Monthly Archives: August 2015

‘मांझी- द माउंटेन मैन’ – रुपेश कश्यप की समीक्षा

”मांझी- द माउंटेन मैन’ एक सक्सेसफुल ‘स्टार्ट-अप’ है. क्यों कि वो सिर्फ़ अपने निजी फ़ायदे नहीं देखता.

मैं सोचता हूँ कि अगर दशरथ मांझी छोटी जाति से नहीं होते तो क्या होता? क्या उन्हें 22 साल लगते पहाड़ तोड़ने में? क्या उन्हें और ज़्यादा समय लगता या कम लगता, मुझे इतना तो नहीं पता पर इतना पता है कि लड़ाई कितनी लेयर्स में होती है जब रूप, रंग, बोली, नस्ल, जाती, धर्म, क्लास के आधार पर आपको और आपकी योग्यता को जज किया जाए. ऐसे में ख़ुद को बनाये रखना आसान नहीं होता. मुझे दुःख होता है कि आज भी हम कुछ ज़्यादा नहीं बदले हैं. मैं समझता हूँ दशरथ मांझी एक चमचमाती, आँखें खोलने वाली, खनकदार और ईमानदार सोच है जिसकी हत्या उन स्मार्ट लोगों द्वारा होती है जो सत्ता में या सत्ता के नशे में या सत्ता के इर्द-गिर्द  होते हैं. वो ये सोचते हैं उनका शातिरपना, छले गए को समझ में नहीं आता. इतिहास गवाह है कि उन स्मार्ट लोगों को इतिहास कैसे याद रखता है.

क्यों ऐसा है की आज भी गेहलौर का रास्ता विकास के सही रास्ते पर जाते नहीं दिखता? गेहलौर एक सवाल है जो संसद में ही नहीं हमारे जेहन में भी दबा दिया गया है. सच तो ये है कि ‘दशरथ मांझी’ उसी सवाल को फिर से उठाने की ज़िद  है और ये ज़िद अच्छी लगती। गेहलौर एक प्रतीक है ऐसे कई गाँवों और शहरों का जहाँ रूप, रंग, बोली, नस्ल, जाती, धर्म, क्लास के पहाड़ को तोड़ा जाना बाकी है.

अब फ़िल्म पर आते हैं, ‘मांझी – द माउंटेन मैन’ एक प्रेम कहानी से ज़्यादा एक प्रेमी की कहानी है जो अपनी प्रेमिका के बिना अधूरा है मगर अपनी धुन का पूरा है. यह किवदंतिओं पर आधारित एक सिनेमाई किवदंती है और ज़्यादा दर्शकों तक पहुँचती है. और यही इसकी सफलता भी है. अगर आप प्यूरिस्ट हैं और फ़िल्म के प्रमाणिक रहन-सहन, बोली और परिवेश के चित्रण पर ज़्यादा ध्यान देंगे तो आपको थोड़ी निराशा हो सकती है. इसलिए मैं अपनी बात फ़िल्म के मुख्य चरित्रों और उनकी विशिष्टताओं पर फोकस रखूँगा.

‘मांझी – द माउंटेन मैन’, एक क्लासिक हीरो की कहानी है जिसमें एक साधारण आदमी एकदम असाधारण बन जाता है… क्योंकि इसमें मांझी को तोड़ने के लिए कई भयानक स्थितियां हैं मगर मांझी नहीं टूटता, बस तोड़ देता है.…अपने बाहर और भीतर का भी पहाड़…इसलिए वो हमारा हीरो हो जाता है. नवाज़ुद्दीन हिन्दी फिल्मों के पारम्परिक हीरो इमेज के पहाड़ को तोड़ते हुए यहाँ तक पहुंचे हैं इसलिए वो भी हमारे हीरो हैं. शायद इसलिए वो मांझी को सहज जीते हैं और प्रमाणिक लगते हैं. हर सीन में नवाज़ आपको सिर्फ़ चकित नहीं करते बल्कि इतने सहज, सरल और संवेदनशील लगते हैं कि आप भूल जाते हैं कि आप सिनेमा देख रहे हैं. एक उदाहरण देखिये, जब मांझी पत्थर तोड़ते-तोड़ते एक आवाज़ सुनते हैं तो उनको अपने पेट की भूख याद आती है और वो उस तरफ बढ़ते हैं जिस तरफ से आवाज़ आ रही है, उसे चूहा समझ वो उधर लपकते हैं तभी वहां से सांप निकलता है जो उन्हें उनके पैर के अंगूठे पर डंस लेता है, ज़हर पूरे शरीर में न फैले, पीड़ा से बिलबिलाया हुआ ‘मांझी’ अपने पैर के अंगूठे को उसी छेनी-हथौड़ी से अलग कर देता है जिससे वो पत्थरों को तोड़ता है. ये साहस प्रेम से नहीं आया है बल्कि प्रेम से उपजे लक्ष्य को हासिल करने का है. कॉर्पोरेट लैंग्वेज में कहें तो ‘बिग पिक्चर’ के लिए छोटे-मोटे सैक्रिफाइस ज़रूरी हैं.

