•  अजय ब्रह्मात्मज
    •  19 November 2020
    •  580

    “लेखकों के लिए एक न्यूनतम राशि तय किया जाना ज़रूरी है।”

    अजय ब्रह्मात्मज के सवाल, लेखकों के जवाब: अतुल तिवारी

    थिएटर के लम्बे प्रशिक्षण, लेखन और अभ्यास के बाद अतुल तिवारी फिल्म लेखन से जुड़े और अपना ख़ास मुक़ाम हासिल किया। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और व्यक्तित्वों पर उन्होंने कुछ चर्चित फ़िल्में और टीवी शो लिखे हैं। इन दिनों वे संग्रहालयों के लिए भी लेखन कर रहे हैं, जिसमें कॉन्सेप्ट के साथ स्क्रिप्ट लिखनी होती है। अतुल तिवारी ने फिल्मों के साथ कुछ नाटक लिखे हैं और उनका निर्देशन भी किया है। इन दिनों वे एक बायोपिक का लेखन कर रहे हैं। पूर्व में एसडबल्यूए की एक्ज़ेक्यूटिव कमेटी के सदस्य भी रहे हैं।  

     

    जन्मस्थान: लखनऊ, उत्तर प्रदेश।

    जन्मतिथि: 20 दिसंबर, 1958

     

    शिक्षा दीक्षा: लखनऊ से स्नातक। फिर भारतेंदु नाट्य अकादेमी, लखनऊ, एनएसडी और फिर जर्मन नैशनल थियेटर वायमार (जर्मनी), बर्लिन में अनसामबेल, बर्टोल्ट ब्रेख्त के थिएटर ग्रुप में प्रशिक्षण।

     

    लेखन का प्रशिक्षण और अभ्यास?

    स्कूल के दिनों से शुरु हो गया था। 10 साल की उम्र में रेडियो से जुड़ गया था और नाटक किया करता था। रेडियो से रिश्ता बन गया। वहां हर तरह के काम करता था। 12 साल की उम्र में रेडियो एंकर बन गया था मैं। बाल संघ प्रोग्राम किया करता था। रविवार को 9:45 से 10:30 तक। घर में मेरे दादाजी आनंदी दिन तिवारी लेखक थे। पिताजी कॉमरेड शंकर दयाल तिवारी भी लेखक थे। वे राजनीतिक लेख लिखते थे। वहां मेरे घर पर एक अद्भुत लाइब्रेरी थी। लाइब्रेरी का मतलब रैक पर रखी कुछ किताबें नहीं थीं। पूरा एक कमरा समर्पित था पुस्तकों के लिए। हाई स्कूल के दिनों में ही सत्यजीत रे की फिल्म ‘शतरंज के खिलाड़ी’ की शूटिंग में हो आया था। और मेरी हिम्मत देखिए कि 11वीं कक्षा की उम्र में जाकर उनसे मिल आया था। उनसे मिलकर मैंने कहा था कि सर आपके साथ काम करना है। उन्होंने अपने प्रॉडक्शन इंचार्ज श्रीवास्तव से कहा कि इस लड़के को सैट पर लेकर आना। शूटिंग देखने के साथ मैं उनकी स्क्रिप्ट में भी झांक कर देखता था। उनके स्क्रिप्ट में थंबनेल स्कैचेज़ बने रहते थे। आज की शब्दावली में कहे तो ‘स्टोरी-बोर्ड’ बना रहता था। यह 1975 की बात है। उस समय मैंने एक स्क्रिप्ट लिख मारी थी। उसका स्टोरीबोर्ड अपने एक पेंटर दोस्त से करवाया था। कह सकते हैं कि फिल्म राइटिंग का भूत चढ़ गया था। थिएटर तो कर ही रहा था। थिएटर के सारे काम किया करता था। एक्टिंग के लिए ज्यादा मौके नहीं थे। 15 साल की उम्र में ही बीएनए का  वर्कशॉप कर लिया था। राज बिसारिया साहब ने मुझे चुन लिया था। मेरे प्रथम गुरु वही थे थिएटर के। नैशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के दिनों में मैंने शेक्सपियर के नाटकों का अनुवाद किया था। वह बहुत बड़ी उपलब्धि और धृष्टता थी। मैंने ‘टेंपेस्ट’ का अनुवाद ‘तूफ़ान’ नाम से किया था। उसका मंचन हुआ था। तब मैं सेकंड ईयर में था। उस नाटक में थर्ड ईयर और एक्टिंग स्पेशलाइजेशन क्लास के छात्र एक्टिंग कर रहे थे। अनुवादों से मैंने बहुत कुछ सीखा। नए लेखकों से मैं कहूंगा कि वे अनुवाद किया करें अभ्यास के लिए। अनुवाद करना लगभग ऐसा ही है कि जैसे घड़ीसाज अपने बच्चे को घड़ी खोलना सिखाता है। घड़ी बनाना तो बाद में आता है।

     

    मुंबई कब आये?

