•  धनंजय कुमार
    •  20 September 2018
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    पेशेवर हितों की सुरक्षा

    स्क्रीनराइटर्स के क़ानूनी अधिकारों और SWA की DSC के कामकाज पर विशेष शृंखला - भाग 3

    विवाद की स्थिति में अनुबंध/एग्रीमेंट का महत्व

    कॉपीराइट, क्रेडिट या भुगतान को लेकर विवाद हो जाने पर कोई भी एसडबल्यूए सदस्य एसोसिएशन की डिसप्यूट सैटलमेंट कमिटी (डीएससी) के पास शिकायत दर्ज करवा सकता है. ऐसी स्थिति में अगर एग्रीमेंट होता है, तो सुलह कराना कमिटी के लिए बेहद आसान हो जाता है. लेकिन एग्रीमेंट नहीं होने की सूरत में कमिटी के हाथ बांध जाते हैं. पारिश्रमिक के मामले में तो कमिटी फेडरेशन और प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन के बीच समझौते के दौरान निर्धारित राशि देना निश्चित कर देती है, लेकिन क्रेडिट के मामले में कमिटी प्रोड्यूसर पर दबाव बना पाने में सक्षम नहीं हो पाती, क्योंकि क्रेडिट को लेकर कोई निर्धारित निर्देश नहीं है कि लेखक का नाम कहाँ आयेगा. 

    हालांकि पारिश्रमिक के सन्दर्भ में भी कई बार ऐसा हो जाता है कि लेखक को लगता है कि उसका पारिश्रमिक इससे ज्यादा होना चाहिए था, लेकिन फेडरेशन और प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन के बीच समझौते से जो राशि निर्धारित हुई है वो न्यूनतम राशि है, और उससे ज्यादा दिलाना कमिटी के लिए संभव नहीं है, वैसी हालत में एग्रीमेंट आपके लिए बेहतर होता है. 

    अब जहाँ तक क्रेडिट से जुड़ा मामला है, तो अगर आपका एग्रीमेंट नहीं है या अगर एग्रीमेंट है भी, लेकिन उसमें अगर यह विश्लेषित नहीं है कि आपका नाम कहाँ और किस तरह आयेगा, तो यह निर्माता के अधिकार क्षेत्र में चला जाता है कि वह आपका नाम कहाँ और किस तरह दे. निर्माता अगर एंड स्क्रोल में भी आपका नाम देता है तो आप कुछ नहीं कर सकते. इसलिए एग्रीमेंट में इस बात का उल्लेख करवा लेना भी जरूरी है कि लेखक का नाम स्क्रीन पर किस तरह आयेगा, कहाँ आयेगा और इसी तरह पब्लिसिटी में कहाँ कहाँ आयेगा. 

    एक लेखक मित्र ने प्रश्न पूछा है कि क्रेडिट को लेकर एग्रीमेंट में क्या लिखवाया जाना चाहिए, तो आदर्श स्थिति यह है कि आप लिखवायें कि हमारा नाम शुरुआत के मुख्य क्रेडिट लिस्ट में हो, निर्माता - निर्देशक के पहले हो और निर्माता निर्देशक के ही फॉण्ट साइज में हो. इसी तरह पब्लिसिटी में भी जहां जहां निर्माता निर्देशक का नाम हो, लेखक का भी उसी फॉण्ट साइज में नाम हो.

    कई बार स्क्रिप्ट में एक से अधिक लेखक होते हैं, कोई कहानी लिखता है, कोई पटकथा लिखता है, तो कोई संवाद, ऐसी स्थिति में तीनों लेखक को अपने अपने एग्रीमेंट में यह लिखवाना चाहिए. कई बार ऐसा भी होता है कि एक लेखक ने स्क्रिप्ट लिखी, लेकिन निर्माता-निर्देशक उसकी राइटिंग से संतुष्ट नहीं होता, वह किसी दूसरे राइटर से स्क्रिप्ट रीराइट करवाता है, तो उसमें उस दूसरे राइटर का नाम भी आयेगा, लेकिन उस स्थिति में मूल लेखक का नाम पहले होगा, बाद में आये लेखकों का नाम बाद में होगा. इसमें राइटर के सीनियर - जूनियर होने से कोई अन्तर नहीं पड़ता. 

