Monthly Archives: July 2016

में अकेला पहाड़ तोड़ सकता हूँ (कविता) – मधुर त्यागी

मेरी इस कविता के प्रेरणा श्रोत बिहार के गहलौर गाव के दशरथ मांझी जी हैं। जो एक लक्षय मन में रखकर

दिन रात लगातार २२ साल तक पहाड़ के एक एक पत्थर को तोड़ते रहे ताकि वो एक दिन उसमें से रास्ता

निकाल सकें। उस वक़्त आते जाते हर आदमी ने इनके बारे में बहुत कुछ बुरा भला कहा होगा मगर उसकी

परवाह न करते हुए लक्षय पर अडिग रहे और एक दिन सच में पहाड़ का सीना फाड़ दिया। ऐसी लगन अगर

हम सब में अपने लक्षय के प्रति हो तो हमारा कोई भी मुसीबत रास्ता नहीं रोक सकती।    

टूट जाता है जिसका हौसला बीच राह में, 

खुद ही अपना विश्वास वो मिलाता है खाख में,

वो ही बोलता है कि “मैं अकेला क्या कर सकता हूँ ?”

कोई साथ तो दो “मैं अकेला कहाँ पहाड़ तोड़ सकता हूँ ?”

नहीं चाहिए हाथ किसी का,
जिसे खुद पर यकीन हो ,
एक दृढ लक्ष्य हो,
और सर पर जुनून हो,

एक बार में उसको भी,
सफलता मिलती नहीं,
पर उसके विश्वास के आगे,
असफलता टिकती नहीं,

वो छोड़ता नहीं डोर आशा की बीच राह में,
रोकता नहीं काम अपना किसी के इन्तजार में,
सुनता नहीं किसी कि बस जानता है कि “मैं कर सकता हूँ”

“मैं अकेला भी पहाड़ तोड़ सकता हूँ”

मधुर त्यागी   

किलकारियाँ (कविता) – अमित कुमार तिवारी

कविता :   किलकारियां
कवि : अमित कुमार तिवारी

वह घुटनों के बल मेरा फिसलना
बात बात में शरारत करना
कभी तुम्हारे पैरों के सहारे
पांवों पर खडे होने की कोशिश करना
कहीं भी गिरूं तो मां मां पुकारना मेरा
तुम्हारा वह रसोई से आना
मुझे चुप कराने के लिये
ध्यान कहीं और बंटाना
कभी दिन में आसमान में
उगते सूरज को दिखाना
जब लौटूं स्कूल से तो
आते ही मां क्या बना है
कह कह के मेरा दोहराना दुलराना
तुम्हारा मेरा मनपसंद पकवान लेके आना
आज अवाक स्तब्ध हूं थोड़ा निशब्द हूं
सूना सूना हुआ मेरा जहां
अभिव्यक्ति नहीं कर सकती ज़बान
तुम चाहे जहाँ भी हो मेरी मां
दिल की धड़कने देती हैं किलकारियां
सर पे हाथ फिराती हो आज भी
हमारी हौसला अफज़ाई करती मां ।।

