•  सुदीप सोहनी
    •  05 September 2018
    •  1167

    सामाजिक यथार्थ के गिर्द कहानी की संरचना

    फ़िल्म 'मुल्क़' की पटकथा का विश्लेषण

    बीते दिनों लेखक/निर्देशक अनुभव सिन्हा की फ़िल्म ‘मुल्क़’ की बड़ी चर्चा रही। इसके ट्रेलर रीलीज़ होने के बाद से ही यह तय था कि फ़िल्म विवादों में रहेगी। हुआ भी यही। पाकिस्तान में जहाँ फ़िल्म की रीलीज़ पर रोक लगा दी गई वहीं भारत में अपनी-अपनी तरह से इस फ़िल्म पर बात होने लगी। बाबरी मस्जिद का कांड भारत की तकदीर का सबसे अहम पन्ना है और वहाँ से यह मुल्क़ अब तक धर्म के नाम पर सहता ही चला आ रहा है। दंगे, कर्फ़्यू, मंदिर, जिहाद, ब्लास्ट, आतंक ये वो कुछ शब्द हैं जो तब से लेकर आज तक अख़बारों और न्यूज़ चैनल के ज़रिये हमारी लगभग रोज़ की ज़िंदगी का हिस्सा बने रहे हैं। इस लिहाज़ से ‘मुल्क़’ में बहुत कुछ नया नहीं है। पर कहानी में जैसा इस बार कहा गया और दिखाया गया है, वह बेहद दिलचस्प और ज़रूरी है। अनुभव सिन्हा ने ‘मुल्क़’ रचने के लिए जिन आधारों का इस्तेमाल किया है उसे दबी ज़बान से सड़क-चौराहों और व्हाट्सएप के मैसेजों में पढ़ा, जाना जा सकता है। एक ट्रेलर में उन्होंने कुछ पोल रिज़ल्ट्स के ज़रिये बताया है कि भारत में 43% लोग अपने घर के आसपास किसी मुस्लिम परिवार के पड़ोसी बन जाने पर असहज होते हैं, वहीं 52% लोग मानते हैं कि आतंक की जड़ इस्लाम है। 45% लोग यह मानते हैं कि वे अपने आसपास किसी दाढ़ी वाले शख़्स के होने पर असहज महसूस करते हैं। सीधी सी बात है, ‘मुल्क़’ की कहानी वही हिन्दू-मुस्लिम तनाव, आशंका, असहजता और पूर्वाग्रहों के आसपास है। मगर इस बार बातों के अपने तर्क हैं, साहस के साथ उन बातों को कहा गया है जो मज़हब के नाम पर हवाओं में फैली हुई हैं, दिमाग में घुली हुई हैं। मुसलमान, इस्लाम, दाढ़ी धीरे-धीरे और जाने कैसे संदेह के घेरे में आ गए किसी को पता न चला। बात संदेह से ज़्यादा विश्वास की हो गई। हम बहुत जल्दी ‘कन्क्लूज़न’ पर पहुँच जाते हैं। हालांकि, इस्लामिक जेहाद को आतंकवाद मान लेने वाली बात एक दशक पुरानी है और अब भगवा आतंक को भुनाया जा रहा है जहाँ सारी वही बातें और संदेह हैं, जो इस्लामिक जेहाद के संदर्भ में समझी जाती थीं। ‘मुल्क़’ बस यहीं विशिष्ट हो जाती है जहाँ विपक्ष है ही नहीं। इसे देखने वाला हर आदमी अपने भीतर ही पक्ष भी है और विपक्ष भी। ‘मुल्क़’ भले ही बनारस की कहानी है और परिवार के आतंकी होने पर उसके साथ हुए  सुलूक को थोड़ी देर के लिए अलग रख दिया जाये तो लगभग हर शहर की किसी एक बदर मंज़िल और मुराद, बिलाल, शाहिद, तबस्सुम, दानिश, संतोष, आरती जैसे नामों और किरदारों की कहानी है।

     

