•  डॉ. मनीष कुमार जैसल
    •  09 November 2020
    •  441

    "मिर्ज़ापुर के किरदारों ने मुझे अपनी पहचान दी है।"

    मिर्ज़ापुर वैब सीरीज़ के लेखक, क्रिएटर पुनीत कृष्णा से बातचीत।

    एमेज़ॉन प्राइम पर लम्बे समय के इंतज़ार के बाद मिर्ज़ापुर सीज़न-2 रिलीज़ हुआ है। सीरीज़ के पहले भाग के किरदार और संवाद दर्शकों और पाठकों के दिलों दिमाग़ में आज भी अलग छाप छोड़े हुए हैं। यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि किसी भी ऑडियो विजुअल कंटेंट (फ़िल्म, वैब सीरीज़, टीवी कार्यक्रम) का पहला निर्माता लेखक ही होता है, जिसका श्रेय उसे ज़रूर मिलना चाहिए। अच्छी बात ये है कि अब कोई भी फ़िल्म या वैब सीरीज़ देखते समय दर्शक के मन में भी ये ख़याल आने लगा है कि उसका लेखक कौन है।

    मिर्ज़ापुर सीज़न 2 के लेखक और क्रियेटर के साथ साथ डायलॉग सुपरवाइज़र पुनीत कृष्णा से हुई हमारी बातचीत में कई अहम ख़ुलासे हुए। वे सीज़न 1 के लेखक भी थें। पुनीत ने इस शो से जुड़े सभी सवालों के जवाब देने की कोशिश की। प्रस्तुत है कुछ अंश:

     

    मिर्ज़ापुर देखने वाले मिर्ज़ापुर वैब सीरीज़ लिखने वाले के बारे जानना चाहते हैंकुछ अपने बारे में बताइए।

    मैं उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूँ। सरकारी नौकरी की वजह से पिताजी का हर 2-3 साल में तबादला होता रहता था, इसीलिए उत्तर प्रदेश के भी कई अलग अलग हिस्सों में रहने का अनुभव मुझे प्राप्त हुआ है। इसके बाद ख़ुद की पढ़ाई और नौकरी के सिलसिले में भारत के भी कई हिस्सों में रहने का सुख मिला। अलग अलग लोगों से मिलने और उन शहरों की कहानियाँ मुझे सुनने समझने को मिली हैं। यही सुख और अनुभव मेरे लेखन में काफ़ी मदद करता है। 

     

    मिर्ज़ापुर वैब सिरीज़ (1 और 2) के किरदारों का जन्म कैसे हुआ?

    मुझे कहानियाँ कहने का शौक़ है। कई सालों पहले मेरी दिली इच्छा थी एक गैंगस्टर ड्रामा फ़िल्म बनाऊँ, लेकिन फिर अनुराग कश्यप की गैंग्स ऑफ़ वासेपुर बन गई। कमाल की फ़िल्म थी वह। लेकिन मुझे मलाल रह गया कि इस तरह की फ़िल्म लेखन में मुझे पहला होना था लेकिन चूक गया। मिर्ज़ापुर की कहानी पर पहले मेरा फ़िल्म बनाने का मन था लेकिन वक़्त की माँग ने एक और नया प्रयोग करने पर विवश किया। मेरी कहानी थोड़ी लम्बी थी और कई मज़बूत किरदार थे। ऐसे में मुझे फ़िल्म निर्माण के लिए अपनी कहानी में कई समझौते करने पड़ते वो यहाँ नहीं करने पड़े। वैब सीरीज़ बनाई और लोगों ने उसे पसंद किया। बात किरदारों के जन्म की करें तो यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है। लेकिन जब मैं जौनपुर में पढ़ रहा था तब दो भाई बाइक पर घूमा करते थे। टू ब्रदर्स ऑन अ बाइक विद गन का विजुअल मेरे दिमाग़ में था। मैंने इससे ही लिखने की शुरुआत की।

     

    पूर्वांचल आपकी नज़र में कैसा है? इसे ही क्यों चुना आपने लेखन के लिए?

