•  अजय ब्रह्मात्मज
    •  26 October 2020
    •  398

    “मेरे किरदारों के साथ मेरा रिश्ता प्रोफेशनल नहीं, पर्सनल होता है।”

    अजय ब्रह्मात्मज के सवाल, लेखकों के जवाब: कनिका ढिल्लों  

    2018 में आई अनुराग कश्यप की फिल्म ‘मनमर्ज़ियां’ कनिका ढिल्लों ने लिखी थी। उसके बाद उनकी ‘केदारनाथ’ और ‘जजमेंटल है क्या’ फ़िल्में आ चुकी है। उनकी ‘गिल्टी’ और ‘हसीन दिलरुबा’ जल्द ही रिलीज़ होंगी। इन दिनों वे राजकुमार हिरानी की फिल्म लिख रही है।

    जन्मस्थान: अमृतसर

    जन्मतिथि: 24 अगस्त

    शिक्षा-दीक्षा: स्नातक। सेंट स्टीफेंस कॉलेज, दिल्ली। मीडिया कम्युनिकेशन में मास्टर, लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स, लंदन।

    लेखन प्रशिक्षण और अभ्यास?

    मैंने काम करते हुए ही सीखा और अभ्यास किया। पढ़ाई के दौरान खेलने से ज़्यादा मेरी रुचि पढ़ने में थी। मेरी मां अंग्रेजी की प्रोफेसर हैं। शुरू से मेरी इच्छा लेखक बनने की थी। दसवीं कक्षा में मैंने लिखने के उद्देश्य से पढ़ाई पढ़ाई और अभ्यास शुरू कर दिया था। मेरे दिमाग में यह बात बैठ गई थी कि मुझे कहानियां ही लिखनी हैं। उपन्यास से मैं शुरू करना चाहती थी। एक उपन्यास लिखा भी। फिल्मों का भी बहुत शौक था। फिर यह बात भी दिमाग में आई कि सिनेमा के लिए कहानियां लिखनी चाहिए।

     

    आप मुंबई कब पहुंची?

    2007 में ‘ओम शांति ओम’ के समय आ गई थी मुंबई।  

     

    कहानी लिखने का विचार कैसे आया? पहली कहानी कब लिखी थी? वह कहीं छपी थी या कोई और उपयोग हुआ था?

    पहली कहानी मैंने 15  साल की उम्र में लिखी थी। तब मेरी कहानियां स्कूल मैगज़ीन और शहर की पत्रिकाओं में छपने लगी थीं। हर कहानी में अपना नाम देख कर खुश होती थी। उन्हें देखकर जोश भी मिलता था कि और लिखो। सेंट स्टीफेंस से पढ़ाई खत्म करने तक मैंने कहानियों का एक संकलन लिख लिया था। कथा ने उसे प्रकाशित भी किया था। उसके बाद मेरा इरादा पक्का होता चला गया। फिर लंदन में मास्टर करते समय खयाल आया कि क्यों न फिल्मों के लिए लिखा जाए? तब मैंने सोचा कि अगर फिल्मों के लिए लिखना है तो किसी सेट या प्रोडक्शन हाउस में ज्वाइन कर लिया जाए। समझ तो लूं कि सिनेमा बनता कैसे है? कहानियां बनती कैसे हैं? पन्नों से पर्दे पर तक कैसे जाती है कोई कहानी? यही सोचा कि जो लोग काम करते हैं, उनके साथ रहते हुए सीखूंगी तो मीडियम समझ जाऊंगी। वह मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण सबक होगा। मुंबई आकर मैंने रेड चिलीज़ ज्वाइन किया। वहां काम करते हुए मैंने जाना कि सिनेमा की भाषा क्या होती है? रेड चिलीज़ की ‘ओम शांति ओम’ और ‘बिल्लू बार्बर’ में मेरी ट्रेनिंग हुई। उस समय मैंने बहुत कुछ सीखा और समझा। उस दौरान मैंने एक किताब भी लिखी ‘बॉम्बे डक इज अ फिश’। लेखक के तौर पर किताब छपती है तो उससे एक क्रेडिबिलिटी आती है। हौसला बढ़ता है। इरादा पक्का होता है कि हां, आगे बढ़ सकते हैं। सही दिशा में जा रहे हैं। इसके साथ ही मुझे लग रहा था कि फिल्मों का मीडियम भी मेरी समझ में आ गया है।

     

    आरंभिक दिनों में किस लेखक ने प्रभावित किया? कोई कहानी या रचना, जिसका ज़बरदस्त असर रहा?

