•  टीम एसडबल्यूए
    •  30 January 2019
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    "राइटर की जिंदगी से आलस चला जाए, तो आधी समस्या वही ख़त्म हो जाती है।"

    टीवी-लेखिका स्वेच्छा भगत से एसडबल्यूए की ख़ास बातचीत

    डेली शोज़ वो गाड़ियाँ हैं जो लेखक नाम के ईंधन पर दौड़ती हैं। टीवी लेखक स्क्रिप्ट दर स्क्रिप्ट शो की कहानी गढ़ता है और किरदारों में हर दिन नयी जान फूंकता है। हमने टीवी की ऐसी ही एक उभरती लेखिका, स्वेच्छा भगत से बातचीत की। कई हिट शोज़ में सहायक लेखिका रह चुकी स्वेच्छा अपनी क़ाबिलियत और अनुभव की बदौलत स्वतंत्र टीवी लेखिका बनने की राह पर अग्रसर हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी से मास कॉम में स्नातक करने के बाद, उन्होंने पुणे स्थित प्रतिष्ठित, फ़िल्म एंड टेलेविजन इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया (एफ़टीआईआई) से पटकथा लेखन में सर्टिफ़िकेट कोर्स किया और फिर मुम्बई आ गयीं। वरिष्ठ टीवी लेखकों को असिस्ट करते हुए, सुवरीन गुग्गल - टॉपर ऑफ़ द ईयर, वीर शिवाजी, क़ुबूल है, पेशवा बाजीराव और क़ुल्फ़ी कुमार बाजेवाला जैसे शोज़ लिखें। अप्रैल 2019 में स्वतंत्र लेखिका के तौर उनका पहला शो लॉंच होगा। प्रस्तुत है, उनके इंटरव्यू से कुछ ख़ास अंश:

    टीवी राईटर के बतौर अपने अब तक के सफ़र को कैसे परिभाषित करेंगी?

    मैं पिछले सात सालों से टीवी के लिए लिख रही हूँ, और इस दौरान मुझे अनशासन और रचनात्मकता के बीच का सम्बन्ध बहुत गहरायी से समझ आया। टीवी राइटर मूड के हिसाब से नहीं, शूटिंग schedule के हिसाब से लिख रहे होते हैं। हमारे लिए अपनी व्यक्तिगत जिंदगी के उतार-चढ़ाव को एक किनारे रख, काम को प्राथमिकता देना अनिवार्य होता है। मैंने दोस्तों की शादी में फेरे देखते हुए भी एपिसोड लिखा है, और अपनी माँ के ऑपरेशन के दौरान भी। इसलिए अब किसी भी सूरत में लिखना मुझे नामुमकिन नहीं लगता। राइटर की जिंदगी से आलस चला जाए, तो आधी समस्या वही ख़त्म हो जाती है।

     

    फ़िल्म स्कूल के बाद टीवी राइटिंग से जुड़ना कितना आसान या मुश्किल था? क्या कहीं किसी विरोधाभास या दुविधा का सामना किया?

    मेरे लिए लिखना प्राथमिकता था। माध्यम कोई भी हो, मैं जानना चाहती थी कि मार्किट में मेरी कहानियों, मेरी सोच और मेरी काबिलियत की कितनी कीमत है, इसलिए मेरे लिए टीवी राइटिंग से जुड़ना मुश्किल नहीं था। एक फिल्म बनते-बनते सालों लग जाते हैं, और वो जब चल जाती है तो उसकी सफलता का ज़्यादातर क्रेडिट एक्टर या डायरेक्टर का हो जाता है। टीवी में, हर हफ़्ते आपका रिपोर्ट-कार्ड आता है, और अच्छी-बुरी दोनों सूरतों में जवाबदेही अक्सर राइटर की ही होती है। मैं कितने पानी में हूँ, ये जानने के लिए मुझे टीवी उचित माध्यम लगा। अगर मैं अपने किरदारों से हर रोज़ दर्शको को अपनी टीवी स्क्रीन के सामने ला सकती हूँ, तो मेरी कहानियों में कुछ ऐसा ज़रूर है, जिसे वो देखना चाहते है, और ये मेरे लिए काफ़ी है।

    जब आप किसी छोटे शहर से इतनी बड़ी महानगरी में आते हैं तो शुरू में कुछ भी आसान नहीं होता। लेकिन फिल्म स्कूल में अंजुम रजबअली सर ने बार-बार ये चेतावनी दी थी कि आगे का सफर कठिन होने वाला है... इसलिए मैं मानसिक रूप से इन धक्कों के लिए तैयार थी। साथ ही, काफ़ी सीनियर एसडबल्यूए मेंबर्स को मैंने अपने संघर्ष की कहानी कहते हुए सुना था, इसलिए मुझे कहीं न कहीं ये उम्मीद बांध गयी थी कि अगर कोशिश करने से पीछे न हटा जाए, तो देर - सवेर सब ठीक हो ही जाता है।

     

    आपके अनुसार सबसे बड़ा क्या फ़र्क़ है फ़िल्म और टीवी लेखन में?

