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5-Day Screenwriting Workshop by Anjum Rajabali

To help SWA members, and non-members, further their craft and build their writing careers, is one of the primary aims and objectives of SWA.
 
Mumbai based film school Whistling Woods International, in association with SWA, is organising 5-Day Screenwriting Workshop, conducted by Anjum Rajabali (veteran screenwriter and senior EC member of SWA) from February 6-10, 2019, at WWI Campus
  
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Here’s what in store for the participants, at the workshop:
 
Screenwriting has been in the news for almost all of 2018. And, for all the right reasons. Several ‘small’ non-star-driven films performed fabulously, purely because they had wonderful scripts. (Some big ones tanked, owing to weak writing.) Web series, powered primarily by good writing, are making waves continuously. The first edition of Cinestaan India’s Storytellers Script Contest rewarded five new screenwriters with cash prizes totaling Rs. 50 lakh! (The second edition is open right now.) And, of course, the quest for good scripts by studios, production houses and web platforms is going into overdrive.
 
Imperative then, that more people take to this craft, and equally important that we continue to polish and upgrade our skills.
 
This workshop covers both these objectives: Guide new writers into kick-starting their screenwriting seriously, and also serve as a refresher to practicing writers. , by interacting with the workshop instructor and the other guests who will come to share their writing experiences. For both kind of participants, it should be an enriching experience.
 
Like always, this workshop will serve as a basic but comprehensive guide to all the essential elements of the screenwriting craft, and then some more. Topics will include:
 
– How does one formulate the CENTRAL IDEA for a script, and draw dramatic power from it to fuel the full narrative? How does it continue to open up, creating challenging twists for the characters?
 
– Developing this central idea into a PLOT. What is a good plot? How the action plot facilitates the thematic or emotional plot to emerge and bloom.
 
– CHARACTER – the factor that gives life to your story and script, thereby making the viewing experience an involving one. How does one encourage the viewer to develop a bond of empathy with the characters such that the viewer begins to feel for them. Creating interesting but credible characters.
 
– Often a wonderful story, with interesting characters, falls flat because the STRUCTURE of the screenplay was problematic. Hence, it’s essential for us to be mindful of the design that we’re giving our scripts.
 
– If everything else works, but the SCENES are not crafted well, the entire effort takes a toss. We can learn from good examples how scenes can be crisp and impactful, and develop our own style for achieving that.
 
– Last, but obviously not the least – DIALOGUE! Difficult to be taught this, but every screenwriter will have to come up with crackling stuff here. Once again, examples can be inspiring, and a great source of learning.
 
– Archetypal characters and conflicts from MYTHOLOGY continue to find centrality in modern scripts. So, it will certainly help to examine what is mythology really about, and why does it exercise such influence on our imagination, and how does it actually help and enrich our screenwriting.
 
– Today, a professional screenwriter has to be a quasi-lawyer! There will be a substantial session on COPYRIGHT LAW, on WRITERS’ RIGHTS, on CAREER GUIDANCE & STRATEGY (especially on how to approach producers, conduct meetings, etc.). We shall bring in agents and a lawyer, plus a senior official of SWA to guide you and answer all your queries.
 
– This time we have five GUEST SESSIONS with special writers like Vishal Bhardwaj, Juhi Chaturvedi, Sriram Raghavan (and the co-writers of Andhadhun), the writers of Badhai Ho and Stree, and three writers of web series – Smita Singh (Sacred Games), Puneet Krishna (Mirzapur) and Hardik Mehta (The Story of my Assassins).

 

 
E-mail: kanchi.parikh@whistlingwoods.net
or
Call: 022-30916003

मानवीय संवेदनाओं के फ़िल्मकार मृणाल दा को सलाम!

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मृणाल सेन भारतीय समानांतर सिनेमा में सुनहरी अक्षरों में लिखा जा चुका एक ऐसा नाम है, जिसे विश्व सिनेमा के इतिहास में हमेशा अदब और सम्मान से याद किया जाएगा। सिने जगत में प्यार से मृणाल दा के नाम से जाने जाते मृणाल सेन का जन्म 14 मई 1923 को फ़रीदपुर (अब बांग्लादेश में) हुआ। हाई स्कूल के बाद वह उच्च शिक्षा के लिए कलकत्ता आ गए और फ़िर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। कलकत्ता ना सिर्फ़ उन के जीवन बल्कि सिनेमा का भी एक अह्म किरदार बन गया। 1940 के दशक में जब वह कलकत्ता में फ़िज़िक्स की पढ़ाई कर रहे थे, तो वह कम्यूनिस्ट पार्टी के सांस्कृतिक विंग से जुड़ गए और इप्टा में काम करने लगे। उन्होंने पार्टी की सदस्यता तो नहीं ली लेकिन वह विचारधारा से इतने प्रभावित हुए कि आगे चल कर यही उन के सिनेमा की आवाज़ बनी। फ़िल्म सौन्दर्य बोध (एस्थेटिक्स) की एक किताब पढ़ कर उनका रुझान सिनेमा की तरफ़ हुआ। एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के मुताबिक शुरूआत में उन्होंने पत्रकार और दवाइयों के सेल्समैन के तौर पर नौकरियां की, जिस के लिए उन्हें कलकत्ता से दूर जाना पड़ा। लेकिन यह नौकरियां लंबी नहीं चली और जल्दी ही वह कलकत्ता लौट आए और एक फ़िल्म कंपनी में ऑडियो तकनीशियन के तौर पर काम करने लगे। यहीं से उनके फ़िल्मी सफ़र की शुरूआत हुई।

मृणाल दा ने पहली फ़िल्म रात भोर (1956) बनाई, फिर उन्होंने विवाह संबंधों पर आधारित दो फ़िल्में बेशे र्स्वणा (शादी का दिन, 1960) और पुनास्चा (फिर से, 1961) बनाई, जिन के ज़रिए उनकी राजनैतिक विचारधारा के साथ-साथ इटालियन नव-यथार्थवाद और साथी फ़िल्मकार सत्यजीत रे की फ़िल्मों के प्रति उनका लगाव ज़ाहिर हुआ। इन फ़िल्मों ने उन्हें अपने क्षेत्र में एक पहचान दी।