    मुझे थॉमस हार्डी का उपन्यास ‘टेस ऑफ़ द डी’उबरविलेस’ ने बहुत प्रभावित किया। इसी उपन्यास पर ऋषि कपूर और माधुरी दीक्षित की फिल्म ‘प्रेमग्रंथ’ बनी थी। इस उपन्यास की भाषा बहुत सिनेमाई है। साहित्य में मेरी पसंद किसी एक विधा तक सीमित नहीं है। अमृता प्रीतम, झुम्पा लाहिरी को पढ़ती रही हूं। मां की वजह से बहुत ही विविध अनुभव रहा है। पढ़ने को मैंने मुराकामी भी पढ़ा है। कुछ भी पढ़ने के बाद अगर किरदार मेरे साथ रह जाते हैं तो वह साहित्य मुझे ज़्यादा अच्छा लगता है।

     

    पहली फिल्म या नाटक या कोई शो, जिसकी कहानी ने सम्मोहित कर लिया?

    मुझ पर ज़्यादा प्रभाव किताबों और साहित्य का ही रहा है। नाटक मैंने कम देखे हैं। फिल्में मेरे जीवन में बाद में आई हैं।

     

    आप का पहला लेखन जिस पर कोई फिल्म, टीवी शो या कोई और कार्यक्रम बना हो?

    ‘मनमर्ज़ियां’ मेरी पहली स्वतंत्र फिल्म है। उसके बाद ‘केदारनाथ’, फिर ‘जजमेंटल है क्या’। अभी ‘गिल्टी’ और ‘हसीन दिलरूबा’ पूरी हो गयी है। आजकल राजकुमार हिरानी के लिए लिख रही हूं।

     

    ज़िन्दगी के कैसे अनुभवों से आप के चरित्र बनते और प्रभावित होते हैं? उन्हें गढ़ने की प्रक्रिया पर कुछ बताएं?

    मुझे तो यही लगता है कि मेरे सारे किरदार जाने-पहचाने से हैं। मेरी फिल्मों के किरदार मेरी जिंदगी या मेरे अपनों की जिंदगी से ही जुड़े रहते हैं। मैं बहुत बाहर निकल कर नहीं लिख पाती। मेरे किरदारों की जड़ें मेरे ही यथार्थ में रहती हैं। मैं खुद को अपने किरदारों के बहुत करीब पाती हूं, क्योंकि मैं उन्हें उनकी पैदाइश से जानती हूं। सारे किरदार मुझे अपने परिवार का हिस्सा लगते हैं। मेरे साथ चल कर ही वे दुनिया में आए हैं। उनसे मेरा बहुत ही पर्सनल रिश्ता होता है। यहां तक कि मैं उन्हें निभा रहे कलाकारों से भी एक बॉन्डिंग महसूस करती हूं। उन्होंने ही मेरे किरदारों में जान डाली होती है। अभी तक मुझे यही लगता है कि मेरे किरदारों के साथ मेरा कोई प्रोफेशनल रिश्ता नहीं होता है। सब कुछ पर्सनल होता है।

     

    क्या आप अपने चरित्रों की जीवनी भी लिखती हैं?

    मेरे लिए यह समझना बहुत ज़रूरी है कि मेरे किरदार हैं कौन? वे अच्छे दोस्त की तरह है या दुश्मन की तरह है? किरदार को समझने के लिए यह लिखना पड़ता है कि वह कहां से आता है? क्या सोचता है? क्यों सोचता है और ऐसे क्यों बना? उसके साथ क्या-क्या हुआ होगा? इस सिचुएशन में वह ऐसे क्यों रिएक्ट कर रहा है? इन बातों का जवाब तो मुझे खोजना ही पड़ता है। बिल्कुल उन दोस्तों की तरह, जिन्हें आप जान जाते हैं तो उनके बारे में हर जानकारी आपके पास रहती है। दोस्तों के बारे में हमें पता रहता है कि वह क्यों इतना खुश रहता है? क्यों इतना दुखी रहता है? या क्यों उसे गुस्सा आता है? उसके जीवन के अनुभव कैसे हैं? उसका बचपन कैसा बीता? उसके मां-बाप कैसे थे? उसकी परवरिश कैसे हुई? पूरी बायोग्राफ़ी मेरे दिमाग में तो बन ही जाती हैं।

     

    अपने चरित्रों के साथ आप का इमोशनल रिश्ता कैसा होता है?

    सबके साथ मेरे पर्सनल रिश्ते होते हैं। बॉबी हो या मंसूर। वे सभी मुझे अपनी ज़िंदगी का एक हिस्सा ही लगते हैं। यहां तक कि जो निर्देशक उन्हें निर्देशित करते हैं या जो एक्टर उन्हें निभाते हैं, उनके साथ भी मेरा एक भावनात्मक रिश्ता होता है।

     

    क्या कभी आप के चरित्र ख़ुद ही बोलने लगते हैं?

