Monthly Archives: December 2017

सिनेमा से टेलीविजन तक: रामानंद सागर (जयंती-विशेष)

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लेखक- निर्माता निर्देशक रामानंद सागर ने सिनेमा से लेकर टेलीविजन तक हर माध्यम में अपनी अलहदा छाप छोड़ी है। सिनेमा में लेखन से सफर शुरू करने के बाद उन्होंने कई बड़ी हिट फिल्में निर्देशित की। उन्होंने मनोरंजन जगत की क्रांति को आत्मसात करते हुए टेलीविजन पर एक नया अध्याय रचा। प्रस्तुत है, उनकी जयंती पर उनकी कुछ विशेष यादें।

चंद्रमौली चौपड़ा से रामानंद सागर बनना

रामानंद सागार का जन्म 29 दिसंबर 1917 लाहौर में हुआ । उनके जन्म का नाम चंद्रमौली चौपड़ा था। लेकिन अपनी नानी के गोद जाने पर वे चंद्रमौली चौपड़ा से रामानंद बने। वे शुरू से ही पढ़ने लिखने में बेहद तेज़-तर्रार थे। उन्होंने संस्कृत विषय में गोल्ड मैडल हासिल किया। हिंदी-संस्कृत का ज्ञान होने के कारण उनकी लेखनी पर पकड़ थी, इसलिए छोटे मोटे कामों को अंजाम देने के साथ ही वे अखबारों के लिए लिखने लगे। वे अखबारों में रामानंद चौपड़ा, रामानंद काश्मीरी, रामानंद बेदी आदि नामों से लिखने लगे। इसी दौर में उनका सरनेम रामानंद सागर हो गया और वे बाद में इसी नाम से बेहद मकबूल हुए।

पृथ्वी थिएटर से मिला मुकाम
वे शुरू से ही सृजनात्मक इंसान रहे। पंजाब विश्वविद्यालय में पढाई के दौरान ही वे नाटक, लघुकथा इत्यादि लिखने लगे। 1932 में बनी मूक फिल्म रेडियर्स ऑफ द रेल रोड में उन्होने बतौर क्लैपर बॉय काम किया। इसी दौरान सस्ंकृत और लेखनी पर उनकी पकड़ को देखकर अभिनेता पृथ्वीराज कपूर उनसे बेहद प्रभावित हुए और उन्हें पृथ्वी थिएटर के साथ बतौर स्टेज मैनेजर जोड़ लिया।रामानंद काफ़ी समय तक पृथ्वी थिएटर में स्टेट मैनेजर रहे और पृथ्वीराज कपूर के संरक्षणमें कुछ नाटकों का सहायक निर्देशक भी रहें।

बीमारी ने बदल दी जिंदगी

उनकी लेखनी को थोड़ी पहचान मिलने लगी तो वे 1941 में एक दैनिक अखबार डेली मिलाप के संपादक बने गए और पत्रकारिता को अपना जीविकोपार्जन बनाया। लेकिन इसी दौरान वे भयंकर टीवी की चपेट में आ गए। उन दिनों टीबी लाइलाज थी।

अपने एक पुराने साक्षात्कार में बताते हैं कि “मुझे लगा कि टीवी की बीमारी के बाद मेरा जीवन लीला समाप्त हो जाएगी। मेरे पास कुछ काम नहीं था, इसलिए में अपनी डायरी लिखने लगा। मैंने डायरी ऑफ ए टीबी पेशेंट नाम से पत्रिका अदब-ए-मशक में एक कॉलम लिखा। अदब से जुड़े लोगों ने इसे खूब पढ़ा। मैं अपनी मौत का इंजतार कर रहा था। लेकिन ईश्वर की कृपा से मैं तपेदिक के जानलेवा रोग से मुक्त हो गया । इस घटना ने ईश्वर में मेरी श्रद्धा बढ़ाने के साथ मुझे और ज्यादा जज़्बाती बना दिया।”

गौरतलब है कि उन्होंने अपनी पहली सुपर डुपर हिट फिल्म बरसात की कहानी भी इसी समय लिखी। देश विभाजन होने के बाद उनहोंने तय कर लिया कि वे बंबई जाकर रहेंगे। राजकपूर से उनका परिचय पुराना था। उनकी कहानी राजकपूर को बेहद पसंद आई और उन्हें बरसात का स्क्रीनप्ले लिखने के लिए कहा। बरसात की कामयाबी के बाद बतौर लेखक उनके लिए हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के दरवाज़ें खुल चुके थें।

लेखन से निर्देशन तक

बरसात के बाद सागर इंडस्ट्री के व्यस्त लेखक बन गए। इस दौरान उन्होंने जान- पहचान (1950), मेहमान (1951), संगदिल (1953), बाजूबंद (1954), मेम साहिब (195) और राजतिलक (1958) जैसी फ़िल्में लिखी। जैमिनी स्टूडियों के एस एस वासन द्वारा निर्देशित पैगाम (1959 ) के लिए उन्हें बेस्ट डॉयलॉग रायटर का फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड मिला।

