•  अजय ब्रह्मात्मज
    •  06 November 2020
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    स्वतंत्र भारत की पहली प्रतिबंधित फिल्म

    मृणाल सेन की ‘नील आकाशेर नीचे’ पर एक नज़र

    मुमकिन है शीर्षक बदल जाने और बंगाली में होने की वजह से महादेवी वर्मा के रेखाचित्र ‘वह चीनी भाई’ पर आधारित मृणाल सेन की फिल्म ‘नील आकाशेर नीचे’ के बारे में हिंदी में विमर्श नहीं हुआ है। यह स्वतंत्र भारत की पहली प्रतिबंधित फिल्म थी। हेमंत कुमार फिल्म के निर्माता थे। यह फिल्म 1959 में प्रतिबंधित हुई थी।

    सिनेमा और साहित्य के संबंधों पर हो रहे विश्वविद्यालयों के शोध, पाठ्यक्रम और अकादमिक लेखों में भी इस फिल्म का उल्लेख नहीं मिलता। महादेवी वर्मा ने इलाहाबाद में मिले चीनी भाई के बारे में उसका मार्मिक संस्मरणात्मक रेखाचित्र लिखा। इस रेखाचित्र में एक चीनी भाई जो सालों पहले चीन से बर्मा आ गया था, रोज़गार की तलाश में बर्मा से इलाहाबाद आकर फेरी का धंधा करता है। वह सिल्क कपड़े बेचता है। पहली ही मुलाक़ात में महादेवी वर्मा जब उसे मना करती हैं कि “कुछ नहीं लेना है, भाई!” वह ‘भाई’ संबोधन सुनकर अटक जाता है और पूरे विश्वास से कहता है “हमको भाय बोला है, तुम ज़रूर लेगा, ज़रूर लेगा- हाँ?” धीरे-धीरे लेखिका और चीनी का परिचय गाढ़ा होता है। लेखिका को चीनी भाई के प्रवासी जीवन की कहानी पता चलती है। कैसे वह अपनी बहन से बिछुड़ कर रंगून, फिर कलकत्ता और आखिर में इलाहाबाद पहुंचा है। लेखिका और चीनी भाई का भावनात्मक संबंध भरोसे और प्रेम के साथ आगे बढ़ता है। फिर एक दिन चीनी भाई सिल्क का पूरा गट्ठर उसे एक साथ बेचकर चीन की लड़ाई में शामिल होने के लिए लौटना चाहता है। स्वदेशी आन्दोलन में हिस्सा ले रही और स्वदेशी की हिमायती लेखिका की एक सहेली जब उस पर सिल्क रखने के लिए कटाक्ष करती है तो लेखिका चीनी भाई के बारे में नहीं बताती। वह भाई तो लेखिका के स्मृति पट पर अंकित है।

    महादेवी वर्मा के इस रेखाचित्र को मृणाल सेन ने फिल्म में रूपांतरित किया। उन्होंने कहानी की कथाभूमि इलाहबाद से बदल कर कलकत्ता कर दी। साथ ही चीनी चरित्र को वांग लू नाम दिया। फिल्म में लेखिका (महादेवी वर्मा) का नाम बसंती हो गया। वह कांग्रेसी कार्यकर्ता हो गयी। मृणाल सेन ने इसे चौथे दशक के कलकत्ता में चित्रित किया है। फिल्म में वांग लू बर्मा से नहीं, सीधे चीन से आया है। कपडे बेचने के सिलसिले में वह बसंती से मिलता रहता है। बसंती उसके प्रति स्नेह रखती है। वांग लू को अपना भाई मानती है।  

