हरफ़नमौला कादर ख़ान को नमन! (श्रद्धांजलि)

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जाने-माने चरित्र अभिनेता और फ़िल्म लेखक काद़र ख़ान  का 1 जनवरी 2019 की सुबह कैनेडा के एक अस्पताल में देहांत हो गया है। वह पिछले लम्बे अर्से अपने बेटे सरफराज के पास कैनेडा में रह कर अपना इलाज करवा रहे थे। प्रोग्रेसिव सुप्रान्यूक्लीयर पाल्सी डिसऑर्डर रोग के कारण कादर खान के दिमाग ने काफी पहले काम करना बंद कर दिया था।

कादर ख़ान का जन्म 22 अक्टूबर, 1937 को काबुल, अफ़गानिस्तान में अब्दुल रहमान ख़ान और इकबाल बेग़म के घर हुआ। उन्होंने इंस्टीच्यूट ऑफ इंजीनियर्ज़ (इंडिया) से इंजीनियरिंग का मास्टर्ज़ डिप्लोमा सिविल इंजीनियरिंग में विशेषज्ञता के साथ हासिल किया। 1970 से 1975 के दौरान उन्होंने मुंबई बाइकुला स्थित सिविल इंजीनियरिंग के टीचर के तौर पर एम. एच. साबू सिदिक कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग में नौकरी की। कॉलेज के वार्षिक समारोह के दौरान चीफ़ गेस्ट के तौर पर आए दिलीप कुमार ने एक नाटक में उनकी अदाकारी देखी और फ़िल्म के लिए साइन लिया।

वह रंगमंच के लिए नाटक लिखा करते थे, इसी दौरान उन्हें फ़िल्म जवानी-दिवानी लिखने का मौका मिला। इस तरह से उनके फ़िल्मी सफ़र की शुरूआत हुई। 1973 में दाग़ फ़िल्म से उनके एक्टिंग कैरियर की शुरुआत की थी। इस फिल्म में उनके साथ राजेश खन्ना मुख्य भूमिका में थे। उन्होंने 300 से ज़्यादा फ़िल्में में अपनी अदाकारी का लौहा मनवाया। इस के साथ ही उन्होंने 200 के करीब फ़िल्मों के लिए संवाद भी लिखे।

शुरूआत में उन्होंने सह-अभिनेता के किरदार निभाए, लेकिन फ़िर उन्होंने विलेन के किरदार में ऐसी छाप छोड़ी कि एक के बाद एक उन्हें विलेन की भूमिकाएं मिलने लगीं। परवरिश, कुर्बानी, नसीब, नौकर बीवी का, फ़र्ज़ और कानून, जियो और जीने दो जैसी अनेक फ़िल्मों में कादर खान ने विलेन के दमदार किरदार निभाए। एक टीवी इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि उनके ऐसे किरदारों की वजह से उनके बच्चों के सहपाठी उन्हें चिढ़ाया करते थे, जिस वजह से उनका झगड़ा हो जाता था। एक दिन ऐसे ही झगड़े के बाद चोटिल हुए अपने बच्चे को देखने के बाद उन्होंने कुछ दूसरे किरदार करने फ़ैसला किया।

इस दौरान उन्होंने जैसी करनी वैसी भरनी, बीवी हो तो ऐसी, घर हो तो ऐसा, हम हैं कमाल के, बाप नंबरी बेटा दस नंबरी फ़िल्में लिखी, जिनमें उनकी मुख्य भूमिकाएं रहीं। सन 1989 से उन्होंने हिम्मतवाला और आज का दौर फ़िल्मों से कॉमेडी भूमिकाएं निभानी शुरू की जिन में हम, बोल राधा बोल, मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी, दूल्हे राजा, राजा बाबू, बड़े मियां छोटे मियां, हीरो हिंदुस्तानी बेहद चर्चित रहीं। 2000 के पहले दशक वह गोविंदा की फ़िल्मों में अपनी दमदार कॉमेडी का जादू चलाते रहे।  उसके बाद उन्होंने टीवी के ज़रिए भी अपने हंसी के अंदाज़ से दर्शकों के गुदगुदाया।

राजेश खन्ना ने फ़िल्म रोटी के ज़रिए उन्हें संवाद लेखन का मौका दिया। उसके बाद उन्होंने उनकी कई फ़िल्मों के संवाद लिखे, जो टिकट खिड़की पर सफ़ल रहीं। बतौर स्क्रीनराईटर उन्होंने मनमोहन देसाई और प्रकाश मेहरा की अमिताभ बच्चन अभिनीत फ़िल्मों के बेहतरीन संवाद लिखे। अमिताभ बच्चन के बाद कादर ख़ान इकलौते ऐसे कलाकार थे, जिन्होंने दोनों धुर विरोधी कैम्पों में काम किया। उनके धारदार संवादों से सजी यादगार फ़िल्मों में मनमोहन देसाई की धर्मवीर, कुली और अमर, अकबर एंथनी व प्रकाश मेहरा के साथ शराबी, लावारिस और मुकद्दर का सिकंदर रहीं। कादर ख़ान ने अमिताभ बच्चन की हम, सत्ते पे सत्ता के संवाद लिखने के साथ ही अग्निपथ और नसीब फ़िल्मों की पटकथा भी लिखी। सफल फ़िल्मों में लिखे उनके चुटीले और हँसी-मज़ाक से भरपूर संवादों ने भी उनको एक अलग पहचान दिलायी।

उन्होंने फ़िल्मी पर्दे के सामने या पीछे जो भी किया उस पर अपनी गहरी छाप छोड़ गए। अपने आखिरी समय में लम्बी बीमारी की वजह से उन्हें काफ़ी दुख सहना पड़ा और उनकी याददाश्त भी जाती रही। उनके निधन पर  स्क्रीनराइटर्स एसोसिएशन की तरफ़ से श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनका लिखा और अभिनीत किया हुआ यह संवाद याद आता हैः

“इस फ़कीर की एक बात याद रखना ज़िंदगी का अगर सही लुत्फ़ उठाना है ना, तो मौत से खेलो। सुख में हँसते हो तो दुख में कहकहे लगाओ, ज़िंदगी का अंदाज़ बदल जाएगा। ज़िंदा हैं वो लोग जो मौत से टकराते हैं, मुर्दों से बद्दतर हैं वो लोग जो मौत से घबराते हैं। सुख को ठोकर मार, दुख को अपना, अरे! सुख तो बेवफ़ा है, चंद दिनों के लिए आता है और चला जाता है, मगर दुख तो अपना साथी है। अपने साथ रहता है।”

-कादर ख़ान, मुकद्दर का सिकंदर (1978)

लेखक: दीप जगदीप सिंह