फगुनिया का किरदार एक ज़ोरदार किरदार है जिसे राधिका आप्टे बड़ी सहजता से अपना बना लेती हैं. फगुनिया अपनी अस्मिता को बचाये रखने के लिए सिर्फ़ अपने पति पर आश्रित नहीं है और उसकी ये सोच उसे आज के धारावाहिकों में दिखने वाली बहुओं से कहीं ज़्यादा मज़बूत और प्रोग्रेसिव बनाती है. वो ‘बाहुबली’ की नायिका से आगे निकलती हुई, ‘क्वीन’ की नायिका के बराबर खड़ी दिखती है. राधिका आप्टे के व्यक्तिव में मुझे स्मिता पाटिल का अक्स नज़र आता है.

मुझे ‘मांझी’ में एक ‘स्टार्टअप’ स्पिरिट दिखती है और मुझे महसूस होता है कि एक प्रॉब्लम सॉल्वर जब तक उस प्रॉब्लम को महसूस नहीं करता तब तक वो उसका ऐसा हल भी नहीं ढूंढ पाता जो निजी हितों से ऊपर हो. ‘मांझी’ निजी समस्या से पैदा हुआ एक ऐसा हल है जो समाज के हित में है. इसलिए हमसे आसानी से जुड़ जाता है. तभी तो ‘मांझी’ एक सक्सेसफुल ‘स्टार्ट-अप’ है क्यों कि वो सिर्फ़ अपने निजी फ़ायदे नहीं देखता. आज के ब्रैंड्स भी यही गुर अपना रहे हैं ताकि वो अपने ऑडियंस से रिलेवेंट बने रहें.

दरअसल, असली हीरोज पर बनी फिल्में भले ही क्राफ़्ट के मामले में बेहद परफेक्ट न हों, फिर भी अच्छी लगती हैं क्योंकि किरदार में दम होता है. प्रियंका चोपड़ा अभिनीत ‘मैरी कोम’ भी ऐसी ही श्रेणी की फिल्म थी.

ऐसी पावरफुल चरित्र को हम तक लाने के लिए केतन मेहता को बधाई, जो हमें एक इंसान के तौर पर बेहतर होना सिखाती है और ताक़तवर भी बनाती है. इंटरनेट पर लीक होने के बावज़ूद भी ‘मांझी – द माउंटेन मैन’ चौथे सप्ताह में भी सिनेमा घरों में मौजूद है और इससे साबित होता है कि किरदार और कहानी में बल है. इसलिए आप से कहना चाहता हूँ कि आपको ‘मांझी’ इसलिए देखनी चाहिए कि आप अपने बाहर और अंदर के पहाड़ को तोड़ सकें.

