•  दिनकर शर्मा
    •  28 February 2018
    •  509

    मैं आज भी रायटर हूं। मैं आज भी रायटर के हित की बात करूंगा। अगर कोई दुविधा की सिचुएशन आई तो मैं अपना प्रॉडक्शन हाऊस बंद कर सकता हूं, यह मैं पूरे यकीन के साथ बता रहा हूं। - ज़माँ हबीब

    ‘निमकी मुखिया’ के लेखक-निर्माता के साथ ख़ास बातचीत (हिंदी ट्रांसक्रिप्शन: दीप जगदीप सिंह)

    टीवी लेखक और निर्माता ज़माँ हबीब ‘सपना बाबुल का... बिदाई’, ‘ससुराल गेंदा फूल’, एक हज़ारों में मेरी बहना है’, ‘सास बिना ससुराल’ और ‘निमकी मुखिया’ जैसे सफल डेली शोज़ के लिए जाने जाते हैं। वे लेखकों के अधिकारों को लेकर ख़ासे मुखर और प्रयासरत हैं, साथ ही वर्तमान में एसडबल्यू के महासचिव का पदभार भी संभाले हुए हैं। ज़माँ हबीब ने एक लेखक के तौर पर अपने सफ़र के बारे में एसडबल्यूए से ख़ास बातचीत की। प्रस्तुत है उनके वीडियो इंटरव्यू से कुछ अंश। 

     

     

    सवाल: निमकी मुखिया शो में क्या ख़ास है?

    ज़माँ हबीब: शो का यूएसपी निमकी का कैरेक्टर और इसका मेन थीम है। देखा जाए तो पिछले दस साल से हम जिस तरह के शोज़ बना रहे हैं या जो शोज़ आ रहे हैं, उनमें अधिकतर सास-बहू ड्रामा देखने को मिलता है। लेकिन यहां पर एक ऐसी कहानी है जिसका पॉलिटिकल बेस है और रूरल बैकड्रॉप है। तो इस तरह से यह घरेलू कहानी नहीं है बल्कि सोशल स्टोरी है, और ऐसा टेलीविज़न पर पिछले दस-पंद्रह साल से देखने को नहीं मिला है।

     

     

     

    सवाल: निमकी मुखिया लिखने की प्रेरणा कहां से मिली?

    ज़माँ हबीब: एक बार मैं बिहार में कहीं जा रहा था। वहां पर एक होर्डिंग देखी मैंने जिस पर लिखा हुआ था कि…. मान लीजिए सुरेश नाम का कोई व्यक्ति है… ‘सुरेश सरपंच मुखियापति’ और उसके नीचे छोटा-सा नाम उस महिला का लिखा हुआ था जो एक्चुअल मुखिया थी। मुझे वह एक सरप्राईज़िंग चीज़ लगी। मैंने पता किया तो मुझे पता चला कि मुखिया तो उनकी पत्नी हैं और चूंकि सीट रिज़र्व हो चुकी थी, तो इस लिए मुखिया उनकी पत्नी को बनाया गया। लेकिन वो पढ़ी-लिखी थी नहीं और घर के कामकाज करने वाली महिला थी और मेन काम जो भी होता था वो सारा पति जी कर रहे थें, इसीलिए पति जी ही मुखिया जी कहलाते थें।

    तो उस से मुझे एक ख़्याल आया कि वुमन इमेंनसिपेशन के लिए सरकार इतना कुछ भी कर रही है लेकिन समस्या सिर्फ़ सरकार के इनिशियेटिव लेने से हल नहीं होती है। इंडिविजुअल और सोशल लेवल पे हम क्या कर रहे हैं? क्या हम उस रिज़र्वेशन का फ़ायदा उठा रहे हैं, अच्छे से? क्या हम विमन को इम्पावर करने की कोशिश कर रहे हैं? सच्चाई यह है कि हम वैसा नहीं कर रहे हैं। बल्कि हममें से बहुत से लोग ऐसे जुगाड़ कर रहे हैं कि एक महिला को खड़ा कर दिया इलेक्शन में और वह वैसे ही रोटी बना रही है, वैसे ही गोएठा ठोक रही है गांव में, वैसे ही घरेलू काम कर रही है और पति जो हैं वो मुखिया बने बैठे हुए हैं।

