•  डॉ. मनीष कुमार जैसल
    •  10 September 2020
    •  217

    "वैब सीरीज और ओटीटी प्लेटफॉर्म ही बदलेंगे अरुणांचल प्रदेश के सिनेमा का भविष्य।"

    अरुणांचल प्रदेश के लेखक-निर्देशक दोरजी के थोंगुन से ख़ास बातचीत

    अरुणांचल प्रदेश के छोटे से गाँव रूपा निवासी दोरजी के थोंगुन (Dorjee K Thongun) इस राज्य के मुख्य फ़िल्मकारों  में गिने जाते हैं। दोरजी 1977 में पिता द्वारा खोजे गए गाँव डोईमारा जो खैलोंग फॉरेस्ट डिविजन के अधीन आता हैं, में रह रहे हैं। अरुणांचल राज्य की अपनी कोई आधिकारिक भाषा न होने के कारण वहाँ हर समुदाय का अपनी भाषा में ही वार्तालाप और संचार होता है। ऐसे में दोरजी थोंगुन ने अपनी फिल्मों की शुरुआत अरुणांचली हिन्दी से की।

    1987 में अरुणांचल प्रदेश में बनने वाली तारो चतुंग की हिन्दी भाषा की फिल्म मेरी ज़िंदगी और 1993 में तारो चतुंग की ही एक और हिन्दी फिल्म फ़्रंटियर स्टूडेंट्स में सहायक निर्देशन के बाद, 2002 में दोरजी ने निर्देशन में कदम रखा। शुरुआत हुई फिल्म मैं इंडियन हम इंडियन से। दोरजी ने 2006 में ज्योतपा, 2008 में लेह, 2012 में बेसमेह, 2014 में ग्यूमरी और 2018 में मोनियम जैसी फिल्में अरुणाञ्चल की क्षेत्रीय बोली तवंग मोनापा और शेरदुक्पेन में बनाई। इससे पहले अपने फिल्मी सफर में दोरजी ने कुंदुन (1996) और हिज़ होलीनेस (1998) जैसे वृत्तचित्र भी बनाये। क्रमशः हिन्दी और अंग्रेज़ी में बनी दोनों फिल्में दलाई लामा के जीवन दर्शन और लामा की यात्रा पर आधारित हैं। वहीं द मैजिक हैंड (1998) और बुगुन (1999) नाम के उनके अंग्रेज़ी वृत्तचित्र अरुणांचल प्रदेश की जनजातियों और उनके हैंडीक्राफ्ट पर आधारित हैं। अपनी संस्कृति को अपनी ही भाषा में प्रसारित करने के लिए फिल्म माध्यम का बेहतर इस्तेमाल कर रहे दोरजी का संघर्ष कई स्तर पर है। काम जनसँख्या वाले एक छोटे से गाँव में दर्शकों तक बिना किसी स्ट्रीमिंग मधायम के फिल्म को पहुंचाना अपने आप में बड़ी चुनौती है।

    एक निर्देशक, निर्माता और पटकथा लेखक के तौर पर दोरजी ने अरुणांचल प्रदेश के सिनेमा को नई उचाइयाँ दी हैं। पूर्वोत्तर राज्यों के सिनेमा के विस्तार और भविष्य को लेकर हमने उनसे बात की। (यह भी अहम यह रहा कि निर्देशक दोरजी ने हमसे सम्पर्क करने के लिए भी कई तरह के संघर्ष किए। नेटवर्क की दिक्कतों से जूझते हुए दोरजी ने कई दिनों की मशक्कत के बाद मोबाइल के नेटवर्क को खोजा और हमसे बात की। इसके लिए उनका तहे दिल से शुक्रिया!) प्रस्तुत है, दोरजी के थोंगुन से बातचीत के प्रमुख अंश -.

     

    पूर्वोत्तर राज्यों के फिल्मकारों को फ़िल्म बनाने में किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है?

    भारत में बनने वाली क्षेत्रीय फिल्मों में साउथ को छोड़कर कहीं की हालत अच्छी नहीं है। फिल्म निर्माण, मार्केटिंग और स्क्रीनिंग को लेकर हमेशा से दिक्कतें रही हैं। अरुणांचल में तो स्थिति और भी खराब है क्योकि यहाँ एक भाषा नहीं हैं। जैसे सिक्किम में नेपाली, नागालैंड में नागामीज, असम में असमिया है वैसे अरुणांचल में कोई एक भाषा नहीं है। 100 से ज्यादा जनजातियां और उनकी अपनी बोलियाँ होने से एक भाषा में फिल्म बनाना बहुत मुश्किल होता है। इसीलिए फिल्म की एक भाषा के लिए हिन्दी को यहाँ के फ़िल्मकारों ने अपना लिया है। वहीं दूसरी तरफ पूर्वोत्तर का सबसे बड़े क्षेत्रफल वाला राज्य अरुणांचल है लेकिन आबादी के मामले से सबसे कम भी। ऐसे में दर्शकों का संकट सबसे बड़ा है। पूरे प्रदेश में 14 लाख के करीब आबादी है और पूरे लोग तो फिल्म देखेंगे नहीं। ऐसे में वहाँ सिनेमा हॉल ही नहीं हैं। फिल्म में लगा पैसा वापस नहीं आएगा इसीलिए बेहद कम बजट की फिल्में ज़्यादा बनती है। निर्माता निर्देशक यह सोच कर फिल्म बनाता है कि उसकी फिल्म का पैसा न डूबे। इन चुनौतियों के अलावा फिल्म निर्माण संस्थायें, फिल्म सिटी, कुशल टेकनीशियन आदि भी नहीं है इसीलिए यहाँ संकट है।

     

    अपने फिल्मी सफर के बारे में हमें बताईए। क्या लिखा आपने और उसे कैसे बनाया?