    दृश्यों और पन्नों में बोले तो ठीक है। पन्नों के बाहर बोलने लगते हैं तो दिक्कत होती है। किरदार गढ़ लिए जाने के बाद उनकी आवाज़ होती है। और उन्हें सुनना पड़ता है। बोलने का मतलब उनकी आवाज सुनाई नहीं पड़ती है, लेकिन वे रास्ता बताते हैं, विचार देते हैं।

     

    स्क्रिप्ट लिखने के तीन चरणों कहानी, पटकथा और संवाद में कहां अधिक आनंद आता है?

    मुझे तो लेखन के तीनों ही चरण मुश्किल और आनंददायक लगते हैं। मैं सब कुछ साथ-साथ लिखती हूं। पहले कहानी बनती है, कहानी से पटकथा तैयार होती है और पटकथा से ही संवाद आने लगते हैं। मेरे लिए यह प्रक्रिया बहुत ही मिश्रित है। मैं पटकथा और संवाद साथ में ही लिखती हूं।

     

    कभी अपने निजी अनुभव से बाहर के किरदार मिल जायें तो क्या आप आसानी से लिख सकती हैं?

    जी, बिल्कुल। मेरी अभी एक फिल्म आ रही है ‘हसीन दिलरूबा’। यह एक क्राइम-थ्रिलर-रोमांस है। मैं अभी तक तो जेल गई नहीं हूं और ना कोई अपराध किया है। वह फिल्म भी मैंने बहुत प्यार से लिखी है।

     

    दिन के किस समय लिखना सबसे ज़्यादा पसंद है? कोई ख़ास जगह घर में फिल्म लिखने के लिए? कभी शहर भी छोड़ा है?

    लिखने का मेरा कोई रूटीन नहीं है। लिखने के मेरे दिन होते हैं। चार-चार पांच-पांच दिन लगातार बैठी लिख सकती हूँ। फिर हो सकता कि पांच दिन बिल्कुल ना लिखूं। हर स्क्रिप्ट का मेरा एक साइकल बनता है। कभी-कभी तो पूरा दिन में लिखती रहती हूं और फिर ऐसे भी दिन आते हैं, जब कुछ नहीं लिखती। घर में मेरा कोई वर्क-स्टेशन नहीं है। कोई एक जगह निश्चित नहीं है। मैं जगह बदल-बदल कर लिखती हूं, क्योंकि मैं लंबे समय तक लिखती हूँ, इसलिए तीन-चार घंटे पर जगह बदलती रहती हूँ। स्क्रिप्ट लिखने के लिए अभी तक मैं कभी बाहर नहीं गई हूं। मुझे इसकी ज़रूरत नहीं लगती। लेखन के लिए फिजिकल लोकेशन नहीं, मेंटल लोकेशन बदलने की ज़रूरत होती है।

     

    कभी ‘राइटर्स ब्लॉक’ से गुज़रना पड़ा? ऐसी हालत में क्या करती हैं?

    मुझे तो हर चार-पांच दिन पर ब्लॉक होता है तो फिर मैं लिखती ही नहीं हूं। मैंने पहले ही कहा कि मैं चक्र में लिखती हूं। चार-पांच दिन लिख दिया तो फिर चार-पांच दिन बिल्कुल नहीं लिखा। अभी तक तो ऐसा नहीं हुआ है कि एक ही पन्ने पर अटके हुए हैं और समय बीता जा रहा है। मुझे इसका डर ज़रूर होता है कि कभी राइटर्स ब्लॉक हुआ तो क्या करूंगी?

     

    लेखकों के बारे कौन सी धारणा बिल्कुल ग़लत है?

    अपने यहां माना जाता है कि लेखकों का हमेशा कोई आउटलुक होना चाहिए। उन्हें इंटेलेक्चुअल होना चाहिए। लेखक की एक छवि बनी हुई है। मोटा चश्मा, खादी का कुर्ता आदि। जितना मोटा चश्मा और कुर्ता, उतना गंभीर लेखक। यह पुराने समय से चलता आ रहा है। यह धारणा गलत है। लेखक को बक्से में मत डालिए। यह धारणा ग़लत है कि लेखक बंद कमरे में अंधेरे में बैठकर लिखता रहता है। पहले लेखकों को अलग-थलग करके रख दिया जाता था। हमारे समय में स्थितियां बदल गई हैं। हमारी आवाज़ जो पन्ने पर आती है, अब उसका एक चेहरा भी होता है।

     

    लेखक होने का सबसे बड़ा लाभ क्या है?