फ़िर पांच और फ़िल्में बनाने के बाद उन्होंने अपनी सबसे महत्वकांक्षी फ़िल्म भुवन शोम (1969) बनाई, जो भारत सरकार से प्राप्त सहायता से बनी एक बेहद कम बजट की फ़िल्म थी। मृणाल सेनः ओवर द ईयर्स नामक किताब में दर्ज समिक बंधोपाध्या को दिए एक इंटरव्यू में मृणाल दा ने बताया था कि वह भुवन शोम के लिए एक नई आवाज़ की तलाश में थे, उन्होंने ख्वाज़ा अहमद अब्बास से इस बारे में बात की। वहीं पर बैठे एक युवा लड़के ने उन से बंगाली में कहा कि वह कलकत्ता में रहा है और बंगाली बोल सकता है। मृणाल दा ने कहा कि उसकी बंगाली बहुत ख़राब है, लेकिन आवाज़ में दम है। अब्बास साहब ने मृणाल दा को उस लड़के को भेजने के बदले उत्पल दत्त को अपने लिए साइन करने का वादा लिया, जिसके लिए मृणाल दा ने हां कर दी। वॉयस ओवर की रिकार्डिंग के कुछ दिन बाद मृणाल दा उस नौजवान को पैसे देने गए तो उसने इंकार करते हुए कहा कि यह उसकी पहली फ़िल्म है, इस लिए वह पैसे नहीं लेगा। तब मृणाल दा ने कहा, ‘बतौर पेशेवर हम सब पैसे ले रहे हैं, तु इंकार करके हमारा अपमान नहीं कर सकते।’ उन्होंने युवक ने पूछा क्या यह उसका पेशा हैॽ उसने हां कहा तो मृणाल दा ने कहा, ‘तो ठीक है, फ़िर आज से शुरूआत करो’ यह तीन सौ रूपए उस युवक की फ़िल्मी दुनिया की पहली कमाई थी। जब मृणाल दा ने फ़िल्म के क्रेडिट देने के लिए उस युवक का नाम पूछा तो उस ने कहा, ‘अमिताभ’। मृणाल दा का कहना था कि तब तक अमिताभ ने फ़ैसला नहीं किया था कि वह अपने नाम के साथ बच्चन लगाएंगे या नहीं। ख़ैर, इस तरह भुवन शोम के वॉयस ओवर के लिए उन्होंने अमिताभ बच्चन को पहला मौका दिया।

भुवन शोम उनकी महानतम फ़िल्मों में से एक साबित हुई, जिस में उत्पल दत्त ने एक ऐसे नौकरशाह की भूमिका निभाई जिस की मुलाकात रिश्वत लेने के आरोपी एक टिकट क्लेटर की पत्नी से होती है। इस फ़िल्म में असलियत के करीब दिखाए गए ग्रामीण परिवेश को और उपहासपूर्ण व्यंग्य ने इसे भारतीय सिनेमा की शाहकार फ़िल्म बना दिया।

जैसे कि शुरूआत में ज़िक्र किया गया है कि कलकत्ता मृणाल दा के जीवन और सिनेमा का अभिन्न अंग रहा है, यूं तो मृणाल दा की तीन फ़िल्में, इंटरव्यू (1971), कलकत्ता (1972) और पदतिक (गोरीला योद्धा, 1973) कलकत्ता ट्रॉयलॉजी के नाम से जानी जाती हैं, लेकिन चांदनी मुखर्जी 2010 में लिखे अपने शोधपूर्ण लेख में बताती हैं कि मृणाल दा की 14 फ़िल्मों में कलकत्ता पूरी तरह और दो-तीन फ़िल्मों के थोड़े से हिस्से कलकत्ता मौजूद है। चांदनी लिखती हैं कि उक्त तीन फ़िल्में शहरी मध्यवर्ग के जीवन का रेखांकन करतीं है, लेकिन तब मृणाल अपनी अभिव्यक्ति की भाषा की तलाश में थे, यह उन के शुरूआती दौर की फ़िल्में हैं, इनमें कलकत्ता पात्र की तरह नहीं आता।

लेकिन आकाश कुसुम में बिल्कुल नए मृणाल दा के दर्शन होते हैं, जिस में पहली बार कलकत्ता एक पात्र के रूप में आता है। इस फ़िल्म के ज़रिए उन्होंने दिखाया है कि शहरी मध्य वर्ग जिन सपनों को सच करने के लिए भाग-दौड़ में लगा रहता है, वह असल में मिथ्या हैं। शहर उन्हें यह सपने देखने के लिए मजबूर करता है, जो कभी पूरे नहीं हो सकते, क्योंकि इस बाज़ार केंद्रित समाज में कोई भी रातोंरात अमीर नहीं हो सकता। इसी वजह से समाज वर्गों मे बंटा रहता है, जो प्रेम को भी अप्रासंगिक बना देता है। इंटरव्यू फ़िल्म आज़ादी के बाद पीछे छूट गई बस्तीवादी मानसिकता पर चोट करती है। इस का मुख्य पात्र नौकरी के लिए इंटरव्यू देने जा रहा है, लेकिन वह उसके लिए अंग्रेज़ी सूट का इंतज़ाम नहीं कर पाता। इस फ़िल्म मे मृणाल दा पर ब्रेख़्तियन अंदाज़ का असर साफ़ दिखाई देता है। इस में कलकत्ता की ट्राम, बस, सड़कें, पैदल चलने वाले, दुकानें किरदारों की तरह अपनी भूमिका निभाते हैं। यही ख़ासियत मृणाल दा को कैमरे से पर्दे पर कहानी लिखने वाला वह सशक्त फ़िल्मकार बनाती हैं, जो कैमरे को कलम की तरह इस्तेमाल करता है। सत्यजीत रे की भी ऐसी ही कहानी वाली फ़िल्म है प्रतिद्वंदी। दोनों ही फ़िल्मों के मुख्य पात्र से इंटरव्यू लेने वाले ट-पटांग सवाल पूछता है, दोनों को ही नौकरी नहीं मिलती। यह कलकत्ता में हिंसा का दौर है, फ़िल्म के अंत में सत्यजीत रे का पात्र दूर गांव में जाकर मेडिकल सेल्समैन की मामूली नौकरी करने लगता है, जबकि मृणाल दा का पात्र शहर नहीं छोड़ता बल्कि बाज़ार में जाकर दुकान के शीशे तोड़ता है, पुतलों के कपड़े फाड़ देता है। एक तरह से वह 70वें दशक की बस्तीवादी संस्कृति के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद करता है। इस तरह मृणाल की फ़िल्मों में प्रकट होते उनके विचार उन्हें अपने दौर के दूसरे फ़िल्मकारों से अलग बनाते हैं।

