•  सुदीप सोहनी
    •  06 January 2018
    •  252

    आक्रोश’ के ‘अर्धसत्य’ की खोज में लगा लेखक

    विजय तेंडुलकर द्वारा लिखी फ़िल्मों का अवलोकन

    धर्म, राजनीति, पावर, पैसा और इनका खेल... सब कुछ हमारी आँख के सामने होता आया है। हमेशा से ही। इन गुत्थम-गुत्था ताक़तों के ख़िलाफ़ आम आदमी के विरोध और प्रतिरोध को स्वर देने का काम किया विजय तेंडुलकर ने। लिखे हुए का पैनापन ऐसा कि व्यवस्था की जन्मजात ख़ामियाँ उनके गढ़े दृश्यों के एक्सरे में साफ-साफ नज़र पड़ती थीं। आज भी आम आदमी के भीतर कुछ ऐसी बेचैनी है कि तेंडुलकर का सिनेमा और नाटक सामयिक नज़र आते हैं। अपने किरदारों, कहानियों और नाटकों में जिस सच्चाई के साथ समाज की जो तस्वीर पिछली सदी में वो रच रहे थें, भले तब उन्हें विवादास्पद माना जाता रहा हो, वह आज भी बिलकुल सटीक बैठती है। एक लेखक बतौर अपने समय की ऐसी तस्वीर को निर्ममतापूर्वक लिख पाना ही उनके लिखे का बड़ा हासिल है। 

    तंत्र, व्यवस्था की सच्चाई और तेंडुलकर का सिनेमा  

    एफटीआईआई में पटकथा लेखन की पढ़ाई करते हुए मैंने बिलकुल दो अलग मिजाज़ की फ़िल्में ‘अर्धसत्य’ और ‘मंथन’ देखी थीं। पढ़ाई के दौरान जो एनर्जी होती है उसने एक-एक करके फ़िल्म की कहानी, पटकथा और संवादों के अलावा दृश्यों की तोड़-मरोड़, एनालिसिस जैसी चीजों में जाने का मौक़ा भी दिया। दोनों ही फ़िल्मों की पटकथा विजय तेंडुलकर की लिखी हुई हैं। इसी के बीच एक बार ‘आक्रोश’ भी देख डाली। तीनों ही फ़िल्मों ने जैसे भीतर एक क़िस्म की उथल-पुथल मचा दी। मैंने तब लाइब्रेरी जाकर एक-एक कर के सखाराम बाइंडर, घासीराम कोतवाल, ख़ामोश!अदालत जारी है, कमला, गिद्ध, अंजी, जाति ही पूछो साधु की, पंछी ऐसे आते हैं जैसे नाटक पढ़ लिए। रंगमंच से जुड़ा होने के कारण चार आधुनिक नाटककारों बादल सरकार, गिरीश करनाड, मोहन राकेश और विजय तेंडुलकर में आज हिसाब लगाने पर मुझे पता चल रहा कि विजय तेंडुलकर को ही सबसे ज़्यादा मैंने पढ़ा। पढ़ते वक़्त लगा था कि यह सब कुछ अतिरेक (मेलोड्रामा) है और समाज के जिस हिस्से के चरित्र और कहानियों को लिखा गया है वैसा समाज हमारा नहीं है। पर आज जब अपराध, संबंध और नैराश्य के जिन नए-नए तरीक़ों, चरित्रों के बारे में खबरों से सुबह के अख़बार रंगे होते हैं उसे देखकर विजय तेंडुलकर का लेखन अपने समय से आगे का नज़र आता है। किसी कला के लिए समय का अतिक्रमण उसके ‘क्लासिक’ होने पर मुहर है। विजय तेंडुलकर के काम का कालजयी होना इस रूप में सुखद है कि उसने नाट्यलेखन को शिखर पर पहुंचाया। फिर वही ‘ड्रामा’ उनके सिनेमा में भी आया। ऐसी नाटकीयता या ड्रामा जहां चरित्र का मानसिक स्तर और दिमाग उनकी पकड़ से अछूता नहीं। एक लेखक के रूप में चरित्र का गहन अध्ययन, बारीकी, विस्तृत ब्यौरे, धारदार सच्चाई, किरदार की मानसिक अवस्था, घटनाक्रम पर पकड़ आदि ने उनके लिखे नाटक और सिनेमा को विशिष्ट बनाया। दोनों ही में दूसरा विजय तेंडुलकर ढूँढना या पैदा होना लगभग असंभव है।   

