•  डॉ. मनीष कुमार जैसल
    •  18 November 2020
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    “आज अच्छा कंटेंट कहीं से भी लिखा जा सकता है, उसके लिए मुंबई आने की ज़रूरत नहीं।”

    नवोदित लेखक-निर्देशक जोड़ी आज़म और अकबर क़ादरी से बातचीत

    हाल ही में ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म एमएक्स प्लेयर पर फ़िल्म ‘शहज़ादा अली’ रिलीज़ हुई है। बुंदेलखंड के एक छोटे से गाँव में जन्में जुड़वा भाई अकबर और आज़म क़ादरी ने इस फ़िल्म का निर्देशन और लेखन किया है। वर्षों से फ़िल्म लेखन, निर्देशन और थिएटर के ज़रिए धीमे धीमे अपनी पहचान बना रहे दोनों भाइयों ने यू ट्यूब में कोरोना काल की शुरुआत में ‘टॉक ही टॉक’ नाम से एक हास्य सीरीज़ भी आरम्भ की। 2007 में अंतराल ग्रुप के साथ थिएटर की दुनिया में शुरुआत करते हुए क़ादरी बंधु असग़र वजाहत, शंकर शेष जैसे लेखकों के नाटकों का निर्देशन भी कर चुके हैं।

    अकबर और आज़म जुड़वा हैं और साथ साथ एक जैसा सोचते भी हैं। सामाजिक और सांस्कृतिक चिंतन के दायरे में फ़िल्म लेखन, निर्देशन और वृतचित्रों का निर्माण करते हैं। पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टिंग ट्रस्ट PSBT के लिए बनाई फ़िल्म 'Learning in Exile', हाल ही में एमएक्सप्लेयर पर रिलीज़ हुई फ़िल्म शहज़ादा अली, मशहूर रेडियो कार्यक्रम ‘याद शहर विद नीलेश मिस्रा’ और उनकी लिखे कहानियों के संकलन ‘परखनली’ में इसे देखा जा सकता है। जामिया मिलिया इस्लामिया से जर्नलिज़्म और मास कम्यूनिकेशन से पढ़े आज़म और अकबर क़ादरी की लेखनी में विविधता है। छोटे से गाँव से निकले युवा जुड़वा भाइयों के मुंबई तक के सफ़र को उन्हीं के ज़रिए समझने के लिए हमने उनसे बातचीत की।

     

     

    सबसे पहले तो आप दोनों अपने बारे में बताइए और फिर यह बताइए कि लेखन का शौक़ कहाँ से आया?

    आज़म: हम बुंदेलखंड के छोटे से गाँव से आते हैं। कॉलेज में इतिहास पढ़ाने वाले शिक्षक पिता के सुनाए किस्सों ने बचपन में ही साहित्य, समाज और कला की तरफ दिलचस्पी पैदा की। चूँकि गाँव में बिजली हुआ नही करती थी तो रात के खाने के बाद का बहुत समय था इस काम के लिए। कुल मिलाकर कहूँ तो यह बहुत पहले डिसाइड हो गया था कि हमें जाना फ़िल्मों की तरफ़ ही है। और रास्ते बनते चले गए। शुरुआत हमने थिएटर से की। उसके बाद रेडियो के लिए कहानियाँ लिखी, तो हमारे लिए फ़िल्मों में लेखन आसान हो गया। रेडियो के लेखन में जो चुनौतियाँ रही उससे हमने काफ़ी कुछ सीखा। क्योंकि रेडियों में दिखता नहीं, पर श्रोता को फ़ील तो कराना होता ही है। ‘उसके ऊपर नीले रंग का सूट जँच रहा था’ जैसे वाक्य जब श्रोता सुनता है तो चाहता है कि उस लड़की के रंग-रूप और क़द काठी को भी जान जाए ताकि उसकी छवि उभर सके।