AMIT KUMAR TIWARI

amitaapkamitra@gmail.com

सुल्तान (समीक्षा) – पंकज कुमार पुरोहित

सुल्‍तान : अच्‍छी है देख लें, पैसे व्‍यर्थ नहीं जाएंगे।

”किसी भी विधा का एक शिखर को छू चुका व्‍यक्ति किसी ”कारण” से उस विधा से दूर हो जाता है, गुमनामी में चला जाता है। फिर कोई उसे खोजता है और उसे वापस लौटाता है।” कुल मिलाकर इतनी सी स्‍टोरी लाइन पर ढेरों फिल्‍में बनी हैं। हॉलीवुड में तो बीसियों फिल्‍में इस प्रकार की हैं। मगर बात वही है कि इस स्‍टोरी को ट्रीटमेंट किसी प्रकार से दिया जा रहा है कि वह नई-सी लगे। ‘सुल्‍तान’ में वह ट्रीटमेंट है और बहुत अच्‍छा है। फिल्‍म देखते समय बरसों पुरानी ऋषि दा की फिल्‍म ‘अभिमान’ भी याद आती है। अमिताभ-जया, सलमान-अनुष्‍का। पिछले साल सलमान ख़ान ने दीपावली पर ‘प्रेम रतन धन पायो’ दी थी, जिसे देख कर बहुत दिनों तक उसका सदमा रहा था। इस बार ईद पर डरते-डरते ‘सुलतान’ देखी। मगर फिल्‍म सचमुच ईद का तोहफा निकली। सबसे पहले बात की जाए अभिनय की, बहुत शानदार अभिनय सलमान ने किया है, लेकिन अनुष्‍का और रणदीप हुड्डा ने अभिनय में शानदार टक्‍क्‍र सलमान को दी है। अनुष्‍का ने अपने पात्र को जीवंत कर दिया है। छोटे से रोल में रणदीप हुड्डा भी जानदार अभिनय कर गए हैं। बात सलमान की तो सलमान ने फिल्‍म में अपने पात्र सुल्‍तान के चारों शेड्स को बखूबी निभाया है। चारों शेड्स में एक अलग सुल्‍तान दर्शकों को नज़र आता है। सलमान ने पहली बार किसी फिल्‍म में बहुत कूल अभिनय किया है। मंद-मंद। सलमान की उपस्थिति पर्दे को भर देती है। सिंगल स्‍क्रीन के दर्शक तालियां पीट-पीट के हाथ दुखा लेंगे यह तय है। क्‍योंकि मल्‍टीप्‍लेक्‍स में तालियां कई बार बजीं। इंटरवल के बाद का सुल्‍तान एकदम हॉलीवुड के अभिनेताओं को टक्‍कर देता हुआ लगता है। विन डीज़ल, श्‍वाजनेगर, सिल्‍वेस्‍टर आदि को। अनंत शर्मा और अमित साध भी अपनी भूमिकाओं में बहुत सधे हुए नज़र आते हैं। खेलों पर बनी फिल्‍में सफल नहीं होती हैं, यह आम धारणा है, लेकिन सुलतान उस धारणा को तोड़ने वाली है। कुश्‍ती इस पूरी फिल्‍म में एक अंर्तधारा की तरह बहती है। और उस पर हरियाणवी टच तो कमाल का है। खेल का इतना शानदार उपयोग किया गया है कि दर्शक सिनेमा हॉल से सीधे स्‍टेडियम में पहुंच जाता है। अंत में जो फ्री स्‍टाइल कुश्‍ती की फाइट्स दिखाई गईं हैं, वो फिल्‍म की जान हैं। बॉलीवुड में इतना भव्‍य पहली बार किया गया है शायद। हॉलीवुड फिल्‍म का-सा भ्रम पैदा करती है फिल्‍म। इंटरवल के बाद की फिल्‍म एकदम हॉलीवुड की फिल्‍म हो जाती है। वैसा ही प्रभाव और वैसा ही असर पैदा करती है। गाने जैसे एक मसाला फिल्‍म में होने चाहिए, वैसे ही हैं। लेकिन फिल्‍म की गति को अटकाते नहीं हैं। विशाल शेखर ने फिल्‍म के मूड और सलमान खान की फैन फालोविंग को ध्‍यान में रखकर गाने बनाए है। गाने क्लिक करेंगे यह तय है। टाइटल ट्रेक फिल्‍म को और गति प्रदान करता है। इरशाद कामिल ने मसाला फिल्‍म में भी अच्‍छे शब्‍दों और वाक्‍यों की गुंजाइश तलाश ली है। गाने अच्‍छे हैं और शूट भी बहुत खूबसूरती से किए गए हैं। फिल्‍म के संवाद भी चौंकाते हैं। कुछ संवाद तो बहुत अच्‍छे लिखे गए हैं। कहानी बहुत अच्‍छी है । जिन दो विधाओं की तारीफ की जानी चाहिए वो हैं फिल्‍म की एडिटिंग और बैकग्राउंड संगीत। दोनों ने फिल्‍म में जान डाल दी है। एडिटिंग इतनी कुशलता से की गई है कि इतनी लम्‍बी फिल्‍म भी बोझिल नहीं लगती है। दर्शक बंधा रहता है फिल्‍म से। फिल्‍म के पात्र एकदम हरियाणवी लगते हैं और इन पात्रों को बनाया भी हरियाणवी मिट्टी से ही गया है। सुलतान और आरफा मुस्लिम पात्र कहीं नहीं लगते, वो बस हरियाणवी ही लगते हैं। भारतीय और हरियाणवी। हां बस एक बात है, वह ये कि फिल्‍म अंग्रेजी माध्‍यम में पले-बढ़े ‘एलीट’ टाइप के युवाओं को शायद उतनी पसंद नहीं आए, लेकिन सलमान की फिल्‍में उनके लिए होती भी नहीं हैं। यह फिल्‍म तालियां बजवाती है, आंखें भिगो देती है, कहकहे लगवाती है, और यह सब करना ‘एलीट’ क्‍लास को पसंद नहीं है। उनके लिए यह ‘चीप’ होता है। और फिर एलीट क्‍लास की पसंद ‘सेक्‍स का तड़का’ तो इसमें सिरे से ही नहीं है। यह फिल्‍म ‘भारत’ के लिए है ‘इंडिया’ के लिए नहीं है। कुल मिलाकर यह, कि फिल्‍म देखी जा सकती है, पैसे वसूल हो जाएंगे। यदि मेरा अनुमान सही है तो यह फिल्‍म सलमान की सबसे सफल फिल्‍म होने जा रही है। वांटेड, दबंग, टाइगर जैसी बिना कहानी की फिल्‍मों की तुलना में इस फिल्‍म में कहानी है और अच्‍छी है। एक बार देख लें, अच्‍छी लगेगी। बुद्धि मत लगाइयेगा, बस देख लीजिएगा। (पंकज सुबीर 7-8-2016)

