•  टीम एसडबल्यूए
    •  26 June 2019
    •  923

    "हमने एक गम्भीर मुद्दे पर मेन्स्ट्रीम मिस्ट्री-थ्रिलर फ़िल्म बनायी है।"

    'आर्टिकल 15' के स्क्रीनराइटर गौरव सोलंकी से ख़ास बातचीत

    इस हफ़्ते रिलीज़ हो रही फ़िल्म ‘आर्टिकल 15’ ज्वलंत मुद्दों की बात करती है। इसकी कहानी ऐसी घटनाओं पर आधारित हैं जो हमारे आस-पास आए दिन घटित होती हैं, और हमारी सामाजिक चेतना को झकझोरती हैं, लेकिन जिन्हें हम जल्द से जल्द भूल जाना पसंद करते हैं। ऐसी घटनाएँ और मुद्दें जिन्हें आमतौर पर फ़िल्म का ‘मटीरियल’ नहीं माना जाता, उन्हें ही लेकर गढ़ी गयी यह फ़िल्म बदलते वक़्त की ओर इशारा करती है और शायद घोषणा करती है कि हिंदी सिनेमा अब अपनी ठेठ वास्तविक कहानियाँ कहने को तैयार है, चाहे फिर वो कहानियाँ हैरान-परेशान कर देने वाली ही क्यों ना हो।

    ‘आर्टिकल 15’ को गौरव सोलंकी ने इसके निर्देशक अनुभव सिन्हा के साथ मिलकर लिखा है। गौरव कहानीकार रहे हैं और उनका कहानी-संग्रह ‘ग्यारहवीं-ए के लड़के’ ख़ासा चर्चित रहा। इसके बाद उन्होंने अग्ली (2013), दास देव (2018) और वीरे दी वैडिंग (2018) जैसी फ़िल्मों के गीत लिखे। बतौर स्क्रीनराइटर ‘आर्टिकल 15’ उनकी पहली फ़िल्म है। इसी मौक़े पर एसडबल्यूए ने उनसे ख़ास बातचीत की। प्रस्तुत है, प्रमुख अंश:

     

     

    'आर्टिकल 15' क्यों ख़ास है?

     

    गौरव सोलंकी: मेरे लिए तो इसलिए भी ख़ास है कि बतौर स्क्रीनराईटर मेरी पहली फ़िल्म है। थोड़ा दूर से देखूँ तो अच्छा बुरा होने से परे एक बहुत अंदर का ग़ुस्सा है मेरा और अनुभव का, जिससे ये फ़िल्म निकली और बनी। बहुत ईमानदारी से लिखी, बहुत क्रिटीकल रहे लिखाई और विचारों को लेकर। ख़ुद से सवाल किए, अपने आसपास देखा। हिंदी सिनेमा के लोकप्रिय तौर-तरीक़ों, भाषा और मुहावरों की फ़िक्र नहीं की। फिर भी कोशिश की कि ज़्यादा लोगों तक पहुँचने वाली फ़िल्म बना सकें। शूटिंग के आख़िरी दिन भी हम नए डायलॉग्स और सीन लिख रहे थे, तराश रहे थे। तो बेपरवाही, मेहनत और ग़ुस्से का एक मिक्स है, जो मेरे लिए इसे ख़ास बनाता है। लोकप्रिय ऐक्टर ऐसे हार्ड-हिटिंग कहानियों से अक्सर बचते हैं। उसकी फ़िक्र न करके आयुष्मान का बहुत उत्साह, दिल और मेहनत से इसे करना एक और चीज़ है, जो इसे ख़ास बनाती है।

     

     

    आपके अनुसार, क्या कारण रहे कि जातिगत हिंसा या भेदभाव को लेकर मेन्स्ट्रीम हिंदी सिनेमा में बहुत कम फ़िल्में बनी है, या कहें इस विषय पर बात ही नहीं हुई है?

     

    गौरव सोलंकी: कारण यह भी हो सकता है कि ऐसी फ़िल्में 'फ़ीलगुड' नहीं होती। इन्हें लिखना और बनाना भी ज़्यादा चुनौती लेकर आता है। सामाजिक राजनैतिक रूप से सजग और फ़िक्रमंद ऐसे लेखक और निर्देशक भी कम हैं, जो मेनस्ट्रीम फ़िल्में बनाना चाहते हों। हॉलीवुड ने यह संतुलन बड़े अच्छे से साधा है। यही लगा था कि एक थ्रिलर बनाना है इस विषय पर, जिससे वे लोग भी देखें जिन्हें इस बात से फ़र्क़ पड़ना चाहिए। जो बातें, अख़बारों के गम्भीर पन्नों पर, पढ़े-लिखे लोगों के बीच में होती हैं और जिन पर डॉक्युमेंट्रीज़ बनती हैं, उन सबको हम एक दिलचस्प थ्रिलर के रास्ते से लाना चाहते थे। बिना बात से समझौता किए, बिना अपनी आवाज़ को नर्म किए।

     

     

    इस फ़िल्म को लिखते वक़्त वास्तविक घटनाओं और 'फ़िक्शनलाइज़ेशन' के बीच संतुलन को आपने किस प्रकार स्थापित किया?