    वो विचार वहीं से आया था। मैंने एक कैरेक्टर बनाया निमकी का जो उन्हीं महिलाओं में से एक है जिसने कभी भी अपने पावर को, अपने फ्रीडम को, वैल्यू नहीं दिया। शो में एक टैगलाईन है कि ‘फ्रीडम कम्ज़ फ़्रॉम विदिन’। फ़्रीडम कैन नॉट बी बेस्टोड। तो आपको मैं लाख थाली में परोस के दे दूं, अगर आपके अंदर ही कुछ बड़ा, ऊंचा, करने का जज़्बा नहीं है तो आप नहीं कर सकते। सो दिस इज़ अ स्टोरी अबाऊट दिस वन गर्ल, हू डज़ंट वांट टू डू एनीथिंग इन लाइफ़। ऑल शी वांट्स कि हां मेरी शादी हो जाए और मैं ख़ुश रहूं। और इस लड़की का एक बिलीफ़ है कि लड़की के लिए जीवन में बस एक अच्छा बाप, एक अच्छा भाई और एक अच्छा पति होना चाहिए। यानि मर्द। अगर ये अच्छा मिल जाए तो आप तो आपकी ज़िंदगी सफ़ल है, आप ज़िंदगी में सब कुछ पा सकते हैं। ये इस लड़की की सोच है और यही इस लड़की की जर्नी होगी आगे चल के जहां पर उसको अपने अंदर की ताकत का अहसास होता है। उसको यह समझ में आता है कि फ़्रीडम या पावर जो है वो मेरी अपनी होनी चाहिए ना कि दूसरे की। आई शुड नॉट बी डिपेंडेंट। एंड दैट्स वेयर शी टेक्स ऑन।

     

     

     

    सवाल: सामाजिक मसलों पर शोज़ लिखने का आपका अब तक का अनुभव कैसा रहा?

    ज़माँ हबीब: देखिए, कहते हैं ना नथिंग सक्सीड लाइक सक्सेस। एक शो सफल हुआ है तो मुझे ऐसा लगता है कि लोग हिम्मत करेंगे और सोचेंगे कि ऐसे इंटरटेनिंग तरीके से एक सीरियस सब्जेक्ट को भी कहा जा सकता है और वो सक्सेसफुल भी हो सकता है। हां, मैं मानता हूं कि टीवी की ऑडियेंस जो है, आज की डेट में, वो सीरियस सब्जेक्ट नहीं देखना चाहती है। तो हमारी कोशिश रहती है कि हम सीरियस सब्जेक्ट को इंटरटेनिंग वे में कह सकें। मैं मिसाल दूंगा राजकुमार हिरानी की। उन्होंने अब तक सीरियस सोशल इश्यूज़ पर फ़िल्में बनाई हैं, लेकिन उनको बहुत इंटरटेनिंग वे में प्रेज़ेंट किया है। यही ज़रूरत है टेलीविज़न पर भी। अगर हम, बहुत गंभीर समस्याओं को भी इंटरटेनिंग वे में आम लोगों तक हम पहुंचा पाएं तो वो बहुत अच्छी बात होगी। जैसे छः-सात साल पहले मैंने एक शो किया था, प्रोडयूस और लिखा भी था - ससुराल गेंदा फूल। उस दौरान भी यह बात आई थी कि स्लाईस ऑफ़ लाइफ़ काईंड शो चलता नहीं है। बट इट डिड वर्क, और उसके बाद कई लोगों ने कोशिश की उस तरह के शोज़ बनाने की। कुछ अच्छे बना पाए, कुछ फ़ेल हुए, वो तो चलता रहेगा। लेकिन यस, एक चीज़ अगर सक्सेसफ़ुल होती है तो हमारे यहां का यह तो दस्तूर है कि सब कोई वैसा बनाना चाहते हैं। तो एट लीस्ट यह एक शुरुआत हुई है, इस कहानी से।

     

     

     

    सवाल: किरदार बनाम प्लाट, ज़्यादा महत्वपूर्ण क्या है?