    अकबर: मैं इसमें एक बात और जोड़ दूँ कि एक छोटे से गाँव का लड़का कितना बड़ा सपना देख सकता है? अमोल पालेकर और बासु भट्टाचार्य की फ़िल्में देखते हुए भी हमें लगा कि हमें भी कुछ ऐसा करना चाहिए। जो ज़िंदगी इन दोनों निर्देशकों ने परदे पर दिखाई वही हमारा सच था। वही सच देखा और उसी तरह का कुछ दिखाने का सपना लेकर हम आगे बढ़ने लगे। गाँव में ही इप्टा जॉइन किया और सफ़र की शुरुआत की। फिर दिल्ली के जामिया में भूगोल ऑनर्स में दाख़िला मिला। घर से दबाव था कि इन्हीं विषयों में डिग्री के बाद यूपीससी की तैयारी करनी है। एक साल बीता। फिर जाकर पता चला कि वहाँ मास कम्यूनिकेशन जैसा कोर्स होता है। बस वही तो हमें करना था। उधर भूगोल ऑनर्स का एक साल पूरा हो रहा था इधर हम बीए जेएमसी का एक एंट्रेंस टेस्ट दे रहे थे। आज़म और मैंने यह डिसाइड किया कि जो फ़ीस हमें सेकंड ईयर में जमा करनी थी उसे हम मास कम्यूनिकेशन के फ़र्स्ट ईयर में जमा करेंगे। और ऐसा ही किया। आने वाले वर्षों में पिता जी ने जियोग्राफ़ी ऑनर्स के पूरे होने का हाल चाल लिया तब हमने उन्हें सच बताया। घर में मार भी ख़ूब पड़ी। गर्मियों के दिनों में आज़म ने पापा के पाँव दबाते दबाते उन्हें कंविंस किया कि पापा हमारा इसी में मन लगता है और हम कुछ कर के दिखाएँगे। पिता जी का यह सवाल आज भी हमारे लिए मंज़िल है कि ‘महबूब खान, विमल राय जैसी फ़िल्में बना लोगे? आम आदमी की कहानियाँ फ़िल्मों में कह लोगे?’ और हम आज उसी को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं।

     

    आपने अपने हास्य शो के लिए यूट्यूब माध्यम को क्यों चुना?

    अकबर: मेरा पॉइंट यहाँ बहुत सीधा है कि हम जिस तरह की कहानियाँ अपने शो ‘टॉक ही टॉक’ में कह रहे हैं उसे कोई भी OTT प्लेटफ़ॉर्म बहुत आसानी से हाँ कर देता। लेकिन जो हम कहना चाहते हैं उसे उस प्लेटफ़ॉर्म में कह नहीं पाते। उनकी अपनी पॉलिसी आ जाती। ‘टॉक ही टॉक’ के ज़रिए हम ऑडियन्स के साथ सीधा संवाद करना चाहते थे इसीलिए यूट्यूब को चुना।

    आज़म: अकबर की बात से मैं भी सहमत हूँ। हमने देखा कि अमेजन प्राइम से लेकर तमाम सारे OTT प्लेटफ़ोर्म पर कॉमेडी तो थी लेकिन मीनिंगफ़ुल कॉमेडी नहीं थी। हम हास्य के साथ ऐसा कुछ देना चाहते थे जो हमारे दर्शकों को सीख भी दे। हमने शुरू किया और दर्शकों का शुक्रिया कि उन्हें पसंद आया।

     

    इस शो के तमाम किरदारों में से आज़म और अकबर को कौन से किरदार ज़्यादा पसंद हैं?

    आज़म: एक माँ को उसके सारे बच्चे पसंद होते हैं, और यहाँ तो हम माँ भी हैं और बाप भी। लेकिन तमाम किरदारों में दूसरा एपिसोड जो हकीम का था और अभी हाल ही में मज़दूर वाला एपिसोड था वो मुझे पसंद था। क्योंकि हमने मज़दूर वाले एपिसोड को उस पीड़ा में लिखा था जब लोग मुंबई से अपने गाँव की तरह पलायन करते हुए दिख रहे थे।

    अकबर: मुझे अपना लिखा किसान के किरदार वाला एपिसोड बहुत पसंद है। चूँकि ख़ुद हम किसान परिवार से हैं इसलिए ये मेरे दिल के काफ़ी क़रीब है। इसके अलावा टीटी वाला एपिसोड भी मुझे काफ़ी पसंद रहा।

     

    ओटीटी कंटेंट की भीड़ में लेखक का नाम कई बार पीछे छूट जाता है। इस पर आप क्या कहेंगे?

    अकबर: राईटर के नाम को लेकर जंग कब नहीं हुई? हर दशक में हर दौर में आप देखिए तो कई बड़े उदाहरण आप मिल जाएँगे। सलीम जावेद का वो क़िस्सा कौन भूल सकता जिसमें नाम को लेकर संघर्ष हुआ। स्क्रीनराइटर्स एसोसिएशन इस बात को बहुत अच्छे से जानता भी है कि लेखकों ने कितनी लड़ाइयाँ लड़ी है और जीती भी हैं। हमें आज के दौर में और भी सजग होने की ज़रूरत है। मुझे ऐसा लगता है कि लेखक को क्रेडिट के साथ समझौता इसलिए भी करना पड़ जाता है क्योंकि कई लेखक व्यावसायिक रूप से थोड़ा कमज़ोर हैं। नाम को लेकर उत्सुकता के बजाय पैसे कमाने पर फ़ोकस आ जाता है। हालाँकि बदलाव दिखने लगा है हमारी पीढ़ी में। वरुण ग्रोवर, पुनीत शर्मा जैसे नाम हैं जिनके नाम से दर्शक उनका कंटेंट पढ़ते, देखते और सुनते हैं।

    आज़म: मुझे लगता हैं प्रॉडक्शन हाउस की मनमानी के आगे हम लेखकों को अड़ना ही पड़ेगा। तभी हमें हमारा हक़ मिलेगा।

     

    आप दोनों में अच्छा कौन लिखता है?

