Monthly Archives: April 2016

मोहब्बत मेरा मजहब, बिरादरी मेरी शायरी — संतोष आनंद

“मैं टांगो से नहीं सुरों से चलता हूं.” – संतोष आनंद

Veteran Lyricist

श्री संतोष आनंद

२३ अप्रैल २०१६ को २१ सालों बाद फिल्म राइटर एसोसिएशन पहुंचे गीतकार संतोष आनंद युवा लेखकों को हिदायतों के साथ बांटे अपने अनुभव. श्री समीर अंजान, श्री जलीस शरवानी, श्री कमलेश पाण्डेय, श्री दानिश जावेद जैसे कई जानेमाने लेखकों और गीतकारों ने अपने वरिष्ठ श्री संतोष आनंदजी का अभिवादन और सम्मान किया.

पेश है इस कार्यक्रम की विडियो और प्रतिलिपि..

संतोषजी ने कहा …

अपने लोंगों के बीच प्यार पाना किसी बड़े पुरस्कार से कम नहीं है। अपने लोगों के बीच हूं तो ऐसा लग रहा है मानो लेखक बिरादरी ही मेरी शायरी है। मैं एक गीतकार हूं और मेरा मजहब सबसे पहले मोहब्ब्त है। यह विचार शनिवार शाम मुंबई फिल्म रायटर एसोसिएशन के लिंक रोड स्थित कार्यालय में जाने माने वरिष्ठ गीतकार संतोष आनंद ने प्रकट किए।

संस्था की ओर से अभिनंदन समारोह में भावुकता के साथ उन्होंने मुक्त कंठ से अपनी खुशियों और पीडाओं को अदीबों के साथ बांटा ।  इस अवसर पर एसोसिएशन के अध्यक्ष जनाब जलीस शेरवानी और महासचिव श्री कमलेश पांडे ने संतोष आनंद को बुके भेंटकर कर शॉल ओढाया। कार्यक्रम का संचालन संस्था के उपाध्यक्ष दानिश जावेद ने किया। कार्यक्रम में संतोष आनंद के साथ पहुंचे शायर हसन काजमी के साथ संस्था से जुड़े कई नामी लेखक गीतकार उपस्थित थे।

सुर ही मेरे सबसे बड़े साथी

संतोष आनंद के मुताबिक, जिंदगी से मिली पीडाओं से लड़ने का हौंसला मुझे मुझे गीतों ने दिया है। ये सुर ही मेरे सबसे बड़े साथी है, टंागों से चलने में लाचार हूं पर गीत संगीत की चर्चा चलने पर जो चेहरे पर खुशी की चमक आ जाती है तो ऐसा लगता है मैं टंागों से नहींं सुरों के बल चलता हूं।

अपनी यादों का पिटारा खोलते हुए उन्होंने कहा, मैं तो मंच का कवि था पर ताराचंद बड़जात्या ने मुझे फिल्मों की पगडंडी पर ला पटका जहां से मनोज कुमार के अपार प्रेम ने मुझे लोकप्रियता की बुलंदी पर पहुंचा दिया कि कई बड़े नामी गीतकारों के मन में मुझसे प्रतिस्पर्धा जागने लगी।

.. .. ..और मेरी भूख खुल गई

लता जी द्वारा रिकॉडिंर्ग स्टूडियों में मेरे गीत ‘एक प्यार का नगमा है’ के रिकॉर्ड होने के साथ ही उस गीत के चर्चे इंडस्ट्री में होने लगे थे। लेकिन इसी दौरान दो नामी गीतकारों ने जब इसे हल्के से लिया तो मैं दिल्ली आकर अंदर ही अंदर सिकुड़ रहा था कि क्या मेरा गीत आवाम की जुबान पर भी चढेगा? इस संशय की परिस्थिति में भूख मानो मिट गई थी।  मैं उन दिनोंं दिल्ली करीब दो महिने बेदह बेचैन रहा।  एक रात दिल्ली के एक मेले से मेरे घर तक छन छन कर आ रही आवाजों के साथ इस संगीत की ध्वनि कान में पड़ी। मैं हैरत में अपनी पत्नी को जगाके एक रिक्शे पर बैठकर मेले में पहुंचा तो देखता हूं कि वहां चल रही बैंडों की प्रतिस्पर्धा में हर बैंड ‘एक प्यार का गनमा’ की धुन बजा रहा था। ये आवाम के बीच मेरे गाने की लोकप्रियता का बड़ा सुबूत था। फिर क्या था दो महिने से दबी मेरी भूख खुल गई। मैंने आधी रात को घर जाकर पत्नी के साथ भरपेट खाना खाया।

