•  नसीम शाह
    •  08 March 2019
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    आवाज़ उठाने और सवाल पूछने वाला शायर!

    जयंती विशेष: साहिर लुधयानवी (8 मार्च 1921 – 25  अक्टूबर 1980)

    साहिर लुधयानवी अपने आप में शायरी का एक मदरसा थे। ऐसा मदरसा आज भी जिसके गीतों से लोग भी तालीम ले रहे हैं। उनके गीत, गज़ल, नज़्म उनकी ज़िंदगी के उस बेज़ार हिस्से से निकल कर बाहर आते थे। जहां जमाने और ज़िंदगी की क़डवाहट भरी पड़ी थी। आज उनके जन्मदिन के मौके पर उनकी ज़िंदगी के कुछ ऐसे पहलू जो साहिर के वक़ार को आज भी ज़िंदा रखते हैं।

    साहिर के बाद हिन्दी फ़िल्मों में जितने भी गीतकार हुए हैं, साहिर उन सबकी लड़ाई अपने ज़माने के मशहूर गायकों, संगीतकारों और निर्माता-निर्देशकों से लड़ चुके थे। उन्होंने ही लेखक को संगीतकार के बराबर का दर्जा दिलाया। उन्होंने ही लफ़्ज को संगीत की धुन के बराबर इज्ज़त दिलाई।

    यह काम आसान भी नहीं था। इस काम के लिए उन्होंने सारी फ़िल्म इंडस्ट्री को अपना दुश्मन बना लिया था। कुछ उनके अज़ीज दोस्त भी उनसे नाराज़ हो गये थे। उन्होंने लेकिन किसी के भी आगे झुकना गवारा नहीं समझा। वह अपने हक़ की लड़ाई लड़ते रहे।

    साहिर ऐसे इंसान थे, जिन्होंने अपनी शर्तों पर काम किया। लोगों ने उन्हें ज़िद्दी भी कहा किसी ने मग़रूर भी कहा लेकिन साहिर को किसी की बात का कोई फर्क़ नहीं पड़ा। यह कड़वाहट, ऐसा ज़िद्दीपन उनके किरदार में शायद इसलिए था कि असल ज़िंदगी में उनका हक़ मारा गया था। उनके जमींदार बाप ने उनकी मां को निकाल दिया। अपने पिता से उन्हें वो सम्मान नहीं मिला जिसके वे हक़दार थे। एक जमींदार की बेग़म होने के बाद भी उनकी मां को मुफ़लिसी में जीना पड़ा। यह कड़वाहट और अपने सम्मान और वक़ार की भूख शायद उनके सीने में हमेशा रही। इसलिए वह उस हर शख़्स से लड़े जिसने उन्हें या उनके पेशे को अपने से कम समझा।

     

    साहिर वक़्त के बड़े शायरों की नज़र से:

     

    कैफी आज़मी: "साढ़े पाँच फ़ुट का क़द, जो किसी तरह सीधा किया जा सके तो छह फ़ुट का हो जाए, लंबी-लंबी लचकीली टाँगें, पतली सी कमर, चौड़ा सीना, चेहरे पर चेचक के दाग़, सरकश नाक, ख़ूबसूरत आँखें, आंखों से झींपा -झींपा सा तफ़क्कुर, बड़े-बड़े बाल, जिस्म पर क़मीज़, मुड़ी हुई पतलून और हाथ में सिगरेट का टिन।"

    गुलज़ार:

    बताते हैं कि ये साहिर ही थे जिन्होंने फिल्म में संगीतकार और गायक के नामों के साथ गीतकार का नाम भी लिखे जाने की लड़ाई लड़ी। जिसके के चलते ‘विविध भारती’ भी गाना सुनाते हुए गीत लेखक का नाम लेने लगा। वे एक गीत लेखक के काम को संगीतकार से कहीं भी कमतर नहीं मानते थे, और इसे स्थापित करने को अपनी फिल्मों में संगीतकार को मिलनेवाली फ़ीस से एक रुपया ज़्यादा मांग करते थे।