    Aakrosh-1980 2

    विजय तेंडुलकर के नाटक और उनका सिनेमा ‘डिस्टर्बिंग’ है, विचलित करता है। कई बार मैंने सोचा कि क्या यह केवल मन के ऊपरी खोल को झकझोर रहा है? पर नहीं, वह अपनी पूरी सच्चाई के साथ नंगी तलवार की तरह खुला हुआ है। किन्तु-परंतु की गुंजाइश के बग़ैर। आज ही फिर से ‘आक्रोश’ देखी। उसका अंतिम दृश्य आँखों के आगे से जा ही नहीं रहा। लिखे हुए शब्द और दृश्य की ताक़त और उसका असर ऐसा है। ‘आक्रोश’ ही क्या... ‘अर्धसत्य’ के अनंत वेलणकर की घुटन, पीड़ा और उससे बाहर निकलने की उसकी युक्ति कितनी अनोखी है। आज से लगभग तीस-पैंतीस साल पहले के चरित्रों/घटनाओं और आज में फ़र्क केवल इस बात का रह गया कि उन फ़िल्मों और नाटकों में जाति आधारित समीकरणों के साथ घटनाक्रम दर्शाया गया है जबकि आज वही के वही हालात हर समुदाय, जाति में मौजूद हैं। विजय तेंडुलकर के भीतर का जीनियस समय के आगे का था और उसी धार के साथ आज भी खड़ा है। अपने आप को रोमेंटिसाइज़ करते-करते हम इन नाटकों और सिनेमा के सामने सर झुका के ही खड़े होते हैं। विजय तेंडुलकर का लेखन व्यवस्था से टकराहट का नहीं उसके रेशे-रेशे उधेड़ देने और सच को सामने रख देने का लेखन था। उनके अपने समाधान नहीं थे बल्कि खुले सिरे के समान पढ़ने और देखने वाले के विवेक पर छोड़े जाने वाले वो अहसास था जो किसी भी सूरत में सीधे दिल-दिमाग पर वार करते था। क्या वे स्वयं लिख लेने के बाद उस पीड़ा और रोष से उबर पाते होंगे? मुझे लगता है यही उनके लेखन का वो बिन्दु है जिसने उनकी कलम में पैनापन बरकरार रखा। उनके पढे एक इंटरव्यू में उन्होंने खुद कहा कि लिखने के दौरान उनके स्वयं के भीतर कुछ बड़ी बेचैनी घटती थी। इसी बेचैनी और असंतुष्टि ने उनसे कालजयी नाटक लिखवाये। किसी भी लेखन में शब्द की जो ताक़त होती है वो विजय तेंडुलकर के हर नाटक में है और उनके संवाद चरित्र के भीतर की जिस अवस्था को दर्शाते हैं उसका प्रभाव आज भी महसूस किया जा सकता है।

    Aakrosh

    ‘आक्रोश’ का ‘अर्द्धसत्य’ और बेचैनी

    मुझे लगता है विजय तेंडुलकर चरित्र के लेखक थे, घटनाओं के नहीं। घटनाक्रम चारित्रिक बहाव में एक के बाद एक सहज ही आते हैं। मसलन, ‘आक्रोश’ में लहण्या भीकू का चरित्र। लगभग दो घंटे बीस मिनट की फ़िल्म में मुश्किल से दो मिनट के संवाद इस चरित्र के हिस्से आए होंगे मगर ओम पुरी के रूप में भीकू का चरित्र ख़ामोश रहकर केवल अपनी आँखों से जो इज़हार करता है उतना ताकतवर किरदार और दृश्य हिन्दी सिनेमा में दुर्लभ है। भीकू का आक्रोश किस तरह निकलेगा यह अंतिम दृश्य तक पता नहीं लगता मगर फ़िल्म के साथ वो दर्शक के भीतर घुसा जा रहा है। भास्कर कुलकर्णी के रूप में नसीरुद्दीन शाह भीकू को न्याय दिलाने के लिए व्यवस्था से लड़ रहे हैं। कोर्ट की सुनवाई के दौरान और बहस आदि में भीकू सबकुछ देख-सुन रहा है। न्याय पर से उसका विश्वास पहले ही उठ चुका है। उसके और उसकी बीवी को बलात्कार के बाद गला घोंट कर मार देने के इल्ज़ाम में फाँसी की सज़ा होने के बीच में यह मुकदमा ही बचा हुआ है। न्याय और कानून की दलीलों के बीच भास्कर जैसे एक व्यक्ति को नहीं बचा रहा बल्कि पूरे सिस्टम से टकरा रहा है। बस कुछ ही क्षणों में फ़िल्म ख़त्म होगी और क्या भीकू को न्याय मिलेगा, यही एक सवाल चलता है दर्शक के मन में। और अंत से कुछ क्षण पहले भीकू अपना चुनाव कर लेता है। पिता की भी मृत्यु हो जाने के बाद उनके दाह संस्कार के दौरान ही परिवार में बची रह गई अपनी बहन को वह दुबारा अपनी पत्नी की तरह शिकार नहीं बनने देगा। कुल्हाड़ी के एक ही वार में वह समस्या ख़तम, जिसके चलते भीकू पहली बार गिरफ्तार हुआ था। इस दृश्य को लिख चुकने के बाद उन्हें पता था कि ‘आक्रोश’ का इज़हार हो चुका है और हर एक के भीतर छुपी हुई वासना और गुस्से का यह घिनौना चेहरा बेनकाब हुआ ही होगा। ‘आक्रोश’ 1980 में प्रदर्शित हुई थी और 1978 के घटनाक्रम अपनी कहानी में दर्शाती है। आज लगभग 40 साल बाद भी यह घटनाक्रम उतना ही ताज़ा और रेलेवेंट बना हुआ है। इतना कि इस वक़्त यह सोचकर लिखते हुए मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा है। भीकू की चुप्पी ही उसका समर्पण है। वह अपने अंजाम तक पहुँच चुका। उसका दिल उसी समय टूट चुका था जब समाज के भद्र कहे जाने वाले चार ठेकेदार उसके सामने उसकी बीवी की इज्ज़त लूट लेते हैं और भीकू कुछ नहीं कर पाता है। बाक़ी कसर लाठी और पैसे की वो ताक़त पूरी कर देती है जिसके सामने भीकू निहत्था और कमज़ोर रह जाता है। न केवल वह बल्कि उसका पूरा परिवार और उसके गाँव का हर व्यक्ति। सब चुप हैं। और जो चुप नहीं उसका अंजाम क्या हुआ उसे बताने की ज़रूरत भी नहीं।

