Monthly Archives: November 2015

Tamasha (Review) – A Hatke Love-Story

TAMASHA – A hatke Love Story

Hats off to Imitaiz Ali for taking risk on a concept of exploring Love, Dream, Imagination and Finding love for life. It starts with boy VED listening to stories and imagining all the characters narrated by an older guy. The Younger VED (Ranbir Kapoor) meets Tara (Deepika Padukone) on a holiday trip on a French island of Corsica and spends one week with her on an agreement that they won’t reveal their identities so that they can’t be traced. After coming to India the fun and love they shared in Corsica had a resonant impact on Tara and she moves to Delhi on an assignment. However when she meets VED in Delhi, she find VED a different man – a polite sincere, well-mannered product manager seeing this with broken heart TARA decides to leave VED alone and move on. The Clamoring VED leaves his job on a journey to find himself.

Tamasha is about why you need a woman in life and how it takes you on a journey through which we identify ourselves. Imitiaz ali has tried to bring a brilliant romantic drama film in Tamasha. Every scene is well penned. The scene when VED in his childhood imagining the Ram-leela, a heart shaped tattoo on Sita’s hand shows the creativity and the imagination of a young era. From the introduction scene of VED and TARA to the scene when VED goes back to the Older guy (Piyush Mishra) seeking his assistance, to the scene when VED trying make his family realize what he is, makes you applaud for Imtiaz Ali.

The first half of Tamasha is beautiful with exotic location and elegance of music. Splendid & Matured performances from the lead pair. Ranbir Kapoor’s natural act makes you believe he is VED. His conversations with the mirror are fantastic. His immersion in his character at holiday, at work is flawless. Deepika shares less screen presence post interval but still shines at her best.

Tamasha is a mixture of brilliance of Imitiaz Ali + elegance of music by AR RAHMAN + Great chemistry between lead pair and not the least + its unique Story line.

Tamasha is one of those few Indian films that are in their own class

 Nadeem Ali

nadeem2302@gmail.com

A person, who lives the movies, loves the movies and likes to analyse them.

Writer & Film Critic

Writer & Film Critic

मुद्दा व्यंग्य का (लेख) – धवल चोखाडिया

मुद्दा व्यंग्य का

लेखक – धवल चोखाडिया

“व्यंग्य किसे कहते है?”, ये सवाल आप किसी आम आदमी से पूछिये जो लेखक नहीं है | सामान्य रूप से यही जवाब मिलेगा “गहरी बात को हास्यभाव में कहना” | अगर ये सवाल आप किसी लेखक से पूछेंगे तो एक लेखक अपने तरीके से जवाब देगा, “मज़ाकिया अंदाज़ में किसी व्यक्ति, व्यवस्था या सरकार को तीखे शब्दों में सच का आईना दिखाना” | हिंदी सिनेमा में बहुत अच्छी व्यंग्य फिल्मे बनी है | राजनीति पे आधारित व्यंग्य फिल्मे अपने देश में ज्यादा चर्चा में रहती है | लेकिन बदलते वक्त के साथ धर्म पे आधारित और समाज पे आधारित व्यंग्य फिल्मे हमें देखने को मिल रही है | व्यंग्य बहु आयामी है | व्यंग्य में सौ प्रतिशत (100%) मनोरंजन है | किसी भी गंभीर मुद्दे को एक लेखक ऑडियंस के समक्ष हलके फुल्के अंदाज़ में रख सकता है |

राजनीति में व्यंग्य खोजने के मोके बहुत मिलते है, इसीलिए ज़्यादातर लोग व्यंग्य को सिर्फ राजनीति तक सीमित समझते है | राजनीति को एक अलग पहलू से समजने की कोशिष करते है | लेनिन ने कहा था, “जहां लोग है, वही से राजनीति की शुरुआत होती है”” | इस एक छोटे से वाक्य में बहुत गहरे अर्थ छुपे है | आप चाहे वोट दे या ना दे, राजनीति से और नेताओ से आपको चाहे कितनी भी घृणा हो लेकिन हमारी जिंदगी राजनीति से सौ प्रतिशत (100%) प्रभावित होती है | हम आम जिंदगी में भी जाने अनजाने थोड़ी बहुत राजनीति तो करते ही है | किसी भी इंसान के आर्थिक, पारिवारिक और सामाजिक हालात उसको राजनीति के बारे में सोचने को विवश करते है | एक उम्र तक इंसान सोचता है की उसके घर ने उसे क्या दिया, फिर वो सोचता है की उसके समाज ने उसे क्या दिया और आखिर में ये सोचता है उसके देश ने उसे क्या दिया | जब देश की बात आती है तब इंसान राजनीति को अपने नज़रिये से सोचने और समजने की कोशिश करता है | राजनीति और इंसान की जिंदगी एक ही सिक्के की दो बाजू है |