    साहिर सिनेमाई गीतों में एक परिपक्वता लेकर आए। वह विषय में पूरी तरह डूब जाते थे और किरदारों की परिस्थितियों को महसूस कर उन्हें अपने गीतों के भावों में ढालते थे। ‘प्यासा’ के गीत इसका बेहतरीन उदाहरण हैं।

    जब भी गुलज़ार अपनी लिखी शायरी साहिर को दिखाते, कद के लम्बे साहिर गुलज़ार के कांधे पर हाथ रखकर बोलते कि ‘अगर मैं अपनी उम्र और तजुर्बे के आधार पर तुम्हारी शायरी को परखूंगा तो ये नाइंसाफी होगी।’ लेकिन फिर वो साथ में ये भी जोड़ते कि ‘तलफ़्फ़ुज़ सही रखना। तलफ़्फ़ुज़ से ही शायरों के वज़न बिगड़ जाते हैं।'

    ख़्वाजा अहमद अब्बास:

    बंटवारे के वक़्त जब साहिर पाकिस्तान चले गये तो फ़िल्म निर्देशक ख़्वाजा अहमद अब्बास ने उनके नाम 'इंडिया वीकली' रिसाले में एक खुला ख़त लिखा।

    अब्बास अपनी आत्मकथा 'आई एम नॉट एन आइलैंड' में लिखते हैं, "मैंने साहिर से गुज़ारिश की कि तुम वापस भारत लौट आओ। मैंने उन्हें याद दिलाया कि जब तक तुम अपना नाम नहीं बदलते, तुम भारतीय शायर ही कहलाओगे। हाँ, ये बात अलग है कि पाकिस्तान भारत पर हमला कर लुधियाना पर क़ब्ज़ा कर ले।"

    "मुझे हैरत हुई जब उस रिसाले की कुछ कापियां लाहौर पहुंच गईं और साहिर ने मेरा ख़त पढ़ा। मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा जब साहिर ने मेरी बात मानी और अपनी बूढ़ी माँ के साथ भारत वापस आ गए और न सिर्फ़ उर्दू अदब बल्कि फ़िल्मी दुनिया में काफ़ी नाम कमाया।"

    यश चोपड़ा:

    साहिर को लिफ़्ट इस्तेमाल करने से डर लगता था. जब भी यश चोपड़ा उन्हें किसी संगीतकार के साथ काम करने की सलाह देते तो वो उस संगीतकार की योग्यता उसके घर के पते से मापते थे..."अरे नहीं नहीं, वो ग्यारहवीं मंज़िल पर रहता है... जाने दीजिए छोड़िए। इसको लीजिए... ये ग्राउंड फ़्लोर पर रहता है।"

    अमृता प्रीतम:

    वो अपनी आत्मकथा रसीदी टिकट में लिखती हैं, "वो चुपचाप मेरे कमरे में सिगरेट पिया करता। आधी पीने के बाद सिगरेट बुझा देता और नई सिगरेट सुलगा लेता। जब वो जाता तो कमरे में उसकी पी हुई सिगरेटों की महक बची रहती। मैं उन सिगरेट के बटों को संभाल कर रखतीं और अकेले में उन बटों को दोबारा सुलगाती। जब मैं उन्हें अपनी उंगलियों में पकड़ती तो मुझे लगता कि मैं साहिर के हाथों को छू रही हूँ। इस तरह मुझे सिगरेट पीने की लत लगी।"

     

    साहिर की ज़बान आसान या उलझी हुई

    साहिर के जमाने के लोग अकसर कहा करते थे कि साहिर गीतों का नहीं कविताओं और नज़्मों का शायर है। वह जैसे लफ़्ज़ इस्तेमाल करता है, कहना और समझना आसान नहीं होता। साहिर का लेकिन हमें शुक्र अदा करना चाहिए कि उस ज़माने में उन्होंने अपने गीतों के ज़रिये लोगों में कविता को समझने की क़ुव्वत पैदा की। उन्होंने फ़िल्मी गीत और मंच पर या ज़ुलूसों में पढ़ने वाले गीतों के बीच का फर्क़ बहुत हद तक कम कर दिया था।

    साहिर बाकी गीतकारों से इसलिए भी अलग हैं कि वे कवियों शायरों की तरह ही अपने फ़िल्मी गीतों में भी सवाल पूछते थे, और लोगों को सवाल पूछना ना साहिर से हज़ार साल पहले पसंद था, ना साहिर के वक़्त में पसंद था, और ना अब पसंद है। वह अपने गीतों में सबसे सवाल करते हैं। चाहे तो समाज के रूढ़िवादी लोग हों या फिर राजनेता:

    “ये पुरपेंच गलियां, ये बदनाम बाज़ार

    ये गुमनाम राही, ये सिक्कों की झनकार

    ये इसमत के सौदे, ये सौदों पे तकरार

    जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं?