Pankaj Kumar Purohit (Pankaj Subeer)
Email: subeerin@gmail.com

भारत माता (कविता) – मदनलाल गोयल

भारत माता

यहाँ देव लोक की वाणी है,

कुदरत की लिखी कहानी है ।

यहाँ साधू संतो का साया है,

जिन्हे शांति पाठ पढ़ाया है ।

माँ गंगा ऊपर से आई है,

अमृत जल की धारा लाई है ।

है दिल में सभी के प्रीत यहाँ,

दया धर्म की होती है जीत यहाँ ।

हर कण में है भगवान यहाँ,

मिलें खुशिओं का बरदान यहाँ ।

यहाँ बेटी को पूजा जाता है,

यह शक्ति ही भारत माता है ।

 

भारत माता की जय

 

मदन लाल गोयल

Panchkula

goyal.haryau@gmail.com

निर्दोष (कविता) – मदनलाल गोयल

निर्दोष

चोर को चोर कैसे पकड़ पायेगा,

एक दूसरे को जानता है कैसे हाथ आएगा ।

फिर कोई निर्दोष चोर बता कर पकड़ा जायेगा,

चलेगा उस पर मुक्कदमा पूरा महकमा जुट जायेगा ।

आया है अब पकड़ में बहुत राज़ खुलवाने है,

ढूंढने है इसके कहाँ कहाँ लूट के ख़ज़ाने है ।

टाडा, मीसा नाकाफी है कोई नई धारा लगानी है,

यह देश का है दुश्मन, इसे सजा सख्त दिलानी है ।

इन्साफ के इंतजार में गरीब तड़प तड़प कर मर जायेगा,

कानून के रखवाले को बहादुरी के नाम पर अलंकार मिल जायेगा ।

 

मदन लाल गोयल

Panchkula

goyal.haryau@gmail.com

ज़िन्दगी – उमेश धरमराज

ज़िन्दगी

तेरी ओर ही हैं ज़िन्दगी.

कुछ और भी हैं ज़िन्दगी…

 

भोर से उजली भी हैं

घनघोर भी हैं ज़िन्दगी.

खुशीयां देती हैं कभी

ग़मखोर भी हैं ज़िन्दगी.

फुलों से नाज़ुक नाज़ुक

कठोर भी हैं ज़िन्दगी.

तेरी ओर ही हैं ज़िन्दगी.

कुछ और भी हैं ज़िन्दगी…

 

मिट्टी में गुमनाम हैं

एक दौर भी हैं ज़िन्दगी.

ये कटी पतंगसी हैं

डोर भी हैं ज़िन्दगी.

गोल हैं गुमराह हैं

छोर भी हैं ज़िन्दगी.

तेरी ओर ही हैं ज़िन्दगी.

कुछ और भी हैं ज़िन्दगी…

 

शमा या की चांद हैं

चकोर भी हैं ज़िन्दगी.

दिलचस्प दिल के पास हैं

बोर भी हैं ज़िन्दगी.

बेजान कमज़ोर हैं

ज़ोर भी हैं ज़िन्दगी.

तेरी ओर ही हैं ज़िन्दगी.

कुछ और भी हैं ज़िन्दगी…

 

बेफिक्र ओ’ आज़ाद हैं

ग़ौर भी हैं ज़िन्दगी.

जां पे बनती खामोशी

शोर भी हैं ज़िन्दगी.

ये पैरों की ख़ाक हैं

सिरमौर भी हैं ज़िन्दगी.

तेरी ओर ही हैं ज़िन्दगी.

कुछ और भी हैं ज़िन्दगी…

– उमेश धरमराज.

umesh.dharamraj@gmail.com

रब की मर्ज़ी में मैं होता (गीत) – सुशांत

 रब की मर्ज़ी में मैं होता

तेरी किस्मत खुद मै लिखता

हो जाते एक दूजे के हम

एक दूजे पर जीता मरता

ये सारे जज़्बात बदल दो  जिसमें हूँ  मै बात बदल दो

इश्क़ बदल दो प्यार बदल दो

अपने हसीं अलफ़ाज़ बदल दो

रात बदल दोओओओओ , बात बदल दोओओओओओ

 

देख तुझे पाऊं इस सर्दी

तू आये ये तेरी मर्ज़ी

चाँद लुढ़क गया धूम सहर गयी

पलकों के अहसास बदल दो

ख्वाब बदल दो राज़ बदल दो

रात बदल दोओओओओ , बात बदल दोओओओओओ

 