रुपेश कश्यप

Script-Writer/Lyricist/Adman

Script-Writer/Lyricist/Adman

+91 9769424806

 

Phases of Faces – Poem by Kumar Rajiv Ranjan

Phases of Faces
Poem by Kumar Rajiv Ranjan

Behind the brightest part of one’s soul, is the dark side of every face
While few choose to be furious, others bask in grace
While sorrow is seen on one side, bliss is seen at some place

These are nothing but the Phases Of Every Face…

The smile of an old beggar, or an infant’s sacred face
One has a repellent view, the other immense solace
It’s the mask of courtesy that hides the rashes
And the Phases Of Every Face…

Dubious plans behind a fake friendship
Murder the little trust and even kill the acquaintanceship
In the chase of pleasure and opportunities, emotions & dreams clash
Still there are the Phases Of Every Face…

In an attempt to project the good in us, we hide our faults
Neglecting our shortcomings we portray ourselves as a know all.
We give up our modesty while betrayal & dishonesty we embrace
Why do we have Phases Of Every Face…

Amidst the crowd everyone walks
But for those who stand for the truth, no one talks
Nodding in self-belief is the nature of the masses
Still no one cares as if they are Phases Of Every Face…

The real truth is never spoken & lies are always saluted
Corrupted to the brim our blood is diluted
The pure ones are targeted and beaten in every race
Unfortunately each one of us have Phases Of Every Face…

 

Kumar Rajiv Ranjan
looking4rajiv@live.com
09967227160

(Rajiv is the Author of India Kolling published by Leadstart Publications in June 2014).

Scriptwriter, Poet & Novelist

Scriptwriter, Poet & Novelist

Signature of True Indian – by Kumar Rajiv Ranjan

Signature of True Indian

I wonder how I could change the perception of people who live in this 21st century but still follow the same old mentality, and who spent considerable amount of time ostracizing and abhorring people of other communities and states. More than 100 years ago, when Britishers landed to invade us, they had one policy: Divide and rule, which was so effective that even after Independence we are Divided: Divided by Caste, Divided by Creed, Colour, State, Community and of course by Religion. One thing that has changed now is our own Indian Government- Who is invading us. Who is responsible for this? If we raise this question to ourselves the answer we find, it is our mind, which adopted the modernization but is denying adopting the Revolution. Abroad when people refer our country they tag it as “poor”. Why? Because even they are aware of our week points. On the other side we “The people of India” are busy originating various excuses to discharge ourselves from any social responsibilities, very few of us, or shall I say none of us? care about the notion of our Nation internationally.

Earning enormous wealth would not make our country rich but only money cannot not gain respect in outsiders eye. We need to grow as humans, and engender humanity inside us. How often do we unite together as Indians? Seldom. When we win the world cup or when Anna fasts inspiring people to revolt. These are those rare occasions when a sense of patriotism erupts inside our bloods, which is like a heavy blow of wind that lingers only for few minutes.

When we watch Satyamev Jayte on television, we curse everyone whom we see involved in those cruel practices. But immediately after switching the channel we switch our minds too and participate equally in all brutal acts by some means or so. This means despite of a valiant effort by Amir Khan to give birth to changes in our society, he ends up changing only a few serial timings on Star Plus. Education plays an important role in the growth of individual’s mind and in developing their mentality .Is it true? I don’t think so, How many of us are educated?, but before you could answer this question let me clarify the correct definition of education:

Educated person is not only the one who knows all the laws of physics , and who knows the resulted mixture of ethane and benzene , it is someone who develops his thoughts and mind in order to achieve some changes in the society. It is someone who resembles courtesy in his behavior and it is someone who could flush out all the society’s made immoral rules. Now, when you know the real definition of Educated person; you are free to answer my question –How many of us are educated? Through this message, I want to address everyone who claims that they are true Indians, but actually, they are not. The day we stop hating our own people; the day we unite again and the day we restrain ourselves to discriminate each other by color, state and community. That day we can say that we are Indians and can build a colorful India .That would be correct signature of a True Indian.

Kumar Rajiv Ranjan
looking4rajiv@live.com
09967227160

(Rajiv is the Author of India Kolling published by Leadstart Publications in June 2014).

 

Scriptwriter, Poet & Novelist
Scriptwriter, Poet & Novelist

1 अगस्त – शेरी नशिस्त की महफ़िल

शनिवार दि. १ अगस्त २०१५ को FWA के कार्यालय में शेरी नशिस्त की शानदार महफ़िल सजी. श्री जलीस शरवानी की अगवायी में चंद नामतर और कई उभरते शायरों ने अपने शेर, अपनी नज़्मे पेश की और दर्शको का मनोरंजन किया.