    मैं बनारस और जौनपुर में लगभग 9 वर्षों तक रहा हूँ। बहुत क़रीब से इस जगह को समझा और महसूस किया है। भाषा, संस्कृति और लोगों को समझने का जो तजुर्बा  मेरे पास था वो मेरे फ़िल्म लेखन में काम आया। एक उदाहरण से इसे समझाऊँ तो अगर आप बनारस या पूर्वांचल कभी जाएँ और एक रिक्शे वाले से पूछे कि यहाँ चलोगे? तो वो अपने रौब, जिसे हम स्वैग भी कहते हैं, उसमें वो जवाब देगा कि नहीं जाना, मैं आराम कर रहा हूँ। तो भाषा के उस स्वैग और बोली में पहले से मौजूद मिठास ने मुझे मिर्ज़ापुर में काफ़ी मदद की। इसके अलावा बलिया, मिर्ज़ापुर, बस्ती और पूर्वांचल के आस-पास के जिलों के क्राइम की कहानियाँ भी हम सुना करते थे। हालाँकि ये एक तरह का लोगों का बनाया परसेप्शन था और उसी के आधार पर मुझे लगा कि कहानी पूर्वांचल में सैट हो सकती है। लेकिन ये कहानी हिंदुस्तान के किसी भी गाँव शहर में सैट हो सकती है। मिर्ज़ापुर या पूर्वांचल से इसका कोई कनैक्शन नहीं है। ये सिर्फ़ एक बैकड्रॉप मात्र है।

     

    सबसे मज़बूत किरदार आपकी नज़र में कौन सा है?

    देखिये, मज़बूत और प्रिय किरदार अलग अलग हो सकते हैं। पहले सीज़न में कंपाउंडर मेरे प्रिय किरदारों में से एक हैं। इसका कारण यह है कि भले ही वो हिंसात्मक प्रवृत्ति के थे लेकिन उनकी हिंसा के पीछे कोई ना कोई कारण ज़रूर होता था। अगर आपने मिर्ज़ापुर को अच्छे से देखा है तो आपको यह ज़रूर लगेगा कि मिर्ज़ापुर की दुनिया में कंपाउंडर ही ऐसा किरदार है जो बिना किसी एजेंडा के एक्शन ले सकता है।

    बीना का किरदार मुझे पसंद है। अवेयरनेस और जिस तरह मेंस वर्ल्ड की दुनिया में वो ख़ुद सरवाइव करने की कोशिश करती है वो अपने आप में अलग है। पार्ट 1 में बीना का किरदार भले ही अंत तक कमज़ोर हुआ हो लेकिन पार्ट 2 में एक नई ऊर्जा और स्फूर्ति के साथ वो परदे पर आता है। वसुधा, डिंपी, मुन्ना भैया ये सभी किरदार अपने आप में अनोखे हैं। सीधे शब्दों में कहूँ तो मिर्ज़ापुर के किरदारों ने मुझे अपनी पहचान दी है।

     

    वैब सिरीज़ के लेखन में क्या एक लेखक पब्लिक ओपिनियन को भी ध्यान में रखता है? पहले सीज़न में कोई किरदार दर्शकों को भा गया तो क्या उसे अगले सीज़न में जगह दी जाती है?

    मैं अगर इसे अपने अनुभव से कहूँ तो हमने अपने लेखन में ऐसा कभी नही किया। अगर किया होता तो मिर्ज़ापुर सीज़न 2 गालियों और सेक्स सींस से भरा पूरा होता।  हमने दर्शकों की पसंद के लिहाज़ से दूसरा सीज़न लिखा होता तो गोलियाँ गालियाँ आपको बैक टू बैक देखने को मिलती। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कहानी और किरदार को ध्यान में रखते हुए हमने दूसरा सीज़न बनाया है।

     

    मिर्ज़ापुर सीज़न 2 का कौन सा सीन आपको सबसे ज़्यादा पसंद है?

    वो सीन जब गुड्डू और डिंपी जब अपने घर माँ और पिता जी से मिलने आते हैं,मुझे बहुत पसंद है। गोलू जब पहली बार हिंसा करती है वो सीन मुझे पसंद है। इसके अलावा जब मुन्ना भैया, भरत त्यागी और शरद शुक्ला तीनों बैठे हुए बात कर रहे हैं। डाँस चल रहा है। आप उसे क़रीब से देखिए तो पता चलता है कि तीनों एक दूसरे का दोस्त होने का बहाना सा कर रहे हैं लेकिन कोई दोस्त है नहीं। तीनों अलग अलग साम्राज्य चलाते हैं, उन तीनों के पिता का व्यवहार अलग तरह का है। वह सीन मुझे बहुत पसंद है।

     

    ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर सेन्सरशिप की नीति पर आपकी क्या टिप्पणी है?