    ज़माँ हबीब: निमकी मुखिया को लेकर एक सर्वे हुआ था, एक डेढ़-महीना पहले। रिसर्च में एक बड़ी अच्छी बात यह आई कि नॉट ओनली निमकी, बल्कि इसके बहुत सारे पात्र पॉपुलर हो रहे हैं जैसे टुन्ने, निमकी के घर के पड़ोस में रहने वाली चाची जिस से निमकी की नोंकझोंक चलती रहती है इत्यादि।हालाँकि चाची के कैरेक्टर का तो बहुत दिनों तक हमने कोई नाम भी नहीं रखा था। वो सिर्फ़ चाची ही थीं।

    तो एक चीज़ मुझे समझ में आई है और वो ससुराल गेंदा फूल के संदर्भ में भी मैं बोलूंगा कि कैरेक्टर्ज़ जो हैं अगर वैल-एच्ड हों और अपने आप को सही तरह से डिफ़ाईन करते हों तो छोटे-छोटे कैरेक्टर्ज़ भी अंडरलाईन हो जाते हैं और उनको लोग पसंद करते हैं। निमकी मुखिया के साथ यह बहुत अच्छी बात हुई है कि 99 प्रसेंट कैरेक्टर्ज़ लोगों को याद हैं। वो उनके नाम से उसका ज़िक्र कर रहे हैं। सो कैरेक्टर शुड भी वैल एच्ड एंड वैल डिफाइन्ड।

    मोस्टली हम क्या करते हैं कि टेलीविज़न में हम प्लॉट-ड्रिवन चीज़ें चलाते हैं। प्लॉट-ड्रिवन में क्या होता है कि बहुत सारे कैरेक्टर्ज़ जो हैं मुर्दा हो जाते हैं। आप देखिएगा कि एक हॉल में सीन चल रहा है, एक किरदार डायलॉग बोले जा रहा है, बाकी सबके रिएक्शन्स जा रहे हैं।

    दूसरी तरफ़ आप निमकी मुखिया का कोई भी सीन देखिएगा तो एवरी कैरेक्टर विल से समथिंग। ऐवरी कैरेक्टर हैज़ हिज़ और हर टेक ऑन दैट पर्टिकुलर इश्यू। सो कई बार, ऐसा होता कि आप किसी छोटे कैरेक्टर को भी पसंद करने लगें, तो आप एंटिसिपेट करते हैं कि इस सिचुएशन में यह ऐसा कुछ बोलेगा, या ऐसा कुछ कह देगी, तो वो बड़ा इंटरेस्टिंग हो जाता है और कैरेक्टर को ज़िंदा रखता है।

     

     

    सवाल: निमकी मुखिया चैनल तक कैसे पहुँचा?

    ज़माँ हबीब: इस मामले में मै बहुत फ़ॉर्चुनेट हूं कि स्टार प्लस ने हमेशा मुझे फ़्रीडम दिया है और मैं वही शो बना रहा हूं जो मैं बनाना चाह रहा था। मैंने यह शो जब उनको पिच किया था तो एक बड़ा इश्यू उनके साथ था कि स्टार प्लस पर कभी भी रूरल बैकड्रॉप पर शो नहीं बनाया गया था। उनकी अपनी एक ऑडियंस बनी हुई है, तो थोड़े से वो एप्रिहेंसिव रहे। लेकिन जब मैं चैनल के मिस्टर गौरव बैनर्जी और सीईओ एंड चेयरमैन स्टार इंडिया मिस्टर उदय शंकर से मिला तो उनको विश्वास था कि यह शो अच्छा है, यह कहानी अच्छी है और किरदार, ख़ास तौर से निमकी का कैरेक्टर, उनको बहुत पसंद आयें। इसके बाद मैंने एक पायलट बनाया ताकि देख सकें कि वो किस तरह से शेप-अप कर रहा है। यह मेरा इंडविजुअली पहला प्रॉडक्शन था।