इस बात पर वही गीत एक बार हो जाए..

 

गीत वही जो गाया जा सके

संतोष आनंद के मुताबिक, एक जमाना था जब गीतकार और संगीतकार के नाम से फिल्म की पहचाना होती थी लेकिन आजकल अधिकतर गीत ऐसे लिखे जा रहे हैं जो संगीत से सजकर रिकॉडिंग के बाद ही गाए जा सकते हैं। लेकिन सच्चा गीत तो वो है जो बिना वाद्य यंत्रों की मदद से, सिर्फ पन्ने पर उतर गले में आते ही लोगों की जुबान पर चढ़ जाए। आजकल के गीतों से सबसे बड़ी कमी है मैलोडी गायब होती जा रही है।

प्यार कम पीडाएं ज्यादा झेली

संचालक दानिश जावेद की चुहल पर कि उन्होंने कितनी बार इश्क किया। इस पर वे दिल खोलकर बोले, इश्क करने वाले तो बहुत मिले पर सच्चा इश्क सिर्फ अपनी पत्नी से ही हुआ। पिछले साल अपने एकलौते बेटे को एक दुर्घटना में खो बैठे संतोष आनंद ने कहा, कैसे भूल सकता हूं वो दिन जब मुझे रोटी कपड़ा और मकान के लिए फिल्म फेयर अवार्ड मिला और उसी दिन मेरे घर बैटा पैदा हुआ। मैंने अपनी पत्नी से कहा, मुझे आज दो अवार्ड मिले। लेकिन जिंदगी देने के साथ बहुत कुछ छीनती है। बेटे की मौते के बाद मैंने काफी समय तक खुद को कमरे में बंद कर लिया । मैं शून्य की स्थिति में पहुंच चुका था पर फिर से सुरों ने ही मुझे संभाला।

मनोज कुमार और मेरा सृजन

मनोज कुमार के साथ अपना सबसे अच्छा काम फिल्म इंडस्ट्री को देने वाले गीतकार संतोष आनंद के मुताबिक, मनोज कुमार तो मेरे हमनवा थे जो मैं सोचता था वही सोच उनके दिल में होती थी। उस समय अजब टैलीपैथी थी उनके साथ, हम तो फोन पर ही गीत बना लिया करते थे। मनोज कुमार के साथ मेरा बड़ा तालमेल रहा।  सत्यम शिवम सुंदरम से ही राज कपूर मेरे पीछे पड़े थे गीत लिखवाने के लिए तब जाके प्रेम रोग के लिए मैंने अपनी कलम चलाई। वैसे भी मैं प्रेमिल ह्दय इसंान हूं जहां मुझे प्रेम और अपनापन मिलता है मैं वहीं काम करता हूं।

 सीखते रहें, प्रतिस्पर्धा रखें पर ईष्या नहीं

युवा गीतकार लेखकों को हिदायत देते हुए उन्होंने कहा , जीवन में सीखने का जज्बा कभी ना मिटने दैं। मैं बुढापे में नई पीढी से कुछ नया सीखने की कोशिश करता हूं क्योंकि हमें हमारे जमाने में बाजारबाद की इतनी समझ नहींं थी। जब हम अपने आपको पूर्ण समझने लगते हैं तो हम पतन की ओर अग्रसर हो जाते हैं। लिखने से इश्क करें तो आपको खुदा आपकी लेखनी में ही मौजूद मिलेगा। खासकर आज के गीतकारों को अपने गीतों में मयूजिकल फ्रेज को समझना होगा। क्रांति में लिखे मेरे गीत चना चोर गरम में तुम तुम तरम तरम और लुई समासा लुई चैसे शब्दों के कोई अर्थ नहीं हैं। लेकिन ये मयूजिकल फ्रेज है जिसे वर्तमान में फिल्मों में गीत लिख रहे हर गीतकार को समझना पड़ेगा।