    लेखक अपनी काल्पनिक दुनिया में खोया रहता है। कई बार वह गुमशुदा रहता है। मैं कई बार समय देकर भूल जाती हूं तो मैं बहाना बना लेती हूं कि यार, मैं भूल गई। याद ही नहीं रहा। लोग भी मान लेते हैं कि राइटर है, भूल जाती है। वैसे भी लेखकों का रियल लाइफ के बारे में धुंधला फोकस होता है। व्यवहारिक जिंदगी में मेरे आस-पास के लोग मुझ से शिकायत करते हैं कि ना तो तू समय की पाबंद है और ना टाइम का सेंस है। टाइम मैनेजमेंट नहीं कर पाती हो तुम।

     

    अपने लेखन करियर की अभी तक की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मानती हैं?

    अभी तो मुझे बहुत काम करना है। अभी तो बस शुरुआत की है।

     

    कई बार कलाकार दृश्य और संवादों में बदलाव करते हैं। क्या यह उचित है?

    शुरू में मुझे बहुत बुरा लगता था।  ऐसा लगता था कि किसी ने हाथ काट दिया हो। मेरी पृष्ठभूमि तो किताबों की थी। वहां जो लिखते हैं, वही छपता है। कोई काट-छांट नहीं होती। वहां किसी का हस्तक्षेप नहीं होता है। धीरे-धीरे यह बात समझ में आ गई कि अगर कोई शब्द या वाक्य किसी कलाकार के साथ नहीं जा रहा है, तो उसे बदल देने में कोई दिक्कत नहीं है। अनुभव से ही मुझे इसकी ऑर्गेनिक क्वालिटी समझ में आई। मैं हमेशा अपनी फिल्मों के सेट पर रहती हूं। अचानक की गई तब्दीली कहानी को बेहतर ही करती है। कलाकार या निर्देशक की मदद मिल जाती है तो स्क्रिप्ट खिल जाती हैं।

     

    लेखन एकाकी काम है। अपने अनुभव बताएं।

    बिल्कुल सही बात है कि लेखन एकाकी काम है। निर्देशन में आपके साथ टीम रहती है। बाकी कामों में भी आपकी मदद के लिए लोग रहते हैं, लेकिन लिखना तो बिल्कुल अकेले का काम ही है। हम तो इस दुनिया को अकेले ही बनाते हैं, जिसे मारना होता है, मारते हैं, जिसे जिलाना होता है, जिलाते हैं। किरदारों के जीवन का फैसला तो हम ही करते हैं। लिखने के समय जरूर खुद को दुनिया से काटना पड़ता है। ढेर सारी बातें दिमाग में रहेंगी तो एकाग्रता नहीं बनेगी।

     

    फिल्मों में आप के आदर्श लेखक कौन हैं?

    आदर्श लेखक अभिजात जोशी और हिमांशु शर्मा हैं। सलीम-जावेद तो स्थायी पसंद हैं।

     

    लेखकों की स्थिति में किस बदलाव की तत्काल ज़रुरत है?

    मैं सुनती रही हूं कि कई सालों से लेखकों को क्रेडिट नहीं मिल पाता था। पैसे नहीं दिए जाते थें। मैं जब से इस फ़ील्ड में आई हूं मुझे तो अच्छा अनुभव रहा। चाहे वह आनंद एल राय हों या एकता कपूर हों या राजकुमार हिरानी हों। मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि क्रेडिट नहीं दिया गया। पैसा नहीं दिया गया। प्लैटफ़ॉर्म नहीं दिया गया। मेरा ख़ुद का अनुभव अच्छा रहा है लेकिन बाकी लोगों को भी ऐसा ही अनुभव हो तो अच्छा होगा। मुझे मालूम है कि कई टैलेंटेड राइटर्स को प्लैटफ़ॉर्म नहीं मिल पाया है। फिल्मों में मौका मिलना बहुत ज़रूरी है। मौका ही नहीं मिलेगा तो टैलेंट कहां से दिखाएंगे? मैंने भी अपने हिस्से का थोड़ा संघर्ष किया है। ‘मनमर्ज़ियां’ मुझे आसानी से नहीं मिली थी। शुरुआत के सारे डर मेरे साथ भी थें। मैं हमेशा इन मुद्दों पर आवाज़ उठाती रही हूं। आगे भी उठाती रहूंगी। अब तो मुझे लगता है कि लेखकों को आगे बढ़कर शेयर लेना चाहिए। अपने काम पर अधिकार रखना चाहिए।

     

    साहित्य और सिनेमा के रिश्तों पर क्या कहेंगी?