     

    पायलट बनाने के बाद वो रिसर्च में जाता है। उसमें भी कोई ऐसी नेगेटिव बात नहीं आई। सो देन वी गॉट ए गो अहेड, और वहां से हमने यह शो शूट शुरू किया। इन द मीनवाईल ये हुआ कि उसी बीच में स्टार भारत लॉंच होना था और उसकी टारगेट ऑडियंस थोड़ा रूरल और स्मॉल टाउन लेवल पर सैट की गयी थी।सो दे थॉट कि निमकी मुखिया कैन बी चैनल ड्राइवर शो। यह एकदम फिट बैठता था उनकी स्कीम ऑफ़ थिंग्स में तो दे रिक्वेटेड मी कि क्या हम इस शो को स्टार भारत पर कर सकते हैं। आय हैड नो प्रॉब्लम। मेरे लिए यह था कि यह मेरा शो है। फिर वो इस पर हो या उस पर हो, मेरा विश्वास था कि यह शो वर्क करेगा। कोई उस में झिझक नहीं थी। मैंने इमीजेटली हां कहा, और यह स्टार भारत पर आया।

     

     

     

    सवाल: लेखक चैनल की टीम के साथ कैसे तालमेल करता है?

    ज़माँ हबीब: मेरा स्टार से बहुत पुराना रिश्ता है, और इत्तेफ़ाक़ ये है कि मैंने मैक्सिमम शोज़ स्टार के लिए ही किए हैं। यह भी इत्तेफ़ाक है कि मैक्सिमम हिट शोज़ भी मैंने स्टार के लिए किए हैं - चाहे बिदाई हो या ससुराल गेंदा फूल हो, या एक हज़ारों में मेरी बहना हो। तो उतनी तो इज़्ज़त मैंने कमाई है यहां चैनल में। वो मेरी अर्निंग है, कि मुझे उतनी वैल्यू दी जाती है, उतना मुझे सुना जाता है। नए रायटर के लिए मैं यह कहूंगा कि - नहीं, आपको चैनल के पास जाने की ज़रूरत नहीं है। यहां पर प्रड्यूसर्ज़ हैं।

    दूसरी बात मैं स्ट्रॉंगली ये बिलीव करता हूं कि आप पांच-छः चीज़ें जब लेकर जाते हैं, तो आप एक तरह से बेचने जा रहे हैं। तब उसमें आपका विश्वास नहीं होता, कन्विक्शन की कमी होती है, और जब आप एक चीज़ लेकर जाते हैं जिसपर आपने बहुत अच्छी तरह से काम किया होता है, तो आप उस चीज़ के लिए बड़े तैयार रहते हैं। अगर उसपर आपसे चौदह सवाल पूछे जाएंगे तो आप उनके जवाब देंगे क्योंकि आप उस चीज़ को जी चुके होंगे, यह एक फ़र्क है। जैसे, निमकी मुखिया की बात ही बता रहा हूं कि जब मैं यह शो लेकर गया तो मुझे मेरे ही दोस्तों ने, मेरे ही घरवालों ने, सबने मना किया कि यह स्टार का तो शो है ही नहीं। क्यों लेकर जा रहे हो। लेकिन मेरा कन्विक्शन था कि नहीं, ये स्टार का ही शो है। इट हैज़ टू बी ऑन स्टार। सो वो मेरा कन्विक्शन था। चैनल पर भी दस लोगों ने कहा कि यार, स्टार का शो नहीं है। मैं स्टक रहा कि नहीं ये स्टार का ही शो है और अल्टीमेटली यह स्टार पर ही आया। तो ये मेरा अपना तरीका है। बाकी हर किसी का काम करने का तरीका अलग होता है। मेरा यह मानना है कि कोई भी चीज़ कीजिए पूरे कन्विकशन के साथ कीजिए, दैट पेज़ ऑफ़।

     

     

     

    सवाल: आपके हिसाब से, एक डेली सोप की लाइफ़ कितनी होती है?