— धर्मेन्द्र उपाध्याय (संवाददाता)

पानी से जुड़ी सात चौपाइयां (पानीवली) – – अमित कुमार तिवारी

सुबह नहाने को चले
चार बाल्टी दन्न*
दिन भर बूंद बूंद को तरसे
दूर भयो मति भ्रम

जल ही जीवन है
कहते बुज़ुर्ग सत्य
आज अमल हम कर रहे
कल तक समझे व्यर्थ

कतार में लगे चार लोग
अजब यह संजोग
पानी के लिये मची कोलाहल
भूले सब यारी, दोस्त

जल बिन सूनी गृहस्थी
समझो तुम श्रीमान
श्रीमती जी हुईं लालटेन
प्रभुजी करो निदान

वो भी क्या दिन थे सोच
आँख मूंद लगाई छलांग
तालाब में पानी नहीं
अस्पताल पहुँचे गुल़फाम

म्युनिसिपालिटी के नल से आवे
नित्य सर्र सर्र की आवाज
तांत्रिक करता झाड़ फूंक
किन्तु नल ना आवे बाज

जल कर# आता वक्त पर
पानी आता बेवक्त
देखके बढ़ते बिल का बोझ
ब्लडप्रेशर बढ़ता कमबख़्त ।।

*शब्दों का अर्थः  दन्न – व्यर्थ करना
#जल करः वॉटर टैक्स

अमित कुमार तिवारी
amitapkamitra@gmail.com

FAN – Review by Rajnni

FAN

A Review – By RAJNNI

Fan

Shahrukh Khan(SRK) in and as FAN…the tagline should have read: SK, the star and SK the fan…The director tried to portray one different from the other, but if we look at it from the audience’s POV, it seemed like one was an extension of the other and that’s how deeply the characters were etched, with blurred boundaries…both synonymously working together, like conjoined twins…and to active such a feat, credit really goes to this Star Performer SK…aka King Khan – This movie has Shahrukh Khan written all over it…from his early days of struggle as an actor to his charismatic persona as a Star weaving in between his own obsessed state of a megalomaniac who generates worldwide hysteria among his fans, one who unashamedly claims…if there is an award out there, it’s rightfully mine !!

It’s a life drama with a couple of laughs thrown in rather than a real comedy and it has a more philosophical take on life rather than in a drama, FAN is a very contained, yet a vast repertoire of SK’s huge cinematic universe…It treads very carefully between the reel and real life of a Superstar and his obsessed Fan. This one could very well have been a disaster were it not for the extremely committed performances of its two leads – Shahrukh and Shahrukh.

Unlike most of SRK’s films, which feature large, intersecting ensembles, the action of FAN is almost entirely comprised of interchanges between these two, and mostly a mind game, as one resides within the other.

A very real life phenomenon, that psyche of a fan embedded in transferred glory, the perils of being a near look-alike of his idol, has been dealt in a clever ‘how will he’ manner!

While FAN is sometimes an ungainly hybrid of destructive obsession and star power hysteria, it has its share of hard-earned merits.

The story is as common as life and all of us, at some point in our lives, are all guilty of: this ‘Celebrity Worship Syndrome’ …but here is where the storyline turns interesting…It has enough turns and twists to keep you engaged and I will leave it at that…Don’t want to fill this space with spoilers.

The Director very cleverly deals with this Intense-personal level of obsession bordering on neuroticism, almost psychotic behaviour. If you can look beyond the mundaneness of the music and the never-ending chases, it’s quite a watchable experience…..Very slick editing and clever special effects aids the story-line well.

The dialogues are all deja-vu, because his scenes are mostly constructed, literally, from his earlier movies. But here, the predictability of the sounds instead of being contrived – somehow, shine through with energy, talent and that SK magic, and together with the Director, they pull it off!

