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 गीतों के महकते गुलशन थे गुलशन बावरा! (जयंती विशेष)

GulshanBawra

गुलशन बावरा (12-4-1937 से 7-8-2009 तक)

हिंदी फ़िल्म गीतकार गुलशन बावरा के ज़हन में सदैव गीतों का गुलशन बसता था। वे ऐसे गीतकार थे जो चलते-फिरते सिचुएशन को अपने मन में क़ैद कर लिया करते थें और संगीत का साथ मिलते ही उन्हें गीतों के रूप में उतार लिया करते थे। उन्होंने भले ही कम गीत लिखे, पर बेहतरीन गीत लिखे। गीत लिखने के साथ उन्होंने कई फिल्मों में अभिनय भी किया। उनकी जयंती पर पेश है उनके जीवन से जुड़े कुछ तथ्य और उनकी सृजन प्रक्रिया पर चर्चा।

लाहौर से जयपुर तक  

गुलशन कुमार मेहता, उर्फ़ गुलशन बावरा का जन्म 12 अप्रैल को लाहौर के पास सिखपुरा गांव में हुआ। यूं तो वे एक धनाड्य परिवार में जन्मे थें लेकिन देश के बंटवारे और दंगों में उनका सब कुछ छिन गया। उनके पिता को उनकी आंखों के सामने ही मार दिया गया। ऐसे में वे अपनी जान बचाकर अपने भाई के साथ जयपुर आ गए। यहां पर उनकी बड़ी बहिन थी। वे काफी समय तक जयपुर में रहे। बाद में वे अपने भाई के साथ दिल्ली चले गए। दिल्ली विश्वविद्यालय से उन्होंने स्नातक किया औैर कॉलेज के दौरान ही गीत-संगीत और फिल्मों के प्रति उनका रुझान बढ़ने लगा। लेकिन युवा गुलशन के उस समय वैसे हालाता ना थें कि वे घरवालों से पैसे लेकर अपनी किस्मत आज़माने मुम्बई आ पाते।

यूं हुआ मुंबई का रुख

गुलशन बावरा ने मन में अपनी इच्छा दबाए नौकरियों के लिए आवेदन करना शुरू कर दिया। पहले उन्होंने कोटा रेल्वे में नौकरी करनी चाही लेकिन शायद किस्मत उन्हें मुंबई ले जाना चाहती थी। वे रेल्वे की नौकरी में तो नहींं चुने गए लेकिन दूसरी नौकरी, जो मुंबई में एक क्लर्क की थी, उसमें चुन लिए गए। ऐसे उन्हें मुबंई आने का अवसर मिल गया। उन्हें और क्या चाहिए था! वे 1955 में मुंबई आ गए और मुंबई में अपनी नौकरी के साथ फिल्मों में किस्मत आज़माने का संघर्ष भी शुरू कर दिया। स्टूुडियो दर स्टूुडियो घूमते हुए उन्हें मिले कल्याणजी भाई जिन्होंने उस समय कल्याण जी वीर जी शाह के नाम से संगीत देना शुरू ही किया था। उन्होंने गुलशन कुमार मेहता को अपना सहायक रख लिया और गीत लिखने का पहला अवसर फिल्म चंद्रसेना (1959) में दिया। लता मंगेशकर के गाए इस गीत के बोल थे ‘मैं क्या जानूं ये मतवाला सावन’।

फिल्म जगत में बावरा को पहचान मिली बलराज साहनी मीना कुमारी अभिनीत फिल्म सट्टा बाज़ार से। इस फिल्म का हेमंत कुमार लता मंगेशकर का गाया गीत ‘तुम्हें याद होगा कभी हम मिले थें’ से वे इंड़स्ट्री के लोगों की नजर में आ गए।

यूं बन गए बावरा

फिल्म सट्टा बाजार के बाद उन्हें पहचान मिली तो वे अपने अलमस्त और फ़कीराना अंदाज और रंग बिरंगे कपड़े पहनने के लिए पहचाने जाने लगे। ऐसे में ही सट्टा बाजार के वितरक शांति भाई पटेल ने उन्हें गुलशन कुमार मेहता की जगह अपना नाम बावरा रखने की सलाह दी और इसके बाद बतौर गीतकार क्रेडिट में उनका नाम गुलशन बावरा हो गया।

गीत लेखन के साथ अभिनय

गीतकार गुलशन बावरा ने फिल्मों में गीत लिखने के साथ साथ कई फिल्मों में छोटे-मोटे रोल भी अदा किए। इन फिल्मों में विश्वास, पवित्र पापी, प्यार की कहानी, जाने अंजाने, जंगल में मंगल, ये वादा रहा जैसी फिल्म रहीं जिनमें सबसे महत्वपूर्ण थी प्रकाश मेहरा की फ़िल्म ज़ंजीर।  इस फ़िल्म में वे स्वयं द्वारा लिखित गीत ‘दीवाने हैं दीवानों को न घर चाहिए’ में स्ट्रीट-सिंगर के रूप में नजर आते हैं।