    हाल ही में मैंने एक किताब पढ़ी ‘लिटिल वुमन’। उस पर एक फिल्म भी बनी और उसे ऑस्कर भी मिला। बिल्कुल साहित्य पर सिनेमा बनना चाहिए। अगर किताबों को स्क्रीन में बदला जाए और उसे लोगों तक पहुंचाया जाए तो उसे और दर्शक मिलेंगे। साहित्य में हमेशा कोई ना कोई सीख होती है। ऐसी कहानियां पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाई जानी चाहिए। मेरा मानना है कि सिनेमा को लिटरेचर से कहानियां लेनी चाहिए। यह शिकायत बनी ही रहेगी कि पन्ने से पर्दे तक आने में चीज़ें बदल जाती हैं। पढ़ते समय आपने जो कल्पना की होगी, ज़रूरी नहीं है कि लेखक भी उसी कल्पना के साथ फिल्म बनाई हो।

     

    अपनी फिल्मों में गानों और इंटरवल के सिचुएशन आप तय करती हैं या कोई और?

    गानों और इंटरवल के सिचुएशन अभी तक तो हम ही तय कर रहे हैं। आप शुभ शुभ बोलिए।

     

    इन दिनों क्या लिख रही हैं?

    अभी मैं राजकुमार हिरानी की फिल्म ख़त्म कर रही हूँ। बाकी दो फिल्मों का काम चल रहा है। एक और बड़ी फिल्म है, जिसका अनाउंसमेंट जल्दी होने वाला है।

     

    आप कौन सा सॉफ्टवेयर इस्तेमाल करती हैं और आप की भाषा क्या रहती है?

    मैं फाइनल ड्राफ्ट का इस्तेमाल करती हू। मैं अंग्रेजी में विवरण लिखती हूं और हिंदी में संवाद लिखती हूँ।

     

    क्या निर्देशन में भी जाने का इरादा है?

    अभी तक तो मुझे लिखने में मज़ा आ रहा है। फिर भी अगर कभी कोई ऐसा मौका मिला तो क्यों नहीं?

     

    फिल्म लेखन में आने की इच्छुक प्रतिभाओं को क्या सुझाव देंगी?

    फिल्मों में आ रहे लेखकों से कहूंगी कि वे ढीठ बनकर आयें। बहुत सारे लोग आपको ऐसे मिलेंगे जो आपको कहेंगे कि आप लिख नहीं सकते। मेरी पहली किताब आई थी तो शोभा डे ने लिखा था कि इस लेखिका को क़लम नहीं उठानी चाहिए। उस समय तो मैं शुरुआत कर रही थी। मेरे लिए तो शोभा डे रोल मॉडल थी। उन्होंने ऐसा लिख दिया था कि क़लम छोड़ देनी चाहिए। अगर दूसरी कोई लेखिका रहती तो शायद क़लम छोड़ ही देती। पक्के इरादे के साथ आना चाहिए और किसी के कुछ कहने से बंद नहीं करना चाहिए। सच कहूं तो उस समय शोभा डे का रिव्यू पढ़ने के बाद एक साल तक हिम्मत नहीं हुई थी कि मैं किसी को क्या कहानी सुनाऊं। बाद में ख़ुद को समझाया कि यह एक व्यक्ति की सोच है और उसकी सोच मेरी सोच पर कैसे हावी हो सकती है? अपनी आलोचना को सही परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए। रिजेक्शन मिलेगा। शुरू में बहुत ज़्यादा मिलेगा। ‘मनमर्ज़ियां’ के पहले मेरी कई स्क्रिप्ट रिजेक्ट हो चुकी हैं।

    अजय ब्रह्मात्मज जाने-माने फिल्म पत्रकार हैं। पिछले 20 सालों से फिल्‍मों पर नियमित लेखन। 1999 से दैनिक जागरण और दैनिक भास्‍कर जैसे प्रमुख अखबारों के साथ फ़िल्म और मनोरंजन पर पत्रकारिता। चवन्‍नी चैप (chavannichap.blogspot.com) नाम से ब्‍लॉग का संचालन। हिंदी सिनेमा की जातीय और सांस्‍कृतिक चेतना पर फिल्‍म फेस्टिवल, सेमिनार, गोष्‍ठी और बहसों में निरंतर सक्रियता। फिलहाल सिनेमाहौल यूट्यूब चैनल (youtube.com/c/CineMahaul) और लोकमत समाचार, संडे नवजीवन और न्यूज़ लांड्री हिंदी में लेखन।