    कहानी

    बनारस की तंग गलियों वाले इलाक़े में जहाँ हिन्दू और मुस्लिम एक साथ रहते हैं, वहाँ बदर मंज़िल नाम के मकान में मुस्लिम परिवार के मुखिया मुराद अली मुहम्मद (ऋषि कपूर) अपनी पत्नी तबस्सुम (नीना गुप्ता) और अपने भाई बिलाल (मनोज पाहवा), उसकी बीवी छोटी तबस्सुम (प्राची शाह पाण्ड्या), उसके बेटे शाहिद (प्रतीक बब्बर) और बेटी आयत (वर्तिका सिंह) के साथ रहते हैं। मुराद अली पेशे से वकील हैं मगर उनकी बैठकी मोहल्ले के हिन्दू पान वाले और चाय वाले के साथ है। सुबह की नमाज़ पढ़ने के बाद शहर की तंग गलियों से निकलते हुए, अपने मोहल्ले में रोज़ दूध ले कर लौटते हुए यारबाशी और चाय की चुस्कियाँ उनकी ज़िंदगी की दास्तान बयां करती है। साथ ही उस भारत की भी जहाँ क़ौमी एकता ज़िंदादिली से आज भी साँस ले रही है। धीरे-धीरे मुराद के परिवार और किरदारों से परिचय होता है और कहानी आगे बढ़ती है उनके 65वें जन्मदिन पर होने वाली दावत तक। इस मौक़े पर शामिल होने मुराद के बेटे आफ़ताब की हिन्दू पत्नी आरती (तापसी पन्नू) लंदन से भारत आती है। इस दिन तक भी सुबह की अज़ान के साथ मुहल्ले में राम-राम की दुआ-सलाम से माहौल ख़ुशनुमा है। यहाँ तक कि पनवाड़ी चौबे (अतुल तिवारी) भी अपनी पत्नी से छुप कर मुराद के हाथ के बने कोरमा और चिकन का स्वाद ले रहा है। मगर यहीं कुछ बातें भी हैं मसलन मुराद की दावत में शरीक हुए मुहल्ले की हिन्दू महिला का यह कहना कि हम इनके यहाँ नहीं खाते। पनवाड़ी चौबे का बेटा जो अपनी मोटर साइकल पर भगवा झण्डा लगाकर और बाप को हिन्दू होने का हवाला देकर मुहल्ले से निकलता है। हवाओं में इंसानियत की सुगंध कुछ अगर-मगर के साथ अब भी बनी हुई है। यहाँ सारे किरदार और कहानी का मूड सेट है पर अभी तक ऐसा कुछ घटा नहीं है जहाँ से कहानी अगले लेवल पर पहुंचे। यह पटकथा का एक तरह का मास्टर स्ट्रोक भी हो सकता है जब दर्शक के मन में ट्रेलर देख कर या किसी पूर्वाग्रह के चलते कोई ख़याल ज़रूर पकने लगता है। बहरहाल, बिलाल अपने बेटे शाहिद को अगले दिन इलाहाबाद की बस में बिठा कर अपनी मोबाइल रिचार्ज की दुकान पर आ जाता है। थोड़े समय बाद पता चलता है कि इलाहाबाद जाने वाली उसी बस में बॉम्ब ब्लास्ट हुआ है और इसमें 16 लोगों की मौत हुई है। तीन आतंकवादियों पर शक होता है, दो मारे जाते हैं और बचा हुआ एक शाहिद है जो वापस बनारस आकर पास वाले मकान में छुप जाता है। टीवी पर न्यूज़ के ज़रिये यह ख़बर पूरे मुहल्ले में फैल जाती है। चौबे की देशभक्ति जाग जाती है और वह पुलिस को मुराद परिवार के अपने मुहल्ले में होने की ख़बर कर देता है। एंटी-टेररिस्ट स्क्वाड के मुखिया दानिश जावेद (रजत कपूर) एनकाउंटर में शाहिद को गोली मार देते हैं (हालांकि वे उसे ज़िंदा भी पकड़ सकते थे)। इसके पहले उनकी क़ौम के प्रति उनके ख़ुद के कमेन्ट से यह तय हो जाता है कि वे शाहिद जैसे क़ौम के दुश्मन को मार देंगे और फिर अपनी देशभक्ति के प्रमाण स्वरूप वो शाहिद को लाश को मुहल्ले में घसीटते हुए ले जाने का हुक्म अपने दल को देते हैं। इस बीच मुराद के परिवार में हड़कंप मचा हुआ है। मुराद जैसे ही अपने घर से बाहर आते हैं बाहर मीडिया के लोगों और फोटोग्राफ़र्स के साथ मुहल्ले के लोगों को दूसरी ओर खड़ा देख वापस दरवाजा बंद कर लेते हैं। फ़िल्म की कहानी का पहला मुख्य मुद्दा और आधार यहाँ बन कर तैयार है जिसमें अब किरदारों और परिस्थितियों के कारण होने वाली प्रतिक्रिया स्वरूप घटनाएँ फ़िल्म को आगे बढ़ाएँगी। इसी बीच परिवार पोस्टमोर्टम के बाद शाहिद का शव लेने से इंकार कर देता है। मगर अब शक की सुई परिवार की तरफ़ उठती है। पुलिस बिलाल को गिरफ़्तार कर लेती है। दानिश और सरकारी वकील संतोष आनंद (आशुतोष राणा) अब यह साबित करने में लग जाते हैं कि दरअसल यह पूरा परिवार ही आतंकवादी है। बिलाल के साथ ही मुराद पर भी आतंकी होने का आरोप लग जाता है। इस बीच बीमारी के चलते बिलाल की मौत हो जाती है। मुराद को परिवार सहित आतंकवादी होने के आरोप से मुक्त होना है। अब यह पूरा क़िस्सा एक कोर्ट रूम ड्रामा का रूप लेता है, जहाँ मुराद की बहू आरती इस बहस को आगे बढ़ाती है। बहस, आरोप और घटनाओं में दानिश के अपने पूर्वाग्रह के स्वीकार, मुराद की दलीलों, गवाहों के बाद कोर्ट मुराद और बिलाल को बाइज़्ज़त बरी करती है।