“देख तमाशा देख” एक बेहतरीन पोलिटिकल सटायर फिल्म है | फ़िल्म की शुरुआत कोंस्टेबल नाइक की पूछताछ से होती है | नाइक पर ये इलज़ाम लगा है की नाइक के होते हुए पुलिस डिपार्टमेंट की एलिज़ाबेथ (कुतिया) को एक सड़क छाप कालिया (कुत्ता) ने प्रेगनंट कर दिया | एलिज़ाबेथ को सँभालने की ज़िम्मेदारी नाइक की थी | इस सिन के दौरान सिर्फ एलिज़ाबेथ और कालिया नाम लेकर ही कोंस्टेबल नाइक बात करता है | सीन के अंत में ये पता चलता है की कुत्ते और कुतिया की बात हो रही थी | एलिज़ाबेथ और कालिया का नाम लेकर सीन में व्यंग्य का उपयोग किया गया है |

एरिस्टोटल का कहना है, “इंसान का मुख्य स्वभाव समाज में रहना है, दूसरा मतलब ये है की इंसान झुंड में, समूह में रहना पसंद करता है, इसी लिए मनुष्य संस्कृति में समाज की रचना हुई, अगर इंसान समाज में नहीं रहता तो उसके जीवन में अकेलापन होता है और उसकी आयु कम होती है” | ऐसा नहीं है की व्यंग्य सिर्फ राजनीति पे ही हो सकता है | “आँखों देखी” फिल्म का ज़िक्र करू तो इस फिल्म में एक इंसान के आत्मखोज की बहुत सुंदर बात है | बाउजी (संजय मिश्रा) की जिंदगी में कुछ ऐसे हालात पैदा होते है जिसके बाद बाउजी तय करते है जो आँखों से देखेंगे और कानो से सुनेंगे उसी बात पर यकीन करेंगे | मेरे हिसाब से आप “आँखों देखी” को कमोवेश सोशियल सटायर कह सकते हो | फिल्म के कई सीन में बहुत अच्छे संवाद है जो व्यंग्य का रूप देते है | एक सीन में बाउजी बोलते है “ऐसी जगह मुझे काम ही नहीं करना जहां बार बार मुझे झूठ बोलना पड़े” | एक और सीन में जब पंडित बाउजी को प्रसाद देते है तब बाउजी कहते है, “ये प्रसाद नहीं, मिठाई है, अच्छी है”, | ये सुनकर पंडित भड़क उठता है | हम बाज़ार से मिठाई लाते है और भगवान की पूजा करने के बाद उसे प्रसाद कहते है और इस में कुछ भी गलत नहीं | पर जो इंसान तर्क करना चाहता है उसे आप रोक नहीं सकते | तर्क से भी व्यंग्य पैदा होता है |

कार्ल मार्क्स ने कहा था, “धर्म एक अफीम (opium) की तरह है” | एक बार अफीम की आदत पड़ जाए फिर इंसान उसके बिना नहीं रह सकता | अपने देश में धर्म को आम जनता ने नहीं पर धर्म के ठेकेदारों ने ही अपने निजी स्वार्थ के लिए ज्यादा बदनाम किया है | धर्म की पवित्रता में धर्म के ठेकेदारों ने उसी अफीम का नशा मिला दिया है | इंसान के कर्म से बड़ा कोई धर्म नहीं है | “ओह माय गॉड”, “धरम संकट में” और ऐसी कई धर्म आधारित व्यंग्य फिल्मे है | धर्म पे व्यंग्य करना बड़ी ज़िम्मेदारी का काम है |

मेरा मानना है की अगर एक लेखक राजनीति को, धर्म को, इंसान के सामाजिक हालात को या इंसान की निजी जिंदगी को केंद्र में रख के व्यंग्य का सहारा लेकर कोई कहानी लिखेगा तो वो ज्यादा असरदार साबित होगी | ये सब चीज़े एकदूसरे से जुडी हुई है | बस एक लेखक को ये तय करना किस मुद्दे को ज्यादा बल देना (emphasize) है |