I am not a SRK Fan, and I still loved the movie….I can only imagine what this movie would have done to his real Fans…They may go berserk, crazy with the insights this movie provides, and the up close and personal encounters that the viewers go through….So 4 stars for this FAN ! Do watch it, if nothing else, at least for the simple life lesson it reiterates – Be yourself, build your identity…not much point in chasing glamour and overlooking all the hard work all successful people put in, which is what makes them succeed….

 

Felicitation of Lyricist Shri Santosh Anand

FWA is going to felicitate legendary lyricist, Shri Santosh Anand, on  Saturday the 23rd of April at 3.30 pm at FWA Office.
Veteran Lyricist

Shri Santosh Anand

All members are invited to be part of this ceremony and interact with the distinguished personality. Renowned writers and lyricists like Shri Sameer Anjaan, Shri Jalees Sherwani, Shri Kamlesh Pandey and Shri Danish Javed would grace the occasion.

Shri Santosh Anand has won the Filmfare Award twice and his place in the history of Hindi film music is cemented by his songs which all of us remember:
Main naa bhoolunga Main Na Bhoolungi,
Megha re megha re mat pardea jaa re..  &
Muhabbat hai kya cheez ye humko batao…
Seating will be on a first come, first served basis. The event is open to all members of the Film Writers’ Association. Please carry your membership card with you.
Time: 3.30 pm on Saturday, the 23rd of April
Venue: FWA Office,
201/202, Richa, Plot no B – 29,
Off New Link Road, Andheri (West)
Mumbai – 400 053
Phone: +91 22 2673 3027 / 2673 3108
Report of the above Program is available here..
If you can’t access the above link for any reason, please cut-paste the following link..
http://fwa.co.in/blog/%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%b9%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%ac%e0%a4%a4-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%9c%e0%a4%b9%e0%a4%ac-%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%b0/

अशआर – धवल चोखडिया

शायर और लेखक

शायर और लेखक

अशआर – धवल चोखडिया


(1)

एक उम्र लुट के ले गया था कोई

ढूंढने पर पता चला वो वक्त था

 

(2)

हर किसी के अंदर एक दुनिया होती है

जहां गम और ख़ुशी का हिसाब होता है,

मत पूछो किसी से वो क्या सोच रहा है

गौर से पढो तो हर चेहरा जवाब देता है


(3)

अब कैसे कहूँ तुमको क्यूँ रहे हम उम्र भर अकेले

जज़्बात तो मेरे महंगे थे पर लोग बड़े सस्ते मिले


(4)

गुलाबो की महक है मेरी जिंदगी में

कांटो को गिनने की मेरी आदत नहीं,

हर किसी के वार को बखूबी जानता हूँ

पर बदला लेना मेरी फितरत में नहीं


(5)

आज फिर से शिकस्त खाई है मैंने

आज दुनिया को थोडा और समजा हूँ


(6)

सब कुछ तो लुटा हुआ है,

और क्या लुट के जाओगे?

ये घर तो उजड़ा हुआ है,

क्या वीरानिया ले जाओगे?

 

(7)

दिन को दिन, रात को रात कहता हूँ

मुझ पे जो गुज़री है वही बात कहता हूँ

 

(8)

राख में दबी हुई आग सब नहीं देख सकते

ये काम तुम एक शायर पर ही छोड़ दो

 

(9)

आवारगी तुझसे बस यही सिखा हूँ

मैं अपने घर में भी ठहरता नहीं हूँ

 

(10)

रिश्ता सब से रखो उम्मीद किसी से नहीं

फिर देख मज़ा जीने में आता है कि नहीं

  • धवल चोखाडिया

३१ मार्च २०१६ की सभा के वीडियोस

FWA की शेरी नशिस्त और कवि गोष्टी की पिछली माहाना सभा गुरुवार दी. ३१ मार्च २०१६ को, कार्यालय में परिसर में आयोजित की गई. सभा में बड़ी संख्या में सदस्यों ने हिस्सा लिया, जिसमे कई उभरते कवि / शायर के बीच कुछ नामचीन शायरों ने भी रचनाएँ पढ़ी. पेश है कार्यक्रम के वीडियोस ..