    टीवी में लिखते वक़्त आप बहुत सारे दायरों में बंध के रह जाते हैं - बजट, लोकेशन, शूटिंग टाइम, स्केल ऑफ़ प्रॉडक्शन, SNP इत्यादि। टीवी में subtle और subtext लिखना ज़्यादा मुश्किल होता है, क्यूंकि आपकी ऑडियंस बहुत distracted है। वो सिर्फ टीवी नहीं देखती, वो टीवी देखते- देखते बाकि कई काम निबटा रही होती है... इसलिए आपके डायलॉग्स, आपकी शूटिंग और एडिटिंग स्टाइल सब कुछ काफ़ी अलग या आम बोलचाल की भाषा में loud होता है। आपको अपनी मूल बात Underline करनी पड़ती है, ताकि वो मुद्दा छूट न जाए। फिल्म में ऑडियंस का undivided attention मिलना ज़्यादा आसान होता है, इसलिए वहाँ बिन कहे भी बातें हो जाती हैं।

     

    कौन-सी तीन सबसे बड़ी और नयी चीज़ें सिखायी टीवी ने, जो राइटिंग कोर्स या फ़िल्म स्कूल से अलग थीं?

    सबसे पहले अनुशासन। रोज़ लिखना, और रोज़ अच्छा लिखना जिससे टीआरपी मेन्टेन रहे।

    दूसरा, फीडबैक! टीवी राइटिंग में, फीडबैक को समझना बहुत ज़रूरी है। टीवी राइटिंग में कहानी किस pace पर जायेगी, ये लेखक नहीं, ऑडियंस तय कर रही होती है। कई बार, एक लेखक के नज़रिये से हमें लगता है कि कोई रोमांटिक ट्रैक बहुत खिंच गया है, उसमें कुछ नहीं हो रहा, लेकिन ऑडियंस को वो जोड़ी इतने पसंद आती है कि भले ही वो किरदार सिर्फ एक बैकग्राउंड सांग पर डांस कर रहे हों, उस सैगमेंट का टाइम-स्पेंड बहुत अच्छा आता है। ऐसे में चैनल और प्रॉड्यूसर दोनों ही राइटर को फीडबैक देते हैं कि कहानी में उनके रोमांस की सिचुएशन ज़रूर डाली जाए और अभी उसमें कोई अड़चन न डाली जाए, और तब आपको कोशिश करनी होती है कि उसी रोमांस में कोई नयापन ला सके (वो भी बिना ज़्यादा खर्चा किये)।

    तीसरा, ‘कुछ भी हो सकता है!’ - रातोंरात एक एक्ट्रेस के चेहरे पर एलर्जी की वजह से आपको दो एपिसोड ऐसे लिखने पड़ सकते हैं जिसमें हीरोइन का चेहरा न दिखे, या अचानक, आपको महासप्ताह/महाएपिसोड की फ़ुटेज निकालने के लिए डबल-यूनिट के लायक सीन लिखने पड़ सकते हैं, जिसमें मुख्य-किरदारों का रोल ही न हो।

     

    किसी फ़िल्म-लेखक को टीवी से क्या सीखना चाहिए? ऐसी कौन सी जादुई रस्सी है टीवी राइटर्स के पास जिससे वे अपने दर्शकों को सालों-साल बांधे रखते हैं?

    फ़िल्म-लेखक को टीवी से characterisation सीखना चाहिए। टीवी में भले ही हर चैनल पर एक ही तरीके की कहानी दिखाई जा रही हो, टीवी का दर्शक आपको बता देगा कि इश्कबाज़ की अनिका, ये रिश्ता क्या कहलाता है की नायरा, भाभी जी घर पे है की भाभी जी; सब एक दूसरे से कितनी अलग हैं। उनके अंदाज़ क्या, उनकी पसंद-नापसंद, कमी-खूबी, सब उन्हें मुँह-ज़ुबानी ऐसे याद होते हैं, जैसे ये उनके ही घर के सदस्य हैं।

     

    ऐसी तीन बड़ी चीज़ें जो आप चाहेंगी कि टीवी और डेली सोप की दुनिया में बदलनी ज़रूरी हैं?