और अंत में, हिंदी साहित्य में हरिशंकर परसाई के बिना व्यंग्य अधूरा है | जो लेखक व्यंग्य कहानी लिखना चाहता है तो उसे पहले हरिशंकर परसाई को ज़रूर पढना चाहिए | इसके अलावा शरद जोशी और उनके जैसे कई अच्छे लेखको ने अपनी कहानी के ज़रिये व्यंग्य को नया आयाम दिया है | ऐसी बहुत सी अच्छी व्यंग्य फिल्मे है और अच्छे व्यंग्य लेखक है जिनका मैंने ज़िक्र नहीं किया, उनके प्रति मैं अपना सम्मान प्रकट करता हूँ |

—   धवल चोखाडिया

dhaval.chokhadia@gmail.com

शायर और लेखक

शायर और लेखक

ख़ता बख्श दे गर ख़ता हो गई (गीत) – अमित कुमार तिवारी

ख़ता बख्श दे गर ख़ता हो गई
सुना है कि तू बेवफा हो गई
जन्नते इश्क के सैलाब में
खुशनुमा ज़िन्दगी फ़ना हो गई
ख़ता बख्श दे गर ख़ता हो गई…

 

इबादत का है सच्चा उसूल
तू मुझको कबूल मैं तुझे कबूल
कहदे, खामोशियों की चिलमन हटा
बेवफाई तेरी अफवाह हो गई
ख़ता बख्श दे गर ख़ता हो गई….

 

पायल तेरी खनके आज भी
चेहरे की रंगते पंखुडी गुलाब सी
लुटने को बेकरार धडकने मेरी
सोचता मैं रहा तू दफ़ा हो गई
ख़ता बख्श दे गर ख़ता हो गई….

तेरे जाने के बाद पहले से ज़्यादा
मुझको तेरी परवाह हो गई
सुबह से शामें गुजरती रहीं
खुली खिइकी तेरी गवाह हो गई
ख़ता बख्श दे गर ख़ता हो गई

 

सुना है कि तू बेवफा हो गई
जन्नते इश्क के सैलाब में
खुशनुमा ज़िन्दगी फ़ना हो गई ।।

गीतकार अमित कुमार तिवारी

amitapkamitra@gmail.com

Prem Ratan Dhan Payo (Review) – by Rajnni

PREM RATAN DHAN PAYO

A Review – By RAJNNI

Love is in the air and it has brought with it the magical, musical, long awaited extravagant drama crafted by the best “made for each other” team of Salman and Sooraj …. Prem Ratan Dhan Payo (I received the treasure of Love)….and served with a double dose of Salman Khan, no less 

The movie reminds us of the time when Sooraj B first introduced us to Salman K aka Prem as the quintessential lover boy…..and 21 years since the epic family drama Hum Aapke Hain Koun (HAHK) first hit screens he resurrects him ..Through the layers of Bajrangi, Dabaang, Kick, Bodyguard emerges this tough, gentle, quirky, idealistic and adoring lover boy…Only a director this accomplished can pull of this fact seemingly effortlessly.

The movie is all about family values, moral principles and upholding personal ethics when faced with dilemmas. Whether it’s the family torn apart by misconceptions or a common man impersonating the Prince, this is the common thread binding all characters. The movie transcends geography and takes us to a land which could be set in any time period..it’s beside the point that the story is very much in 2015.

On the surface we see grand palaces, lavish sets, elaborate costumes and mythical surrounds. However what we can’t see is the detailed attention on production/set-ups, the screenplay execution, great visualization with overhead cameras and the meticulous editing effort.

All of this is thanks to that one person, the director: and we’ve heard from Salman himself that he played out the entire movie to him in the first pitch. Lot of kudos goes to the actors for their indulging performances in projecting the director’s vision.

Sonam looks very pretty, feminine, naïve and dreamy; awed by her co-star.

Salman Khan once again proves his larger than life persona.. He rises tall and infuses blue blooded action into his scenes.. His portrayal of the lonely prince and the smitten lover is charismatic and soulful.

The musical score is lyrical, pleasing and nostalgic…

The movie does have its share of flaws, some clichéd incidents, some emotional overplay but then the brilliance of the overall jewel overshadows it so well….making this movie real, if not perfect.

Family, friendship, freedom, fantasy, frivolity, forts all make a comeback….and all I can say here is, an enjoyable watchable experience has been created for us ‘the audience’ and we are lucky to have this privilege and the luxury of watching this gem of a movie with our families…..that’s the priceless Ratan.

Review by – Rajnni Lalsingaani
rlalsinghani@hotmail.com

Geraua from Dilwale (Song Review) – Nita Kapadia

Geraua, from Dilwale, the movie.