    पहली बार 1989 में। फिल्म लिखकर लौट गया था। बाद में 1992 में आया तो यहीं का हो गया।

     

    आरंभिक दिनों में किस लेखक ने प्रभावित किया? कोई कहानी या रचना, जिसका ज़बरदस्त असर रहा?

    घर की लाइब्रेरी से टॉलस्टॉय, गोर्की, इरविंग स्टोन आदि विदेशी लेखकों को पढ़ा था। हिंदी में निस्संदेह प्रेमचंद रहे। घर में मानसरोवर की सारी प्रतियां थी। क्रांतिकारियों का साहित्य पढ़ता था। तब की पढ़ाई मेरे ऐतिहासिक फिल्मों के लेखन में काम आई। 

     

    आपका पहला लेखन जिस पर कोई फिल्म, टीवी शो या कोई और कार्यक्रम बना हो?

    मुझे सुधीर मिश्रा ने बुलाया था मुंबई। उनसे मेरी मित्रता एनएसडी के दिनों में हुई थी। हम दोनों के परिवार एक-दूसरे को पहले से जानते थे। हम लोग एक ही जिले के रहने वाले हैं। उनके नानाजी मेरे ही गांव के थे। सुधीर मिश्रा की पूर्व पत्नी सुष्मिता मुखर्जी मेरी बड़ी अच्छी दोस्त थी। हमारे बीच परस्पर सम्मान बढ़ता गया। सुधीर ने जब पहली फिल्म ‘यह वह मंजिल तो नहीं’ बनाई तो मुझे उसके संवाद लिखने के लिए बुलाया। उस फिल्म के साथ ही मुंबई और फिल्म इंडस्ट्री से मेरा जुड़ाव शुरू हुआ। फिर धारावाहिक ‘कब तक पुकारूं’ के लिए उन्होंने मुझे मुंबई बुला लिया। 1989 में जब मैं आया था तो श्याम बेनेगल से मुलाकात हुई थी। फिर उनके लिए मैंने ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ लिखा।

     

    ज़िन्दगी के कैसे अनुभवों से आप के चरित्र बनते और प्रभावित होते हैं?

    फिल्मों के सारे चरित्र दो चीजों से ही बनते हैं। एक हमारा अनुभव होता है, दूसरी हमारी कल्पना होती है। मेरे अनुभव ही किसी न किसी चरित्र में दिख जाते हैं। एक कहावत है कि लेखक जिन लोगों को जानता है, उन्हें ही बेचता है। मैंने अपने सभी परिचितों और यहां तक के माता-पिता को भी किरदारों में डाला है। मैंने सुहेल तातारी के धारावाहिक ‘कदम’ में एक किरदार डाला था, जो बार-बार अपने बर्तन गिनती है। वह किरदार मेरी मां पर आधारित था। ऐसे ही एक किरदार लिखा था मैंने, जो सोवियत लैंड पत्रिका से कटिंग काटकर जमा करता है। वह किरदार मेरे पिताजी से प्रभावित था।

     

    क्या आप अपने चरित्रों की जीवनी भी लिखते हैं?

    जीवनी थोड़ी बहुत लिखनी पड़ती है। उसकी सामाजिकता, उसका मनोविज्ञान और वह स्वयं। यह सब लिखना पड़ता है। अब अगर सुभाष चंद्र बोस पर लिख रहा हूं तो उनकी जीवनी तो लिखनी नहीं है, फिर भी हमें उनके जीवन से कुछ चीजें खोज कर लानी पड़ती हैं। जैसे मैंने लिखा था कि सुभाष चंद्र बोस जैसे बहादुर आदमी बिल्लियों से डरते थे। महात्मा गांधी जब खाना खाते थे तो सारी चीजें एक में मिला लेते थे।

     

    अपने चरित्रों के साथ आपका इमोशनल रिश्ता कैसा होता है?

    इमोशनल रिश्ता रखना पड़ता है। उसके बगैर हम लिख नहीं सकते। चरित्रों से जुड़ाव होने पर ही हम उसके संवाद लिख पाते हैं। यह रिश्ता तात्कालिक होता है।

     

    क्या लेखक अपने किसी किरदार में मौजूद रहता है?