उनकी काफ़ी फ़िल्में शहरी मध्यवर्ग पर केंद्रित रही हैं जो 70 के दशक में उनकी मानसिकता को दिखाती हैं और इस तरह उनकी फ़िल्में पटकथा लेखकों के लिए मिसाल बन जाती हैं। वह कलकत्ता को फ़िल्मों में इस तरह दिखाते हैं, जैसे गोदार्द की फ़िल्मों में पैरिस नज़र आता है। यह कलकत्ता से उनके प्रेम का चरम ही था कि दुनिया के बाहर बेहतरीन फ़िल्मकारों द्वारा बारह हिस्सों में बनी इंटरनेशनल फ़िल्म सिटी लाईफ़ के एक हिस्से के निर्देशक के तौर पर उन्होंने जो अपने हिस्से की फ़िल्म बनाई उसका टाइटल रखा, कलकत्ताः माई ल्डोराडो (मेरा सोने का शहर)।

अपने जीवन सफ़र के दौरान 34 फ़ीचर फ़िल्मों, 14 लघु फ़िल्मों और 5 दस्तावेज़ी फ़िल्मों का ख़जाना देने वाले मृणाल दा की फ़िल्मकारी का डंका क्षेत्रीय सिनेमा और भारतीय सिनेमा में ही नहीं विश्व सिनेमा में भी बजा। जहां उन्हें बेस्ट फ़िल्म के लिए चार, बेस्ट बंगाली फ़ीचर फ़िल्म के लिए तीन, बेस्ट डायरेक्शन के लिए चार, बेस्ट स्क्रीनप्ले के लिए चार नेशनल अवार्ड मिले और इन्हीं श्रेणियों में कुल चार फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड प्राप्त हुए, वहीं मास्को, बर्लिन, कारलोवी, केन्स, वोलाडॉलिड, शिकागो, मोंट्रियाल, वेनिस और कायरो के इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टीवल्ज़ में उन्हें विभिन्न श्रेष्ठत्म सम्मानों से उन्हें नवाज़ा गया। इस तरह उन्होंने भारतीय सिनेमा को विश्व स्तर पर एक अलग पहचान दिलवाई। एक लेखक के तौर पर, मृणाल दा ने करीब 24 फ़िल्में लिखी, इस में 12 फ़िल्मों की पटकथाएं शामिल हैं, जिन में भुवन शोम, मृग्या, खंडर, एक दिन अचानक और एक अधूरी कहानी जैसी चर्चित हिंदी फ़िल्में भी शामिल हैं। जहाँ एक ओर उन्हें फ़िल्मों में याेगदान के लिए फ़िल्म जगत का स्वश्रेष्ठ सम्मान दादा साहिब फ़ाल्के सम्मान प्राप्त हुअा, वहीं भारत सरकार ने भी उन्हें सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से अलंकृत किया गया।

मृणाल दा ने हर नए दशक में अपनी फ़िल्मकारी का एक नया अंदाज़ दिखाया, जिस के बारे में उनका कहना था कि उनकी हर नई फ़िल्म उनकी पिछली फ़िल्म का विस्तार होता है। चाहे उन्होंने फ़िल्मकारी के अंदाज़ में अनेकों प्रयोग किए, लेकिन उनका केंद्र बिंदु एक ही रहा, वह केंद्र बिंदु था, जीवन के विभिन्न हालात में मानव के व्यवहार का अध्ययन करना। यह मानव शहरी, ग्रामीण और कबायली कोर्इ भी हो सकते हैं। उन्होंने एक बार कहा था-

“मेरी सृजनात्मकता का केंद्रीय सवाल रहा है कि एक व्यक्ति किसी विशेष स्थिति में क्या करता है। मैंने हमेशा व्यक्ति को एक विशेष स्थिति में डालने की कोशिश की है और उस की प्रतिक्रियाएं देखने की कोशिश की है, ऐसा करते हुए मैनें हमेशा ख़ुद को उस स्थिति में फंसा होने की कल्पना करने की कोशिश की है।”

30 दिसंबर 2018 को जब उन्होंने अपने प्रिय शहर कलकत्ता में रविवार की छुट्टी वाले दिन अंतिम सांस ली, तो वह समाजिक सरोकार से जुड़े सिनेमा में रूचि रखने वाले सिने-प्रेमियों और फ़िल्मकारों को भी ऐसी स्थिति में छोड़ गए हैं, जिसकी कल्पना शायद वे ही कर सकते हैं।

हम स्क्रीनराइटर्स एसोसिएशन की तरफ़ से भारतीय सिनेमा के विल्क्षण हस्ताक्षर, हम सब के प्यारे मृणाल दा को श्रद्धा भरा सलाम भेजते हैं।

– दीप जगदीप सिंह

(दीप स्वतंत्र पत्रकार, स्क्रीनराईटर और अनुवादक हैं।)

हरफ़नमौला कादर ख़ान को नमन! (श्रद्धांजलि)

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जाने-माने चरित्र अभिनेता और फ़िल्म लेखक काद़र ख़ान  का 1 जनवरी 2019 की सुबह कैनेडा के एक अस्पताल में देहांत हो गया है। वह पिछले लम्बे अर्से अपने बेटे सरफराज के पास कैनेडा में रह कर अपना इलाज करवा रहे थे। प्रोग्रेसिव सुप्रान्यूक्लीयर पाल्सी डिसऑर्डर रोग के कारण कादर खान के दिमाग ने काफी पहले काम करना बंद कर दिया था।

कादर ख़ान का जन्म 22 अक्टूबर, 1937 को काबुल, अफ़गानिस्तान में अब्दुल रहमान ख़ान और इकबाल बेग़म के घर हुआ। उन्होंने इंस्टीच्यूट ऑफ इंजीनियर्ज़ (इंडिया) से इंजीनियरिंग का मास्टर्ज़ डिप्लोमा सिविल इंजीनियरिंग में विशेषज्ञता के साथ हासिल किया। 1970 से 1975 के दौरान उन्होंने मुंबई बाइकुला स्थित सिविल इंजीनियरिंग के टीचर के तौर पर एम. एच. साबू सिदिक कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग में नौकरी की। कॉलेज के वार्षिक समारोह के दौरान चीफ़ गेस्ट के तौर पर आए दिलीप कुमार ने एक नाटक में उनकी अदाकारी देखी और फ़िल्म के लिए साइन लिया।