    कहाँ हैं, कहाँ हैं, कहाँ हैं? ???”,

    यह साहिर का लफ्ज़ों का ही जादू था कि इस गाने को लोगों ने थिएटर में तीन बार चलवाकर सुना था।

    “ये महलों, ये तख़्तों, ये ताजों की दुनिया

    ये इनसां के दुश्मन समाजों की दुनिया

    ये दौलत के भूखे रिवाजों की दुनिया

    ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है???”

    यह साहिर के अपने लिखने का तरीक़ा था। वह अपने गीतों में समाज के रहनुमाओं से ही सवाल नहीं करते थे। वह अपने रोमांटिक प्रेम गीतों में प्रेमिका से भी सवाल करते थे।

    "प्यार पर बस तो नहीं है मेरा लेकिन फिर भी, तू बता दे कि तुझे प्यार करूं या न करूं?"

    “हम आप की ज़ुल्फ़ों में इस दिल को बसा दें तो?” 

     

    साहिर ने गीतों मे किसी औरत को नहीं कोसा

    दरअसल शायर वही लिखता है जो वह मानता है। वह असल ज़िंदगी में चीज़ों को जैसे परखता है, अपने गीतों में भी वही लिखता है। साहिर ऐसे शायर थे जो औरतों की बराबरी के हक़ की बात करते थे। वह बाकी शायरों की तरह नहीं कह रहे थे:

    “प्यार के इस खेल में, दो दिलों के मेल में, तेरा पीछा ना छोडूंगा सनम, चाहे भेज दे तू जेल में”

     “तू हां कर या ना कर तू है मेरी किरन”

    “ बेवफ़ा अगर तुझको पहचान जाते तो”

    साहिर ने अपने गीतों में कभी किसी औरत के बारे में ऐसा नहीं लिखा। वह बल्कि अपने गीतों में औरत को प्रेमिका को बराबर का हक़ देने की बात करते थे।

     “तुम मुझे भूल भी जाओ तो ये हक़ है तुमको, मेरी बात और है मैंने तो मुहब्बत की है”

    यह साहिर की गीतों की तासीर है, उन्होंने किसी औरत को अपने गीतों में नहीं कोसा। उन्होंने किसी औरत को बेवफ़ा ठहराकर उस पर कभी कोई गीत नहीं लिखा। अपने गीतों में बल्कि उसे हमेशा इज्ज़त बख़्शी।

    “औरत ने जन्म दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाज़ार दिया

    जब जी चाहा कुचला मसला, जब जी चाहा दुत्कार दिया”

    साहिर अपनी मां कि बहुत इज्ज़त करते थे, उनकी नज़रों में उनकी मां ही उनके लिए सब कुछ थीं। अपने वक़ार और क़िरदार के ऐसे मज़बूत शायर कम ही मिलते हैं। 

    स्क्रीनराइटर्स एसोसिएशन, साहिर की जयन्ती के अवसर पर उन्हें नमन करती है।

    जामिया मिल्लिया से बी.ए मास मीडिया, कुछ समय इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ मास कम्यूनिकेशन दिल्ली और फ़िल्म एण्ड टेलीविज़न इंस्टीटयूट पुणे से पटकथा लेखन करने बाद हिन्दी फ़िल्मों में बतौर लेखक काम करते हैं। नसीम शाह पर हिन्दी साहित्य और उर्दू अदब के लेखकों का गहरा असर है। हिन्दी उर्दू की कई पत्रिकाओं में उनकी कहानी और कविताओं को जगह दी जा चुकी है।