Did the lyrics, images and colors of the song ‘Gerua’ from Dilwale, mean the same to you?

A wreck of a man, atop the mangled plane?

A love that was pure when it all began. A courtship which played hide and seek with the sunshine and the shadows?

As the journey progressed did, the relationship became more formal as depicted by the black clothes and the symbolism of the boat?

That it was not about instant gratification, but something a bit more sophisticated?

Was it a love that did not sink in spite of the vagaries of life?

Does the orange accent tell you that in spite of their enduring love, the expressions of their love were changing? Not too much, just a little at a time?

Does the waterfall depict the openness of their love? How powerful were their expressed emotions?

Where I meet you, away from the sun, slipping through the shade, a moment pauses; the sky melts into a mirror and sets within it forming your face.

I come to you, forgetting the world, a prayer awakens in my heart, color me ochre: the color of dawn, for I begin from you and extinguish with you.

Had their love reached a turning point?

Was it powerful because the lovers were true to their heart’s desire? What was their heart’s desire?

Does the rainbow mean that the lovers spoke directly from their hearts? Does the presence of two rainbows promise magic at the end of it? The fulfillment of their heart’s desire because the lovers never swayed from their path?

Actually they did sway, but all for the good cause of romance. Where would we fans be, if not for the serendipitous magic of the double rainbow, the waterfall, the boat, the synchronized flight of the birds, the lava, the ice, the passion of red tempered by blue?

An evolving relationship in you? A wrecked relationship rejuvenated because the lovers stayed their path? Follow their heart’s desire? Did they reach the end of the rainbow? Did the double rainbow bring magic in their relationship? Did their passion unleash

A red that is not there talks of passion that has mellowed. The presence of black conveys the sophistication that hints at a new formality in the relationship. Luckily for the lovers, an orange accent talks of the love that has endured without the loss of vitality.

In sunshine, or in shade, if you follow your heart’s desire and purpose, you will get to the end of the rainbow.

Nitavkapadia.nk@gmail.com

कुछ उम्र कट गयी यहाँ, कुछ और अभी बाकि है (गीत) – Stanish John Gill

कुछ उम्र कट गयी यहाँ, कुछ और अभी बाकि है.

चलता रहे जामे दौर युही, इतनी गुजारिश साकी है.

 

एक मैं रहु एक तू रहे, और बस यह मैख़ाना रहे

छलकाए रख तू युही जाम, खाली ना यह पैमाना रहे.

इस बेइलाज़ मर्ज़ को ज़रूरत बस इस दवा की है.

कुछ उम्र कट गयी यहाँ, कुछ और अभी बाकि है.

 

आई बहार और चल भी दी, हम देख़ते ही रह गए.

कलियाँ खिली मुर्ज़ा गयी , फ़क्त वीराने ही रह गए.

बेजान हम  चमन में  हो गए , यह हाल उनकी अदा की है.

कुछ उम्र कट गयी यहाँ, कुछ और अभी बाकि है.

 

परवाना समज़ के वह हमे , कुछ इस तरह जला गए.

अपने मजे के वास्ते , हमे ख़ाक में मिला गये.

कितनो को है मिटा दिया , यह बात उस शमा की है.

कुछ उम्र कट गयी यहाँ, कुछ और अभी बाकि है.

 

अपने तो वोह ना बन सके , जीते थे जिनके वास्ते.

गुमराह हो गए है हम , दिखते नहीं अब रास्ते.

सब चाहते अब मिट गई , एक चाह बस कज़ा की है.

कुछ उम्र कट गयी यहाँ, कुछ और अभी बाकि है.

 

 

Written by,

Stanish John Gill.

9987413282.

writer.stanish@gmail.com

Hausle Hacker Ke (Rap Song) – Amit Tiwari

RAP GEET – HAUSALE HACKER KE
WRITTEN BY- AAPKA AMIT

Hausale hacker ke
Technology cracker ke
Azi hadh karte hadh karte
Gafalat kar chaupat karte
Hum mehnat karte
Tum khokhat karte
Suit boot tumko
Suit naa karte
Hum Writer’s ke pass
Vaise bhii tangii
Creativity sari jamaa punji
E- Mail account se le udte
Hausale hacker ke…
Saat vars kii jail pakki
Pakde Gaye jo tum unlucky
Aaj shirt ki collar jhuki hui hai
Parent Ki Nazarene dukhi Hui hai
        Hausale hacker ke…
Kyaa paya yah sab karke
Bharose tode ghar ghar ke
Newspaper mein tum chhapte
Chehraa dhakne ki kosis karte
Writer friends remember my suggestion
Double laptop use karo common solution
Ek jisme online rahte dujaa jispe work ho karte
Friends pen drive bhii one alternative solution
WRITTEN BY- AAPKA AMIT