वह रंगमंच के लिए नाटक लिखा करते थे, इसी दौरान उन्हें फ़िल्म जवानी-दिवानी लिखने का मौका मिला। इस तरह से उनके फ़िल्मी सफ़र की शुरूआत हुई। 1973 में दाग़ फ़िल्म से उनके एक्टिंग कैरियर की शुरुआत की थी। इस फिल्म में उनके साथ राजेश खन्ना मुख्य भूमिका में थे। उन्होंने 300 से ज़्यादा फ़िल्में में अपनी अदाकारी का लौहा मनवाया। इस के साथ ही उन्होंने 200 के करीब फ़िल्मों के लिए संवाद भी लिखे।

शुरूआत में उन्होंने सह-अभिनेता के किरदार निभाए, लेकिन फ़िर उन्होंने विलेन के किरदार में ऐसी छाप छोड़ी कि एक के बाद एक उन्हें विलेन की भूमिकाएं मिलने लगीं। परवरिश, कुर्बानी, नसीब, नौकर बीवी का, फ़र्ज़ और कानून, जियो और जीने दो जैसी अनेक फ़िल्मों में कादर खान ने विलेन के दमदार किरदार निभाए। एक टीवी इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि उनके ऐसे किरदारों की वजह से उनके बच्चों के सहपाठी उन्हें चिढ़ाया करते थे, जिस वजह से उनका झगड़ा हो जाता था। एक दिन ऐसे ही झगड़े के बाद चोटिल हुए अपने बच्चे को देखने के बाद उन्होंने कुछ दूसरे किरदार करने फ़ैसला किया।

इस दौरान उन्होंने जैसी करनी वैसी भरनी, बीवी हो तो ऐसी, घर हो तो ऐसा, हम हैं कमाल के, बाप नंबरी बेटा दस नंबरी फ़िल्में लिखी, जिनमें उनकी मुख्य भूमिकाएं रहीं। सन 1989 से उन्होंने हिम्मतवाला और आज का दौर फ़िल्मों से कॉमेडी भूमिकाएं निभानी शुरू की जिन में हम, बोल राधा बोल, मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी, दूल्हे राजा, राजा बाबू, बड़े मियां छोटे मियां, हीरो हिंदुस्तानी बेहद चर्चित रहीं। 2000 के पहले दशक वह गोविंदा की फ़िल्मों में अपनी दमदार कॉमेडी का जादू चलाते रहे।  उसके बाद उन्होंने टीवी के ज़रिए भी अपने हंसी के अंदाज़ से दर्शकों के गुदगुदाया।

राजेश खन्ना ने फ़िल्म रोटी के ज़रिए उन्हें संवाद लेखन का मौका दिया। उसके बाद उन्होंने उनकी कई फ़िल्मों के संवाद लिखे, जो टिकट खिड़की पर सफ़ल रहीं। बतौर स्क्रीनराईटर उन्होंने मनमोहन देसाई और प्रकाश मेहरा की अमिताभ बच्चन अभिनीत फ़िल्मों के बेहतरीन संवाद लिखे। अमिताभ बच्चन के बाद कादर ख़ान इकलौते ऐसे कलाकार थे, जिन्होंने दोनों धुर विरोधी कैम्पों में काम किया। उनके धारदार संवादों से सजी यादगार फ़िल्मों में मनमोहन देसाई की धर्मवीर, कुली और अमर, अकबर एंथनी व प्रकाश मेहरा के साथ शराबी, लावारिस और मुकद्दर का सिकंदर रहीं। कादर ख़ान ने अमिताभ बच्चन की हम, सत्ते पे सत्ता के संवाद लिखने के साथ ही अग्निपथ और नसीब फ़िल्मों की पटकथा भी लिखी। सफल फ़िल्मों में लिखे उनके चुटीले और हँसी-मज़ाक से भरपूर संवादों ने भी उनको एक अलग पहचान दिलायी।

उन्होंने फ़िल्मी पर्दे के सामने या पीछे जो भी किया उस पर अपनी गहरी छाप छोड़ गए। अपने आखिरी समय में लम्बी बीमारी की वजह से उन्हें काफ़ी दुख सहना पड़ा और उनकी याददाश्त भी जाती रही। उनके निधन पर  स्क्रीनराइटर्स एसोसिएशन की तरफ़ से श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनका लिखा और अभिनीत किया हुआ यह संवाद याद आता हैः

“इस फ़कीर की एक बात याद रखना ज़िंदगी का अगर सही लुत्फ़ उठाना है ना, तो मौत से खेलो। सुख में हँसते हो तो दुख में कहकहे लगाओ, ज़िंदगी का अंदाज़ बदल जाएगा। ज़िंदा हैं वो लोग जो मौत से टकराते हैं, मुर्दों से बद्दतर हैं वो लोग जो मौत से घबराते हैं। सुख को ठोकर मार, दुख को अपना, अरे! सुख तो बेवफ़ा है, चंद दिनों के लिए आता है और चला जाता है, मगर दुख तो अपना साथी है। अपने साथ रहता है।”

-कादर ख़ान, मुकद्दर का सिकंदर (1978)

लेखक: दीप जगदीप सिंह

Attention, all SWA members! सभी एसडबल्यूए सदस्य, कृपया ध्यान दें!

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Dear Writer-Member.

Greetings from SWA!

Recently, we have noticed some rather silly rumours floating around, spread with the clear intention of spreading some lies about your Association. This is not a new phenomenon. In fact, every time a person or an organisation tries to do good work, there will always be envious people trying to discredit them.

However, we don’t want you to be anxious or concerned about any of this. So, to clear the air, here are the facts:

  1. It was SWA that informed the Federation (FWICE), in early 2018, that it has chosen to disaffiliate itself. While we have always respected the Federation, and continue to do so, we feel that since it is responsible for more than 2 lakh workers in our industry, its energies should focus on their issues, which are very important and urgent. It is unfair of unions like SWA, which represent professionals, to push their agenda as a priority on FWICE. That will just dilute FWICE’s efforts towards those workers.