    20 फरवरी 1959 को रिलीज़ हुई ‘नील आकाशेर नीचे’ में एक चीनी और एक भारतीय के संबंध को मानवीय स्तर पर चित्रित किया गया है। उनके पति, सास और नौकर भी किरदार के तौर पर जुड़ जाते हैं। फिल्म की कहानी चीन के शानतुंग भी जाती है। फिल्म में दो-तीन फ़्लैशबैक में चीन की कहानी चलती है। वहां के जमींदार और बहन के ज़रिये हम वांग लू की पीड़ा से परिचित होते हैं। फिल्म में खूबसूरती के साथ चीन के तत्कालीन हालात को पिरोया गया है। तब जापान ने चीन के नानचिंग शहर पर भयानक हमला किया था। इस हमले का रवींद्रनाथ टैगोर ने विरोध किया था। उन्होंने जापान के कवि मित्र नागुची को पत्र लिखा था। उन्होंने लिखा था, “मैं उम्मीद करता हूँ कि आपके देश के लोग, जिन्हें मैं बहुत प्यार करता हूँ, सफल न हो पाएं और पश्चाताप करें।” वांग लू जापान के खिलाफ़ लड़ने के लिए लौटता है। मृणाल सेन ने चीन के संघर्ष और भारत की आज़ादी के संघर्ष को वांग लू और बसंती के साथ एक ज़मीन पर लाकर जोड़ा है।

     

    रेखाचित्र के अनुसार फिल्म में भी चीनी भाई बताता है कि वह फ़ॉरेनर नहीं है, वह तो चीनी है। उसकी चमड़ी गोरी नहीं है। उसकी आँखें नीली नहीं हैं। उसके कहने का आशय है कि वह अँग्रेज़ नहीं है। पिछली सदी के चौथे दशक में भारत और चीन लगभग एक जैसी स्थिति में थे और अपनी आज़ादी के सपने बुन रहे थे। भारत ने स्वतंत्रता और चीन ने मुक्ति की राह चुनी थी। दोनों के रास्ते अलग थे। भारत कांग्रेस के नेतृत्व में तो चीन कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में अपने नागरिकों को लामबंद कर रहा था। ‘नील आकाशेर नीचे’ में बगैर किसी भाईचारे के नारे के ही चीन के एक भाई और भारत की एक बहन के बीच एक रिश्ता बनता दिखाई देता है।

     

    यह फिल्म अवश्य देखी जानी चाहिए। ख़ासकर सिनेमा और साहित्य के शोधार्थियों के लिए यह ज़रूरी है। इसके साथ ही भारतीय फिल्मों में चीनी किरदारों के चित्रण के सन्दर्भ में यह ज़रूरी फिल्म है। यह फिल्म चीन के किरदार की पॉज़िटिव छवि रचने के साथ साथ हमदर्दी भी ज़ाहिर करती है। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच आई खटास ने सदियों के सांस्कृतिक संबंध को खट्टा कर दिया है। भारत-चीन युद्ध को भारत में चीन की धोखेबाजी के रूप में देखा जाता है। चीन ने कभी इस धारणा को समझने और मिटाने का प्रयास नहीं किया। ताज़ा स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। सीमा विवाद से वैमनस्य बढ़ा है। फिर से चीन भारतीय मीडिया और आम नागरिक के लिए एक दुश्मन देश हो गया है। कोविड-19 के प्रकोप के लिए चीन को दोषी माना जाता है, क्योंकि इस वायरस की शुरुआत चीन के वुहान शहर से हुई।

     

    निर्देशक मृणाल सेन की फ़िल्मी यात्रा 1955 से आरम्भ होती है। उनकी पहली फिल्म ‘रात भोरे’ थी। उत्तम कुमार और साबित्री चटर्जी अभिनीत इस फिल्म में उन्हें सराहना मिली। उनकी दूसरी फिल्म ‘नील आकाशेर नीचे’ पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। स्वतंत्र भारत में प्रतिबंधित यह पहली फिल्म थी। हालाँकि 3 महीने के बाद प्रतिबंध हटा लिया गया था। इस फिल्म की विशेष स्क्रीनिंग दिल्ली में हुई थी, जिसमें प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु और राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद भी आये थे। इस स्क्रीनिंग का आयोजन हेमंत मुखर्जी (कुमार) ने किया था। मुमकिन है कि उनके देखने के बाद फिल्म पर लगा प्रतिबन्ध समाप्त किया गया हो। फिल्म में व्यक्त कम्युनिस्ट विचार तत्कालीन सेंसर बोर्ड को सही नहीं लगे थे।  फिल्म में चीनी भाई वांग लू के बहाने भारतीय बसंती की चीन से हमदर्दी दिखाई गयी थी। दरअसल, 1957 की गर्मियों में लद्दाख के लामा और सांसद कुशल बकुला ने तिब्बत की निजी यात्रा में वहां जारी चीन की दमनकारी नीति को देखा था। उन्होंने तिब्बतियों की तकलीफ़ की चर्चा की थी। तिब्बत के दलाई लामा चाहते थे कि भारत उन्हें चीन से मुक्त कराये। लेकिन पं. जवाहर लाल नेहरु चीन से युद्ध नहीं चाहते थे। हाँ, उन्होंने दलाई लामा को भारत में शरण देने की सहमति दी थी। इसके बाद चीन ने तिब्बत में कड़ी निगरानी कर दी थी कि दलाई लामा भारत न जा सके। इस तनाव का भारत-चीन संबंध पर सीधा असर पड़ा था। 1958-59 तक भारत-चीन मैत्री की प्रगाढ़ता हलकी पड़ने लगी थी। इसी के मद्देनज़र चीन से हमदर्दी दिखाती फिल्म को सेंसर का शिकार होना पड़ा होगा। यह नेहरु की उदारता थी कि उन्होंने फिल्म को प्रदर्शित करने की अनुमति दी।

