Monthly Archives: August 2016

ग़ज़ले 5 – धवल चोखडिया

ग़ज़ले – धवल चोखडिया

 

(1)

 

कुछ इस तरह हम सब से अलग हो गए

जैसे सुबह को आँखों से नींद चली जाती है

 

आखिर तक उसने गुफ्तगू की उम्मीद रखी

लेकिन कुछ बातें नज़रो से भी कही जाती है

 

दुनिया की चका-चौंध से थक जाओ अगर

एक रोशनी है जो ख़ुद के अंदर मिल जाती है

 

कई बार ऐसा हुआ जो चाहा वो ना मिला

और कभी बे-वक्त पे सौगाते मिल जाती है

 

चेहरे की हँसी कभी कभी झूठ भी होती है

कुछ हँसी के पीछे दबी हुई चीख मिल जाती है

 

(2)   

 

वही छोड़ के चला जाता है जो करीब होता है

हर रिश्ते में हम थोड़ी दूरी रखना सीख गए है

 

किताबे पढ़कर हमने बस एक बात को जाना है

झूठ को सच की तरह पेश करना सीख गए है

 

गम-ए-दुनिया के आगे मेरा गम बहुत छोटा है

भीगी हुई पलकों से भी मुस्कुराना सीख गए है

 

दर्द रोज़गार का हो या फिर टूटे दिल की बाते

हर तजुर्बे निचोड़कर शायरी कहना सीख गए है

 

नशा चढ़ रहा है खुदा तेरी बंदगी का धीरे धीरे

लगता है की खुदा से बाते करना सीख गए है

(3)

 

अपनी तबियत को ज़रा ठीक रखो

दिल में शक नहीं उम्मीद को रखो

 

ये दुनिया भले ही पागल कहे तुम्हे

अपना मुक्कदर बदलने की ज़िद रखो

 

बे-सिम्त जिंदगी को जो राहे दिखाए

अपने पास ऐसा एक रहबर रखो            [बे-सिम्त – दिशाहीन, रहबर – पथदर्शक]

 

न जाने कब तूफ़ान उड़ा ले जाए

कभी कभी कश्ती को साहिल पे रखो

 

ख़ुद से नाराज़गी इतनी अच्छी नहीं

वक्त के इंसाफ का तुम सब्र रखो

 

(4)

 

ऐ आसमान तेरे सितारे फीके पड़ गये है

मेरे ज़ख्मो की रौशनी से उजाले हो गये है

 

क्या करू, क्या नहीं, बड़ी उलजन सी है

अब सारे सवाल खुदा तेरे हवाले हो गये है

 

कौन समज पाया है इस बेबूझ जिंदगी को

जो समजने गये वो सारे बावले हो गये है

 

तू कहे तो रुक जाऊं, तू कहे तो मुड जाऊं

देखा नहीं पैरो में कितने छाले हो गये है

 

दुनिया में लोग बाते बड़ी अच्छी करते है

पर मन मेला और दिल काले हो गये है

 

शायर और लेखक

शायर और लेखक

धवल चोखडिया

dhaval.chokhadia@gmail.com

 

 

प्यास का मौसम (कविता) – उमेश धरमराज

प्यास का मौसम

यादें जगा रहा हैं बरसात का मौसम

आया हैं लौट के फीर प्यास का मौसम.

ए काश के मुझको अभी होश ना होता

या फिर तक़दिर में दोष ना होता.

अमृत क्यों ना बरसे रातों में तेरे बिन

या आजाए रवानी सांसों में तेरे बिन.

फिर भी क्या लौट पाएगा आस का मौसम?

आया हैं लौट के फीर प्यास का मौसम….

भीगी हुई फिज़ा में वो बात अब कहां

उस मौसम के जैसे दिन रात अब कहां.

पानी के बदले अग्नि दुखीयों पे आ पडी

शायद तेरे जहान में खुशियों की हैं झडी.

लौटा दे एक बार तेरे पास का मौसम

आया हैं लौट के फीर प्यास का मौसम….

गिरती हैं बिजलियां मेरे दिल पे क्यों सदा?

या आती हैं बार-बार यादों में क्यों अदा?

हो जाए जिवन की बरसात आखरी

निकले तो निकल जाए बारात आखरी.

तडपाए यांदों की बारात का मौसम

आया हैं लौट के फीर प्यास का मौसम….

 

– उमेश धरमराज.

umesh.dharamraj@gmail.com

हुआ तेरे हक़ में फैसला – ग़ज़ल – उमेश धरमराज

हुआ तेरे हक़ में फैसला

 

तुझसे पहले कितने मिले

तुझसा पहले नहीं मिला.

हर शै तुझसे हार गयी

हुआ तेरे हक़ में फैसला.