     

    कथानक का असर तथा संवाद

    कहानी कुल जमा यही है। मगर दो मुख्य घटनाओं यानि शाहिद का बॉम्ब ब्लास्ट में शामिल होना और

    बिलाल सहित मुराद के कोर्ट में आतंकी होने के आरोपों के बीच संवादों और घटनाओं की नाटकीयता के बीच यह फ़िल्म उन सवालों को उठाती है जो इस घटनाक्रम के बाद हर एक के मन में उठ रहे होते हैं। कोर्ट की दलीलों के बीच यह कहानी दर्शकों को अपने साथ ले लेती है जहाँ हर एक दर्शक (अपने अनुभव के आधार पर) मन ही मन मुराद से सवाल पूछता जा रहा है। इधर संतोष आनंद अपने धारदार संवादों से सिनेमाघर में संवाद सन्नाटा पैदा करते हैं। एक दृश्य में मुराद अपने घर से बाहर निकलते हैं और उनके घर की दीवार पर ‘पाकिस्तान जाओ’ लिखा होता है। जब इसके बाद मस्जिद में मुसलमान प्रतिक्रिया स्वरूप शाहिद को ‘शहीद’ बताने की कोशिश करते हैं तो मुराद उनसे कहता है ‘पाकिस्तान ही लिखेंगे ना अगर कुछ घर आज भी पाकिस्तान की जीत पर पटाखे बजाएँगे तो’। इधर मुराद और बिलाल कोर्ट में आरोपों का सामना करते हैं और दूसरी ओर मुहल्ले में मुराद के घर के ठीक सामने देवी जागरण का आयोजन मुहल्ले को पवित्र करने और अब अपने धर्म को गर्व से देखने के बहुत बारीक रेशे को दिखाता है। यह समझ से परे है कि कैसे धर्म के नाम पर रिश्ते बहुत जल्दी अपने-अपने पाले में आ जाते हैं ? कटघरे में आतंकी होने के आरोपों को झेलते हुए मुराद उस मानसिकता से भी टकराते हैं जब उन्हें यह अहसास होता है कि आरोप लग जाने का मतलब ही गुनहगार साबित हो जाना है। जिस मुल्क़ में पैदा हुए, पले, बढ़े उसी के प्रति उन्हें अपना प्यार साबित करना है। मगर कैसे? मुराद ख़ुद कहते हैं, ‘आखिर प्यार साबित कैसे किया जाता है? प्यार कर के ही ना !’ पर वक़्त के साथ उनकी झल्लाहट बढ़ती जाती है जब आरती भी संतोष आनंद के हमलों से परेशान हो कर उनसे ही सवाल करती है, ‘एक आम देशप्रेमी कैसे फर्क करेगा दाढ़ी वाले अली मोहम्मद में और दाढ़ी वाले उस टेररिस्ट में? कैसे साबित करेंगे आप कि आप एक अच्छे मुसलमान हैं ? मुराद को यह सवाल चुभता है और वो कहते हैं, ‘मेरे घर में मेरा स्वागत करने का हक़ उन्हें किसने दिया? ये मेरा भी उतना ही घर है जितना आपका। और अगर आप मेरी दाढ़ी और ओसामा बिन लादेन की दाढ़ी में फर्क नहीं कर पा रहे तो भी मुझे हक़ है मेरी सुन्नत निभाने का’। इन सब दलीलों के बीच दानिश जावेद का अपने पूर्वाग्रहों के चलते शाहिद को ज़िंदा पकड़ने की बजाय उसे मार डालने वाली सोच का भी पता चलता है। आरती और दानिश के ज़रिये यहाँ आतंकवाद की वह परिभाषा भी ख़त्म होती है जहाँ आतंक का मतलब केवल इस्लामिक आतंकवाद माना जाता है। आरती और संतोष आनंद की बहसों के साथ आरती मुराद के पक्ष में कहती है कि ‘बदर मंज़िल का ये वही परिवार है जिसने बँटवारे के बाद मज़हब और मुल्क़ में से मुल्क़ को चुना’। अंतिम दलील के रूप में आरती कहती है, ‘एक मुल्क़ कागज़ पर नक़्शों की लकीरों से नहीं बँटता। मुल्क़ बँटता है रंग से, भाषा से, धर्म से, ज़ात से’। सारी बहसों और सबूतों-गवाहों को देखने-सुनने वाले जज हरीश मधोक (कुमुद मिश्रा) बेहद संतुलित फैसला देते हैं। इस सवाल के बारे में जब तथ्य यही कह रहे कि अधिकतर आतंकी मुसलमान हैं, जज हरीश माधोक मुसलमानों से कहते हैं कि अपने बच्चों पर ध्यान दीजिये कि वे किसकी संगत में रह रहे हैं। साथ ही हिंदुओं को भी मुस्लिमों की दाढ़ी से उनके प्रति धारणा बनाने की आदत से परहेज रखने की सलाह देते हैं।