    इस फिल्म में चीनी किरदार वांग लू की भूमिका काली बनर्जी ने निभाई थी और बसंती की भूमिका में मंजू डे थीं। फिल्म में संगीत हेमंत कुमार ने दिया था और गीत गौरी प्रसन्न मजुमदार ने लिखे थे। इस फिल्म के शीर्षक गीत में गौरी प्रसन्न मजुमदार ने मनुष्यता के संत्रास और वेदना को शब्द दिए थे, जिसे हेमंत कुमार की आवाज़ ने प्रभावशाली बना दिया था। मजुमदार की पंक्तियों का भावार्थ है -

    ‘नीले आकाश के नीचे पृथ्वी और पृथ्वी के ऊपर आकाश को कभी गौर से देखा है।

    रात होते ही आकाश का गहरा नीलापन खो जाता है और नीचे धरती सो जाती है।

    तुम ने रात की नीरवता देखी है? क्या रात का रोना सुना है कभी? रुलाई भर जाती है हवाओं में।

    धीरे-धीरे ख़ामोशी से रात उतरती है। पृथ्वी की सारी हलचल और ज़िन्दगी रुक जाती है। रात थक जाती है तो सुबह जागती है।

    कभी इस वेदना का इतिहास सुना है? ओस की हर बूँद में टपकते मनुष्य के आँसू देखे हैं क्या?

    विशाल और असीमित आकाश के नीचे सोये मनुष्य की यंत्रणा और पीड़ा जागी है। छोटे लोगों की छोटी उम्मीदों का कोई हिसाब नहीं रखता।

    तुम ने कभी मनुष्य का रोना सुना है? सुनो, हवाओं में फैल गयी है रुलाई।’

     

    गीत के इन भावों में संसार के छोटे लोगों की तकलीफ़ और यंत्रणा के प्रति गीतकार और निर्देशक की गहरी हमदर्दी है। महादेवी वर्मा के संस्मरण की भावनात्मकता यहाँ सामाजिकता में बदलती दिखाई पड़ती है। मृणाल सेन के चरित्रों के निर्वाह और गठन में भावुकता के साथ ही सामाजिक परिप्रेक्ष्य भी रखा गया  है।

    यह फिल्म 133 मिनट की है।

    अजय ब्रह्मात्मज जाने-माने फिल्म पत्रकार हैं। पिछले 20 सालों से फिल्‍मों पर नियमित लेखन। 1999 से दैनिक जागरण और दैनिक भास्‍कर जैसे प्रमुख अखबारों के साथ फ़िल्म और मनोरंजन पर पत्रकारिता। चवन्‍नी चैप (chavannichap.blogspot.com) नाम से ब्‍लॉग का संचालन। हिंदी सिनेमा की जातीय और सांस्‍कृतिक चेतना पर फिल्‍म फेस्टिवल, सेमिनार, गोष्‍ठी और बहसों में निरंतर सक्रियता। फिलहाल सिनेमाहौल यूट्यूब चैनल (youtube.com/c/CineMahaul) और लोकमत समाचार, संडे नवजीवन और न्यूज़ लांड्री हिंदी में लेखन।