    सुन्दर, बड़े और भव्य सेट: कहीं न कहीं टीवी में एक बनावटीपन इसलिए लगने लगता है क्यूंकि भले ही कहानी में किरदार कर्ज़दार हो, उसका घर आलिशान ही होता है। कहानी कानपुर की होती है, लेकिन सड़क पर न गड्ढे दिखते हैं, ना पान की पीक, ना गली के बीचोंबीच पसरी हुई गाय। अगर थोड़ा ‘रीयलिस्टिक’ टच आये, तो शायद लोगो को एक विज़ुअल ब्रेक मिले।

    पॉलिटिकल ड्रामा: वैस्ट में डेसिग्नेटेड सर्वाइवर, होमलैंड, हाउस ऑफ़ कार्ड्स - जैसे कई शो आते हैं, लेकिन हिंदुस्तान के सबसे बड़े लोकतंत्र होने के बावजूद आज के परिवेश को केंद्र में रखकर टीवी पर कोई पॉलिटिकल ड्रामा नहीं आया है। हमें अपने सिस्टम को समझने-समझाने के लिए ऐसी कहानियों को कहने-सुनने की आवश्यकता है।

    बच्चों के कार्यक्रम: हमारे आज के बच्चे शिन-चैन, डोरेमोन, पोकेमोन के करीब हैं, पर सोनपरी, जलपरी और मुल्ला नसरुद्दीन के मज़ेदार किस्सों से दूर। तरंग में अरविन्द गुप्ता को माचिस की डिब्बी से खिलौने बनाते देख विज्ञान सीखना, या पूरे परिवार का एक साथ बैठ के डेरेक ओ-ब्रायन के साथ क्विज खेलना ऐसे अनुभव है जो हमें अपनी नयी पीढ़ी को ज़रूर देने चाहिए, ताकि टीवी उनके लिए सिर्फ ईडियट-बॉक्स बनकर न रह जाए।

     

    अपने किन्हीं दो शोज़ के उदाहरण से, किसी शो के आइडिएशन/ पिचिंग से उसके स्क्रीन तक आने; और एक रनिंग शो के लिए लगातार लिखते रहने की चुनौतियों के बारे में बताइए।

    पेशवा बाजीराव: आमतौर पर एक हिस्टॉरिकल शो में एक किरदार के सिंहासन तक पहुंचने और राज्य को बचाये रखने की कहानी कही जाती है जिसकी वजह से एक underdog की कहानी कहना आसान होता है। लेकिन बाजीराव राजा नहीं, पेशवा हैं। वो युद्ध करते हैं, राजनीति करते हैं, मुग़ल उनका लोहा मानते हैं लेकिन फिर भी, उनके पास वो अधिकार नहीं है जो एक राजा के पास होता है। ये एक ऐसा हिस्टॉरिकल शो था, जहाँ किरदार की कहानी उसके माँ-बाप के संघर्ष से शुरू होती है। इसलिए इस शो का वनलाइन - ‘बालक से बाजीराव बनने की गाथा’ सोचना हमारी पूरी टीम के लिए काफ़ी मुश्किल काम था। जब एक बार ये दिशा मिल गयी थी, तो पूरी कहानी को इसी लेंस से देखना आसान हो गया। एक योद्धा की कहानी तो बन गयी, परन्तु मस्तानी से शादी करने के उनके निर्णय को सही दर्शाना - और उस समय के प्रचलन को आज की ऑडियंस के लिए प्रासंगिक, तर्कसंगत और मनोरंजक बनाना भी बहुत बड़ी चुनौतियाँ थीं।

    कुल्फ़ी कुमार बाजेवाला: ये एक बंगाली शो ‘पोतोल कुमार गान वाला’ का रीमेक है। ये पहली बार था कि हमारे सामने एक सक्सैसफ़ुल शो था, जिसकी पूरी कहानी पहले से लिखी जा चुकी थी।  लेकिन इसमें कुछ अलग करना उतना ही मुश्किल था जितना शायद किसी मास्टरशेफ़ के लिए लिए किसी और की रेसिपी को रेप्लिकेट करना होता होगा। इस शो को हिंदी ऑडियंस के लिए एडाप्ट करते वक़्त हमारी राइटिंग टीम को समझ आया की बंगाली ऑडियंस की सेंसिबिलिटी हमारी हिंदी ऑडियंस से अलग है। हमें एक अलग तरह का ड्रामा देखने की आदत है और हमें कहानी का मूल वही रखते हुए, किरदारों को एक अलग रंग देना होगा। एक बंगाली औरत, और एक पंजाबी औरत - अपनी परवरिश और अपने परिवेश में इतनी अलग होती है कि वो एक ही सिचुएशन में बहुत अलग तरह से रिऐक्ट करेगी। साथ ही, क्यूंकि ये म्यूज़िकल शो है, जहाँ सिचुएशन में ओरिजिनल गाने बनने थें, हमारे लिरिक्स राइटर - दिव्य निधि शर्मा का रोल भी काफ़ी महत्वपूर्ण था। 

     

    डेली-सोप फ़ॉरमैट को कितना सही और कितना चुनौतीपूर्ण मानती हैं? 