     

    गौरव सोलंकी: हर दिन अख़बार में इतनी सारी चीज़ें थी, इतना कुछ पढ़ा था, उसी का ग़ुस्सा था, वो एक बरसों से चल रही रिसर्च थी अनजाने में ही। ओमप्रकाश वाल्मीकि की किताब 'जूठन' पढ़ी थी कुछ साल पहले। वो हर हिंदुस्तानी को पढ़नी चाहिए, बल्कि स्कूल के सिलेबस में होनी चाहिए। उसका असर रहा बहुत ज़्यादा। पिछले साल यूपी में स्कूल के बच्चों ने एक दलित कुक के हाथ का खाना खाने से मना कर दिया था, उस घटना ने बहुत विचलित किया था। फिर मिर्चपुर, गोहाना की घटनाओं से लेकर दलित लड़कियों के बलात्कार, हत्या, ऊना और रोहित वेमुला तक इतना सब कुछ था, और यह एक मौक़ा था जिसमें इस सब पर बात हो सकती थी। आप बार-बार तो एक थीम पर फ़िल्मे बनाते नहीं हो।

    यह संतुलन बनाना मुश्किल था। उसी के लिए प्लॉट गढ़ा, किरदार बनाए। और एक स्क्रिप्ट का सबसे बड़ा सच वो स्क्रिप्ट, उसकी कहानी और किरदार ही होते हैं। उसके लिए जो भी ठीक लगा, किया। हमें सच तक पहुँचना था, जिसके लिए यथार्थ की घटनाएँ बस ज़रिया होती हैं। फिर वे किरदार अपनी भाषा ख़ुद बनाने लगे। सच का और उन सब घटनाओं का ईंधन हमेशा चूल्हे में था, लेकिन हमने उसे ख़ुद को बाँधने नहीं दिया। जो बातें हमें कहनी थी, एक ऑर्गैनिक कहानी में, उसी ने हमारे नियम तय किए।

     

     

    इस फ़िल्म के आइडिया से लेकर फ़ाइनल स्क्रिप्ट तक के सफ़र के बारे में थोड़ा बताएँ।

     

    गौरव सोलंकी: मैं पिछले साल जनवरी में अनुभव से मिला था। तब वे 'मुल्क़' का पोस्ट प्रॉडक्शन कर रहे थे। वहाँ से बातें शुरू हुईं। 'मुल्क़' में जज का आख़िरी फ़ैसला मैंने लिखा था। उन्हीं दिनों अनुभव ने कहा कि उन्होंने एक ड्राफ़्ट लिखा हुआ है, ‘कानपुर देहात’ नाम की एक फ़िल्म का। मैंने पढ़ा। वो कच्चा पहला ड्राफ़्ट था, लेकिन जो बातें वे उस फ़िल्म से कहना चाह रहे थे, मुझे बहुत ज़रूरी लगीं। अपनी कहानियों में भी जाति को लेकर मैं बात करता रहा हूँ।

    तो वहाँ से इस स्क्रिप्ट पर साथ काम शुरू हुआ। उनकी अच्छी बात यह थी कि वे उससे बंधे नहीं हुए थे। बतौर लेखक मैं जो विजन लेकर आ रहा था, उसका उन्होंने बाँहें फैलाकर स्वागत किया। हमने बहुत बातें कीं। क्या क्या कहना है, कैसे किरदार लाने हैं, हम पत्रकारों और एक्टिविस्टस से मिले, और पढ़ना शुरू किया। फिर एक शुरुआती कहानी बनाई और मुख्य किरदार, जिसमें कुछ उस पहले ड्राफ़्ट से था, लेकिन ज़्यादातर नया था।

    मैं इस चीज़ को लेकर शुरू से बहुत श्योर था कि इस फ़िल्म को एक मिस्ट्री-थ्रिलर होना चाहिए। जिसको जाति की बहस से लेना-देना न हो, ये फ़िल्म उस दर्शक के लिए भी वर्क करे। इस पर अनुभव भी सेम पेज पर थे। फिर कई ड्राफ़्ट लिखे गए। अंत को लेकर हम निश्चित नहीं थे। आख़िरी कुछ पेज कई बार लिखे गए। दोस्तों और टीम को पढ़वाया। उनके जो फ़ीडबैक आए, उन पर फिर से काम किया। अंजुम (रजबअली, एसडबल्यूए ईसी के वरिष्ठ सदस्य) जो स्क्रिप्ट कन्सल्टंट थे, उनके फ़ीडबैक पर काम किया।