कहने को हम आएंगे

जुदा अगर हो जाएंगे

फुर्सत हो गई रूखसत हो गई

खुसबू की बरसात बदल दो

जाति बदल दो धर्म बदल दो

ये सारे जज़्बात बदल दो  जिसमें हूँ  मै बात बदल दो

इश्क़ बदल दो प्यार बदल दो

अपने हसीं अलफ़ाज़ बदल दो

रात बदल दोओओओओ , बात बदल दोओओओओओ

PRADEEP CHATURVEDI (SASHANT)+919651477368

prd.chaturvedi@gmail.com

“सूखे गुलाब की महक” – मनोजकुमार मिश्रा

भागलपुर स्टेशन पे झटके से इंटरसिटी ट्रेन आकर रूकी तो प्रिया की आंखें अचानक से खुल गयी। अलसायी नज़रो से बाहर देखा तो कुछ एक लोग ही नज़र आ रहे थे। गाड़ी पकड़ने के जल्दबाजी ने प्रिया को थका दिया था। और ऊपर से राजीव कि किचकिच, जल्दी करो ट्रेन निकल जायेगी, मुझे आॅफिस पहुचना है कल बहुत ज़रूरी मीटीग है, मेरी मीटिंग का क्या होगा। उफ….. इतनी सारी बातों के बीच प्रिया कभी सामान समेटती तो कभी रागनी के लिए कपड़े निकालती। रागनी प्रिया की तीन साल की प्यारी सी बेटी, एक मासूम सी परी। इतने जद्दो जहद के बाद जैसे-तैसे राजीव और प्रिया ट्रेन में बैठी तो उसकी आंखे लग गयी थी। भागलपुर स्टेशन पर ज्यादा गहमा-गहमी तो नहीं थी। लेकिन इन सबके बीच हाॅकर्स का कभी-कभी आवाजें जरूर आ रही थी। पानी ले लो, ठंडा पानी, ए बतिया बाला, चाय वाले चाय ए गरम चाय, तो कही से लीची वाले की अावाज़े, ए लीची ले लो। ऐसी ही अावाज़े प्रिया के कानों में आ रही थी कि तभी, मम्मी मम्मी मुझे आइसक्रिम चाहिए? रागनी ने अपनी तुतली ज़ुबान में कहा। प्रिया के आखों में जो भी रही सही नींन्द थी, कपूर बनकर उड़ गया। अच्छा….. प्रिया ने कहा। प्रिया ने पहले सोचा कि राजीव को ही बोल देती हूँ, वही दिला आयेगा रागनी को आइसक्रिम। लेकिन जैसे ही प्रिया ने अपने उपर वाली सीट पर देखा, राजीव गहरी नींद में सो रहा था। प्रिया ने राजीव की नींद मे खलल डालना उचित नहीं समझा। और फिर अपने पति का नींद तो सर्वप्रिय होता है। चलो मैं ही दिला लाती हूँ आइसक्रिम ऐसा प्रिया ने सोचा, और रागनी का हाथ पकड़ कर ट्रेन के दरवाजे की तरफ बड़ गयी। ट्रेन से जैसे ही नीचे उतरी। एक कूली को आवाज़ लगाकर पूछा। भैया यहाँ पर ट्रेन कितनी देर रुकेगी? बीस मिनट बहन जी, कूली ने जबाब दिया। अच्छा ठीक है इतना कहकर प्रिया स्टेशन पर आगे निकल गयी। प्रिया ने इधर-उधर देखा, लेकिन आइसक्रिम वाला कहीं दिखाई नहीं दिया। तो प्रिया को याद आया कि एक आइसक्रिम वाला तो स्टेशन के बाहर अपना आइसक्रिम बाॅक्स लगाता है! चलो उसी से ले आती हूँ। और फिर प्रिया स्टेशन से बाहर रागनी का हाथ पकड़े हुए निकल गयी।                       स्टेशन से बाहर निकलकर जब प्रिया ने नज़रे घुमाकर स्टेशन को देखा तो उसके मानसपटल पे कई तरह की पुरानी यादें ताज़ा हो गई। क्या….यही है वो स्टेशन? जब हम चारो गाहे बगाहे यहाँ आ जाया करते थे। वही गाड़ी वालों का आवाजे लगाना, वही सारे भिखारी, वही पटरियों पे किसी कपड़े वाले या फल वालो की आवाज़ कुछ भी तो नहीं बदला था बिगत इन दस वर्षों में। हां थोड़ा सा स्टेशन का मरम्मत जरूर हो गया था। तो क्या हरीया काका की चाय की दुकान अभी भी होगा? ये एक सवाल किया था उसके मन ने प्रिया से, प्रिया को ऐसा महसूस हो रहा था मानो इन दस वर्षों का बीता हुआ समय कुछ कहना चाहता हो। पर क्या? दिल-दिमाग में एक मीठी सी चाहत दौड़ने लगा। प्रिया के मन मतिष्क को किसी ने झकझोरा था। प्रिया का रोम रोम प्रफुल्लित हो गया। उसने वहाँ किसी को महसूस किया था। बिगत १० वर्षों में प्रिया एक बार भी भागलपुर वापस नहीं आयी थी, जब भी अपनी सहेलियों से बात करना होता फोन पे ही बात कर लेती। लेकिन उसका मन कभी यहाँ से गया ही नहीं। प्रिया ने अपनी १२ वी तक की पढाई भागलपुर से ही किया था। प्रिया, रमा, उषा, और नेहा ये चारों एक ही क्लास की दोस्त थी, स्कूल से वापस आते वक्त ये चारों हमेशा हरीया के दूकान पे चाय पीने चली जात। कोयले के भट्टी पे बनाया हुअा चाय का टेस्ट बहुत ही सुन्दर हुआ करता था। चारों लड़की हसमुख और चुलबुली थी, हमेशा चेहरे पे एक मुस्कान लिए रहती थी। चाय की चुस्की लेती और फिर अपने-अपने घर चली जाती। अब तो मानो उसको पंख ही लग गया हो वो जल्दी से जल्दी हरीया काका, के दुकान पे जाना चाहती थी…….!                                 