    प्लॉट और सब-प्लॉट

    फ़िल्म की पटकथा में मुख्य कथानक के रूप में दो ही घटनाएँ हैं। सब-प्लॉट के रूप में आम जीवन में मुस्लिमों के प्रति फैली धारणाओं का इस्तेमाल हुआ है। कथानक की कुछ गुत्थियाँ ज़रूर दिखाई गई हैं- मसलन बिलाल का 14 सिम कार्ड्स बगैर आइडेंटिटी प्रूफ़ के बेच देना, शाहिद का कश्मीरी आतंकी महफ़ूज आलम के संपर्क में आना और फिर अपने दोस्त राशिद के साथ घर पर ही इंटरनेट के ज़रिये बम बनाने की ट्रेनिंग लेना, बिलाल का पाकिस्तान में रहने वाली बहन से अपनी बीमारी में हवाला के ज़रिये रुपये लेना, दानिश जावेद की देशभक्ति साबित करने की मानसिकता के कारण शाहिद को ज़िंदा पकड़ने के बजाए मार देना और उसकी लाश के साथ बुरा सुलूक करना, वकील संतोष आनंद के ज़रिये मुस्लिमों की गरीबी, अशिक्षा, आबादी, उनके प्रति जेहादी धारणाओं को उजागर करना जैसी घटनाएँ और संवाद कहानी को गति देती हैं। हाँ, कुछ जगहों पर यह फ़िल्म अपनी रियलिस्टिक शैली के बावजूद पकड़ छोड़ती भी जाती है। मसलन, बनारस का बनारसीपन नज़र नहीं आया है, न तो भाषा में और न ही संवादों में। कोर्ट की प्रोसीडिंग्स में जहाँ सबूत और गवाह और आरोपों के पीछे केवल बहस है और यह भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं कि पुलिस क्यों बिलाल और मुराद को आतंकी घोषित करने पर तुली है? कोर्ट का हिस्सा भी अपने-अपने नज़रिये को न थोपने और उनसे बच निकलने का रास्ता देता है। जज का फैसला संविधान की दुहाई के साथ फ़िल्म खत्म होने के पहले ही दर्शक भाँप लेता है। कई जगह यह भाषणबाज़ी भी लग सकती है।

     