    ज़माँ हबीब: मैं जब कहानी लिखता हूं तो यस, मैं उसका एंड सोचता हूं। कमर्शियल एंगल से अगर देखें तो किसी भी चैनल के लिए भी, आज की डेट में, एक डेली शो की कॉस्ट सौ-दो सौ एपिसोड से कम में नहीं निकलती है। तो जैसे फ़िल्म का है कि आप को दो घंटे की फ़िल्म बनानी ही है - आप एक घंटे की फ़िल्म बना नहीं सकते - तो उसी तरह से टेलीविज़न का भी है। आप कम से कम डेढ़-दो सौ एपिसोड की कहानी बनाईए ही बनाईए। तो हम कहानी वैसी ही बनाते हैं जो साल डेढ़ साल की हो।

    इन द मीनवाईल, यह होता कि जब आपकी दो महीने की कहानी चल जाती है तो यह लगता है कि कुछ चीज़ें बहुत पसंद की जा रही हैं। यह कमर्शियल ग्रीड है हर किसी की - प्रॉड्यूसर, रायटर, ब्रॉडकास्टर सबकी कि भई, जब मेरी यह चीज़ बिक रही है तो मैं इस को और बेचूं। तो वहां से हम कहानी में कुछ ट्विस्ट लाना शुरू करते हैं। या उसमें सब-प्लॉट्स जोड़ना शुरू करते हैं। एक्चुअली बहुत नैचुरल वे में कई चीज़ें आती हैं। डेली सोप का अपना एक नरेटिव है। अपना एक पैटर्न है। कई बार आप दूसरे कैरेक्टर्ज़ को भी जब छूने लगते हो और उनको भी साथ में लेकर चलने लगते हो तो उन सबकी अपनी-अपनी, कहानियां बनने लगती हैं। अगर एक पूरा साल आपने दो-ढाई सौ एपिसोड कर लिए हैं एंड यैट दैट शो इज़ गोईंग ग्रेट दैन ऐवरीवन वॉन्ट्स कि इसको मैं और जूस आऊट करूं। यह सिलसिला शुरू होता है। और हां, ये मैं मानता हूं कि एक साल के बाद कहानी में थोड़ी बेईमानी आती हैं क्यूंकि मैं नहीं समझता हूं कि किसी भी कहानी की स्ट्रेंथ है पांच सौ या छः सौ एपिसोड हो सकती है। दो-ढाई सौ एपिसोड तक कहानी के डेली सोप के फ़ॉरमैट में नैरेटिव आपका हो जाता है, डेली बेसिस पे। मसलन, आज सुबह हुई तो शाम को ऐसा हुआ तो दोपहर में ऐसा हुआ। आप हर कैरेक्टर की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में चले जाते हो। ये सब एक्सप्लोर करते-करते आप एक-डेढ़ साल चला सकते हो। लेकिन वही चीज़ पांच सौ एपिसोड लेने लगे तो वो रेपेटेटिव और बोरिंग हो जाती है। उसके बाद आप उस कैरेक्टर को शेक-अप करना चाहते हो। आप उस पूरे प्लॉट को हिलाना चाहते हो कि इस का कुछ पति मर जाए या दोबारा वापस आ जाए, या इसको पैरालिटिक अटैक हो जाए तो फिर से हाओ टू रिवाईव हर। वहां से आप गिमिक्स करना शुरू कर देते हो। बहरहाल, एक साल तक दो-ढाई सौ एपिसोड तक आप किसी कहानी को ईमानदारी से कह सकते हो।

     

     

     

    सवाल: नये टीवी लेखक क्या करें? अपने मन का लिखें या ट्रेंड के अनुसार?