इस कार्यक्रम के videos website पर upload किये जा चूके है, जिनके links निम्नलिखित अनुसार हैं. मेम्बरान से गुजारिश है कि links पर क्लिक करके कार्यक्रम के वीडियो देखें, like करें, share करें और उभरते कलाकारों का हौसला बढ़ाये.
साथ ही अगली महफ़िल की तारीख पर भी गौर फरमाएं और खुद आकर महफ़िल की शान और शायरों का हौसला बढ़ाये.

इसके बाद जानेमाने शायरों ने भी अपनी ताजातरीन ग़ज़ले पढ़ी. पेश है उनकी videos – मुलायाज़ा फरमाए

कवि गोष्टी और शेरी नशिस्त का यह मंच FWA के ऑफिस में हर महीने क्रमशः तीसरे शनिवार को आयोजित किया जाता है. जो मेंबर्स इसमें शरीक होना चाहे वो अपने नाम FWA के दप्तर में लिखवा दे. कृपया ध्यान रहें कि समय की कमी के चलते केवल पहले दस शायरों को ही मौका दिया जायेगा.

इस कार्यक्रम के अगले चरण की जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें

http://fwa.co.in/blog/155/

धन्यवाद

FWA Event Team

मेरी चंद ग़ज़ले 1 – धवल

(1)

तूफानों में लहरों के रूप बदल जाते है
थोडा सच कहो तो अपने बदल जाते है

मैंने कई बार सोचा की सच ना कहू
दिल में तल्खी हो तो लफ्ज़ बदल जाते है (तल्खी – कडवाहट)

भीड़ में रहकर भी हम सब थक गए है
तन्हाई में हमको सन्नाटे निगल जाते है

अपनी सोच पर एतमाद करना सीखो
तक़दीर के मौसम पल में बदल जाते है (एतमाद – विश्वास)

(2)

थोडा ठहर जा तूं, ये वक्त भी चला जायेगा
धीरे धीरे हर दर्द कम होता चला जायेगा

इस दर्द की दवा तो किसीने ढूंढी नहीं
ये दर्द ही तेरा दोस्त बन जायेगा

इस दर्द की मय में नशा लाजवाब है
जो इसे पियेगा वो झूमता चला जायेगा

किसी से मत कहना की दर्द में जवाब छुपे है
वर्ना हर कोई सवाल पूछता जायेगा

चीख कर रो ले तूं, घर में कोई नहीं है
घर का सन्नाटा भी थोडा दूर हो जायेगा

(3)

ना इसकी, ना उसकी, ना तेरी, ना मेरी
यहाँ जो बाते हो रही है सब बेमानी है

दर्द के छालो से हर कोई चीख उठता है
गोर से देखो तो सब की आँखों में पानी है

इस अदाकारी में किरदार खुद से नाराज़ है
उपरवाले ने लिखी ये कैसी कहानी है

हँसना हो तो रोता हूँ, रोना हो तो हँसता हूँ
दुनियादारी के नाम पर सीखी बेईमानी है

(4)

यहाँ पर अपने ही लोग अजनबी निकले
नियत के मेले थे सब मतलबी निकले

जज्बातों को मैं अल्फ़ाज़ में तराशता हूँ
लोग कहते है मेरे शौक नवाबी निकले

कल शब ख्वाब में छुआ था उसने
सुबह देखा तो मेरे होठ गुलाबी निकले

दुश्मन को भी रास्ता दिखाता हूँ मैं
ढूँढो,अगर मुझ में कोई खराबी निकले

आंसुओ का दरिया बहा के चल दिए
देखो मयखाने से कुछ शराबी निकले

dhaval.chokhadia@gmail.com

(Mo) – 9979739104

 

 

 

 

 

Glamour Outdoing Quality of Films – Rahul Dhekane

POWER OF GLAMOUR…. OVERSHADOWING QUALITY ???

With due respect to all Film-makers.. Writers… Dare2share my observation and opinion !!