     

    "ना" कहने की भी आदत डालिये

    कई लेखकों की चिंता है कि कॉपीराइट से जुड़े विषयों और तथ्यों को लेकर आपके लेख तो ठीक हैं, लेकिन नए लेखकों के लिए क्या ये संभव है कि वह अपने हितों और हक़ों से जुड़ी अपनी शर्तों के लिए प्रोड्यूसर पर दवाब बना सकें या उन्हें राजी कर सकें?! क्योंकि वास्तविकता यही है कि प्रायः प्रोड्यूसर नए लेखकों के साथ मनमाना पूर्ण व्यवहार करते हैं. नये लेखक को काम देना वह अपना बड़प्पन मानते हैं और बार बार अहसास दिलाते हैं कि काम देकर उनपर अहसान कर रहे हैं. ऐसे में लेखक अपनी शर्त उनके सामने रख सके, ये संभव नहीं दिखता. उसे प्रायः इस बात का डर लगा रहता है कि अगर उसने अपनी शर्त रखी, तो प्रोड्यूसर उसे निकाल देगा और उसकी जगह दूसरे राइटर को रख लेगा और उसका काम छिन जाएगा इसलिए नए लेखकों के लिए चुप रहना ही या कहें प्रोड्यूसर की मर्जी के अनुसार चलना ही उचित लगता है. क्योंकि काम मिलेगा, तभी तो उसकी प्रतिभा दुनिया के सामने आ पायेगी और आगे उसका भविष्य बेहतर होगा. जब काम ही नहीं मिलेगा, तो फिर तो वहीं उसका खेल ख़त्म हो जाएगा!

     इस दलील को समझना मुश्किल नहीं है, क्योंकि इस स्थिति से सबको गुजरना पड़ता है. आज का बड़ा और वरिष्ठ लेखक भी कल नया था. लेकिन सबको अपनी बुद्धिमता से अपने पेशेगत सम्बन्ध या कहें प्रोफेशनल रिलेशन बनाने और गढ़ने होते हैं. ये स्किल तो आपके अपने अन्दर होना ही चाहिए.लेकिन जो एक सबसे अहम बात देखने को मिलती है, वो ये कि निर्माता के सामने प्रायः वही लेखक कमजोर पड़ते हैं, जो राइटिंग में भी कमजोर होते हैं.

    स्क्रीनराइटिंग आलेख लेखन या साहित्य लेखन से अलग है. केवल भाषा की जानकारी या विषय की जानकारी होने से आप स्क्रीनराइटर नहीं हो जाते. स्क्रीनराइटिंग भाषा से ज्यादा तकनीक पर आधारित है. सिनेमा या टीवी विजुअल मीडियम है. इसलिए जरूरी है कि आपको अपनी कहानी शब्दों के बजाय दृश्य के माध्यम से कहना आये. और यह जन्मजात आपमें हो यह जरूरी नहीं. इसे सीखना और समझना पड़ता है. जिसे आप अनुभवी लेखकों के स्क्रीनराइटिंग वर्कशॉप में भी सीख सकते हैं. यह भी संभव है कि करते करते आपको आ जाय. लेकिन प्रोफेशनल राइटिंग में उतरने से पहले आपको स्किल्ड होना ज़रूरी है.

    स्क्रीनराइटर्स एसोसिएशन में पिछले तीन-चार वर्षों से सक्रिय तौर पर जुड़े रहने से मुझे ये अनुभव हुआ है कि ज्यादातर राइटर्स अनुभवहीन हैं. भाषाई स्तर पर भी कमजोर हैं और तकनीक के स्तर पर भी. कुछ फिल्मों को देखकर वह अपने बारे में आकलन कर लेते हैं कि ऐसी फिल्म तो वह भी लिख सकते हैं. यहाँ स्कूल के कोर्स की किताब में पढ़ी एक कहानी मुझे याद आ रही है. कहानी का नाम था 'साइकिल की सवारी'. शुरुआत में लेखक को लगता है कि साइकिल चलाने में रखा ही क्या है, कूद कर साइकिल की सीट पर जा बैठिये और फिर दनादन पैदल मारते जाइये, लेकिन लेखक जब वास्तव में साइकिल की सवारी करने के लिए छलांग लगाता है तो सीट पर जाकर बैठने के बजाय साइकिल लिए जमीन पर जा गिरता है. स्क्रीन राइटिंग के साथ भी कुछ ऐसी ही बात है. ये उतनी आसान नहीं है, जितनी दिखती है. अच्छी स्क्रिप्ट लिखना नाकों-चने चबाने जैसा है. और इसके लिए जरूरी है कि आपमें अध्ययन की लत हो और आपमें अपने आपको बेहतर बनाने की जिद हो.