कम लेकिन बेहतरीन गीत

गुलशन बावरा ने फिल्मों में चुनिंदा गीत ही लिखे पर उनमें बड़े हिट गीत शामिल हैं। वे अपने मन के मुताबिक लोगों के साथ ही काम करना पसंद करते थें। इस कड़ी में कल्याण जी आनंद जी के अलावा संगीतकार आरडी बर्मन के साथ उनकी जोड़ी खूब जमी। कल्याण जी आनंद जी के साथ उन्होंने ना केवल अपने कैरियर की शुरूआत की बल्कि ‘मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती’, और ज़ंजीर के गीत ‘यारी है ईमान, मेरा यार मेरी जिंदगी’ के लिए के लिए श्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड भी मिला।

मनोज कुमार की फिल्म उपकार के गीतों ने उन्हें बतौर गीतकार जन-जन तक पहुंचा दिया। जय जवान जय किसान के नारे को बुलंद करता हुआ उनका गीत ‘मेरे देश की धरती’ भारत की गौरवपूर्व छवि को बड़े असरदार तरीके से प्रस्तुत करता है।

गुलशन बावरा के इंडस्ट्री में सबसे अच्छे दोस्त थें संगीतकार राहुल देव बर्मन। वो प्यार से पंचम दा को गोरखा कहते थें और पंचम उन्हें प्यार से गुल्लू कहके पुकारते थें। 80 के दशक में कई हिट गानों को उन्होंने बिना किसी तैयारी के खेल-खेल में रचा। अपने एक साक्षात्कार में गुलशन बावरा ने बताया कि सनम तेरी कसम के हिट गीत ‘जानेजां ओ मेरी जानेजां’ को उन्होंने प्रोडूसर के साथ सिटिंग से घंटे भर पहले बनाया।

पंचम के साथ उन्होंने ये वादा रहा, सनम तेरी कसम, अगर तुम ना होते आदि चर्चित फिल्मों के हिट गीत लिखें। 80 के दशक में रेखा, राजेश खन्ना और राज बब्बर अभिनीत ‘हमें और जीने की चाहत ना होती’ गीत आज भी उसी चाव से सुना जाता है जिस तरह पहले ये रेडियों पर बजने वाले हिट गीतों में शुमार हुआ करता था। प्रेम में निसार हो जाने की भावना से लबरेज़ इस गाने में स्थाई से लेकर अंतरे तक प्यार की गहरायी का बयां है। एक बानगी देखें –

हरेक गम तुम्हारा सहेंगे खुशी से

करेंगे ना शिकवा कभी भी किसी से

जहां मुझपे हंसता खुशी मुझपे रोती, अगर तुम ना होते।

80 के दशक में पंचम के साथ बावरा ने रमेश बहल की अमिताभ बच्चन-ज़ीनत अमान स्टारर पुकार के लिए हिट गीत ‘तू मैके मत जइयो’ लिखा। इस गीत में नायक, नायिका से कभी से दूर नहीं होने की गुज़ारिश कर रहा है। इस गीत में गुलशन जी ने नायक के नायिका के बिना अधूरेपन को साल के बारह महिनों के इर्द गिर्द बड़े असरदार शब्दों में प्रकट किया है।

***

गीतकार गुलशन बावरा ने अपने गीतों में प्रेम के साथ जीवन की निस्सारता को भी बड़े भावपूर्ण ढंग से बुनने के बाद, 7 अगस्त 2009 को इस जहां से विदा ली। अपने गीतों की ऐसे सौगात वे हमारे लिए छोड़ गए हैं जिसका कई दशक बाद आज भी लुत्फ़ उठाया जा सकता है।

  • धर्मेन्द्र उपाध्याय

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पिछले कई सालों से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय, बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र इन दिनों मुंबई में एक स्क्रीनराइटर के रूप में सक्रिय हैं।

 

 

SWA Vaartalaap – In conversation with screenwriters, and lyricists making a difference

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SWA Vaartalaap is a new initiative by SWA to honor screenwriters & lyricists who are creating difference with their pen.

Year 2017 was the year of character-driven stories set in the common man’s world. Stories of likeable people in dire situations, connected with the audiences making them laugh and love.

One such film was Shubh Mangal Saavdhaan, adapted from writer-director R. S. Prasanna’s Tamil film Kalyana Samayal Saadham (2013). With this sleeper hit, its screenwriter Hitesh Kewalya successfully proved his mettle as a writer.

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Hitesh Kewalya

In his writing career of about 15 years, Hitesh, an alumnus of National Institute of Design’s film programme, has written extensively for television before finding his big break with SMS. Join us, as we host him for an evening of lively discussion about his writing journey.

Day: April 14th, 2018 (Saturday)
Time: 05:00 PM
Venue: SWA office (Andheri West)
  • ONLY FOR SWA MEMBERS (Please, carry your valid SWA Membership Card along.)
  • ‘First Come – First Served’ seating.
  • The discussion will be followed by evening tea and snacks.
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