आया मैं आया तेरी birthday party में (गीत) – अक्षत अरुण

आया मैं आया तेरी birthday party में

नैनों से नैना मिला

लाया मैं लाया तुझे तोहफ़े क्वालटी के

जा भूल शिक्वा गिला

आया मैं आया तेरी birthday party में

नैनों से नैना मिला

लाया मैं लाया तुझे तोहफ़े क्वालटी के

जा भूल शिक्वा गिला

आशिक हूँ तेरा यूं  गाली न दे

दो घूँट की रम की पयाली न दे

पिलाना है तो यार जमकर पिला

दारु  की बोतल आधी खाली न दे

पिलाना है तो यार जमकर पिला

दारु  की बोतल आधी खाली न दे

 

ये इशक दा पिरंदा

अब तलक है जिंदा

कितना भी मारो मरेगा नहीं

मैं हूँ सोणा बंदा

दिल का तेरे बाशिदा

जुदा तुझसे पारो रहेगा नहीं

पाया है पाया तुझे मन्नतों से

चलने दे ये सिलसिला

आशिक हूँ तेरा यूं  गाली न दे

दो घूँट की रम की पयाली न दे

पिलाना है तो यार जमकर पिला

दारु  की बोतल आधी खाली न दे

पिलाना है तो यार जमकर पिला

दारु  की बोतल आधी खाली न दे

 

शाम है ये रंगीन

सोणिये तू नमकीन

हँसके गुजार ये जवानी के दिन

बात सुन ले मेरी

ओ मेरी हसीं Quween

रह न सकेगी तू भी मेरे बिन

साया है साया तेरा हरदम मुझपे

चेहरा मेरा भी खिला

आशिक हूँ तेरा यूं  गाली न दे

दो घूँट की रम की पयाली न दे

पिलाना है तो यार जमकर पिला

दारु  की बोतल आधी खाली न दे

पिलाना है तो यार जमकर पिला

दारु  की बोतल आधी खाली न दे

 

दिल हुआ मेरा घायल

मन हुआ मेरा पागल

देख तेरे जलवे अदा शोखियां

मस्तियों में डूबा

आज यारो हर पल

गिर रही हैं मस्ती भरी बिजिलयाँ

छाया है छाया नशा तेरे रूप दा

नाज़ुक कमिरया हिला

आशिक हूँ तेरा यूं  गाली न दे

दो घूँट की रम की पयाली न दे

पिलाना है तो यार जमकर पिला

दारु  की बोतल आधी खाली न दे

पिलाना है तो यार जमकर पिला

दारु  की बोतल आधी खाली न दे

 

song writer and copyright by

akshat arun

copyright mumbai-11584

-09250053786

Prem Ratan Dhan Payo (Review) – Nadeem Mohiddin Ali

Prem Ratan Dhan Payo stuck in bygone era of 90’s

After delivering memorable blockbusters such as Maine Pyaar Kiya, Hum Aapke Hain Kaun and  Hum Sath Sath hai. The Combo of Salman Khan and Sooraj Barjatya is back, But unfortunately this does not work well with Prem Ratan Dhan Payo.

The Story is set in a place called Pritampur Yuvraj Vijay Singh (Salman Khan) a prince of Pritampur, is soon to be crowned as king and is engaged to princess Maithili (Sonam Kapoor), His step sisters Rajkumari Chandrika (Swara Bhaskar) and Rajkumari Radhika (Aashika Bhatia) lives in a separate house outside royal fort, while his step brother Yuvraj Ajay Singh (Neil Nitin Mukesh) wants to kill him and take the Crown with the help of his manager Chirag Singh (Armaan Kohli), who is misguiding Ajay at every step. They plan an attack on Yuvraj Vijay, which Vijay survives but gets badly injured. Meanwhile Vijay’s look alike Prem Dilwale (Salman Khan) a happy go lucky stage actor who falls in love with princess Maithili, reaches Pritampur to meet her along with his friend Kanhaiya (Deepak Dobriyal). Pitampur’s Diwan Sahab (Anupam Kher) notices Prem and gets him to take Yuvraj Vijay’s place while Yuvraj recover in a hideout.

Prem acts as Yuvraj Vijay but with his simple and caring nature, impresses Maithaili, and also reconciles with his sister’s and brings them back to fort.