    बहरहाल, आपका शोषण न हो इसके लिए जरूरी है कि आप लेखन विधा और उसके कानूनी पहलुओं से अवेयर हों. अवेयर होंगे तभी आप अपना हित बेहतर समझ पायेंगे और प्रोड्यूसर के सामने अपनी बात रख पायेंगे. और एक बात हमेशा ध्यान में रखिये, इस फिल्म और टीवी इंडस्ट्री में कोई आप पर अहसान नहीं करता, आप जब उसकी जरूरत पूरी करेंगे, तभी वो आपको काम देगा. और जब काम दे रहा है, तो किन शर्तों पर काम दे रहा है, ये आपको क्लियर कर लेना चाहिए.

    कुछ लेखकों को डर होता है कि अगर एग्रीमेंट या पैसे की बात करेंगे तो वो काम से निकाल देगा! संभव हो ऐसा हो, क्योंकि हमारे समाज में काम से ज्यादा पैसों की कीमत है. पैसा कमाना सबसे बड़ी उपलब्धि है, इसलिए पैसे वाले आदमी यानी प्रोड्यूसर अपने आपको सर्वेसर्वा मानता है. लेकिन सारे प्रोड्यूसर ऐसे नहीं हैं. अच्छे प्रोड्यूसर प्रायः हर बात पहले ही क्लियर कर देते-लेते हैं और ज्यादातर एग्रीमेंट भी बना लेते हैं. बदमाशी या कहें लीचड़ई वो करते हैं जो मूलतः प्रोड्यूसर नहीं होते. उनका बिजनेस कोई और होता है और शौकिया तौर पर इस इंडस्ट्री में आ जाते हैं. जो प्रोफेशनल नहीं होते. वैसे प्रोड्यूसर्स को "ना" कहने की आदत डालिए.

     

    काम कैसे पायें ?

    कई लेखकों ने कहा है कि सर कॉपीराइट तो समझ गए, लेकिन कॉपीराइट तो तब फलीभूत होगा न जब काम मिलेगा, अन्यथा यूं ही लिख लिख कर कॉपीराइट जमा करते जाने का क्या मतलब ?! बात तो सही है भाई, तो आज इसी पर चर्चा करते हैं कि आखिर काम कैसे पकड़ा जाय. नए लेखकों को यह यक्ष प्रश्न की तरह लगता है, तो उत्तर के तौर पर तो सबसे पहले यह जान लीजिये कि काम पाने का कोई निश्चित मार्ग या निश्चित फ़ॉर्मूला नहीं है कि आप उसपर अमल करेंगे और काम मिल जाएगा. हाँ, एक प्रक्रिया जरूर है. जिसे आप फ़ॉलो करेंगे तो कोई न कोई काम जरूर मिलेगा.

    आमतौर पर होता यह है कि ज्यादातर लेखक बिना ट्रेनिंग या तैयारी के फिल्म राइटिंग में आ जाते हैं. वो कहानी का आइडिया सोच लेते हैं या कागज़ पर लिख लेते हैं और समझ लेते हैं कि उन्होंने जबरदस्त कहानी लिख ली और अब पांच सात प्रोड्यूसर से संपर्क करेंगे और कहीं न कहीं काम मिल जाएगा. लेकिन वास्तव में ऐसा होता नहीं है. 
    जबसे हिन्दी सिनेमा ग्लोबल हुआ है, फिल्म इंडस्ट्री के तौर तरीके बदल गए हैं. जब प्रोड्यूसर फ़िल्में बनाया करते थे, तब बड़े बड़े प्रोड्यूसर्स या निर्देशकों से मिलना ज़रा आसान होता था, फोन करने पर मिलने का समय दे दिया करते थे और नए लेखकों को भी सुन लिया करते थे. सुनने के बाद सलाह भी दे दिया करते थे, कई बार कहानी अच्छी होने पर वही दूसरे किसी प्रोड्यूसर के पास भी भेज दिया करते थे, लेकिन अब वो ज़माना नहीं रहा. आज फिल्म निर्माण में भी कॉर्पोरेट कल्चर हावी है, प्रोड्यूसर की जगह कॉर्पोरेट कंपनी या प्रोडक्शन कंपनी ने ले ली है. अब प्रोड्यूसर्स से मिलना उतना आसान नहीं रहा, या कहें कि मिलना बहद मुश्किल हो गया है. एक तो उनका नंबर आसानी से उपलब्ध नहीं है, और अगर हो भी जाता है, तो वो मिलने का समय नहीं देते और कंपनी के नंबर पर कॉल कर किसी अधिकारी या क्रिएटिव से बात करने के लिए कहते हैं. कंपनी के नंबर पर रिसेप्शनिस्ट फोन उठाती है और वह कंपनी का इमेल आईडी देती है. लेखक कहानी मेल करता है, लेकिन महीनों कोई रिप्लाई नहीं आता. और लेखक निराश जाते हैं.