Hence, with a very courteous letter, we informed them that we will not be the Federation’s affiliates, but will continue to work in parallel with them. Moreover, whenever there is a struggle for justice that concerns the entire industry, we shall most certainly stand shoulder-to-shoulder with the Federation, strongly.

So don’t pay any heed to the rumours that the Federation has disaffiliated us. In fact, you may be aware that the union of actors – CINTAA – too has disaffiliated from FWICE.

  1. Another silly rumour being spread is that after SWA’s disaffiliation from FWICE, its members cannot work in the Film and TV industry. This is patently false and mischievous. Do know that no person or union can stop you from working here.

Actually, after the strike of 2015, some producers had filed a complaint with the Competition Commission of India (CCI) urging it to stop the practice that only union members affiliated to the Federation can work in the film and TV industries. The CCI in its order termed this practice as monopolistic declaring it illegal, and threatened very strict action if any individual, regardless of her/his affiliation or membership is stopped from working in this industry. 

  1. Friends, SWA is a strong union that was established in 1954, by stalwarts like Ramanand Sagar, Khwaja Ahmad Abbas, Shailendra, Sahir Ludhianvi, Majrooh Sultanpuri and Kamal Amrohi. It continues to gain strength. On the legal front, your Association has a full-time copyright lawyer as its Legal Officer to offer free legal advice and guidance to all members for their contracts and complaints. Moreover, the Dispute Settlement Committee (DSC) continues to vigorously take up all genuine complaints by our members. 

A new and truly wonderful development is that SWA will soon offer legal support too to those members who may need to approach the court, after the DSC has decided in their favour. The detailed guidelines for the same are being worked out, which we shall announce very soon. This will give more concrete power to aggrieved members to seek justice legally.

  1. SWA has been organizing regular activities and events like Workshops, Conferences, Seminars, Vartaalaaps, other interesting events and initiatives to educate and enlighten our members. Our collaboration with worthy organisations for Contests, Pitching Programmes, LitFests, Fellowships, Scholarships will continue in higher gears. 

All in all, please be assured that SWA continues its efforts for you vigorously, as a proactive and vigilant union. So, please dismiss any silly rumours from any individual or organisation that seeks to mislead you about SWA. And, if you have any questions or doubts, at any time, about anything, please reach out to us by dropping an email or visiting our office. We shall promptly clear the air for you.

We believe that those people spreading rumours about SWA have formed a parallel association and are exhorting writers to join that. It is of course your democratic right to join any association that you believe is good for you. However, do know that, as per SWA’s constitution, our members cannot simultaneously belong to any other writers’ association.

With you, for you, always –

On behalf of the Executive Committee of SWA,

Sunil Salgia (Hon. Gen. Secretary)

***

आपकी अपनी मज़बूत संस्था एसडबल्यूए (SWA) की ओर से एक ख़ास संदेश

प्रिय लेखक साथी!

नमस्कार! 

इन दिनों ये देखा गया है कि हमारे एसोसिएशन के बारे में कुछ अफ़वाहें और झूठी बातें फैलायी जा रही हैं। हालाँकि, ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। जब भी हमने कुछ अच्छा काम किया है, कुछ ईर्ष्यालु लोगों ने हमारे खिलाफ झूठी बातें फैलाने का काम किया है। 

आप किसी अफ़वाह या किसी की दुर्भावना का शिकार न हों, इसलिए ज़रूरी है कि आप अपने एसोसिएशन के क्रियाकलापों के बारे में सच जानें।

  1. सबसे पहले तो जानना ज़रूरी है कि साल 2018 की शुरुआत में हमने ख़ुद फेडरेशन (FWICE) से अलग होने का फ़ैसला लिया था। हालाँकि, अलग होने का अर्थ यह कतई नहीं है कि हम फेडरेशन के औचित्य को नकार रहे हैं। सच यह है कि फेडरेशन की ऑफ़िशियल भूमिका को लेकर हमारे मन में सम्मान है, और जब कभी ऐसा ज़रूरी लगा कि फिल्म इंडस्ट्री के हितों की रक्षा के लिए बाकी एसोसिएशनों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर साथ चलना आवश्यक है, तो हम फेडरेशन के साथ खड़े होने में तनिक देर नहीं लगायेंगे। 

साथियों, फिल्म इंडस्ट्री में 2 लाख से अधिक वर्कर्स हैं, जिनमें स्पॉट बॉय से लेकर, जूनियर आर्टिस्ट, ग्रुप डांसर, लाइटमैन, महिला कलाकार, आर्ट डिपार्टमेंट के वर्कर, ड्रेसमैन, हेयर ड्रेसर्स और मेकअपमैन शामिल हैं। उनके अधिकारों और हितों की रक्षा सबसे ज़रूरी और सबसे ऊपर है। ऐसे में यह अनुचित हो जाता है कि हम फेडरेशन को उस लड़ाई से हटाकर पहले राइटर्स के हित और हक़ के लिए सोचने और लड़ने को मजबूर करें। ऐसा करने से निश्चित तौर पर फेडरेशन का फ़ोकस शिफ्ट होगा और मजदूरों के हकों और हितों की लड़ाई कमजोर पड़ेगी। 

यही सब सोचकर हमने फेडरेशन को पूरी विनम्रता के साथ उनसे ख़ुद के अलग होने का पत्र लिखा कि हम भले ही आज अलग हो रहे हैं, लेकिन जब कभी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े मसलों पर न्याय की लड़ाई में हमारे साथ आने की आवश्यकता पड़ेगी, हम बिना एक पल की भी देर लगाए साथ आ खड़े होंगे। अतः झूठी अफ़वाहों पर ध्यान ना दें कि फेडरेशन नेहमें निकाला है। बल्कि शायद आपको पता हो कि कलाकारों का यूनियन सिंटा (CINTAA) भी फेडरेशन से अलग हो चुका है। 

  1. दूसरा मुद्दा यह है कि ऐसी भी खबरें भी फैलाई जा रही हैं कि स्क्रीनराइटर्स एसोसिएशन चूँकि फेडरेशन से अलग हो चुका है, इसलिए हमारे सदस्य फिल्म-टीवी इंडस्ट्री में काम नहीं कर सकेंगे। साथियों, यह पूरी तरह ग़लत और दुर्भावनाओं से भरा है। आप आश्वस्त रहें कि कोई भी व्यक्ति या यूनियन आपको फिल्म-टीवी इंडस्ट्री में काम करने से नहीं रोक सकता।

