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क्रांतिकारी कलम के धनी, विजय तेंडुलकर! (जयंती विशेष)

 

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विजय तेंडुलकर (6 जनवरी 1928 -12 मई 2008)

भारतीय लेखक बिरादरी में विजय तेंडुलकर का नाम बड़े अदब से लिया जाता है। प्रमुख कारण ये है कि विजय तेंडुलकर की कलम ने जो भी लिखा वो क्रांतिकारी था। आज उनकी जयंती पर उनकी यादों के साथ उनकी क्रांतिकारी कलम की चर्चा करने का सुअवसर है।

पूत के पैरों का पालने में दिखना

महाराष्ट्र के गिरगांव में 6 जनवरी 1928 को पैदा हुए विजय धोडूपंत तेंडुलकर ने बचपन में ही कलम को अपने हाथों में थाम लिया। उनके पिता प्रकाशन व्यवसाय से जुड़े थें इसलिए घर में पढ़ने का माहौल था। इसका प्रभाव उनके बाल्यकाल पर पड़ा। 11 वर्ष की उम्र में ही उन्होंने अपना पहला नाटक लिखा जिसमें उन्होंने अभिनय के साथ निर्देशन भी किया। 14 साल की उम्र में ही वे राजनीतिक और सामाजिक चर्चाओं में रुचि लेने लगे। इसी समय देश में भारत छोड़ो आंदोलन की लहर थी और वे भी इस आंदोलन में कूद पड़े। इस तरह बचपन से ही उनके अंदर जो क्रांति की अलख जगी थी उसे उनकी कलम ने जीते-जी थामे रखा।

अखबारी लेखन से रंगमंच साधना

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के कारण तेंडुलकर ने पढ़ाई छोड़ दी। वे अंग्रेजों के खिलाफ़ थें सो स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों में हिस्सेदारी लेने लगे। पहले वे अखबारों के लिए लेख आदि लिखने लगे। 20 वर्ष की अवस्था में उन्होंने अपने मराठी नाटक आमज्यावर कोण प्रेम करणार और गृहस्थ लिखे। इसी दौर में वे मुंबई आ गए । यहां पर काफी संघर्ष के साथ जीवन के अनुभव मिले तो उनकी साहित्य संपदा भी विराट हुई।

1956 में उनके लिखे नाटक श्रीमंत को मराठी रंगमंच पर खूब चर्चा मिली। इसके बाद उन्होंने मुंबई में सुलभा देशपांडे, डॉ श्री राम लागू और मोहन आगाशे जैसे दोस्तों के साथ मिलकर अपनी रंगमंच टोली रंगायन की स्थापना की। इसके बाद वे एक एक करके अपने नाटकों का मंचन करने लगे। रंगायन टोली द्वारा मुंबई के अलावा महाराष्ट्र के अन्य शहरों में होने वाले नाटकों के मंचन ने मराठी रंगमंच की दिशा और दशा बदलने में बड़ी भूमिका अदा की।

रंगमंच से सिनेमा की ओर

मराठी रंगमंच में विजय तेंडुलकर एक जाना पहचाना नाम बन गए थें। उन्होंने 1967 में नाटक शांतता कोर्ट चालू आहे लिखा। 1967 में पहले मंचन के बाद इसके कई मंचन हुए। तब रंगमंच से ही जुड़े विजय तेंडुलकर के रंगकमी मित्र और लेखक सत्यदेब देव दुबे ने इस पर मराठी फिल्म बनाने का निर्णय लिया। 1971 में उनके नाटक शांतता कोर्ट चालू आहे पर फिल्म निर्माण हुआ। वे इस फिल्म में बतौर पटकथा लेखक भी जुड़े। इसी समय उनका लिखा नाटक सखाराम बाइंडर भी देशभर में झंडे गाड़ने लगा।

सत्यदेब दुबे के साथ के चलते उनका परिचय निर्देशक श्याम बेनेगल से हुआ। श्याम बनेगल अपनी पहली निर्देशित फिल्म अंकुर से चर्चा में थें। श्याम बेनेगल के लिए उन्होंने निशांत (1975) और मंथन (1976) लिखी । सिनेमा के साथ वे रंगमंच पर भी लिख रहे थे। इसी दौरान उनका लिखा नाटक घासीराम कोतवाल भी खूब चर्चित हुआ। श्याम बेनेगल के सिनेमेटोग्राफर रहे निर्देशक गोविंद निहलानी की आक्रोश (1981) और अर्धसत्य (1984) जैसी फिल्मों ने हिंदी सिनेमा में उन्हें खूब प्रसिद्धि दिलाई। इसके बाद फिल्म उंबरठा (1982), कमला (1984) और सरदार (1993) का लेखन भी उन्होने किया।

लेखनी को मिले खूब पुरस्कार

रंगमंच और सिनेमा में एक साथ सुर्खियां बटोरने वाले लेखक विजय तेंडुलकर को चर्चा के साथ खूब पुरस्कार भी मिले। इस कड़ी में 1970 में रंगमंच पर अपनी सेवाएं देने कारण उन्हें संगीत नाटक अकादमी अवार्ड से नवाजा गया। फिल्मों में मंथन (1976) के लिए उन्हें श्रेष्ठ पटकथा लेखन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। गोविंद निहलानी की फिल्म आक्रोश (1981) के लिए उन्हें बेस्ट स्टोरी का फिल्मफेयर अवार्ड दिया गया। फिल्म अर्धसत्य (1984) के लिए उन्हें श्रेष्ठ पटकथा लेखने के लिए एक बार फिर फिल्मफेयर अवार्ड प्राप्त हुआ। 1984 में ही भारत सरकार ने रंगमंच और सिनेमा में उनकी सेवाओं के लिए उन्हें पदमभूषण प्रदान किया।

जीवन अवसान की ओर

सन 2001 में उनके बेट राजा और पत्नी निर्मला के निधन से उन्हें भावनात्मक आघात पहुंचा। इसके अगले साल ही 2002 में उनकी पुत्री और जानी मानी अभिनेत्री प्रिया तेंडुलकर के निधन ने मानो उन्हें तोड़कर रख दिया। इधर उम्र उनके शरीर पर अपने पैर पसार रही थी सो वे धीर धीरे मायस्थेनिया ग्रेविस रोग से ग्रसित हो गए। अंतत: 80 वर्ष की उम्र में 12 मई 2008 को पुणे में उनका निधन हो गया।

आज वे हमारे बीच में नहीं है लेकिन लगातार पांच दशक तक सक्रिय रही उनकी कलम ने देश की आवाम के बीच विजय तेंडुलकर के कद को बनाए रखा है। इतना कि उनके नाम को सुन, उनके बारे में जानने की जिज्ञासा पैदा हो जाती है।

  • धर्मेन्द्र उपाध्याय

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पिछले कई सालों से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय, बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र इन दिनों मुंबई में एक स्क्रीनराइटर के रूप में सक्रिय हैं।