    अकबर: ये सवाल जलेबी की तरह टेढ़ा है क्योंकि अच्छा बुरा लेखन तो दर्शक भी एक मत से तय नहीं कर सकता। लेकिन फिर भी मुझे लगता है कि हम दोनों में आज़म बेहतर लिखता है क्योंकि आज़म की लेखनी में एक रूहानियत हैं, एक कविताई रूप दिखता है, नज़्म शामिल है। जो मेरी लेखनी में नहीं है। मैं सीधा और सटीक लिखना पसंद करता हूँ।

    आज़म: अकबर की सीधी लिखी कहानियों की रीच इसीलिए ज़्यादा रहती है। क्योंकि आम जन मानस की भाषा में लिखता है। हमारी अपनी किताब परखनली में 6 कहानियाँ मेरी और 4 अकबर की थी। लेकिन अकबर की कहानियों से पाठक ज़्यादा जुड़े दिखे। ओटीटी प्लैटफ़ॉर्म पर जिस तरह की अश्लीलता और अपशब्दों की भरमार देखने को मिलने लगी है ऐसे में क्या आपको किसी तरह की सेन्सरशिप की ज़रूरत महसूस होती है?

    अकबर: अमेरिका और यूरोप का सिनेमा अपने प्रेसीडेंट तक को कटघरे में खड़ा करके दिखा सकता है क्या हम उतना सोच सकते हैं? मेरे ख़याल में भारत में जब तक राजनीति प्रभावित नहीं होती सेन्सरशिप का सवाल नहीं आता लेकिन जैसे ही राजनीति से जुड़ाव आता है सभी माध्यमों में सेन्सरशिप की ज़रूरत पैदा होने लगती है या कहे कर दी जाती है। मेरे हिसाब से तो किसी भी कला के माध्यम में सेन्सरशिप नही होनी चाहिए। आज़म- अभिव्यक्ति के लगभग सभी माध्यमों में तो सेन्सरशिप हैं ही अब अगर ओटीटी में सेन्सरशिप जैसी ज़रूरत पैदा की जा रही है तो यह दुखद है। हाँ, इन प्लैटफ़ॉर्म पर लिखने वालों को थोड़ा सोच समझ कर लिखने की ज़रूरत ज़रूर है। लेकिन सेन्सरशिप जैसी बॉडी इसका इलाज बिलकुल भी नहीं। जिस किरदार में गालियाँ ज़रूरी हैं तो वहाँ तो दिखानी ही पड़ेगी। उससे कंप्रोमाइज मतलब अभिव्यक्ति की हत्या। समाज के अलग अलग हिस्सों को अगर हम समझे तो कौन गालियाँ नहीं देता? नेताओं को गालियाँ पड़ती हैं, अभिनेताओं को पड़ती हैं, दोस्तों को पड़ती है, बाप बेटे को देता है। तो फ़िल्मों में, वैब सीरीज़ में किरदार क्यों नही दे सकता?

     

    हाल ही में एमएक्स प्लेयर पर आपकी फ़िल्म ‘शहज़ादा अली’ रिलीज़ हुई है। इस फ़िल्म के लेखन की क्या प्रक्रिया रही?