    अयान का कलाईमैक्स का सीबीआई टीम के साथ लम्बा आख़िरी सीन हमारे लिए बड़ा ज़रूरी था। वो जिस सुबह शूट होना था, हमने उसे सुबह पाँच बजे उठाकर पूरा रीराइट किया। उसके आधे से ज़्यादा डायलॉग दुबारा लिखे। जैसा मैंने पहले बोला, शूटिंग के दौरान भी जहाँ ठीक लग रहा था, हम नए डायलॉग जोड़ रहे थे, घटा रहे थे। अनुभव डायरेक्शन में उलझे थे, तो शूटिंग के दौरान स्क्रिप्ट की कमान उन्होंने पूरे भरोसे के साथ मुझे थमा दी थी। कुछ असहमति होती थी तो हम एक दूसरे को कनविंस कर ही लेते थे, कभी मैं हो जाता था, कभी वे। साथ काम करते करते उन्हें मेरे डायलॉग्स पर काफ़ी भरोसा हो गया था। स्क्रिप्ट के कई बदलावों पर कई बार उन्होंने मुझे फ़ाइनल कॉल लेने दी। तो एक ज़िद सी थी, कि कुछ अलग करना है।

     

     

    साहित्यिक कहानीकार से फ़िल्मी गीतकार और फिर स्क्रीनराइटर; ये सफ़र कैसे तय हुआ? कितना आसान या मुश्किल रहा? इन तीनों विधाओं में आप क्या अंतर पाते हैं?

     

    गौरव सोलंकी: साहित्यिक कहानी लिखना सबसे आज़ाद अनुभव होता है। उसका सब कुछ आपके हाथ में भी है। फ़िल्म क्योंकि टीम वर्क है, इसलिए सबको ख़ुद को एक्सप्रेस करने के लिए एक दूसरे पर निर्भर होना ही पड़ता है। साहित्यिक कहानी पूरी तरह आपकी आवाज़ और अभिव्यक्ति होती है, उसमें एक्सपेरिमेंट भी ज़्यादा हो सकते हैं, क्योंकि पैसा नहीं लगा।

    मज़ा मुझे सब विधाओं में ही आता है और इनमें से किसी के भी बिना मैं अधूरा महसूस करने लगता हूं। जैसे अभी स्क्रिप्ट्स में ज़्यादा व्यस्त होने की वजह से बहुत दिन से गाना नहीं लिखा, तो कभी कभी उसकी बेचैनी होने लगती है। स्क्रिप्ट लिखते-लिखते दूसरी फ़ाइल पर जाकर कविता लिखने लगता हूं कभी कभी।

    फ़िल्म लिखने की जो चुनौती है, उसी में उसका ख़ूबसूरत रहस्य भी छिपा है। वो बहुत सारी कलाओं-विधाओं का संगम है, इसलिए कई बार आप नए तरीक़ों से, दूसरे लोगों के साथ मिलकर अपनी बात कह सकते हैं। वो ज़्यादा लोग देखते भी हैं।

    आजकल अच्छे गानों की जगह और भी कम होती जा रही है। क्या शब्द इस्तेमाल करने हैं और क्या बात कहनी है, उसकी गली हिंदी फ़िल्मों में पहले से भी ज़्यादा संकरी हो गई है।

    तो शायद अपनी फ़िल्मों में ही गाने लिखूँ अब जहाँ उसकी सीमा या असर तय करना अपने हाथ में हो, या बस ऐसी चुनिंदा फ़िल्मों में, जहाँ गानों में कुछ कहने की जगह हो, जिन्हें कुछ नया करना हो।

    पिछले कई सालों में कुछ स्क्रिप्ट्स लिखी, कुछ अभी बन रही हैं, कुछ रुक गई हैं। तो वो एक लम्बी प्रोसेस होती है, जिससे हर किसी को गुज़रना ही होता है। वो एक चुनौती है। शुरू के सालों में एक पैसे की अनिश्चितता भी थी। नया-नया मुम्बई आया था, तो बहुत कम लोगों को जानता था। यही राईटर था तब भी मैं, बहुत सारी फ़ुर्सत थी लेकिन कोई काम नहीं था। अब उलटा होने लगा है। फ़ुर्सत कम है, और काम ज़्यादा आ रहा है। जो बहुत ख़ुश करने वाला भी है और थोड़ी विडम्बना भी है इसमें।

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