    ये फ़ॉरमैट हमारी इंडस्ट्री के इकोनॉमिक्स को ध्यान में रखते हुए सही है। जितना पैसा एक शो को खड़ा करने में लगता है, उसे वसूलने में ही प्रॉड्यूसर को एक साल तक का समय लग जाता है। फिर मुनाफ़ा कमाने के लिए शो का कम से काम तीन साल तक अच्छा चलना ज़रूरी है। तीन साल से ज़्यादा अगर कोई शो चल रहा है, तो इसका मतलब उसमें कुछ ऐसा ज़रूर है, जो दर्शक देखना चाहता है।

    हम लोग दास्तानगोई, किस्सागोई की ज़मीन से आते हैं... इसलिए लम्बी कहानियां हमें तब तक बोर नहीं करती जब तक उसमें हर थोड़ी देर में कोई न कोई दिलचस्प मोड़ आ रहा हो, या कहानी इतनी अपनी-सी लग रही हो कि हम उसमें खो जाए। टीवी राइटर के लिए ये बोरियत भगाना ही सबसे मुश्किल काम है क्यूंकि कुछ अच्छा लिखने के लिए, अच्छा सोचने, अच्छा पढ़ने, और जिंदगी को अनुभव करने की ज़रुरत होती है, और दिन-रात लैपटॉप के सामने बैठ के लिखते रहने से ये सब कहीं न कहीं पीछे छूट जाता है।

     

    असिस्टैंट राईटर से स्वतंत्र राईटर बनने का सफ़र कैसा रहा?

    मैंने सात साल टीवी के सीनियर राइटर - फैज़ल अख़्तर को असिस्ट किया है। उन्होंने मेरे व्यक्तित्व और मेरी लेखनी दोनों को तराशा है। उन्हें असिस्ट करने से मुझे मेरी बारीकी से जानने का, और सुधारने का मौका मिला। अब जब मैं स्वतंत्र लेखन की ओर बढ़ रही हूँ, तो उनकी नसीहतें हमेशा दिमाग में रहती हैं।

     

    नैटफ़्लिक्स। प्राइम वीडियो जैसे स्ट्रीमिंग प्लैटफ़ॉर्म्स के आने से क्या कुछ बदला है या बदल रहा है?

    स्ट्रीमिंग प्लैटफ़ॉर्म्स आने से मोहल्ले की औरतें अब एक दूसरे को फ़ोन करके "कल लाइट नहीं थी, तो सीरियल में क्या हुआ" नहीं पूछती। वो हॉटस्टार पर देख लेती हैं। सीरियल अच्छा लग रहा है तो लाइक, शेयर, कमेंट, सब्सक्राइब होता है, और अगर नहीं तो हेट-कमेंट्स पढ़ने को मिल जाते हैं। अब ऑडियंस क्या सोच रही है, ये पता करना उतना मुश्किल नहीं है। एक राइटर को डायरैक्ट फ़ीडबैक मिलता है।

     

    शहरी दर्शक-वर्ग कब टीवी की और लौटेगा?

    BARC - RURAL और URBAN दोनों की रेटिंग देता है, और अगर शो अच्छा है तो दोनों नंबरों में ज़्यादा फर्क नहीं होता। इसका मतलब ये है की शहरी ऑडियंस भी टीवी देख रही है। हाँ, उनके पास आज कंटेंट के विकल्प कई हो गए हैं, और अब ये ज़रूरी नहीं कि वो हमेशा टीवी से चिपककर ही शो देखे। पर, टीवी की ऑडियंस को कुछ नया देना ज़रूरी है, क्यूंकि अब वो ट्रेंड को समझने लगी है। इसलिए अब अलग Genre ढूँढने करने का सही समय है।

     

    एक सफल टीवी राईटर बनने के लिए नए लेखकों को क्या आना चाहिए और उन्हें क्या करना चाहिए?

    सफल टीवी राइटर बनने के लिए आपको इस माध्यम की सीमा को समझते हुए, उसमें कुछ नया सोचना आना ज़रूरी है। किरदार को यादगार बनाने के लिए, उसे दर्शक की दिनचर्या का हिस्सा बनाने के लिए नए पहलू ढूंढना ज़रूरी है। टीवी लेखक को आलस से दूर रहना चाहिए। अगर आप समय पर स्क्रिप्ट नहीं दे सकते, तो इस इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाना बहुत मुश्किल है।

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