    अकबर: जैसा कि हमने आपको बताया कि हमने मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई की है। उस दौरान यह महसूस हुआ कि बच्चों के स्तर पर सिनेमा में कुछ ख़ास नहीं हुआ। ‘स्टैनली का डब्बा’ और ‘चिल्लर पार्टी’ जैसी उँगलियों पर गिनी जाने वाली फ़िल्में ही बनी हैं। इसीलिए हमने ‘शहज़ादा अली’ बनाई। एक किरदार जो आज़म में मन में अटका हुआ था उसे एक रात में कहानी में तब्दील किया और फिर हमने इसे परदे के लिए फ़िल्माया। यह उस दौर की बात है जब 2011 के समय जिन बच्चों के दिल में सुराख़ था उनका देश के अस्पतालों में सही समय पर ऑपरेशन नहीं हो पाता था। फ़िल्म उसी की कहानी कहती है। एक बच्चे से उसका खेल अगर छीन लिया जाए तो उसके बचपन के क्या मायने हैं? हम आज जो लॉकडाउन झेल रहे हैं उसमें इतना परेशान हैं तो आप समझिए उन बच्चों की ज़िंदगी में तो 24 घंटे ही लॉकडाउन रहता है। हमने सोचा कि यह फ़िल्मों बच्चों के बहाने बड़ों के लिए बनाएँगे। हम अपने घरों और परिवार में बच्चों को यह बताते हैं कि उल्टी चप्पल पर शैतान बैठता है लेकिन उसके बाद बड़े भूल जाते हैं। मगर उसका असर बच्चों के दिमाग़ पर कितना पड़ता है यह सोचने वाली बात है। 'शहज़ादा अली' ऐसे ही बच्चे की कहानी हैं जिसकी माँ उसे लगातार रोकती है। फ़िल्म का अंत हमें शिक्षा ज़रूर देता हुआ दिखेगा।

     

    आने वाले दिनों के लिए क्या लिख रहे हैं?

    अकबर: हमारी 2 फ़िल्में अभी साईन हैं जिसमें एक राईटर-डायरेक्टर है और एक बतौर राईटर। वर्षों पहले मैं और आज़म स्टार प्लस के लिए काम करते थे तब हमने ‘कितने पाकिस्तान’ का एडॉप्टेशन किया था। वैसा ही कुछ फिर से लिखने की कोशिश करेंगे। एक लेखक के तौर पर आप दोनों ख़ुद को अभी भी मुंबई में स्ट्रगलर मानते हैं?

    अकबर: राईटर ही सबसे बड़ा स्ट्रगलर होता है। पहले रोटी कपड़ा मकान के लिए संघर्ष, फिर अपने काम की निरंतरता के लिए संघर्ष फिर उसके बाद अपने काम के स्तर को मेंटेन करने के लिए संघर्ष - ये सब एक राईटर को करना ही पड़ता हैं। फ़िलहाल तीसरी स्टेज में हैं हम लोग। आज़म- मेरी नज़र में तो किसी भी राईटर के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह कि वो जो लिख रहा है उसके लिए वह कभी निश्चिन्त नहीं रहता कि मेरा लिखे पर फ़िल्म या वैब सीरीज़ बनेगी या नहीं। फ़िल्म निर्माण के अन्य किसी प्रोफ़ेशन में कम से कम यह चुनौती तो नहीं ही है। किसी भी सिनेमेटोग्राफ़र या निर्देशक के पास ग्रीन सिग्नल लिए हुए ही स्क्रिप्ट पहुँचती है, लेकिन राईटर अपने काम के दौरान यह कभी नही तय कर पाता उसका लिखा पास होगा या नहीं।

     

    छोटे शहरों और गाँवों के उन युवाओं को क्या संदेश देंगे जो फ़िल्म निर्माण और लेखन में अपना कैरियर बनाना चाहते हैं और मुंबई आना चाहते हैं?

    अकबर: सबसे पहले तो आपको ये समझना होगा कि आज के वक़्त में फ़िल्मकार बनने के लिए मुंबई आना ज़रूरी नहीं है। आप जहाँ हैं वहीं से रहकर भी सिनेमा लिख और बना सकते हैं। लॉकडाउन ने हमें यह बता भी दिया है कि कोई भी काम कहीं से भी किया जा सकता हैं बस जुनून की ज़रूरत है।

    आज़म: हमें जिस क्राफ़्ट में जाना हैं उस क्राफ़्ट को समझने की ज़रूरत है। बनने को तो किसी भी कहानी पर फ़िल्म बनाई जा सकती हैं लेकिन फ़िल्म निर्माण की अपनी कुछ ज़रूरतें हैं कुछ नियम हैं उन्हें समझने की ज़रूरत है। कहानी, पटकथा संवाद, लिरिक्स आदि के क्राफ़्ट पर होमवर्क करना चाहिए।

    डॉ. मनीष कुमार जैसल मंदसौर यूनिवर्सिटी, मध्य प्रदेश, में जनसंचार एवं पत्रकारिता के सहायक प्रोफेसर हैं । नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी नई दिल्ली के बुक फ़ेलो और सहपीडिया यूनेस्को के रिसर्च फ़ेलो भी रह चुके हैं। फ़िल्मकार मुजफ्फर अली पर किताब 'फिल्मों का अंजुमन: मुजफ्फर अली' प्रकाशित। सेंसरशिप और सिनेमा पर पीएचडी। नियमित आलेख और संगोष्ठियों में वाचन। संपर्क: mjaisal2@gmail.com