हरी काका कैसे हैं आप, पहचाना ? प्रिया ने कहा! हरीया ने अपनी गर्दन घुमाकर देखा और कुछ याद करने की कोशिश करने लगा। हरी ने अपना चश्मा थोड़ा ठीक किया जो उम्र के दहलीज के पास आकर लग ही जाता है। पहचानने की कोशिश करते हुए अभी कुछ ही पल हुए थे, कि प्रिया ने कहा आप भूल गये शायद! और मानो हरीया को अचानक से सबकुछ याद आ गया हो….जैसे उसकी केतली में चाय उबल रही थी। अचानक ही उनके मन में वो सारी बातें उबलने लगी। ज़ुबान से कुछ बोल तो नहीं पाया लेकिन अपने आप को रोक नहीं पाये और उठकर खड़े हो गये, मानो हरीया प्रिया का स्वागत कर रहा हो। अपने कंधे पे रखे हुए गमछा से एक बगल वाला टेबल खीच कर साफ करने लगे। मानो उसपर वर्षों का धूल जमा हो। ताकि प्रिया को उसपे बिठा सके। अरे नहीं नहीं काका ये क्या कर रहे हैं आप, प्रिया ने स्नेह बस कहा। अरे नहीं बिटीया ये तो हमारा फर्ज है। फिर प्रिया को खुद ही ये एहसास हुआ कि हमारे पिता तुल्य है हरीया काका, उनको मेरे लिये येकरना अच्छा नहीं लगा। तो प्रिया ने खुद ही टेबल खीचा और बैठ गयी।..                             एक कप चाय मिलेगी? प्रिया ने धीरे से हरीया से कहा। हां हां क्यों नहीं मै अभी देता हूँ ये कहकर हरी ने एक काच के ग्लास में प्रिया को चाय पकड़ा दी। प्रिया ने एक सिप चाय का लिया और हरीया से पूछा। हरी काका आपके दूकान पे प्रेम नहीं दिख रहा है! आज कहीं गया है क्या? हरीया को तो मानो साँप सूघ गया हो, तोड़ के रख दिया था प्रिया के इस सवाल ने। हरीया के चेहरे पे अचानक ही उदासी सी छा गयी। मन भारी हो गया आखिर क्या जवाब दिया जाय इस सवाल का, यही सोच हरीया के मन मे कयी सवाल उभर रहा था। और हरीया ने अपनी गर्दन नीचे कर लिया।                               प्रेम नाम तो उसका इन चारों लड़कीयो ने दिया था। उसका असली नाम तो डब्बू था। प्रिया अपने सहेली के साथ जब पहली बार हरी के दुकान पे चाय पीने के लिए आयी थी। तो डब्बू ने ही उसका स्वागत किया था। एक बेन्च जो अलग थलग रखा था उसका धूल डब्बू ने खुद अपनी गमछा से साफ किया। आइये आप लोग इधर इस बेन्च पे बैठिये। डब्बू ने बेन्च साफ करते हुए कहा। अरे रहने भी दो इसकी कोई जरूरत नहीं है, वैसे साफ ही तो है। आपका गमछा गंदा हो जायगा। प्रिया ने डब्बू के सवाल का जवाब दिया था। डब्बू अपनी हसी दबाये हुए रह गया। और सोचा कितना सुन्दर विचार है इनका ये तो हमारे गमछा के बारे में भी सोच रहे हैं। हमारे लिये चार कप चाय, प्रिया ने डब्बू से कहा। जी अभी दिया। अरे हाँ अच्छा एक बात बताइए आपका नाम क्या है? प्रिया ने डब्बू के मिलनसार स्वाभाव को देखते हुए पूछा था। जी डब्बू , डब्बू ने जवाब दिया। तो सारी लड़कियां हंस पड़ी। डब्बू को समझ ही नहीं आया कि ये हंस क्यों रही है। उषा ने हसीं से परदा हटाते हुए डब्बू से कहा ये भी कोई नाम है! मेरा मतलब नाम तो है पर अच्छा नहीं है। डब्बू ने अपना सर नीचे झुका लिया। हम उम्र ही थे डब्बू भी लेकिन समय के थपेड़े ने डब्बू को चाय के दुकान पे लाकर खड़ा कर दिया था। फिर क्या होना चाहिए था मेरा नाम? डब्बू को थोड़ा यहाँ अपना इनसल्ट होते हुए भी दिख रहा था। डब्बू के आखों मे थोड़ा आक्रोश भी दिखा था उसको ऐसा लगा था कि मेरे नाम का हंसी उड़ाई जा रही है। आपके अन्दर इतना सेवा भाव है इतना प्रेम है। प्रिया ने कहा, प्रेम….प्रेम तो बहुत बड़ियां नाम है, हाँ उसका समर्थन उषा ने किया। हम लोग आज से आपको प्रेम कहकर बुलायेगे। ठीक है! डब्बू ने कहा ठीक है। हरीया सबकी बातो को बड़े गौर से अनसुना करके सुन रहा था। और अन्दर ही अन्दर मुस्करा भी रहे थे। अरे डब्बू जरा वो चाय का गिलास तो इधर पकडा़ हरीया ने कहा। तो तपाक से डब्बू ने कहा हरी काका मेरा नाम डब्बू नहीं प्रेम है। ये सुनकर वहां पर बैठे हुए सारे लोग हंस पड़े थे।                          