लेखन में नाम पाने के बाद उनकी मंजिल अब निर्देशन थी। वासन ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें बतौर निर्देशक घूंघट (1960) बनाने का अवसर दिया। इसके बाद उन्होंने जैमिनी के लिए ज़िंदगी (1964) का निर्देशन भी किया ।
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सागर आर्ट की स्थापना

जैमिनी के साथ बतौर लेखक-निर्देशक काम करने के बाद जहां रामानंद सागर ने कई मुकाम हासिल किए वहीं उनके मन में ये बात आने लगी कि दूसरे के लिए फिल्म निर्देशित करने की बजाय अब अपना ही प्रॉड्क्शन हाउस स्थापित किया जाए ताकि वे अपने मन का सिनेमा बना सकें। इसी सोच के चलते 1965 में उन्होंने सागर आर्ट की स्थापना की।

सागर आर्ट के बैनर तले उनकी पहली फिल्म आरज़ू बेहद मकबूल हुई। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। आरजू (1965) के बाद उन्होने आखें (1968), गीत (1960) ललकार (1972), जलते बदन (1973) और चरस (1976) जैसी बेहद चर्चित फिल्मों का लेखन निर्माण-निर्देशन किया। आखें (1968) के लिए उनहें बेस्ट डायरेक्टर का फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड मिला।

अगला पड़ाव: रामायण

इसी दौर में टेलीविजन भारत के मनोरंजन जगत में एंट्री मार चुका था। हालांकि रामानंद सागर अपनी बढ़ती उम्र के साथ छुटपुट फिल्में बना रहे थे पर वे इससे संतुष्ट नहीं थें। इसलिए उन्होंने टीवी पर राम कहानी को कहने का मन बनाया।

23 जनवरी 1987 को छोटे पर्दे पर रामायण की शुरूआत हुई। इसने सफलता के कई कीर्तिमान रचे। अब रामानंद सागर फिल्म इंडस्ट्री के बटवृक्ष बन चुके थें। उनके पुत्र मोती सागर, आनंद सागर और सुभाष सागर ने भी टीवी निर्माण जारी रखा और दर्शकों को विक्रम बेताल, अलिफ़ लैला और कृष्णा जैसी टीवी सीरीज़ देखने को मिलती रही।

सन 2000 में भारत सरकार ने रामानन्द सागर को पदमश्री पुरस्कार प्रदान किया। कालांतर, में सागर की तबियत थोड़ी नासाज रहने लगी। 12 दिंसबर 2005 में वे अपने विशाल परिवार को मनोरंजन जगत की सेवा में छोड़कर परमब्रह्म में विलीन हो गए। उनकी प्रतिभा के लिए शब्द कम पड़ जाते हैं क्योंकि वे एक साधारण लेखक से फिल्म निर्देशक और एक क्रांतिकारी निर्माता के रूप में उभरे।

रामायण के बाद उन्हें भारतीय जनमानस में श्रद्धा की नज़रों से देखा जाने लगा था। हम सदैव उन्हें एक धारदार लेखक के साथ-साथ एक अच्छे इंसान के रूप में भी याद करते रहेंगे।

  • धर्मेन्द्र उपाध्याय

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पिछले कई सालों से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय, बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र इन दिनों मुंबई में एक स्क्रीनराइटर के रूप में सक्रिय हैं।

SWA MEMBER SUMAN MUKHOPADHYAY TO BE FELICITATED FOR WINNING ASIA PACIFIC SCRIPT AWARD

The Screenwriters Association (SWA) will felicitate screenwriter Suman Mukhopadhyay on December 22nd 2017, Friday, at 5.00 pm at their office in Andheri West. Mukhopadhyay became one of the four recipients of the MPA (Motion Pictures Association) and APSA Academy Film Fund 2017, which was announced on 23 November 2017, Thursday, at the 11th Asia Pacific Screen Awards (APSA) in Brisbane, Australia. By doing so, Suman Mukhopadhyay has also become the first Indian writer-director to win this prestigious script development award of US$ 25,000.

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This year, SWA had collaborated with APSA and MPA to invite and shortlist entries from India. A special SWA jury shortlisted 19 treatments, which were then sent to the APSA jury. This was the first time that so many submissions had ever gone from India while the entries made MPA-APSA jury to take note of the Indian cinematic storytelling talent waiting to spread its impact internationally.

As chosen by SWA’s jury, Suman Mukhopadhyay’s hard-hitting story, ‘Paradise in Flames’, set in Kashmir, first won him a trip to Brisbane to attend the APSA Award ceremony. At the same time, another SWA member Anusha Rizvi’s script called, ‘The Great Shamshuddin Family’ won her a trip, sponsored by MPA APSA, to Los Angeles for a week to meet with studios, broadcasters, agents etc.