The major drawback of PRDY is his dull script which is stuck in bygone era of 90’s with some heavy dialogues “Aap paristhiti ki gambhirta ko samajh nahi rahe hain”, “Ram jaisa kahenge Seeta waisa hi karegi” , “Yeh sab Shaadi ke Baad” AND its running time which is close to 3 hours. Romantic scene between Prem Diwale and Princess Maithili is very well written.

If there is one reason to watch the film, that is Salman Khan who had brilliantly handle both role one as Prem Dilwala a playful Ram Bhakt and other Prince Vijay. His comic timing is simply superb. Salman still looks young, energetic, fit as ever and is quite the charmer. Other than Salman, Sonam Kapoor, Anupam Kher, Neil Nitin, Deepak Dobriyal, Swara Bhaskar has done complete justice to their roles.

The other plus point of PRDY are production values, grand set design, rich interiors and nice costumes. Every single frame looks very rich and eye feast for audiences.

An Overdose of melodrama and Sanskar. Strictly for Salman Khan fans.

By –

Writer & Film Critic

Writer & Film Critic

Nadeem Mohiddin Ali
nadeem2302@gmail.com

 

 

प्रेम रतन धन पायो (समीक्षा) – दीप जगदीप सिंह

प्रेम रत्न धन खोयो!

सलमान ख़ान जैसा बड़ा सितारा, सूरज बड़जात्या जैसा नामचीन निर्देशक, हॉलीवुड की धड़ल्लेदार निर्माता कंपनी फॉक्स स्टार, कभी सबसे भद्दे फैशन के लिए चर्चित हुई सोनम कपूर जो अब अपनी पीआर के दम पर फैशन दीवा है, पिटा हुआ ग्रे शेड कलाकार नील नीतिन मुकेश, खुद का ‘जानी दुशमन’ अरमान कोहली, दर्जन के करीब ठूंसे हुए गाने, राजस्थान के ऐतिहासिक महल, अयोध्या के घाट और मंडप, कुछ चुलबुले वन लाईनर, कुठ भावुक संवाद, अनंत रंग, विहंगम दृश्य, यूपी-बिहार की बोली का तड़का, एक और सलमान ख़ान (अरे डबल रोल है ना!) नो फैमिली, जस्ट फैब्रिकेटेड इमोशन एंड ड्रामा, लाईन चाहे फिल्म की अवधी जितनी लंबी है, लेकिन एक ही लाईन में बताना तो हो बस यही है प्रेम रत्न धन खोयो ओह! आई मीन पायो…

प्रेम दिलवाला (सलामन ख़ान) अध्योध्या में अपनी नाटक मंडली चलाता, रामलीला दिखाता है। रामलीला से जो भी चंदा इक्ट्ठा होता है वह समाज सेवी संस्था उपहार को दान कर देता, क्योंकि जब पिछली बार बाढ़ आई थी तो उपहार की संचालिका राजकुमारी मैथिली (सोनम कपूर) अपने उड़नखटोले पर बैठ कर खुद राहत सामग्री बांटने आई थी। वह राहत सामग्री क्या बांट कर गई, प्रेम दिलवाला की दिल की राहत साथ में ले गई। बेचैन दिलवाला बस एक झलक उसे देखने के लिए उपहार के दफ्तर चंदा जमा करवाने लगा, इस बार जब वह चंदा जमा करवाने गया तो उसे पता चला कि राजकुमारी मैथली अपने मंगेतर राजकुमार विजय सिंह (सलमान ख़ान मूछ वाले) के राजतिलक के भव्य आयोजन पर प्रीतमपुर पहुंच रही हैं, अगर वो चाहे तो इस बार चंदे का डिब्बा सीधा जाकर उन्हें वहीं दे सकता है। फिर क्या दिलवाले बाबू लिए लंगोटिए कन्हैया को साथ और कटा लिए सीधा बस का टिकट और चल दिए प्रीतमपुर। इधर अपने प्रेम बाबू बस में बैठे हैं उधर राजकुमार विजय अपने राजतिलक की तैयारी कर रहे हैं उनके सबसे ख़ास सेवक दीवान जी (अनुपम खेर) घराने परंपरा के अनुसार राजकुमारी मैथली का स्वागत करने के लिए राजकुमार विजय की बहनों चंद्रिका (स्वरा भास्कर) और राधिका (आशिका भाटिया) को न्यौता देने की सलाह देते हैं। लेकिन पिता की रखेल (लता सभ्रवाल) की बेटी चंद्रिका जो राजकुमारी की सहपाठी भी है और जो शाही परिवार की संपत्ति में हिस्सा और पारिवारिक सम्मान ना मिलने से आहत उनसे कोई रिश्ता नहीं रखना चाहती। राजकुमार विजय, दीवान के कहने पर बहन को न्यौता देने पहुंच तो जाते हैं, लेकिन बहन वकील को सामने कर देती है। आहत होकर राजकुमार अपनी घोड़ागाड़ी में गुस्से में वापिस चल देते हैं और एक साजिश के तहत उन्हें पहाड़ से नीचे गिरा दिया जाता है, जिसमें शामिल है उनका चालक छुट्टन (मुकेश भट्ट)। दीवान को पहले से पता है कि यह साजिश राजकुमार के सौतेले भाई अजय सिंह (नील नीतिन मुकेश), उनकी पीए (समैरा राओ) और एस्टेट के सीईओ चिराग़ (अरमान कोहली) की रची हुई है। होता यह है कि बुरी तरह से जख़्मी राजकुमार, दीवान को मिल जाते हैं और वह उन्हें महल के एक गुप्त तहख़ाने में वह उनका इलाज शुरू करवाते हैं।

