अलविदा, राहत साहब! (श्रद्धांजलि)

Rahat-Indori

राहत इंदौरी (1 जनवरी 1950 – 11 अगस्त 2020 )

उर्दू अदब के मशहूर शायर राहत इंदौरी का मंगलवार 11 अगस्त को इंदौर में देहांत हो गया। वे 70 वर्ष के थें और COVID19 से जूझ रहे थें। वायरस के चलते बीमारी में उन्हें दो बार दिल का दौरा पड़ा और तमाम कोशिशों के बावजूद बचाया नहीं जा सका। सुबह ही उनमें वायरस के संक्रमण की पुष्टि हुई थी।

राहत इंदौरी का बचपन का नाम कामिल था जो बाद में राहतउल्ला कुरैशी हुआ लेकिन दुनिया में पहचान डॉ. राहत इंदौरी के नाम मिली। वे देवी अहिल्या विश्वविद्यालय इंदौर में उर्दू साहित्य के प्राध्यापक भी रहे। उन्होंने उर्दू साहित्य के लिए काफी रिसर्च भी किया।

राहत साहब हर दिल अज़ीज़ शायर थें और देश ही नहीं विदेशों में भी होने वाले मुशायरों की जान हुआ करते थे। उन्होंने महज़ 19 साल की उम्र में शायरी लिखना शुरू कर दिया था। आगे चलकर, आम आदमी की ज़बान में समसामयिक मुद्दों और जज़्बात के ऊफ़ान के साथ अपने अलहदा अंदाज़ में अपनी बात कहना, राहत इंदौरी की पहचान बना। राहत इंदौरी ने सियासी शेर भी खूब कहे और हुकूमत को आईना दिखाया। एक बार 2008 में उन्हें मंच पर ही शेर सुनाते-सुनाते हार्ट अटैक आ गया था, जब वे अपने अंदाज में चर्चित शेर- ‘सभी का ख़ून’ सुना रहे थे और सीने पर हाथ रखकर गिर पड़े। लेकिन उस वक्त करोड़ों चाहने वालों की दुआओं का असर कहिए या फिर कुछ और कि उन्होंने मौत को मात दे दी थी।

उनकी कई गज़लें और ढेरों शेर बेहद चर्चित हुए और लोगों की जुबान पर भी चढ़े। एक बानगी देखिये –

मैं मर जाऊँ तो मेरी इक अलग पहचान लिख देना
लहू से मेरी पेशानी पे हिन्दुस्तान लिख देना।

ऐसी सर्दी है कि सूरज भी दुहाई मांगे
जो हो परदेस में वो किससे रज़ाई मांगे।

जुबां तो खोल, नजर तो मिला, जवाब तो दे
मैं कितनी बार लुटा हूँ, हिसाब तो दे।

फूलों की दुकानें खोलो, खुशबू का व्यापार करो
इश्क़ खता है तो, ये खता एक बार नहीं, सौ बार करो।

आँख में पानी रखो होंठों पे चिंगारी रखो
ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो।

सरहदों पर बहुत तनाव है क्या
कुछ पता तो करो चुनाव है क्या।

लगेगी आग तो आएंगे घर कई ज़द में
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है।

सभी का खून शामिल है इस मिट्‌टी में
किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है।

हाल ही में राहत साहब ने एक ऐसी ग़ज़ल कही थी जिसने लोकप्रियता की नयी बुलंदी को छुआ। इसके एक शेर में उन्होंने COVID19 पर भी अपने बात रखी थी। वो ग़ज़ल है –

बुलाती है मगर जाने का नई
ये दुनिया है इधर जाने का नई।

मेरे बेटे किसी से इश्क़ कर
मगर हद से गुज़र जाने का नई।

ज़मीं भी सर पे रखनी हो तो रखो
चले हो तो ठहर जाने का नई।

सितारे नोच कर ले जाऊंगा
मैं खाली हाथ घर जाने का नई।

वबा फैली हुई है हर तरफ़
अभी माहौल मर जाने का नई।

वो गर्दन नापता है नाप ले
मगर ज़ालिम से डर जाने का नई।

राहत इंदौरी शायर के तौर पर इतने प्रसिद्द रहे  कि फिल्मों में उनके सफ़र की बहुत काम बातें हुई जबकि उन्होंने करीब दो दर्जन फिल्मों में गीत भी लिखे। मुशायरों में लोगों से सीधे संपर्क करने वाले राहत साहब का दिल मुंबई में नहीं लगा। बंधन में काम करना इस आज़ाद शायर की तबीयत में नहीं था और वे वापस अपने शहर इंदौर चले गए। बाहर निकलते तो बस मुशायरों में शिरकत के लिए। क्या दुबई, क्या मुंबई और क्या हैदराबाद –  वे शहर दर शहर मुशायरें लूटते रहे। दिलों को जीतते रहे। कुछ प्रमुख फिल्में जिनमें उनके गीत आये, इस प्रकार हैं – ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’, ‘मीनाक्षी – अ टेल ऑफ़ टू सिटीज़’, ‘मिशन कश्मीर’, ‘मर्डर’, ‘करीब’, ‘इश्क़’ और ‘मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी’।

उनके लिखें कुछ मशहूर गीत हैं – चोरी चोरी जब नज़रें (फ़िल्म – करीब), आज हमने दिल का हर किस्सा (फ़िल्म- सर), तुमसा कोई प्यारा कोई मासूम नहीं है (फ़िल्म- खुद्दार), खत लिखना हमें खत लिखना (फ़िल्म- खुद्दार), रात क्या मांगे एक सितारा (फ़िल्म- खुद्दार), दिल को हज़ार बार रोका (फ़िल्म- मर्डर), एम बोले तो (फ़िल्म- मुन्नाभाई एमबीबीएस), बुमरो बुमरो (फ़िल्म- मिशन कश्मीर), ये रिश्ता क्या कहलाता है (फ़िल्म- मीनाक्षी), चोरी-चोरी जब नज़रें मिलीं (फ़िल्म- करीब), देखो-देखो जानम हम दिल (फ़िल्म- इश्क़), नींद चुरायी मेरी (फ़िल्म- इश्क़), मुर्शिदा (फ़िल्म – बेगम जान)। 

राहत साहब के जाने की ख़बर से उर्दू ज़बान, शायरी, कविता-साहित्य, कला और फ़िल्म जगत में शोक की लहर है। स्क्रीनराइटर्स ऐसोसिएशन और इसके तमाम सदस्यों को भी राहत इंदौरी के निधन से आघात पहुंचा है। उनके शेर, ग़ज़लें, बेबाक अंदाज़ और आवाज़ की गूँज जो वे छोड़ कर गए हैं, वो सदा हमें उनकी याद दिलाती रहेगी। हम सभी उनकी आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना करते हैं।

एसडबल्यूऐ के मानद महासचिव सुनील सालगिया ने सोशल मीडिया पर दो अलग अलग पोस्ट में राहत इंदौरी को शायराना अंदाज़ में श्रद्धांजलि दी है – “शायरी वैसे ही इन दिनों हो रही है आहत। वो भी गया जिसे सुनकर मिलती थी राहत।” “कोई ईश्वर को प्यारा होता है तो होता है कोई ख़ुदा को, वो राहत था जिसकी चाहत अल्लाह को भी थी ईश्वर को भी।”

हम राहत इंदौरी साहब के जज़्बे और उनकी शायरी को उन्हीं के इस शेर के साथ सलाम पेश करते हैं –

ये हादसा तो किसी दिन गुज़रने वाला था
मैं बच भी जाता तो एक रोज मरने वाला था।