    लेखक थोड़ा-थोड़ा अपने सारे किरदारों में मौजूद रहता है। बहुत ऑब्जेक्टिव होकर किरदारों को नहीं लिखा जा सकता। उसमें खुद का निवेश करना पड़ता है। उसके विचारों में लेखक होता है। कभी-कभी निजी सोच के विरोधी विचारों के साथ भी लिखना पड़ता है। जिन विचारों से हम निजी ज़िदगी में सहमत नहीं हैं, किरदारों के लिए उन विचारों के पक्ष में बोलना पड़ता है।

     

    क्या किरदारों की भाषा अलग-अलग होनी चाहिए? और संवाद लिखना कितना आसान या मुश्किल होता है? 

    किरदारों की भाषा अलग-अलग होनी ही चाहिए। जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने ‘पिग्मैलियन’ नाटक में लंदन के किरदारों को उनके मोहल्ले के अनुसार लहजा दिया था। उसकी वजह से वह नाटक बहुत रोचक बनता है। भाष से हमें किरदार के बारे में पता चलता है। किरदारों का अलग व्यक्तित्व बन जाए तो संवाद लिखे जा सकते हैं। देखना यह पड़ता है कि वह किरदार है कहां का? उसे किस लहजे में बोलना है? इसके लिए हमें थोड़ा शोध करना पड़ता है। कमल हासन की फिल्म ‘दशावतार’ में मैंने 10 किरदारों की भाषा लिखी थी। वे सभी हिंदी बोल रहे थे, लेकिन उनका लहजा अलग-अलग था। वे सभी भिन्न देशों और प्रदेशों के थे। इसमें अभिनेता की भी मेहनत होती है, लेकिन उसके पहले तो संवाद लिखने पड़ते हैं। संवादों में वैचारिकता लाना मेरे लिए बड़ी समस्या नहीं है। संवाद लिखने में यह ध्यान तो रखना पड़ता है कि आप जितने छोटे में जितनी बड़ी बात कर सको, उतना बेहतर।

     

    दिन के किस समय लिखना सबसे ज़्यादा पसंद है? क्या कोई ख़ास जगह तय है घर में लिखने के लिए?

    मैं अपनी डाइनिंग टेबल पर लिखना पसंद करता हूं। उस पर सारे सामान फैला कर आराम से लिखता हूं। मेरे लेखन में थोड़े रिसर्च की जरूरत पड़ती है। लैपटॉप के आसपास किताबें, टेप रिकॉर्डर, बाकी ज़रुरत के सारे सामान होने चाहिए। मैं अनुशासित व्यक्ति नहीं हूं, इसलिए कोई निश्चित समय नहीं है मेरे लिखने का। सभी के लिखने की अपनी लय होती है। रूटीन होता है। श्याम बेनेगल और गुलजार निश्चित समय पर रोज़ाना लिखते हैं। मैं किसी रूटीन में काम नहीं कर पाता।

     

    कभी राइटर ब्लॉक से गुज़रना पड़ा? ऐसी हालत में क्या करते हैं?

    एक-दो बार जरूर ऐसा हुआ है। उसमें सबसे अच्छा होता है कि उसे वैसे ही छोड़ दें और सो जायें। उस अटकन पर विचार करते हुए आराम से सो रहो। ज़्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि दिमाग काम करता रहता है। उसी प्रक्रिया में ख्याल आता है और फिर वह ब्लॉक खत्म होता है। कई बार सोते-सोते ख्याल आते हैं। कई वैज्ञानिक आविष्कार ऐसे ही हुए हैं। बहुत सोचने से ब्लॉक नहीं टूटता। अवचेतन कई अवरोधों को सुलझा देता है।

     

    लेखकों के बारे कौन सी धारणा बिल्कुल ग़लत है?

    यह धारणा बिल्कुल गलत है कि एक अच्छी कुर्सी हो, खिड़की से सामने पहाड़ दिख रहे हों, प्रकृति दिख रही हो, वसंत ऋतु का मौसम हो तभी अच्छा लेखन हो सकता है। लेखन मूल रूप से मानसिक अभ्यास है। उसके लिए बाहरी उपादान की जरूरत नहीं पड़ती। कम से कम मेरे लिए तो यही है। जैसे मोहब्बत के लिए ज़रूरी नहीं है कि यश चोपड़ा की फिल्मों का माहौल हो... मोहब्बत तो कहीं भी हो जाती है। इसी प्रकार लेखन कहीं भी हो सकता है।

     

    लेखक होने का सबसे बड़ा लाभ क्या है?

    लेखक किसी भी परिस्थिति में कल्पनाशील , सृजनरत और खुश रह सकता है।

     

    अपने लेखन करियर की अभी तक की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मानते हैं?