असल में, 2015 में फेडरेशन द्वारा बुलाई गयी हड़ताल के बाद कुछ प्रोड्यूसरों ने कम्पटीशन कमीशन ऑफ़ इंडिया (CCI) से गुहार लगाई थी कि फिल्म और टीवी इंडस्ट्री में सिर्फ फेडरेशन से संबद्ध यूनियनों से जुड़े सदस्यों के ही काम करने की प्रथा पर रोक लगाई जाए। तब सीसीआई ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि अगर कोई यूनियन या फेडरेशन किसी भी व्यक्ति को, जो किसी यूनियन का मेंबर नहीं है, काम करने से रोकता है तो उस यूनियन या/और फेडरेशन के ख़िलाफ कठोर कार्रवाई की जायेगी।

  1. साथियों, एसडबल्यूए 1954 में रामानन्द सागर, ख्वाजा अहमद अब्बास, शैलेंद्र, साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी, कमाल अमरोही जैसी दिग्गज शख़्सियतों द्वारा स्थापित एक मज़बूत यूनियन है, और पिछले इतने सालों से हम निरंतर और मज़बूत होते जा रहे हैं। क़ानूनी मोर्चे की ही बात करें, तो अपने सदस्यों की शिकायतों और कॉन्ट्रैक्ट पर मुफ्त सलाह और गाइडेंस के लिए आपके एसोसिएशन ने कॉपीराइट के एक जानकार वकील को फुल टाइम के लिए नियुक्त कर रखा है।

एक और जो ऐतिहासिक क़दम हम उठाने जा रहे हैं, वो ये है कि एसडबल्यूए बहुत जल्द अपने उन सदस्यों को क़ानूनी सहायता देने की स्थिति में होगा, जिनके मामलों पर कोर्ट जाने के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं रह जाता है। हम इस नयी योजना पर काम कर रहे हैं और बहुत जल्द इस बाबत आपको सूचित करेंगे। निश्चित तौर पर हमारा यह क़दम न्याय पाने की दिशा में बेहद मज़बूत और महत्वपूर्ण होगा!

  1. आपका एसोसिएशन नियमित रूप से अपने नए–पुराने सदस्यों को लेखन के स्तर पर और सशक्त बनाने के लिए वर्कशॉप, कांफ्रेंस, सेमिनार, वार्तालाप आदि  जैसे ज़रूरी और दिलचस्प कार्यक्रम नियमित तौर पर आयोजित कर रहा है। साथ ही, प्रतिष्ठित और योग्य संगठनों, जैसे विस्लिंगवुड्स इंटरनैशनल, सिनेस्तान, MPA-APSA आदि के साथ मिलकर हम स्क्रिप्ट प्रतियोगिता, पिचिंग कार्यक्रम, फ़ैलोशिप, स्कॉलरशिप और साहित्य मेला आदि जैसे कार्यक्रम भी पूरे उत्साह के साथ आयोजित कर रहे हैं, ताकि प्रतिभावान लेखकों को काम और प्रोत्साहन के सुनहरे अवसर मिल सके।

कुल मिलाकर यह है कि आप अपने एसोसिएशन पर विश्वास रखें कि आपका एसोसिएशन (SWA) आपके हितों और अधिकारों को लेकर पूरी तरह सतर्क और सक्रिय है। इसलिए यदि कोई व्यक्ति या संगठन एसडबल्यूए को लेकर आपको गुमराह करने की कोशिश करता है, तो बिना देर लगाए उसे नकार दिया करें! और अगर आपके मन में किसी अफवाह की वजह से किसी प्रकार का संदेह प्रकट हो जाए, तो तुरंत ऑफिस आकर हमें संपर्क करें या ईमेल लिखें।

हम यह जानते हैं कि जो लोग एसडबल्यूए के बारे में अफवाहें फैला रहे हैं, उन्होंने हमारे समानांतर एक एसोसिएशन भी बनाया है और ख़ास मकसद के तहत दुर्भावनाओं से ग्रस्त होकर यह कार्य कर रहे हैं। आपके हित कहाँ और किसके साथ सुरक्षित हैं, ये आपसे बेहतर कोई और नहीं जान सकता। हाँ, बस इतना ध्यान रहे कि एसडबल्यूए के संविधान के अनुसार आप किसी दूसरे समानांतर राइटर्स एसोसिएशन की सदस्यता नहीं रख सकते।

हमेशा आपके लिए, आपके साथ –

स्क्रीनराइटर्स एसोसिएशन की कार्यकारिणी समिति की तरफ से,

सुनील सालगिया (मानद महासचिव)

IPRS invites Lyricists to become Members

The Indian Performing Rights Society Limited is the body which issues Licences to users of music and collect Royalties from them, for and on behalf of its Members i.e. the Authors, the Composers and the Publishers of Music and distribute this Royalty amongst them after deducting its administrative costs. It collects license fees for the utilization of musical works (lyrical work being part of the said Musical work) & distribute the collection made to its Members only.

IPRS, which came into existence on 23rd August 1969, is a representative body of Owners of Music, viz. The Composers, Lyricists (or Authors) and the Publishers of Music and is also the sole Authorized Body to issue Licences permitting usage of Music within India by any person. Composers are those who are better known as Music Directors, Authors are better known as Lyricists, Publishers of Music are the Producers of Films and Music Companies, or those who hold Publishing Rights of the Musical Works. The Society is a non-profit making Organization and is a Company Limited by Guarantee and Registered under the Companies Act, 1956. IPRS has been granted Registration by the Central Government on 28th November, 2017 and is accordingly now a Copyright Society registered under Section 33 of the Copyright Act, 1957 and Copyright Rules, 2013.

IPRS invites SWA’s all lyricist members, who are creators of such Musical Works, to become its member and get the benefit of Royalties collected on their behalf for the utilization of such works.

IPRS 1920 X 800

“IPRS is your trusted partner. It will protect as well as effectively and transparently monetize your rights with each member discovering fair value from the exploitation of their creativity & investment in music. 2018-19 will surely be a big year for IPRS, its members and Music in India.”

 – Shri Javed Akhtar, IPRS Chairman 

Note: This invite is for the AUTHORS (LYRICISTS) who have created a lyrical work (which is part of Musical Work) & are member of Screenwriters Association (SWA) who are yet not a part of IPRS.