NOTE: The event is exclusive for SWA members. 
All SWA Members are requested to bring along their valid SWA Membership Card. 
Seating will be on FIRST COME, FIRST SERVED basis.

Here’s more about Suman Mukhopadhyay’s award-winning script:

TITLE – ‘Paradise in Flames’

SYNOPSIS – The war in Kashmir, seen through the eyes of psychologically damaged children and the staff of a psychiatric hospital where there are 5 doctors for 45 thousand patients.

CITATION – A mental health doctor with 45 thousand registered patients responds to the devastation of warfare in Kashmir. With unexpected elements of magical realism, this innovative and hard-hitting drama (based on Abhishek Majumdar’s ‘The Djinnes of Eidgah’) by Indian director, Suman Mukhopadhyay offers a unique insight into the psychological damage of combat.

(Click here for official APSA office website.)

Rest In Peace, Neeraj Vora!

Neeraj Vora (22 January 1963 – 14 December 2017)

Writer-director and actor Neeraj Vora passed away on December 14, 2017, at Criti Care hospital in Juhu, Mumbai, in the wee hours. He was 54. In October 2016, he had suffered a heart attack followed by a stroke, and was in a coma since then. Vora, who was son of the classical musician Pt. Vinayak Vora, had no children of his own while his wife too had passed away in 2004.
For the past one year, Producer Firoz A. Nadiadwala had been looking after all the medical expenses of comatose Vora who occupied a special make-shift ICU (Intensive Care Unit) in Firoz’s bungalow in Juhu.
Neeraj Vora the writer, was known for his sense of humour and witty dialogue while his comic timing as an actor was also impeccable. His initial writing work includes Shah Rukh Khan’s TV show Circus. He went on to write about 30 feature films including Rangeela (dialogue), Hera Pheri (screenplay-dialogue), Golmaal: Fun Unlimited (written by), Hungama (dialogue), Hulchul (screenplay), Awara Paagal Deewana (dialogue) and Garam Masala (dialogue).
Vora had made his acting debut with Ketan Mehta’s Holi (1984), which also starred Aamir Khan. He then went on to star in films like Rangeela, Raju Ban Gaya Gentleman, Akele Hum Akele Tum, Virasat, Mann, Satya, Mast, Pukar and Company. His last film as an actor was Anil Kapoor starrer Welcome Back, which released in 2015.
As a director, his most notable work was Phir Hera Pheri, the second installment of filmmaker Priyadarshan’s Hera Pheri. Vora was also due to direct the third installment of the same franchise.
We at SWA, deeply mourn the demise of Shri Neeraj Vora and pray for his soul to rest in peace.

Rest In Peace, Shashi Kapoor!

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Veteran Hindi film actor and producer Shashi Kapoor passed away on December 4th 2017, Monday, in Mumbai. He was 79. Shashi Kapoor, who was awarded Padma Bhushan in 2011and the Dadasaheb Phalke Award in 2015, was reportedly battling old age related problems and was under medical supervision.

Shashi Kapoor was born as Balbir Raj Kapoor on March 18, 1938. He was the 3rd and the youngest son of Prithviraj Kapoor, the younger brother of Raj Kapoor and Shammi Kapoor, the husband of Jennifer Kendal (sister of actress Felicity Kendal), and the father of Karan Kapoor, Kunal Kapoor, and Sanjana Kapoor.

Kapoor started his film career as a child actor in brother Raj Kapoor’s  Aag (1948) and Awaara (1951). He went on to work in over 175 films as an actor. He made a popular pairing with Amitabh Bachchan and the two co-starred in a total of 12 films: Roti Kapda Aur Makaan (1974), Deewaar(1975), Kabhi Kabhie (1976), Immaan Dharam (1977), Trishul (1978), Kaala Patthar (1979), Suhaag (1979), Do Aur Do Paanch (1980), Shaan (1980), Silsila (1981), Namak Halaal (1982) and Akayla (1991). 

He was also known internationally for starring in British and American films, notably Merchant Ivory productions run by Ismail Merchant and James Ivory, such as The Householder (1963), Shakespeare Wallah (1965), Bombay Talkie (1970), Heat and Dust (1982), The Deceivers (1988) and Side Streets (1998).

Shashi Kapoor also produced acclaimed films like Junoon (1978), Kalyug (1981), 36 Chowringhee Lane (1981), Vijeta(1982) and Utsav (1984). Apart from directing 1991 Amitabh Bachchan-starrer Ajooba, Kapoor also directed a Russian movie Vozvrashcheniye Bagdadskogo Vora, in 1988. His last and most recent film appearances were in Jinnah (1998), a biographical film of Mohammed Ali Jinnah in which he was the narrator and another Merchant Ivory production titled Side Streets(1998). He took retirement from the film industry by late 1990s.

We at SWA, deeply mourn the demise of Shri Shashi Kapoor and pray for his soul to rest in peace.