    मैं दो-तीन फिल्मों के नाम लेना चाहूंगा। ‘शहीद उधम सिंह’ मुझे मुकम्मल सी फिल्म लगती है। इसी प्रकार ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस’ और ‘संविधान’ नाम की 10 घंटे की सीरीज। इन पर मैं गर्व कर सकता हूं। इन्हें मैं अपने पोते के लिए छोड़ जाऊंगा कि बेटा इन्हें जरूर देख लेना।

     

    कई बार कलाकार और निर्देशक दृश्य और संवादों में बदलाव करते हैं। क्या यह उचित है?

    सैद्धांतिक रूप पर मैं इससे सहमत नहीं हूं। फिल्म निर्माण में सभी का अलग-अलग काम है। लेखक ने अगर कुछ लिखा है तो उसने सोच समझकर ही लिखा होगा। उसने हर तरह से मंथन के बाद वह पंक्ति लिखी होगी। लेखक की यही अपेक्षा रहती है कि अभिनेता इन पंक्तियों को बोलेगा तो फिल्म के लिए ठीक रहेगा। स्क्रिप्ट पढ़ने के बावजूद बहुत कम कलाकारों को पूरी फिल्म का संज्ञान होता है। नाटकों में तो नाटककार ने जो लिख दिया है, कलाकार वही बोलते हैं। संवाद बोलने की कलाकारों की अपनी लय होती है। कई बार उन्हें थोड़ी अलग पंक्ति मिल जाती है तो उन्हें दिक्कत होती है। अच्छा अभिनेता कोई बदलाव नहीं करता। अगर कोई गलती मिलती है तो ज़रूर बदलना चाहिए। लेखक का लिखा पत्थर की लकीर भी नहीं होती।

     

    लेखकों की स्थिति में किस बदलाव की तत्काल ज़रुरत है?

    लेखकों के लिए एक न्यूनतम राशि तय किया जाना ज़रूरी है। ख़ासकर नए संभावनाशील लेखकों के लिए। लेखकों की स्थिति अच्छी नहीं होगी तो वे कुछ और करने लगेंगे। इसी वजह से लेखकों को लेखन के अलावा भी बहुत कुछ करना पड़ता है। और हाँ, लेखकों को पूरा क्रेडिट मिलना चाहिए। एसडबल्यूए इस दिशा में बहुत कुछ कर रहा है।

     

    इन दिनों क्या लिख रहे हैं? लॉकडाउन में कुछ लिख पाए क्या?

    लॉकडाउन में एक नाटक लिखा है मैंने। एक स्क्रिप्ट म्यूजियम के लिए लिखी।

     

    फिल्मों के गाने और इंटरवल पॉइंट आप सुझाते हैं क्या?

    आमतौर पर लेखक ही तय करता है। मैं भी करता हूं। गाने का काम होता है छोटे समय में कहानी को आगे बढ़ाना। जो चीजें दृश्य में नहीं दिखायी जा सकती, उन्हें गाने के बहाने बता दिया जाता है। यह लेखक ही बताये तो अच्छा‌। इंटरवल पॉइंट तो मैं ही लिख कर देता हूं।

     

    किस भाषा में लिखते हैं और कौन सा सॉफ़्टवेयर इस्तेमाल करते हैं?

    मैं हिंदी और अंग्रेजी दोनों में लिखता हूं। संवाद हिंदी में होते हैं। तकनीकी सजेशन और निर्देश अंग्रेजी में होते हैं। इन दिनों फिल्मों में तकनीशियन देश-विदेश से आते हैं। निर्देश अंग्रेजी में लिखने पड़ते हैं। मैं फाइनल ड्राफ्ट, सैल्टएक्स और राइटरडुएट का प्रयोग करता हूँ।

     

    फिल्म लेखन में आने के इच्छुक प्रतिभाओं को क्या सुझाव देंगे?

    लेखन का प्रशिक्षण ले लेना चाहिए। आजकल सुविधाएं बढ़ गई हैं और लिखना सीखा जा सकता है। तैयारी करके आएंगे तो कम समय बर्बाद होगा।

    अजय ब्रह्मात्मज जाने-माने फिल्म पत्रकार हैं। पिछले 20 सालों से फिल्‍मों पर नियमित लेखन। 1999 से दैनिक जागरण और दैनिक भास्‍कर जैसे प्रमुख अखबारों के साथ फ़िल्म और मनोरंजन पर पत्रकारिता। चवन्‍नी चैप (chavannichap.blogspot.com) नाम से ब्‍लॉग का संचालन। हिंदी सिनेमा की जातीय और सांस्‍कृतिक चेतना पर फिल्‍म फेस्टिवल, सेमिनार, गोष्‍ठी और बहसों में निरंतर सक्रियता। फिलहाल सिनेमाहौल यूट्यूब चैनल (youtube.com/c/CineMahaul) और लोकमत समाचार, संडे नवजीवन और न्यूज़ लांड्री हिंदी में लेखन।