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    ‘अर्धसत्य’ जिसने भी देखी है उसने सचमुच एक कमाल का सिनेमा देखा है। ओम पुरी के रूप में अनंत वेलणकर हिन्दी सिनेमा के सबसे प्रमुख चरित्रों में एक है। कमाल की बात यह है कि लगभग 30 सालों बाद भी अनंत जितना सशक्त चरित्र आज तक सिनेमा में नहीं आया है। मुझे सच कोई याद नहीं आ रहा। बहरहाल, ‘अर्धसत्य’ वैचारिक रूप से टकराहट, उलझन वाली और रहस्य से भरी फ़िल्म लगती है। क्या किसी समस्या का इस कदर समाधान हो सकता है? अपने आप में यह एक किरदार के ज़रिये बहुत उथल-पुथल और उत्पात मचाती है। ओम पुरी ने अपनी तरह से इस किरदार को जिया और अमर किया है। अभिनेता के क्राफ़्ट पर बहुत सी बात की जा सकती है पर बात पूरे सिनेमा के प्रभाव और उसके विचार की है। ‘अर्धसत्य’ की कहानी यूं तो किरदार की यात्रा पर टिकी है, यानि अनंत नाम के पुलिस अफ़सर की वैचारिक अस्त-व्यस्त ज़िंदगी जिसमें उसके बचपन से लेकर व्यवस्था से असंतुष्टि के बीज हैं। पर उसका द्वंद्व दिलीप चित्रे की इस कविता के बाद मुखर होता है जिसकी अंतिम पंक्तियों में इस किरदार की नियति है और इस फ़िल्म का पूरा विचार समाया हुआ है। “सोया हुआ आदमी / जब शुरू करता है चलना नींद में से उठकर / तब वह देख ही नहीं पाऐगा दुबारा सपनों का संसार / उस निर्णायक रोशनी में / सब कुछ एक जैसा होगा क्या? / एक पलड़े में नपुंसकता / दूसरे पलड़े में पौरुष / और तराजू के काँटे पर बीचों-बीच अर्धसत्य”। एकबारगी देखने पर यह एक अमूर्त कविता ही लगती है और इसके अपने इंटरप्रिटेशन पर ‘अर्धसत्य’ की कहानी। इसके एक छोर पर व्यक्ति है जो अपनी कमियों, ग़लतियों और द्वंद्व के बाद समष्टि तक पहुंचता है। अनंत के साथ इस सिनेमा को देखते हुए हम एक ऐसे तंत्र से टकराते हैं जो हमेशा से रहा है और शायद हमेशा ही रहेगा। तमाम लाचारियों, बेबसी और निर्णायक क्षण के ठीक पहले तक जूझना जैसे कोई सज़ा है। ‘अर्धसत्य’ देखने के बाद बहुत बेचैन करती है। एक ऐसे समय में जब गोली और बोली में चोली-दामन का साथ हो गया है, तब तो यह बात और सालती है। और बेचैनी

    मुझे लगता है विजय तेंडुलकर चरित्र के लेखक थे, घटनाओं के नहीं। घटनाक्रम चारित्रिक बहाव में एक के बाद एक सहज ही आते हैं। मसलन,

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    निश्चित रूप से तेंडुलकर का लेखक उस अहसास से घिरा रहता होगा होगा जिसने उसकी क़लम को समाज के अंधे

    फ़िल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, पुणे, से पटकथा-लेखन में स्नातक। लेखक, निर्देशक, कॉलमिस्ट, कवि, गायक, प्रशिक्षक, संपादक के रूप में सुदीप का कार्यक्षेत्र सिनेमा, नाटक, पत्रकारिता, कविता एवं आयोजनधर्मी के रूप में फैला है। भोपाल से प्रकाशित दैनिक ‘सुबह सवेरे’ में विश्व-सिनेमा पर साप्ताहिक कॉलम ‘सिनेमा के बहाने’ और इन्स्टाग्राम पर विशिष्ट गद्य लेखन के कारण भी पहचान।