    इन सबके बावजूद जिस कारण फ़िल्म और उसका स्क्रीनप्ले दमदार बनता है वह है इसका इंटेन्शन जिससे प्रेरित हो कर यह कहानी लिखी गई। इस फ़िल्म का स्क्रीनप्ले कहानी के बैलेंस और हिन्दू-मुसलमान शब्दों के बीच ठोस दलीलें पेश करता है। एक ओर जहाँ मुसलमानों के आतंकी गतिविधियों में शामिल होने की कई घटनाओं से यह मुसलमानों को चेतावनी भी है, वहीं दूसरी ओर हिन्दू भावनाओं और तेज़ी से आग पकड़ती चिंगारियों से दूर रहने की हिदायत भी है। कमाल की बात यह है कि फ़िल्म पारदर्शिता से मुसलमान आतंकी घटनाओं की संलिप्तता पर किसी भी तरह के सवाल पूछने से नहीं चूकती और हर तरह का सवाल करती है। साथ ही सारे जालों को साफ़ करती हुई मुराद की आरोपों से रिहाई भी करती है।

     

    चरित्र

    फ़िल्म के चरित्र अपनी-अपनी मानसिकता के साथ न्याय करते हैं। बड़ी और छोटी तबस्सुम एक अच्छी फ़िल्म का हिस्सा बनने की ख़ुशी अपने खाते में दर्ज कर सकते हैं। यूं तो कहानी का मुख्य किरदार मुराद अली मोहम्मद है जिसके नज़रिये से इसे कहा जा रहा है। इसलिये हर तरह का दर्द, तकलीफ़, पसोपेश, जद्दोजहद और संघर्ष उसके हिस्से का है। चाहे वो अपने भाई के बेटे को आतंकी बने टीवी न्यूज़ पर देखना हो, उसकी लाश को लेने से इंकार करना हो, अपने भाई को पुलिस हिरासत में टूटते और फिर मरते देखना हो, ख़ुद पर भी आतंकी होने के आरोप सुनना हो, मुहल्ले वालों की नफ़रत का शिकार बनना हो या मुल्क़ और मज़हब दोनों के ही लिए प्रेम साबित करना हो – मुराद इस कहानी का नायक है। मगर बिलाल का चरित्र सहायक हो कर भी अपने बेटे के एक फ़ैसले को जिस तरह से देखता है, उससे यह चरित्र इस फ़िल्म का प्रमुख किरदार बन जाता है। ख़ासकर के एक ऐसे आदमी की मानसिकता जो थोड़ी नासमझी, कुछ अनपढ़ रह जाने के कारण मोबाइल सिम कार्ड की दुकान चलाने वाली रोजगारी, रातों रात ज़िंदगी बदल जाने की विवशता और लाचारी के बावजूद अपने बड़े भाई से प्रेम करता है और परिवार-मज़हब को एक आम आदमी की छवि में ही देखता है। ‘मुल्क़’ के ये दो भाई और चरित्र अपनी तरह से गुंथे हुए हैं। अन्य किरदारों के ज़ेहन केवल संवादों के सहारे ही समझ आ सकते हैं। और उन पर कोई बुनावट की होगी, ऐसा ख़ास कुछ लगता नहीं।

     

    अपनी बात

    ‘मुल्क़’ को एम एस सथ्यू की ‘गरम हवा’ और सईद अख़्तर मिर्ज़ा की ‘नसीम’ के बाद एक महत्त्वपूर्ण फ़िल्म की तरह कुछ लोगों ने माना है। मेरे लिए यह फ़िल्म अराजक क़िस्म के समय में उम्मीद की बात करती हुई सकारात्मक फ़िल्म लगती है जिसे बहुत ईमानदारी और दृढ़ता से बनाया है। ख़ासतौर से एक ऐसे समय में जब भीड़ धर्म के नाम पर उबल रही है और उत्तेजना से अपने आप फैसला करना चाहती है; तब यह कहानी ‘मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना’ की भावनाओं को तर्क से सही साबित करती दिखती है।  

    फ़िल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, पुणे, से पटकथा-लेखन में स्नातक। लेखक, निर्देशक, कॉलमिस्ट, कवि, गायक, प्रशिक्षक, संपादक के रूप में सुदीप का कार्यक्षेत्र सिनेमा, नाटक, पत्रकारिता, कविता एवं आयोजनधर्मी के रूप में फैला है। भोपाल से प्रकाशित दैनिक ‘सुबह सवेरे’ में विश्व-सिनेमा पर साप्ताहिक कॉलम ‘सिनेमा के बहाने’ और इन्स्टाग्राम पर विशिष्ट गद्य लेखन के कारण भी पहचान।