    ज़माँ हबीब: नये रायटर यह ग़लती कर रहे हैं कि जो चल रहा है वे बार-बार उसी को फ़ॉलो करना चाहते हैं। मैं सारे नये टीवी रायटर्ज़ से ये रिक्वेस्ट करता हूं कि एक चालाक बिज़नसमैन के हिसाब से भी सोचो। जो चल रहा है उसमें तुम नहीं चल पाओगे क्योंकि वहां पर खिलाड़ी बैठे हुए हैं। मॉरल एथिकल बात को अलग रख दीजिए, मैं एज़ ए बिज़नस प्रोपोज़िशन बात कर रहा हूं कि नए रायटर को यह सोचना चाहिए कि मेरी स्ट्रेंथ क्या है जो मैं लेकर आने वाला हूं। जो चीज़ चल रही है आप उसे फ़ॉलो करेंगे तो प्रॉड्यूसर कहेगा कि तुमसे बैटर करने वाले लोग मौजूद हैं। जैसे मैं करण जौहर नहीं बन सकता हूं, करण जौहर करण जौहर जैसी ही फ़िल्म बनाएंगे। मैं सूरज बड़जात्या नहीं बन सकता हूं, उनकी अपनी अलग सोच है, वैसा वो वही बना सकते हैं। तो मेरी इंडिविजुएलिटी क्या है? जो मेरे जैसा कोई नहीं कर पाए? मेरी नए रायटर से ये रिक्वेस्ट है, हम्बल रिक्वेस्ट है, कि प्लीज़ बी वॉट यू आर। आप अपने कनविक्शन से अपनी चीज़ कहिये। वो ही नयी चीज़ को लीड करेगी।

     

     

     

    सवाल: एक निर्माता और लेखक होने के बीच कोई दुविधा पाते हैं?

    ज़माँ हबीब: मैं आज भी रायटर हूं। मैं आज भी रायटर के हित की बात करूंगा। अगर कोई दुविधा की सिचुएशन आई तो मैं अपना प्रॉडक्शन हाऊस बंद कर सकता हूं, यह मैं पूरे यकीन के साथ बता रहा हूं। प्रॉड्यूसर मैं, प्रॉड्यूसर बनने के लिए नहीं बना हूं। मतलब उस में मेरी पैसे वाली मंशा नहीं है। हां, यह है कि मैं अपने घर की चीज़ बेचकर कोई शो नहीं बनाने वाला हूं। प्रॉड्यूसर मैं इस लिए बना हूं कि एक चीज़ जो मैं बनाना चाहता हूं एज़ ए मेकर, नॉट जस्ट एज़ ए रायटर, उसे बना सकूँ। मैं प्रॉड्यूसर बना हूं इसलिए कि मेरा इनवॉल्वमेंट क्रिएटिव लेवल पर बहुत ज़्यादा है। मैं एडिट देखता हूं, रफ़ कट्स देखता हूं। मैं जो सीन शूट होता है, उसको डिज़ाईन करता हूं कि इसको किस तरह से किया जाए। सो आय एम एंजायईंग एज़ अ मेकर और उसी वजह से मैं प्रॉड्यूसर बना हूं ताकि वो पावर मेरे पास रहे कि मैं जैसी चीज़  बनाना चाहता हूं उसे वैसा बना पाउं। लाईक जो हमारा निमकी मुखिया का सैट है, उसकी पूरी डिज़ाईनिंग में मैं पूरा इनवॉल्व रहा हूं। पूरे मेकिंग में मैं इनवॉल्व रहा हूं तो वो मेरा अपना किक है, एज़ अ प्रॉड्यूसर नहीं।

     

     

     

    सवाल: डिजीटल मीडिया के उभरने को आप कैसे देखते हैं?