Its definitely COMPARISION.. but it’s Necessary… in fact MUST !!!

PAAN SINGH TOMAR (2012)

Extremely Talented Actor Irrfan Khan
performed so well EFFORTELESSLY and SURPRISED all of us
Extemely Talented Actor Irrfan Khan performed so well EFFORTLESSLY and SURPRISED all of us with his fab stamina.. fitness and fast running at the age of 45 (DOB : January 7, 1967).

Business : Good.. Average.

BHAAG MILKA BHAAG (2013)

Multifaceted Farhan Akhtar performed so well with LOT OF EFFORTS and developed 8 packs and Fast Running Skill at the age of 39 (DOB : January 9, 1974)

Business : Very Good.

KICK (2014)

Extremely handsome Salman Khan performed well and did cycling at the age of 49 (DoB: Dec 27, 1965).

Business : TOO GOOD.

Coming to “Comparison” and Three important Questions for all of us…

1. Rate GOOD, BETTER and BEST movie amongst all 3 movies mentioned above.

(My ans. : Kick (Good.. average), Bhaag Milka Bhaag (Better) and Paan Singh Tomar (The Best)

2. Rate GOOD, BETTER and BEST Actor amongst all 3 actors mentioned above.

(My Ans. : Salman (Good), Farhan Akhtar (Better) and Irrfan Khan (The Best)

3. Is really Glamour overshadow on Quality ???

(My Ans. : Unfortunately Yes)

Your answers to all above 3 questions and criticism to my article will be highly appreciated.

Thanking You,

Rahul Dhekane (FWA Membershiip No. 17691)

 

उस चौराहे पर – अज़ीज़ इमाम मदारी

उस चौराहेपर आजभी घना अँधेरा छाया है
क्या फिरसे कोई गुनाह हुआ है ?…
बेईमान और दरिंदी जिनकी काया है
क्या उनमे कोई सुलह हुआ है ?

एक अजीबसी ताकत, उंगली पकड़कर मुझे
उस चौराहेपर ले आयी I
ओह, बड़ाही भयानक नज़ारा है !
कहीं खुनके धब्बे,
तो कहीं टूटा हुआ भरोसा I
अगलेही पल मेरे हाथ, उसने कुछ हथियार रख दिये I
एक चाकू, एक तलवार और भरी हुयी एक बन्दूक ;
हाँ, वो सब थे बस मेरेही लिये !
फिर कहीं दुरसे एक आवाज़ आयी –
“तुझे इनकी जरूरत है भाई !”

एक एक कर जब टटोला सब लोगोंकों
मायुस हुआ दिल, ना पाकर किसीभी दुश्मनको I
फिर छुपाये उन हथियारोंकों अपने सीनेमें
मैं चल दिया एक सफरपे I
बड़ेही अजीबसे एक जंगलमे पहुँच गया मैं चलते चलते
कुछ कुछ दिखायी दिया, आँखोंकों मलते मलते I
खूबसूरत चीख उस लड़कीकी, मुझे बहका गयी
फटे कपड़ोंमेंसे चमक रहा था, बदन उसका खूनी
आंखोंसे निकली दो लकीरें उसकी, दिलकोभी मेरे दहला गयी II
सफ़ेद सोनेकी रस्सीको गलेसे अपने बांधकर
ना जाने वो किसान क्यों इतरा रहा है ?
यूं लगता है शायद, वो मेरी बेबसीपर हँसा जा रहा है II
दो लाशें अपने चीथड़ोंकों संभालते हुये
एक दूजेसे बिलग रहे हैं I
एक जलती ट्रेनमे मरा था और दूसरा बमके धमाकेसे
शायद ये बात वे भूल गए हैं !

आखिर हथियारोंनेही अपना शौर्यगीत सुना दिया
हर एकने अपनी मंज़िलको, अपने आपही पा लिया I
चीखना उसको छोड़ना था,
रस्सीको उसे तोड़ना था,
मासूमोंकोभी अब अमनके लिये, अपनोंसेही भिड़ना था !