 

सबब ये हैं दिदार हो

ये हैं चर्चे तेरे ही नूर के.

हद-ए-नज़र तक कारवां

तेरी ओर बढता ये क़ाफिला

हर शै तुझसे हार गयी

हुआ तेरे हक़ में फैसला…

 

कई हैं हसिन सुरतें

हसिं नहीं कोई रूह से.

तुझमे सब मे कितना हैं

बहुत बडा हैं फासला.

हर शै तुझसे हार गयी

हुआ तेरे हक़ में फैसला…

 

जो करे तेरी नज़र बयां

दिलो जां पे वो करे असर.

कभी युग का यादगार पल

या कभी क़यामत – ज़लज़ला.

हर शै तुझसे हार गयी

हुआ तेरे हक़ में फैसला…

 

तु जो ना कहे तो शिकस्त हैं

इक़रार फतह हयात.

तु वजह हुई मेरी जित की

तु ही जिन्दा रहने का हौसला.

हर शै तुझसे हार गयी

हुआ तेरे हक़ में फैसला…

 

बिना तेरे ये मेरा वजूद

दरख़्त बिन ज़मीन का.

तू ही अर्श की बुलंदीयां

तू ही कामयाबी का सिलसिला.

हर शै तुझसे हार गयी

हुआ तेरे हक़ में फैसला…

 

तू हैं ज़र्रे से कभी मामूली

तुझमे ही सिमटी ये क़ायनात.

कभी ज़िन्दगी कभी हैं फ़ना

कभी लौ लगाने का मामला.

हर शै तुझसे हार गयी

हुआ तेरे हक़ में फैसला…

– उमेश धरमराज.

umesh.dharamraj@gmail.com

तज़करा तेरी जुदाई का मगर होता है (ग़ज़ल) – सय्यद निसार अहमद

ग़ज़ल

तज़करा तेरी जुदाई का मगर होता है

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जब कभी मेरे तख़य्युल का सफ़र होता है !

ऐसा क्यों है तेरे कूचे से गुज़र होता है !!

जब तेरा रूप मेरे पेश-ए-नज़र होता है !

मेरे अश्कों में मेरा खून-ए-जिगर होता है !!

जाने कितना भी चलूँ दूर तेरी यादों से !

तज़करा तेरी जुदाई का मगर होता है !!

वक़्त के हम भी तक़ाज़ों को पढ़े हैं यारो !

क्या कभी वक़्त की आँखों में भी तर होता है?

हाँ ‘निसार’ अश्क बहाना है नवा-ए-फ़ितरत !

ज़ब्त करना भी तो अंदाज़-ए-हुनर होता है !!

सय्यद निसार अहमद
ahmadnisarsayeedi@yahoo.co.in

The SHINING STAR in a Single Night – Koustubh Sapre

Title : The SHINING STAR in a Single Night

Author: Koustubh Sapre 

Read it Twice, Nobody knows who might become the SHINING STAR Overnight.

Respect art and respect and appreciate others’ talent. This will allow you to become a better person.

Rejection teaches us a lot, more than what appreciation teaches us. So, take it positively. It is easier said than done but if you want to grow, this is the mantra. No one in this world can judge your work and talent because it’s your own. And that is all. You know what you can do and how you can do. Believe me, you do.

Rejection does not means you do not have the talent or your work is weak.. It means you need to work a little more on your stuff to make it more qualitative and qualified, so that next time people have to think thousand times before they reject you.

After you think you have done your best and people still reject you, it does not mean there is flaw in your idea or art work. The only reason behind rejection is that they cannot see your hard work and they don’t deserve to judge your work..

So keep on working hard on your subject and try to bring out the best in you . At each and every stage of life you just learn something new by mistakes you have done or by imperfections in your work. Everything teaches us something new, every time.

Keep on learning. People in this world can copy your idea but not your talent.

So if you feel that you have been rejected and you agree that your idea or work can be copied and implement by others, don`t worry. If you are really talented, do your best from heart and work hard and your will present something new to this world and that will make you the SHINING STAR Overnight.

 

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An Article by Koustubh Sapre.

Article reviewed by Shivam, Shefali and Ruchi.

Koustubh Sapre is a Member in Film Writers Association Mumbai. He is lyricist/ Rapper /  Song producer of music team Rainbow –  Colors Of Life. He is a poet, he perform live poetry and write articles/poems/stories for www.kousutubh.in .