वाकयी डब्बू का बड़ा योगदान था हरीया के चाय दुकान में जब से डब्बू उसके दुकान पे आया था हरीया का बिक्री चार गुना बड़ गया था। बड़ा ही भाग्यशाली था, डब्बू से बना प्रेम। आप लोगों की चाय! ये कहते हुए डब्बू यानी कि प्रेम ने चारों को चाय की ग्लास पकड़ाई। चारों ने चाय पी और चल दिये। तभी से उसका नाम  प्रेम हो गया था। और सभी उसको प्रेम कहकर बुलाता।                                     हरीया ने प्रिया का जिज्ञासा को भापते हुए देख लिया था। प्रिया चाय तो पी रही थी लेकिन उसका मन प्रेम में अटक गया था। जब तक प्रिया और उसकी सहेली स्कूल में रही तब तक शायद ही ऐसा कोई दिन होगा। जब ये चारों हरीया के दुकान पे चाय पीने नहीं आयी हो सिर्फ सन्डे को छोड़कर। जब भी ये वहाँ आती प्रेम बहुत ही प्रेम से सबका स्वागत करता, चाय पानी पिलाता। अब इन चारों के जिन्दगी का प्रेम एक अहम हिस्सा हो चुका था। जिसको जो भी मन मे होता कह देता ना कभी प्रेम ने किसी की शिकायत की और ना ही कभी इन चारों के हरकतों से उबा था। समय को तो पंख होता है ऐसा कहा जाता है, कब दो तीन साल बीत गया पता ही नहीं चला। एक दिन प्रिया ने प्रेम से कहा प्रेम आप इतने सच्चे और अच्छे हैं, आप सबकी सेवा करते है और आप हुनर मंद भी लगते हैं आपने पड़ाई क्यों नहीं की अगर आप पड़ाई करते तो आपकी जिन्दगी में एक  लेकिन समय का बंधन हमेशा आड़े अाता है ये कहते हुए अक्सर सुना गया है। और शायद अमीरी ग़रीवी की दीवार भी, तभी प्रेम ने अपनी भावना को दबाये रखा। उनसे कभी भी अपनी भावनाओं को प्रगट नहीं होने दिया। हरीया ने शायद इस बात को भांप लिया था कि प्रेम, प्रिया को अंदर ही अंदर चाहने लगा है। इसपर हरीया ने प्रेम से कहा भी कि तू उस लायक नहीं है जो प्रिया जैसी लड़की से प्यार कर सके। तो प्रेम ने बडे ही रोचक अंदाज में जवाब दिया कि प्रेम ही एक ऐसी जिज्ञासा है जिसमें किसी का पकड़ नहीं है कोई भी किसी से भी प्रेम कर सकता है। और इसपर प्रतिबन्ध भी नहीं लगाया जा सकता है। जबतक कि हम किसी को ये ना कह दें कि मै आपसे प्यार करता हूँ। प्रेम की बात सुनकर हरीया निरुत्तर हो गया था। प्रेम ने बिलकुल सही कहा था कि जबतक हम अपने प्रेम का इजहार नहीं करते कोई भी गुनाहगार नहीं हो सकता। प्रेम पड़ा लिखा ज्यादा नहीं था लेकिन उसके रग रग मे संस्कार भरा था। ऐसा हरीया ने कई बार महसूस किया।                               प्रिया बार-बार इधर-उधर देखती कि शायद प्रेम आ जायेगा। लेकिन वो नहीं आया। हरी काका आपने जवाब नहीं दिया। प्रेम कहाँ है? प्रिया ने एक बार फिर सवाल किया तो, हरीया का सर जो नीचे झुका था वो रोक ना सके। हरीया ने अपना सिर उपर किया और अपना चश्मा ऊतारा। बाकी बातें तो हरीया की आखों ने ही कह दी। आंखें डबडबाई हुई गला रून्ध गया लफ्जों को कह पाने में वो सक्षम नहीं थे। प्रिया को समझने मे देर ना लगी कि प्रेम अब हमारे बीच नहीं है। प्रिया सब समझ गयी थी। ये कैसे हुआ काका? प्रिया ने एक सवाल फिर से हरीया से किया……!                       ये तब की बात है जब तुम्हारे पापा का यहाँ से ट्रांसफर हो रहा था। ये बात तुमने खुद ही अपनी सहेलियों को बताया था कि मेरे पापा का ट्रांसफर पटना हो गया है और अब हम सभी पटना चले जायेंगे। हां हां बताया था प्रिया ने कहा। अफसोस तो तुम्हारी दोस्तों को भी हुआ था कि अब तुम्हारी चौकड़ी टूट जायेगी। लेकिन प्रेम को तुम्हरी इस बात का कुछ ज्यदा ही गहरा असर हुआ। वो ना जाने क्यों उदास सा हो गया था। हां ये बात मैने भी महसूस किया था काका.. प्रिया ने कहा। प्रेम के पापा तो दंगाइयों के हाथों मारे गये थे। एक माँ और अपने से छोटी बहन का बोझ ढो रहा था बेचारा। प्रेम