    यहाँ सीधे तौर पर यह समझने की ज़रूरत है कि जब फ़िल्म या वैब सीरीज़ का  चरित्र कोई बात करता है या कोई हरकत करता है तो हमें उस किरदार पर ज़्यादा ध्यान देना चाहिए। पिता पुत्र-पुत्री की कहानी है तो उसी के इर्द-गिर्द रह कर सोचने की ज़रूरत है। जब मैं इन चरित्रों पर लिखूँगा तो उसी को ध्यान में रखकर लिखूँगा। एक लेखक के तौर पर मैं अपने चरित्र के प्रति ईमानदार रहने की कोशिश करता हूँ। मिर्ज़ापुर के चरित्र क्रिमिनल्स हैं और एक ख़ास तरह के माहौल में पले बढ़े हैं तो उन्होंने बचपन से गालियाँ सुनी और बोली होंगी ही। अब फ़िल्म या वैब सीरीज़ लिखते समय उस पर गालियों को ध्यान में रखकर सेंसर किया जाएगा तो सवाल उठाने ही पड़ेंगे। मेरी अपनी राय ये हैं कि अगर कोई फ़िल्में या वैब सीरीज़ देखकर यह कह रहा हैं कि अमुक संवाद गालियाँ हैं तो इसका सीधा मतलब वो इन्हें जानता है और अगर कोई भी व्यक्ति गाली पहचानता है तो सीधी सी बात है यह समाज का हिस्सा है। फ़िल्में समाज का प्रतिबिम्ब ही तो होती हैं। बच्चन साहब ने अपने दौर में जिस तरह की फ़िल्में की हैं उन किरदारों को समाज में कोई स्वीकार नहीं करेगा इसके बावजूद फ़िल्में बनी हैं। सेन्सरशिप जैसी नीति का मैं खुलकर विरोध करता रहा हूँ और करता रहूँगा। काल्पनिक कहानियों को उसी तरह से देखा जाना चाहिए। हमारी मिर्ज़ापुर सीरीज़ में सैक्स सीन ज़रूर हैं लेकिन एक भी सीन ऐसा नही है जो कहानी को आगे नहीं बढ़ाता। मिर्ज़ापुर सीज़न 1 के फ़ैन्स को सैक्स और गालियों में बहुत मज़ा आया लेकिन इसके बावजूद हमने सीज़न 2 में इसे कम से कम रखने की कोशिश की। गुड्डू, मुन्ना भैया सभी के सींस आप देखिए, कहानी आगे बढ़ती ही दिखेगी।

     

    फ़िल्म में मुख्य पात्रों की संख्या सीमित होती है लेकिन वैब के लिए लेखन में सभी पात्रों पर लेखक बराबर मेहनत करते हुए दिखते हैं। कितना चुनौतिपूर्ण है ये काम?

    जी, ये इस नई विधा के लेखन में चुनौतियाँ तो हैं। क्योंकि फ़िल्म 2-3 घंटे में सिमट जाती है। चार-पाँच मुख्य कलाकारों के इर्द-गिर्द कहानी घूमती है लेकिन वैब के लिए  लेखन में सपोर्टिंग कास्ट नाम की कोई चीज़ नहीं है। जिस पर लेखक को कम मेहनत करनी पड़े। छोटे से छोटे किरदार पर भी उसी नज़र से लेखन करना पड़ता है जितना बड़े किरदार पर।

     

    ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म के लेखक को अपने नाम के लिए काफ़ी जद्दोजहद करनी पड़ती है। पुनीत कृष्णा इससे कैसे निपटने का प्रयास करते हैं?

    देखिए, समय बदल रहा है। और मुझे पूरी उम्मीद है लेखकों को प्राथमिकता दी जाने लगेगी। और थोड़ा क़रीब से देखिए तो इसके सकारात्मक रिज़ल्ट भी आपको देखने को मिलेंगे। एक लेखक आज के समय में अपना घर चला पा रहा है यह बड़ा परिवर्तन है। जहाँ तक कठिनाई की बात है वहाँ यह ज़रूर कहना चाहूँगा कि एक नए लेखक के लिए अपनी जगह बनाना उतना ही चुनौतिपूर्ण है जितना एक निर्देशक और अभिनेता के लिए।

     

    डायलॉग सुपरवाईजर के तौर पर काम करना कैसे हुआ? क्या आपको लगा किरदार जो बोल रहे हैं उस पर लेखक का कंट्रोल काम रहता है?

    नहीं। ऐसा बहुत कम होता है। मिर्ज़ापुर के साथ यह ख़ासियत रही कि टीम पूरी तरह परिपक्व थी। सभी किरदारों को अपना मिज़ाज ख़ुद ही पता था। एक्शन और डिक्शन पर मेरा फ़ोकस ज़रूर रहता है और इसके लिए लोग मुझे अड़ियल भी कह सकते हैं लेकिन टीम ने इस पर मेरा पूरा साथ दिया है। कई बार शूटिंग के दौरान संवाद बदले भी जाते हैं लेकिन वो सीन के अच्छे के लिए होता है । मिर्ज़ापुर-2 के शुरुआती सीन में गुरुभाई ने संवाद बदले भी हैं। मुझे वो सही लगे इसीलिए उनकी बात मानी।

     

    फ़िल्म लेखन/वैब सीरीज़ लेखन में कहानी, पटकथा और संवाद लेखन में आपको कौन-सा चरण सबसे अधिक पसंद आया?