    ज़माँ हबीब: मैं अभी दो-चार जगह ट्रैवल कर रहा था तो मैंने देखा है कि घर की औरतें मेरा शो मोबाइल पर ही देख रही थीं। इससे फ़िक्स टाईम वाला सिस्टम अब धीरे-धीरे ख़त्म होता जा रहा है। अब ज़रूरत नहीं कि कोई साढ़े आठ बजे आ के अपने ड्राईंग रूम में बैठे और अपना सीरियल देखे। इस तरह वक्त बदल रहा है। लेकिन नयी ऑडियेंस जो बन रही है वो मोबाइल वाली ऑडियेंस बन रही है। मुझे इसका डर लग रहा है कि आपकी सारी मेहनत एक उस तरह से वेस्ट जाने वाली है। आप एक तरफ़ किसी चीज़ को विज़ुअली ग्रैंड करने की सोच रहे हैं और बनाने की कोशिश कर रहे हैं और दूसरी तरफ आपकी ऑडियेंस आपकी उस चीज़ का इंतज़ार अपने मोबाइल पर कर रही है। मेरा फ़ीयर है कि इससे बहुत फायदा नहीं होने वाला है। विज़ुअल क्राफ़्ट का नुकसान होने वाला है।

     

     

     

    सवाल: एसडबल्यूए के सदस्यों के लिए कोई संदेश?

    ज़माँ हबीब: एसडबल्यू के मेंबर्ज़ के लिए और सारी रायटर्स फर्टेनिटी के लिए मेरा एक रिक्वेस्ट है। इस ऑर्गेनाईज़ेशन या रायटर्ज़ के जो ग्रुप्स हैं उन सबको हम एक मदद करने वाली संस्था के तौर पर देख रहे हैं। उस तरह से ना देखें। बल्कि यह एक ऐसा ऑर्गेनाईज़ेशन है जिसे हम सबको मिलकर ताकतवर बनाना है। मुझे अफ़सोस होता है कि कई रायटर फ्रेंड्स हमारे, जो लैटर भेजते हैं या जो हमारे पास आते हैं मिलने के लिए, वो इसको एक वैलफ़ेयर सोसायटी की तरह ट्रीट कर रहे हैं। यह नहीं करना चाहिए। प्लीज़, आप इसके एक्टिव पार्ट बनिए और इसे बड़ा बनाने में इंडविजुअल लैवल पर हिस्सा लीजिए। एक बहुत इंपॉर्टेंट चीज़ मैं कहूंगा कि सिनेमा इंडस्ट्री जो है, यह कमर्शियल इंडस्ट्री है। रायटर को भी कमर्शियल एंगल से सोचकर ही अपना काम करना चाहिए। यहां पर हम लिट्रेचर या साहित्य लिखने नहीं आए हैं। यहां पर बड़ा सिम्पल-सा काम ये है कि एक कहानी है मेरे पास, जिसको मैं कमर्शियल लैवल पर बेच रहा हूं और इसके मुझे इतने पैसे मिलने हैं और इस में मेरा नाम आना है। ये दो चीज़ें बहुत इंपॉर्टेंट हैं। कहानी को किस तरह से बेचना है, किस शर्त पर बेचना है, कितने पैसे में बेचना है, यह आपकी ज़िम्मेदारी है। यह प्लीज़, आप कीजिए।

     

    दिनकर शर्मा फ़्रीलांस लेखक-निर्देशक हैं। उन्होंने एफ़टीआइआइ (पुणे) से पटकथा लेखन की पढ़ाई की और बाद में, विस्लिंगवुड्स इंटरनैशनल में स्क्रीनराइटिंग फ़ैकल्टी के बतौर कार्य किया। वे एफ़टीआइआइ और डबल्यूडबल्यूआइ पर गैस्ट स्क्रिप्ट-मेंटर तथा एफ़टीआइआइ के शॉर्ट-टर्म स्क्रीनराइटिंग कोर्स में गैस्ट-फ़ैकल्टी भी हैं।