CONTACT: Mr. Manish Jani (Manager –  Member Relation & Data) – manish@iprsltd.com Mr. Sandesh Tharkude/Mr. Som Sonik (Membership Department) – membership@iprsltd.com Online Member application portal link – http://114.143.234.186:43380/ Websitewww.iprs.org
Team SWA

CINESTAAN’S SCRIPT CONTEST (SUPPORTED BY SWA) IS BACK!

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After an overwhelming response to its first edition, Cinestaan has now called for entries for the second edition of their ambitious INDIA’S STORYTELLERS script contest. The contest is actively ‘Supported By’ the Screenwriters Association, as a significant platform for all Indian screenwriters, young as well as experienced, to showcase their talent and win cash prizes worth INR 50 Lakh, with the top prize being INR 25 Lakh for the Best Script.

Once again, the top jury of the contest will be actor-producer-director Aamir Khan, writer-director Rajkumar Hirani and screenwriter Juhi Chaturvedi, while the senior member of SWA’s Executive Committee Anjum Rajabali will act as the jury Chairperson. (Click here for Aamir Khan’s special message for all screenwriters.)

The deadline for Submitting Synopsis for the First Round of the Contest is JANUARY 22, 2019 after which, the shortlisted applicants will be asked to submit a full script for Round 2. While an applicant may submit as many entries, there is an Application Fee of INR 1,500/- per entry.

The Screenwriters Association encourages all its members to participate in the contest. We believe it’s a wonderful opportunity for deserving screenwriters and can truly help your script find its rightful place. In this contest, the Copyright of the screenwriter is fully protected, while there are no hidden obligations either. Apply today.

Main contest page: https://scriptcontest.cinestaan.com/

‘Apply Now’ page: https://scriptcontest.cinestaan.com/apply_now.php

Rules & Regulations: https://scriptcontest.cinestaan.com/rules.php

Terms & Conditions: https://scriptcontest.cinestaan.com/terms.php

Frequently Asked Questions: https://scriptcontest.cinestaan.com/faqs.php

Shortlisted titles from Round 2 of the first edition of the contest:  https://scriptcontest.cinestaan.com/2017-18.php#titles (The top winners of the first edition of the contest will be announced shortly, by the end of November or in the first week of December, 2018.)

For any contest related queries: scqueries@cinestaan.com

All the best!

Team SWA

SWA organises Gender Sensitisation Workshop by Paromita Vohra

“NARI TERI YAHI KAHANI TO #BoreMatKarYaar”

A SCREENWRITING WORKSHOP BY PAROMITA VOHRA ON GENDER SENSITISATION

For FB - gender sensitisation

Feminist ideas always show up as an exception in Hindi films – or most films for that matter. It is crisis, revolution, morality play around themes of rape, dowry, divorce, revenge, victimhood or heroism. But does a feminist film always come waving a flag? Or can we imagine it more interestingly, more true to life, more humorous and sexy with more smarts and heart? Could Hindi Masala RomCom be more feminist than a film about feminism? Are songs and beauty, love and interiority full of feminist possibility (Yes!)? Can we write different female characters without writing different male characters? Can we re-conceptualise ‘issue-based films’? In other words – can we imagine an effortless feminism? One that is part of every kind of film?

Paromita Vohra Photo-Milan Gupta

Paromita Vohra is a writer & a filmmaker whose work mixes fiction and non-fiction to explore themes of urban life, popular culture, love, desire and gender. Her films as writer include the internationally released feature Khamosh Pani/Silent Waters and as well as the play Ishqiya Dharavi Ishtyle. She is the founder and Creative Director of Agents of Ishq (a unique digital project about sex & love in India)

Date: November 15th, 2018 (Thursday)      Time: 05:30 PM

Venue: SWA Office, 201 – 204, Richa Building, Plot No. B – 29, Off New Link Road, Opposite Citi Mall, Andheri (West) Mumbai

NOTE: Only for SWA members. To attend, RSVP by sending an email to contact@swaindia.org Limited seats (for first 45 members only – On ‘First Come, First Served’ basis).

SWA collaborates with Critics’ Choice Short Films Awards

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In a first ever event, independent, well-known, movie-loving film critics from across the country — from newspapers, TV channels, websites and radio — have come together formally to form the Film Critics Guild. Motion Content Group India has partnered with the Film Critics’ Guild for the first edition of Critics’ Choice Short Films Awards in India. It is a first of its kind unbiased reward and recognition platform for the short film makers of the country.

The Screenwriters Association proudly supports the Film Critics’ Guild for Critics’ Choice Short Film Awards and encourages its members to participate for the same. There is no fees for submission while the finale – On Ground event celebrating the best of Indian Short films made between OCT 2017 – OCT 2018 ,  will be organized in Mumbai in Dec (2018).

Entries are open till 10th Nov , 2018.

For Details and Submissions, Log on to www.ccsfa.co.in

MPA-APSA felicitates ‘Launch Your Script’ 2018 finalists

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CREATING A UNIQUE GLOBAL OPPORTUNITY FOR INDIAN SCREENWRITERS

Screenwriters Association (SWA), Motion Picture Association (MPA) and Asia Pacific Screen Awards (APSA) launched a joint script development outreach program, ‘Launch Your Script’, 2018, in India earlier this year to enable Indian screenwriters to showcase their work on a global platform.

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L–R: Saiwyn Quadras, Screenwriter, Meenakshi Shedde, APSA Academy Member, Suman Mukho-padhyay, Filmmaker, Lohita Sujith, MPA, India, Anubhav Chopra, LATC Global Film and TV program winner, Swara Bhaskar, Actor, Debashish Irengbam and Anjum Rajabali, SWA

To mark the success of ‘Launch Your Script’, 2018, SWA hosted a felicitation ceremony for the LATC Global Film and TV program winner, Anubhav Chopra for his entry titled “Phurrr” and the twelve finalists of the outreach program on October 24th 2018 at the SWA office in Andheri (W).

Swara Bhaskar, actor known for her roles in films such as Tanu Weds ManuRanjhanaa, and the recently released Veere Di Wedding and Saiwyn Quadras, writer of popular films such as NeerjaMary Kom and Parmanu – the story of Pokhran were the Chief Guests. Also in attendance, were members from the MPA’s India office, SWA, senior APSA Academy members and Suman Mukhopadhyay, recipient of the 2017 MPA APSA Academy Film Fund grant.