एक बार फिर…… कहीं दुरसे आवाज़ आयी
“तुझेभी इनकी जरूरत है भाई, सवेरा ना होगा बिना लड़ाई !”
फिरसे आया मैं उसी चौराहेपर
दिलको बड़ी तबीयतसे घिसा, धार की उसको एक पत्थरपर
उड़ती चिंगारीयाँ देख, खिल गया चेहरा मेरा
थोड़ासाही सही . . .
पर चौराहेसे भाग रहा है अंधेरा !
हाँ, चौराहेसे भाग रहा है अंधेरा !!

Written by – अजीज इमाम मदारी 9890419778

Know the ‘You’ in Yourself – Anuradha Agrawal

In this busy lifestyle, many of us are lost in the daily routine and forgotten our existence. We live to earn and earn to live, live to be Happy but forget to be Happy. Who steals this happiness? Is it the routine life we are living? Is it the people around us? Is it the technology? Is it the competition in market for each and everything? What is the actual reason for not living a happy and healthy life? When we ask this question to ourselves, the only answer comes to our mind is we forget ourselves, we are not living a life we wish to, and we are just playing a role to keep others happy, so that we can also find some happiness for ourselves. But are we really getting this happiness? Yes, sometimes yes we get the happiness but many times we won’t. We forget during this role play what we actually love to do; sometimes we just forget our existence.

We are born alone and will also leave this world alone. But why we are living for others in this life time?

When you put this view of yours in front of others, they will just say you are a selfish person. But you know you are not a selfish person. So leave the world behind and start thinking what you love most to do, what gives you happiness and how you can make others happy as well, while you are living for yourself.

Many of us could not become success in our wishes e.g. you might be willing to be a photographer but your parents didn’t allowed you, so you become an engineer. Now when you are grown up, you want to see your child as a photographer and pushed him/her to become a photographer without knowing his/her interest. This activity continuing as a tradition since ages and we are not hesitating to follow this.

Until and unless we break this rule for ourselves, we cannot apply it for others especially for our kids.

Know the YOU in yourself, try to make yourself happy first than you can make others happy. Now the question is how we can keep ourselves happy, now I become an engineer, I have a family, I have lot many responsibilities, and how can I leave all these responsibilities behind and start photography now?

Which I m pretty sure cannot fill my stomach and how can I support my family. The answer is keeping yourself happy, doesn’t mean leaving your present Job and start doing whatever you love to do. It simply means find some time out from your busy schedule and engage that time to your hobbies that will give you happiness. There is no age limit to start a particular habit you left behind. Be always with people who can encourage your hobbies and get involved into it more and more day by day. There will be one day when you will find yourself at the right place where there is no limit for happiness. Where you will get mental peace and this mental peace will support you to spread happiness among others.

The day when you will see the mirror for yourself will be the happiest day in your life. Also spread this happiness within others, try to know what they love to do and encourage them and show them the mirror to see their happiness in their own mirror. The most important don’t push your decisions to anybody neither to you family members nor to your friends and especially not on your kids. Let your kid know himself/herself since the childhood. You just have to support him/her to succeed in his/her dreams.

By,

Anuradha Agrawal

 

माँझी दी माउंटेन मैन – द्वारा अवनीश कुमार

माँझी दी माउंटेन मन  –
एक दर्शक की नजर से ( अवनीश कुमार)