के ही भरोसे से उनकी प्रेम का बगीचा चल रहा था। जी ये सारी बातें उसने मुझसे बतायी थी प्रिया ने हरीया से कहा। जिस दिन तुम और तुम्हारी मम्मी पापा ट्रांसफर होके पटना जा रहे थे उस दिन वो तुमसे मिलने के लिए स्टेशन भी गया था। उसको गुलाब ढुढने में थोड़ा ज्यादा समय लग गया था। शायद तुम्हें गुलाब बहुत पसन्द है। हां है प्रिया ने कहा। प्रेम ये बात भी जानता था शायद, हरीया ने कहा। उसको ये लगा होगा कि अब तुमलोग उससे नहीं मिल पाओगे तो क्यों ना तुमको तुम्हारी मन पसंद चीज देकर तुम्हें अंतिम बार खुश कर दिया जाये। बस यही वजह रहा होगा शायद कि वो गुलाब ढुन्ढने निकल गया था। लेकिन जब तक वो स्टेशन पहुंचा तब तक तुम्हारी ट्रेन चल चुकी थी। वो अपने हाथों में वो गुलाब लिए बेतहाशा ट्रेन के पीछे दौड़ता रहा। हर डिब्बे के खिडकियो में देखा लेकिन तुम उसको नहीं दिखीं। और वो इसी भागदौड़ में ट्रेन के आखरी डिब्बों से वो टकरा गया और उसके बाद उसको कुछ होश नहीं रहा कि आखिर उसको हुआ क्या। उसको अंदरुनी चोटें आयी थी। मुझे जैसे ही पता चला हम दौड़के प्लेटफार्म पर गये तब तक बहुत देर हो गयी थी। आनन फानन मे उसे उठाकर कर हाॅस्पीटल ले गये। उसकी आखें कभी बंद तो कभी खुलती थी। लेकिन अपने हाथों से वो गुलाब को उसने गिरने नहीं दिया था। हमलोगों ने बहुत चाहा कि उसको कुछ ना हो, लेकिन होनी को कौन टाल सकता है। प्रिया की आंखें जार जार वही जा रही थी उसको कुछ समझ नहीं आ रहा था कि हरीया काका को क्या जवाब दिया जाय प्रिया को इतने दिनो बाद ये एहसास हो रहा था कि शायद वो भी कहीं ना कहीं उसकी मौत का जिम्मेदार है। इतना कहते कहते हरीया अपनी गद्दी से उठा और गद्दी के नीचे से, जहाँ वो पैसा रखते थे एक पुरानी सी कापी जो तकरीबन १० सालों से उस गद्दी के नीचे पड़ा पड़ा लगभग रद्दी हो गया था। जिसके उपर लिखा था प्रिया। जो प्रिया आखरी दिन उसी जगह भूल गयी थी जहाँ बो बैठकर चाय पीया करती थी। जिसकी हर्फ पढ़ा नहीं जा रहा था। वो कापी हरीया ने प्रिया के हाथ में पकड़ा दी। बड़े हि बेबस मन से प्रिया ने उसको पकड़ा। उसकी आखरी हिचकी लेने से पहले जो गुलाब उसने हाॅस्पीटल तक नही छोड़ा था। उसने मुझे दी और धीरे से कहा ये प्रिया को दे दीजिएगा। अब मैं तुम्हें ढूंढने कहां जाता, ना अता ना पता। वो तब से मेरे पास ही रखा था। वो इसी कापी के बीच वाली पन्नों में रखा है, हरीया ने कहा। क्या? सिर्फ इतना ही बोल पायी थी प्रिया! जैसे ही प्रिया ने बीच का पन्ना खोला उसमें एक गुलाब का फूल जो बड़ी ही सिद्त से रखा था। जिसमें ना अब खुशबू थी ना ही रंग और ना रूप। था तो सिर्फ एक ढांचा जो गुलाब जैसा दिख रहा था।                      लेकिन इसके बावजूद जो रंग उस गुलाब ने बिकेरा था वो सदियों तक फीका नहीं होगा। उस सुखे हुए गुलाब मे जो महक प्रेम ने छोड़ा था वो शायद ही कभी मिटे। प्रिया ने कभी सोचा भी नहीं था कि वो कि उसकी जिन्दगी मे कभी ऐसा भी दिन आयेगा। और उम्र भर एक बोझ को डोती फिरेगी। उसकी आंखें नम थी और गला रूंध गया था। अचानक ट्रेन की सीटी बजी, अच्छा काका मै चलती हूँ। प्रिया ने हरीया के सामने दोनो हाथ जोड़े और रागनी का हाथ पकड़कर वापिस ट्रेन में आकर बैठ गयी। राजीव को एक नजर देखा तो वो अभी भी सो ही रहे थे। प्रिया हताश सा होकर अपने सीट पे बैठ गई, अपने सर को थोड़ा पीछे टिकाया और नज़रे खिड़की से बाहर चली गई। जैसे जैसे ट्रेन की रफ्तार बड़ा रही थी। प्रिया का मन किसी सोच पे आकर अटक गया। वक्त कितना बलवान होता है। इसके आगे इन्सान की एक नहीं चलती है। जब उस गुलाब में ताजगी थी, महक थी, तब तो प्रिया के पास नहीं अाया। लेकिन जब वो सूख गया था, उसका महक खत्म हो गया था। तब वो प्रिया के गोद में बैठकर उसके साथ जा रहा था। उस “सूखे गुलाब की महक” से प्रिया का मन महक रहा था। इधर रागनी के हाथो से आइसक्रिम पिघल कर गिर रहा था। जैसे हर लम्हा जिन्दगी की पिघलती रहती है।