    प्रायः नए लेखक बड़े प्रोड्यूसर और निर्देशक को ही मिलने और उन्हें अपनी कहानी सुनाने की चाहत रखते हैं. और प्रोड्यूसर है कि मिलना भी नहीं चाहते! ऐसा क्यों? क्या प्रोड्यूसर को अच्छी कहानी की तलाश नहीं है? जवाब है, उन्हें अच्छी कहानी की तलाश है, लेकिन आपके पास अच्छी कहानी है ये बात सिर्फ आप जानते हैं.

    आज स्क्रीनराइटर्स एसोसिएशन के सदस्यों की संख्या 20 हजार से ऊपर तक पहुँच गयी है और हर महीने सौ से डेढ़ सौ के करीब नए सदस्य बनते हैं. जबकि बड़े और नामचीन प्रोड्यूसर्स की संख्या बीस भी नहीं है, अब आप ही समझिये कि प्रोड्यूसर्स कितने नए लेखकों से मिल पायेंगे? दूसरी बात यह है कि जो भी स्थापित प्रोड्यूसर्स हैं उनके साथ पहले से ही कई लेखक जुड़े हैं.

    ऐसे में इधर इधर कहानियाँ भेजने या मिलने के लिए प्लान बनाते रहने और नहीं मिलने पर निराश होने से बेहतर है कि आप स्थापित प्रोड्यूसर्स तक पहुँचने का सही मार्ग तलाशें.

    और वो सही मार्ग है, कहीं से भी शुरुआत करना. जबतक आपका बायोडाटा अच्छा नहीं होगा, स्थापित प्रोड्यूसर्स से मिल पाना मुश्किल है. इसलिए नए लेखकों को चाहिए कि सीधा हिमालय पर चढ़ने से पहले छोटे छोटे टीलों पर चढ़ाई से अपनी यात्रा शुरू करें. आप पहले लेखन का कोई काम तलाशिये, वो सीरियल, फिल्म, एड फिल्म लेखन, प्रोमो लेखन या कुछ भी हो सकता है. आप किसी स्थापित लेखक के साथ जुड़कर भी अपना काम शुरू कर सकते हैं. इससे आपके लेखन में भी निखार आयेगा और आपका संपर्क भी बढ़ेगा. और फिर तय मानिए आपको काम मिलेगा. लेकिन इसमें साल दो साल चार साल का वक्त लग सकता है. आप सोचेंगे महीने भर में आपको काम मिल जाय तो नामुमकिन तो नहीं, लेकिन मुश्किल जरूर है. कई बार ऐसा होता है कि आते ही काम मिल जाय, तो यह कभी कभार या किसी किसी के साथ ही ऐसा संयोग घटता है. 

    उम्मीद है, आर्टिकल्स की इस विशेष शृंखला की मदद से नए स्क्रीनराइटर्स को कॉपीराइट सुरक्षा और अपने कैरियर को मैनेज करने की दिशा में मदद मिलेगी.

    ऐसी ही कुछ और ज़रूरी बातों के साथ, जल्द ही फिर से मुलाक़ात करेंगे. 

    धनंजय कुमार हिंदी और भोजपुरी फ़िल्म-टीवी लेखक के तौर पर जाने जाते हैं। आप वर्तमान में स्क्रीनराइटर्स एसोसिएशन के कोषाध्यक्ष का पदभार सम्भालने के साथ एसोसिएशन की डिसप्यूट सैटलमेंट कमेटी (डीएससी) के सदस्य भी हैं।