देखें , like और share करें.. और कलाकारों का हौसला बढ़ाये.

कविता नज़्म की ये रंगारंग परंपरा हर माह युही आयोजित की जाती है. सभी मेम्बरान से गुज़ारिश है कि महफ़िल में तशरीफ़ लाये और कार्यक्रम की शोभा बढ़ाये. अगली सभा की तारीख हमारी website पर जल्द ही ज़ाहिर की जाएगी और ईमेल द्वारा भी मेंबर्स को सूचित किया जायेगा.

धन्यवाद, शुक्रिया.

FWA

प्रतिष्ठित भारतीय फिल्म पुरालेखपाल पी.के. नायर का निधन

प्रतिष्ठित भारतीय फिल्म पुरालेखपाल पी.के. नायर बयासी 82 वे वर्षा में निधन

फिल्म पुरालेखपाल, परमेश कृष्णन नायर, पी के रूप में दुनिया फिल्म हलकों में लोकप्रिय नाम नायर पुणे, भारत के एक अस्पताल में निधन हो गया है।

वे बयासी (82) वर्ष के था और कई हफ्तों से बीमार थे

और एक कार्डियक बीमारी के कारण स्वरगवस हो गया!

नायर ने 1964 में भारतीय राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

फिल्म संग्रह था भारत में एक उपेक्षित क्षेत्र है1

नायर यह खुद पर ले लिया हासिल करने के लिए और भारत की पहली फीचर फिल्म राजा हरिश्चंद्र’ (1913) सहित कई भारतीय क्लासिक्स और जीवन नैया’ (1936) की तरह क्लासिक्स Achut कन्या” (1936), “क़िस्मत ‘(1943) औरचंद्रलेखा ‘(1948) फ़िल्मो के नेगेतैइवे का संग्रहा किया।

सभी संग्रह के लिए कुछ 8,000 फिल्मों का अधिग्रहण किया।

नायर पुणे, अपनी प्रेयसी संग्रह के लिए पास में बने रहे, 1991 में संन्यास लेने के बाद और सक्रिय रूप से संस्था के कामकाज में शामिल होना जारी रहा।

1996 में उन्होंने केरल के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव, तिरुवनंतपुरम संगठन मैं महटवा पूर्णा योगदान रहा!

उसके बाद के वर्षों में, बीमार स्वास्थ्य के बावजूद वील चेर से लाचार अवस्था मैं भी फिर भी, वह पूरे भारत में फिल्म समारोहों में एक नियमित रूप से साहब सक्रिया स्वरूपरूप से अपना महत्वपुर्णा योगदान देते रहें। सेवानिवृत्ति के बाद, उन्होंने Aashay फिल्म क्लब के अध्यक्ष के रूप में थ अपनी भागीदारी को जारी रखा!

नायर की विरासत को अच्छी तरह से शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर के वृत्तचित्र में प्रलेखित है सेल्यूलाइड मैन मैं चित्रित किया गया हैं।

अनुपमा चोपड़ा, पत्रकार और जियो ममी मुंबई फिल्म महोत्सव के निदेशक ने ट्वीट किया, “वह अकेले ही भारत की सिनेमाई विरासत को संरक्षित रखा।

अभिनेता शबाना आजमी ने ट्विटर पर लिखा, “हिन्दी साइन इतिहास परंपरा का बेहद नुकसान हैं नायर साहब के स्वरगवस से

किस तरहा नायर साहब सिनिमा इतिहास के जानकार थे !

नायर बेटे बीजू , और एक बेटा वा सुपुत्री बीना पीछे हैं!

अमोल पालेकर, सायीड अख़्तर मिर्ज़ा, प्रकाश मगदूम वा अन्या गान माँया व्यक्तियाओं ने पुणे स्थित रॅशट्रियीआ फिल्म संग्रहालाया में साब को श्रधंजलि देकर श्रद्धा सुमन अरपतीत किये!