मनोजकुमार मिश्रा
mishramanojkumar061@gmail.com

THE BUSINESS OF TV WRITING – MAKING OF THE WRITER

FB Mast

Session 3  –   Aug 4 – 2:15pm – 3:45pm

“THE BUSINESS OF TV WRITING – MAKING OF THE WRITER”

 MODERATOR –

Vinod-Ranganath

 

 

 

 

Vinod Ranganath

 PANELISTS:

Jayesh Patil

 

 

 

 

Jayesh Patil

Shashi Mittal

 

 

 

Shashi Mittal

Aatish-Kapadia

 

 

 

Aatish Kapadia,

Sonali Jaffar

 

 

 

Sonali Jaffar,

Farhan Salahruddin & Raghuveer Shekhawat

Do the writers see themselves as businessmen? Are they prepared enough to sell their stories commercially?

Do the writers understand their target audience?

What do producers expect from writers?

Do they have original content to sell or will they go on developing the ideas given by producers or the channel?

Do the producers get complete writers or they train them? Where and how can new writers learn the television medium?

Are the writers real runners of the show?

This session will focus on writing as a potential business, commercial value of stories. Original content development, training the writer, inspiration and innovation in writing. Understanding requirement of the medium and most importantly pitching the story.

Have the daily soaps become money making machine or is there anything we writers can contribute?

Why do Broadcasters encourage TV writers to become producers? what is their benefit? Most writers don’t have competencies to become producers and yet channels not only encourage them but even go out of their way to help them set up a production house. why is this trend being followed? won;t a writer loose his core competency of being a writer by becoming a producer?’

In the past, in shows based on literature and other original content the writing was never tampered with – Malgudi Days, Nukkad, Yeh Jo hai Zindagi, Tamas, Buniyaad…… list is endless.  In the future do we see scope for a writer to have creative control of original content he/she has created… with no bastardisation? Can a writer becoming the show runner achieve this?

 

DECODING THE DIGITAL PLATFORM

FB Mast

Session 2  –   Aug 4 – 11:45am – 1:15pm 

DECODING THE DIGITAL PLATFORM

 MODERATOR: 

Manisha-Korde

 

 

 

 

Manisha Korde

PANELISTS:

Biswapati Sarkar

 

 

 

 

Biswapati Sarkar (TVF),

Varun Grover

 

 

 

 

Varun Grover (Aisi Taisi Democracy – a web series, Masaan)

Satya Raghavan (Head of Content/YouTube)
Chaitanya Chinchlikar (VP, Business development,Whistling Woods)
Nikhil Taneja (creative producer Y-films)

The evolution of this baby media: What do we really mean by digital media? When did it start? Why did it start? The torch-bearers. Their struggles and breakthroughs. The major landmarks (in terms of programs), the reaction by industry mullahs & audience. What was the ‘Kundali’ made by bis’punditz ? “Rahega ki jaayega”?

The current scenario: How many web-series, on an average today at this time? The statistics of viewership.

How to be a player in digital media: Let’s say, a pass-out student from a media school from Pune wants to write or wants to start a web-series? What does he need to do? Overall, the observation is; ‘The rookies rock’ when it comes to web content. Is it true? Monopoly of the youngsters.

Can one ‘eat likes’? The revenue model: In other words, can you buy chai-shakkar by writing for web? Where does the money come from?

Writing for films, TV and digital media: what are the differences, what the similarities? What are the advantages of writing for internet or mobile? Is it more freedom of expression?

And this leads us to the question of –

Copyrights and intellectual property rights in the digital media. An overview.

The sibling rivalry: TV and digital media? Who will compete better? Who will kill whom? Will TV kill films? Will web kill films & TV? Will TV die at digital’s hands?

Understanding the twins: web & mobile platforms. How different they are from one other? How similar?

The future of the future: The digital media is looked upon as ‘futuristic media’. But has the Big Bang for digital media already happened ? Or Is it happening? In other words, has the monster been created completely by now or is it still in making? In terms of percentage, how much of the market is covered today? What is the scope?