इधर राजकुमार का विश्वासपात्र सुरक्षा अधिकारी (दीपराज राना) बाज़ार में खरीददारी करते हुए प्रेम दिलवाले से टकरा जाता है, फिर क्या उसके दिमाग की बत्ती जल जाती है और वह प्रेम को राजकुमार विजय बना कर असली राजकुमार के ठीक होने तक उसे महल में रखने की योजना बनाता है, जिस पर दीवान राज़ी हो जाता है। जानदार रामलीला का अदाकार प्रेम चुटकी बजाते ही मोजे सहित राजकुमार के जूते पहन लेता है (आई मीन गैट इन द शूज़ ऑफ प्रिंस) और चल देता है राजकुमारी का स्वागत करने। राजतिलक तक साथ रहने आई राजकुमारी सख़्त दिल अन-रोमैंटिक राजकुमार को उल्हाने देती है तो उसे खुशी देने के लिए अपना डुप्लीकेट राजकुमार उर्फ प्रेम एक आज्ञाकार प्रेमी की तरह उसकी हर ख्वाहिश पूरी कर देता है। घंटी तब बजती है जब उसके नए प्रेमपूर्ण रूप से अतिउत्साहित राजकुमारी से अतरंगी होते होए उसे अपने बदन पर अपने प्रेम की पाती लिखने को कहती है। राम-भक्त प्रेम दिलवाला इमानदारी से इस नाटक को खत्म कर चले जाने की आज्ञा लेने दीवान के पास आता है तभी पता चलता है कि लगभग ठीक हो चुके राजकुमार का अपहरण अजय सिंह ने कर लिया है। राजकुमार को लौटाने के बदले चिराग़ दीवान के हाथ आ चुके छुट्टन और प्रेम को मांग लेता है। प्रेम आख़री कुर्बानी देने के लिए उसके साथ चला जाता है और फिर होता है एक्शन और ड्रामा और अंत में इमोशन ढेर सारा इमोशन। विलेन मर जाता है, भाई-भाई, भाई-बहन का मिलन हो जाता है। राजतिलक भी हो जाता है और प्रेम विदा लेता है। ये हुई ना हैप्पी एंडिग अरे रुकिए कहां चल दिए पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त! उफ सूरज बड़जात्या जी, काहे 20-20 के दौर में टिप-टिप टैस्ट मैच खेल रहे हैंए तो हां हम कहां थे, हां पिक्चर में बाकी यह है कि अभी प्रेम दिलवाला को, प्रेम रत्न धन पाना है! वो कैसे पाएंगे, यह हम थोड़े ना बताएंगे, वो तो फिलिम देख कर ही पता चलेगा ना बाबू! ले दे के फिल्म में इतनी रेलम-पेल होने के बावजूद कहानी नदारद ही समझो!