    मिर्ज़ापुर की दुनिया में अगर बात करूँ तो जब हम पटकथा और संवाद दोनों एक साथ लिखने की स्टेज पर थे वो चरण मुझे काफ़ी पसंद आता था। एक्शन सीन में भी ड्रामा था यहाँ। इसीलिए बहुत मज़ा आता था।

     

    मिर्ज़ापुर के अलावा इन दिनों नया क्या लिख रहे हैं?

    फ़िल्में लिखने का प्रयास है। और जब फ़्री होता हूँ तो ख़ुद के लिए कहानियाँ लिखकर रख लेता हूँ। ना जाने उन्हें कहाँ बेचूँगा। ये निर्णय निर्माता ही लेंगे। लेकिन दरवाज़े खुले हैं मेरे लिए और इज़्ज़त भी मिल रही है।

     

    क्या आप मिर्ज़ापुर-3 पर काम शुरू कर चुके हैं?

    मैं इस पर ज़्यादा कुछ तो नही बोलना चाहता। क्योंकि जो इसके लिए आधिकारिक रूप से घोषणा करने वाले हैं वहीं करें। लेकिन हाँ इतना ज़रूर है कि काम चल रहा है। टीम काम कर रही है। किस गली में कहानी जानी है, कौन किरदार अंदर आएगा और कौन बाहर जाएगा इस पर मंथन शुरू है। इंतज़ार करें जल्द ही घोषणा हो सकती है।



    मिर्ज़ापुर सीज़न 2 को लेकर आलोचनात्मक प्रतिक्रियाएँ भी आयी हैं। आप क्या कहना चाहेंगे?

    देखिए, जो भी टिप्पणियाँ की गई हैं उन्हें यह समझना चाहिए कि मिर्ज़ापुर पूरी तरह से काल्पनिक कहानी है। लेखक की अपनी सोच है। इसका किसी स्थान या व्यक्ति से सीधा कोई लेना देना नहीं है। अगर किसी शहर के प्लॉट पर मैं प्यार आधारित कहानी लिखूँगा तो ज़रूरी नहीं कि पूरा शहर प्यार करे। वैसे ही किसी जगह पर क्राइम है तो ज़रूरी नही की पूरा शहर क्राइम में ही डूबा है। कहानी को कहानी की तरह देखा जाना चाहिए। रेकी पर भी जब हम गए मिर्ज़ापुर तो वहाँ के लोगों से बहुत दोस्ताना माहौल में रहकर जाना समझा। यह कहानी किसी भी तरह से मिर्ज़ापुर शहर पर कटाक्ष नहीं है। सिर्फ़ इसका नाम इत्तफ़ाक़न मिर्ज़ापुर है। इसका नाम बलिया, बैंगलोर की तरह कुछ भी हो सकता था।

     

    छोटे शहरों के उन युवाओं को जो फ़िल्म लेखन में अपना कैरियर बनाना चाहते हैं, क्या टिप्स देना चाहेंगे?

    बहुत ख़ूबसूरत इंडस्ट्री है हमारी। लेखकों के लिए ख़ूब इज़्ज़त और प्यार यहाँ मिलता है। जो भी युवा आना चाहते हैं खुलकर आएँ। पूरी तैयारी के साथ आएँ। किससे मिलना है, किस आइडिया के साथ मिलना है, सब कुछ प्रिपेयर होकर यहाँ रखें। प्रोड्यूसर को दुश्मन नहीं दोस्त मानकर चले। आपको लिखना है और प्रोड्यूसर को लिखवाना है। तैयारी के लिए ज़्यादा से ज़्यादा साहित्य पढ़ें, आस-पास के सामाजिक माहौल को समझे।

    डॉ. मनीष कुमार जैसल मंदसौर यूनिवर्सिटी, मध्य प्रदेश, में जनसंचार एवं पत्रकारिता के सहायक प्रोफेसर हैं । नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी नई दिल्ली के बुक फ़ेलो और सहपीडिया यूनेस्को के रिसर्च फ़ेलो भी रह चुके हैं। फ़िल्मकार मुजफ्फर अली पर किताब 'फिल्मों का अंजुमन: मुजफ्फर अली' प्रकाशित। सेंसरशिप और सिनेमा पर पीएचडी। नियमित आलेख और संगोष्ठियों में वाचन। संपर्क: mjaisal2@gmail.com