मुसहर हमारे यूपी और बिहार की अति पिछड़ी और महादलित समुदाय के सदस्य हैं। जो पिछड़े और दलित समुदाय खुद के साथ भेदभाव पर हजार आँसू बहाते हैं, उनका भी रवैया मुसहरों के साथ बिलकुल सवर्णों वाला है। इससे ही अंदाजा लगा लीजिये कि ये वर्ग कितना पददलित हुआ होगा। आज भी लोगों के अंदर मैंने इस समुदाय के प्रति एक वितृष्णा देखी है, इससे इतना सोचा जा सकता है कि सौ दो सौ साल पहले तो इनको इंसान मानने से भी लोग इनकार करते रहे होंगे। मुसहर समुदाय की गरीबी का अंदाज आप इस बात स लगा लीजिये कि मुसहर शब्द मूस और आहार का मेल है। मूस यानि चूहा जिनका भोजन है। ये लोग फसल कट जाने पर जो फसल के बचे खुचे दाने खेत में रह जाते हैं उनको बीनते हैं, चूहों और अन्य जानवरो का शिकार करते हैं। मूस या चूहा पर इतना चौंकिये मत, ये किसने बताया है कि चिकन और मटन ही माँस के सर्वोत्तम प्रकार हैं। भाई जिसको जो सुलभ था वो उसने खाया। जो यायावर है वो मुर्गी बकरी नहीं पाल सकता और खरीदने को उसके पास पैसे नहीं हैं तो वो उन जानवरों के शिकार करेगा जो सुलभ हैं। अब जिनको मानव मानने में ही हम इतना अनुदार थे, उनका हास्य बोध, प्रेम और जूनून जैसी उदात्त भावनाओं को समझना तो तथाकथित सभ्य समाज के बस की बात नहीं। ऐसे में केतन मेहता, नवाजुद्दीन सिद्दीकी और राधिका आप्टे का प्रयास माँझी बहुत ही सराहनीय है। दशरथ माँझी का प्यार, उनकी तड़प, उनका विद्रोह ये सब नवाज ने पर्दे पर जिस तरह जिया है, उसकी प्रशंसा जितनी की जाये कम है। माँझी की फगुनिया उनका प्रेम थीं, उनके दर्द की दवा थीं। जब ऊँची जाति वालों और जमीदारों के शोषण से थक हार कर माँझी घर वापस आते थे, तो फगुनिया उनके घावों पर मरहम रखती थीं। इस तिरस्कार भरी रेगिस्तानी दुनिया में फगुनिया उनका नखलिस्तान थीं। फगुनिया की मृत्यु उनके अंदर के प्रेम को ललकारती है, कल को कोई दूसरा प्रेमी ऐसे बेसहारा न हो, इसका बंदोबस्त करने को कहती है। अब माँझी एक प्रेमी ही नहीं रहे, वो जुनूनी बन गये। प्रेम में कितना बल है इसकी थाह आज तक कोई नहीं पा सका है लेकिन माँझी ने एक पैमाना जरूर तय कर दिया। कल को हम कह सकते हैं कि प्रेम में इतना बल तो है कि पहाड़ का सीना चीरा जा सके। दशरथ माँझी के इस टूटे पहाड़ के आगे दुनिया भर के सारे प्रेम स्मारक फीके हैं क्योंकि वो सम्पन्नो द्वारा बनाये गये, ये विपन्न द्वारा बनाया गया। उनके बनाने में हजारों लोग लगे, इसे अकेले माँझी ने बनाया। उन्हें बनाने वालों को प्रोत्साहन मिला और प्रशंसा मिली, इसे बनाने वाले को तिरस्कार और उपेक्षा मिली। कहने सुनने में ये दो चार वाक्य हैं पर इनका मतलब बहुत विशाल है। आप सोचिये 22 साल का मतलब क्या होता है? वो बाईस साल जिनके बदले में आपको कुछ न मिलने वाला हो। क्या आप अपने प्रेम के लिये सब कुछ छोड़ छाड़कर 22 दिन भी रह सकते हैं? माँझी सिर्फ इसी मोहब्बत के भरोसे 22 साल पहाड़ तोड़ते रहे। अब सोचिये कि दशरथ माँझी ने कितना बड़ा काम किया है। ज्यादा क्या लिखूँ, अब एक वाक्य में फ़िल्म की समीक्षा करता हूँ – शानदार, जबरजस्त, जिंदाबाद

Shri Ranjan Bose Ex-Gen Secretary FWA Passes Away

Ex General Secretary FWA

Ex General Secretary
FWA

Shri Ranjan Bose, a senior writer and ex General Secretary of Film Writers’ Association for 11 years from 1977 to 1988, passed away yesterday afternoon at the age of 88 at his residence. He is deeply mourned by the entire film fraternity, and especially by Film Writers’ Association, Mumbai, all its members, the members of its Executive Committee and its office bearers. Our heartfelt condolences to his bereaved family.

MAY HIS SOUL REST IN PEACE.