यह तो हुई कहानी, अब समीक्षा भी कर ली जाए, ले देकर जो सलमान ख़ान का फील गुड फैक्टर मीडिया में अभी बना हुआ है, पूरी कहानी का ताना-बाना उसी के गिर्द-बुना गया है। बड़जात्या, रंगों, महलों, आयनों, पहाड़ों और शाही ठाठ-बाठ को पूरी वहंगम्ता से पर्दे पर उतारते हैं, लेकिन उनका पारंपरिक परिवार वाला इमोशन इन सब की भीड़ में कहीं खो जाता है। खो कहां जाता है जी, है ही नहीं। पूरी फिल्म में बस सलमान ख़ान ही छाए रहते हैं फिर वो चाहे प्रेम हो या विजय। अंत में पूरी फूटेज सलमान को देने के लिए दोनों रूपों में उन्हें दो अलग-अलग जगह पर फाईट करते दिखाया गया है। एक तरफ भूलभुलैया में प्रेम का चतुर एक्शन तो दूसरी तरह विजय का बाहुबली एक्शन। माने गुदगुदी भी और मारधाड़ भी। सलमान ख़ान बिल्कुल वैसे ही हैं जैसे कि वह हर फिल्म में होते हैं। सोनम भी बिल्कुल वैसी ही लगी हैं जैसी वह हर फिल्म में लगती हैं यानि राजकुमारी तो छोड़‍ ही दीजिए फैशन दीवा भी नहीं लगी हैं। मेकअप की गड़बड़ भी काफी जगह दिखी है। उनकी लटके-झटके और प्रेम-लीला ज़रूर कुछ तालियां और कुछ आहें बटोर लेंगी। अनुपम ख़ेर ने भी वही किया है जो वह करते आएं हैं। स्वरा भास्कर और आशिका भाटिया के पास करने के लिए कुछ था ही नहीं और राजकुमारियों उनको सिर्फ बताया गया, दिखाया ही नहीं तो वो लगती कैंसे? कन्हैया के किरदार में दीपक डोबरियाल दर्शकों के चेहरे पर हंसी लाते हैं। अरमान कोहली बिग बॉस से ज़्यादा अच्छे अभी तक कहीं ओर नहीं लग पाए। दीपराज राना अपने किरदार को बाखूबी जी गए हैं।

संगीत हिमेश रेश्मिया की तरह पिटा-पिटाया है और फिल्म को और बोझिल बनाने में पूरी मदद करता है। कोई भी गीत फिल्म में सहजता से नहीं आता, सब ठूंसे हुए से ही लगते हैं। लेकिन दिए जलते हैं लिखने के लिए इरशाद कामिल की प्रशंसा करनी बनती है। प्रेम के भाव को जितने भावुक अहसास के साथ उन्होंने लिखा है, वैसा सक्रीन पर भले ही ना दिखाया जा सका गया हो, लेकिन बोल दिल को छूते हैं। लेकिन सलमान फिल्म के एक दृश्य में कैमल यानि उूंट को कामिल कह कर चिढ़ाते हुए नज़र आए हैं यह मुझे अटपटा लगा। भाई अगर कोई बिहाईंड दा सीन मसला था तो बिहाईंड दा सीन ही सुलझा लेते ना!

निर्देशन के बारे में मैं इतना ही कहूंगा कि लगता है जैसे बड़जात्या साहब ने यह फिल्म मजबूरी में बनाई है, उनका पक्का दर्शक उनकी मज़बूरी से ठगा सा महसूस कर रहा है। वेष्‍भुशाओं में भी कोई तालमेल नज़र नहीं आता, एक ही पल में कलाकार शाही एथनिक हो जाते हैं और अगले ही पल में कूल अर्बन। लगता है विहंगमता और राजशाही की एथंटिसिटी बनाए रखने के साथ-साथ बाड़जात्या फिल्म को यूथ ओरियेंटेड और सामकालीन बनाने के मध्य झूलते रहे हैं। बाड़जात्या जी एक और बात बताईए, यह जो अपनी राजकुमारी मैथिली के पास अपना चार्टेड हैलीकॉप्टर था, वो काहे नी लेकर आई प्रीतमपुर, का हैलीपैड का कोनो प्रॉबलम था, काहे पैसेंजर ट्रेन में आई वो समझे नहीं हम। और एक ठू बात, यह भी बता दीजिए की कौन महारानी आज के ज़माने में अपनी राजकुमारी को पूरा सामान पैक करके सीधे एक नौटंकीबाज के घर छोड़ने आ जाती है। अरे! भई मान लिया रिश्ता करना भी था, तो गरीब लड़के को महल भी लेजा सकती थीं ना। ख़ैर ई फिलिम देखे के चक्क्र में हमरा (बड़जात्या) प्रेम, रत्न (कीमती समय) और धन (टिकिट का पैसा) खोयो हो गया, हैंजी!

-दीप जगदीप सिंह, पटकथा लेखक व फिल्म आलोचक । 9818003625 । deepjagdeepsingh@gmail.com