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गीत – मेरी राहों में पड़े (समीक्षा) – अमित कुमार तिवारी

SONG  REVIEW
गीत मेरी राहों में पड़े गीतकार अभेन्द्र कुमार उपाध्याय
संगीत एवं गायन अंकित तिवारी
समयावधि – 5’28”
गीत रिलीज़ – 29 मार्च 2016
शैली विरह गीत    (SEPARATION SONG)
फिल्म ब़ागी (BAAGHI)

Lyrics – गीत की रचना मूल रूप से दो प्रेमियों के बिछुडने को ध्यान में रखकर की गई है, अभेन्द्र ने शब्दों का चुनाव सूझ बूझ के साथ किया है साथ ही इन्हें सहजता से गीत को काव्य में पिरोया है, श्रोता आसानी से गीत के भावों को समझ सकते हैं गीत की लोकप्रियता से इस बात का अन्दाजा लगाया जा सकता है । अभेन्द्र कुमार द्वारा गीत मेरी राहों में पड़े तेरे पैरों के निशानसराहनीय प्रयास है ।
Music composition –
अलग तरह का संगीत सुनकर सुकून मिलता है, separation Song  होने के बावज़ूद अंकित तिवारी ने कर्ण प्रिय धुनों से गीत को सजाया है जो की प्रचलित पारम्परिक संगीत को follow नहीं करता है यही संगीत को सबसे अनूठा बनाती है .
Singer –  गीत में शब्दों का उच्चारण गायक के रूप में अंकित तिवारी ने सही ढंग से किया है  साथ ही गीत के मध्य व अन्त में ho ooo hoo hooo he he da da na  na, aeee aajaa mahi जैसे विलाप पूर्ण रून्दन गीत में दर्द को बयां करता है।

Faults –
1.गीत का फिल्म रिलीज के महज़ 4 दिन पहले वीडियो प्रोमों के साथ Launch  किया जाना.
2.
गीत का फिल्म में दो टुकडों में होना साथ ही गीत में की समयावधि में भारी कटौती की गई है,

इसके अंश इस प्रकार है,

बिन तेरे देखूं मैं,
ज़रा सा लगूं ग़म से ही आजकल भरा सा लगूं
छोड़ दे साथ ना ज़िन्दगी  मेरी सोच के बात ये,
डरा सा लगूं गिरते उन आंसुओं में कुछ तो तुझसा लगे हैं
इन अश्कों में मैं ना खोता अगर तू होता तो,
ना रोते हम अगर तू होता तो,
ना रोते हम अगर तू होता तो,
ना रोते हम अगर तू होता तो,
ना रोते हम

किसी भी गीत के साथ इस तरह का बर्ताव उस गीत के प्रशंसकों को मायूस करता है ।

SONG REVIEW BY AMIT KUMAR TIWARI
(गीत की समीक्षा स्वतन्त्र गीत समीक्षक के रूप में की गई है)
amitapkamitra@gmail.com

जवानी वतन के नाम लिखता है (गीत) – अमित कुमार शर्मा

     जवानी वतन के नाम लिखता है

ज़ज्बे के पन्नों पर इरादों की कलम से,

सहादत का कलाम लिखता है।

हर जवान अपनी जवानी वतन के नाम लिखता है।

हमनें तो महबूबा मुल्क़ को समझा है

बस इसी से मोहब्बत की है।

हमें इसी तिरंगे में रहीम, इसी में राम दिखता है।

हर जवान अपनी जवानी वतन के नाम लिखता है।

जब तलक जिस्म में बाक़ी लहू का इक भी क़तरा होगा

यकीं मानों इस मुल्क पर न कोई ख़तरा होगा

हम वो चट्टानें हैं जिनके आगे

न कोई तूफ़ान टिकता है।

हर जवान अपनी जवानी वतन के नाम लिखता है।

जो छायें कभी दहशतगर्दी के बादल उनको हटा देंगें हम

दुश्मन-ए-हिन्द जो डालें नापाक निगाहें उनकों मिटा देंगें हम

फ़र्ज़ की लकीरों से मुल्क़ की मिट्टी पर,

आज़ादी का पैग़ाम लिखता है।

हर जवान अपनी जवानी वतन के नाम लिखता है।

 

AMIT KUMAR SHARMA

amitabh9950@gmail.com

Mob:- 8500627580

 

Writers’ Rights: Are Agents & Lawyers The Answer?

On the first session of the second day (Aug 4, 2016) of the fourth Indian Screenwriters Conference (ISC) held by the Film Writers Association, Mumbai, some basic, some advanced but all pertinent questions were asked about the legal rights of a writer to her work. If you work in the Indian Film Industry, this is a video you must not miss. 

 

Delegate Kits for ISC 4

The ISC 4 delegate kits will be delivered at the Venue St. Andrew’s Auditorium Bandra (W) on the first day, 3rd Aug from 9 AM onwards. Delegates are requested to show their Membership or ID Cards alongwith the proof of registration – soft or hard copy of the receipt for the same. Thank you.