The objective of the outreach program was to open doors for SWA members and screenwriters across the country to compete in the 2018 MPA APSA Academy Film Fund. After receiving over 600 entries and going through multiple rounds of evaluation, SWA and the selection committee comprising APSA Academy members: Rajit Kapur, Mayank Tewari, Leena Yadav, Rajan Khosa and Meenakshi Shedde shortlisted twelve finalists whose entries stand a chance to win a script development grant of USD 25,000 during the 12th Asia Pacific Screen Awards, to be held in Brisbane, Australia in November this year.

Chair of the Asia Pacific Screen Awards and its Academy Michael Hawkins said, “The MPA APSA Academy Film Fund has seen phenomenal success in 2018 with finished projects premiering at Cannes, Venice and beyond. APSA applauds SWA and MPA India for their extensive outreach in support of the initiative, which in 2017 saw one of the applicants through this process, Suman Mukhopadhyay, become one of the four successful MPA Film Fund recipients. We look forward to seeing a strong number of applicants again in 2018.”

Mike Ellis, President and Managing Director, Motion Picture Association, Asia Pacific said, “ “We are delighted to partner once again with the Screen Writers Association of India and the Asia Pacific Screen Awards in this enterprising program that offers screenwriters an avenue to secure significant support for a new feature film project. In 2017, Suman Mukhopadhyay’s project Paradise in Flames, went on to receive one of the four USD$25,000 script development grants. The project is now well advanced in the development stage. The MPA APSA Academy Film Fund is now recognized as a world-class initiative for kick-starting exciting stories from every corner of the Asia Pacific.”

Chief Guest of the event, Swara Bhaskar said, “A script is where the depth of a character lies. No matter how hard an actor tries, there has to be something more in the writing for the character and the plot to stand out and be real. Now that I’m writing a script myself, I can also empathize with the struggle and hard work of the process of script writing.”

Speaking about the collaboration, Anjum Rajabali, veteran screenwriter and Executive Committee Member, SWA said, “The Screenwriters Association is privileged to have been invited to associate with the Asia Pacific Screen Awards and the Motion Picture Association in this ‘Launch Your Script’ initiative since 2017. SWA congratulates its member, Anubhav Chopra for emerging as the winner of the prestigious LATC Global Film and TV program for 2018. It also offers its best wishes to the ‘Launch your Script’ finalists.”

About the MPA APSA Academy Film Fund: The Motion Picture Association (MPA) and Asia Pacific Screen Awards (APSA) annually awards four script development grants of US $25,000 each to APSA Academy members at the awards ceremony held in Brisbane, Australia. APSA is regarded as the highest accolade in film in the region, and these grants provide significant support to enable stories from the Asia Pacific to reach the global stage. Winners of the film fund in the past have included Iranian writer-director Asghar Farhadi (for A Separation, which went on to win an Academy Award®) and Australian writer-director Rolf de Heer (for Mr. Ward’s Incredible Journey). In 2017, SWA member Suman Mukhopadhyay’s Paradise in Flames was one of the four recipients of the MPA APSA Academy Film Fund. This project was submitted with the endorsement of APSA Academy member Rajit Kapur as a creative consultant.

About SWA: The Screenwriters Association (SWA, formerly Film Writers’ Association – Regd. Under the Trade Union Act 1926, Regd. No. 3726) is a Trade Union of screenwriters and lyricists who work for Films, TV and Digital Media in India. Authors, novelists, playwrights, journalists who aspire for to diversify or join full-time the mediums of films, TV or Digital entertainment, are also members of the SWA.

SWA to felicitate finalists of MPA-APSA ‘Launch Your Script’ Program

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To mark the success of our ‘Launch Your Script’ 2018 contest, an outreach program for scriptwriting that was launched by the Screenwriters Association (SWA), India, in collaboration with Motion Picture Academy (MPA) and Asia Pacific Screen Awards (APSA), SWA will host a felicitation ceremony for the LATC Global Film and TV program winner, Anubhav Chopra, and MPA APSA Academy Film Fund finalists, on October 24th 2018, Wednesday, at 6:00 PM, at its office in Andheri West. (Click here for the list of finalists.)

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The chief guests for the event will be actress Swara Bhaskar, known for her roles in films such as Tanu Weds Manu, Ranjhanaa, and the recently released Veere Di Wedding and Saiwyn Quadras, writer of popular flicks such as NeerjaMary Kom and Parmanu – the story of Pokhran;  the program will also be attended by members from the press, MPA, APSA, and SWA, and the team of panelists. The SWA-MPA-APSA Academy Film Fund jury from India consisted of senior APSA members – namely Rajit Kapur, Leena Yadav, Rajan Khosa, Mayank Tewari and Meenakshi Shedde.

The objective of this contest was to open the doors for our members to compete in the MPA APSA Academy Film Fund, 2018, in Brisbane, Australia for the prestigious $25000 script development grant. And the prime reward, of course, was a paid trip to Los Angeles for the Latin American Training Centre (LATC) Global Film & TV Program workshop, in which the winner would be able to spend a week networking and attending workshops and interacting with industry professionals in LA. After receiving an enormous amount of entries and going through multiple rounds of evaluation, SWA finally found the list of twelve finalists whose entries will be sent to compete in the APSA Academy Film Fund. With this, the name of the winner of the LATC Global Film and TV program this year was also announced.

About the MPA APSA Academy Film Fund: The Motion Picture Association (MPA) and Asia Pacific Screen Awards (APSA) annually awards four script development grants of US $25,000 each to APSA Academy members at the awards ceremony held in Brisbane, Australia. APSA is regarded as the highest accolade in film in the region, and these grants provide significant support to enable stories from the Asia Pacific to reach the global stage. Winners of the film fund in the past have included Iranian writer-director Asghar Farhadi (for A Separation, which went on to win an Academy Award®) and Australian writer-director Rolf de Heer (for Mr. Ward’s Incredible Journey). In 2017, SWA member Suman Mukhopadhyay’s Paradise in Flames was one of the four recipients of the MPA APSA Academy Film Fund. This project was submitted with the endorsement of APSA Academy member Rajit Kapur as a creative consultant.

OPEN TO ALL SWA MEMBERS.