    मुझे अरुणांचल फिल्म इंडस्ट्री में करीब 32 साल हो चुके हैं। मेरे फिल्मी गुरु तारो चतुंग के निर्देशन में मैंने फिल्म निर्माण की कला सीखी है। और मैं यहाँ का दूसरा फ़िल्मकार हूँ जो बड़े बजट की फिल्में बना रहा हूँ। 32 सालों के फिल्मी कैरियर में मैंने देखा कि अरुणांचल में कई फ़िल्मकार आए और चले गए। मैंने यह सफर जारी रखा है।

    कई हिन्दी फिल्मों के साथ तवांग मोनपा भाषा में फीचर फिल्में लिखी और बनाई, तो साथ ही हिन्दी और इंग्लिश में दलाई लामा के जीवन पर डॉक्यूमेंट्री भी लिखी और शूट की। ज्योतपा फिल्म बनायी जिसमें इंसान के पछतावे को दिखाने का प्रयास किया। बेसमेह में एक जनजाति का अपना एक सफर है जिसको मैंने पर्दे पर चित्रित किया है। ठंड के दिनों में वो असम की ओर आकर रहने लगते हैं। और फिर वापस चले जाते हैं। यह जीवन संघर्ष वाकई अद्भुत होता है। फिलहाल इंडिया चाइना वॉर को लेकर हिन्दी और एक क्षेत्रीय भाषा में फिल्म बना रहा हूँ। एक लंबे समय से फिल्म निर्माण में खुद को लगा रखा है और इसके लिए मुझे दो बार नॉर्थ ईस्ट का बैस्ट डायरैक्टर का अवार्ड भी मिल चुका है। अरुणांचल सरकार ने फिल्म निर्माण के लिए एप्रिसिएशन लैटर के साथ गोल्ड मेडल भी दिया है। लाइफ टाइम एचीवमेंट पुरस्कार भी मिल चुका है। लेकिन अभी भी संघर्ष चल रहा है। एक फिल्म के बाद दूसरी फिल्म बनाने का जो संकट दिखता है वह अनुभव अब स्मृतियों में जुड़ता जा रहा है।

     

    अरुणांचल प्रदेश से जुड़े कौन से जरूरी विषय हैं जिन पर जल्द से जल्द जरूरी तौर पर फ़िल्म बनाई जानी चाहिए?

    26 ट्राइब (जनजाति) और 75 के करीब सब-ट्राइब को मिलाकर 100 से अधिक ट्राइब और उनकी अपनी बोलियाँ हैं। तो चाहिये कि इन ट्राइब्स से जुड़े लोग ही अपनी बोली पर कम से कम एक फिल्म बनाएँ। अपनी जीवन यात्रा पर भी एक फिल्म बनाएं और इसे नए जमाने के बदलाव को भी इसमे शामिल करें। इससे पता चलेगा कि हम कहाँ थे और कहाँ आ गए हैं। तीसरा विषय इन ट्राइब्स की अपनी संस्कृतियाँ हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक के लिए हर ट्राइब का अपना कल्चर है। ऐसी फिल्म भी बननी चाहिए जिसमें पता चले कि हम सिर्फ अलग अलग ट्राइब न होकर अरुणांचल प्रदेश के निवासी भी हैं और भारतीय भी हैं। अपनी राष्ट्रीय पहचान को लेकर जो एक बड़ा संकट है उस पर भी  फिल्म बनाने की ज़रूरत है। दुनिया भर के युद्ध में शहीदों की गाथाएँ ही फिल्मों में दिखाई जाती रही है। लेकिन 1962 के युद्ध पर मैं जो फिल्म बना रहा हूँ उसमें हिंदुस्तानी फौज का भरपूर साथ देने वाले अरुणांचली लोगों के योगदान को दिखाऊँगा।

     

    अरुणांचल की सरकार सिनेमा विस्तार में किस तरह मदद कर रही है?

    यहाँ की सरकार ने हाल फिलहाल में ही एक फिल्म फैस्टिवल किया था। फीचर फिल्म और डॉक्यूमेंट्री में बेस्ट फिल्म का अवार्ड दिया जा रहा है। इसके अलावा सरकार की कोई भूमिका स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देती है।

     

     नए ऑनलाइन प्लेटफार्म जैसे नैटफ्लिक्स अमेजॉन प्राइम के आने से किस तरह के बदलाव देखने को मिल रहे हैं?

    एक सीरियस फ़िल्ममेकर होने के नाते कह सकता हूँ कि ये नए ओटीटी प्लेटफॉर्म फिल्मों का भविष्य बन जाएंगे। हॉलीवुड से लेकर बॉलीवुड और अब क्षेत्रीय सिनेमा के लोग इसमें धीरे धीरे जुड़ रहे हैं। इसमें दर्शकों को खोजने की जरूरत आपको नहीं पड़ेगी। यह वाकई अहम पक्ष है इसका। सभी के पास स्मार्टफोन होने से दर्शको तक ये मीडियम पहुँच रहे हैं। ये मीडियम हमारे जैसे स्टेट के फ़िल्मकारों के लिए भी वैब सीरीज और शॉर्ट फिल्मों के कल्चर को बढ़ावा देने का बड़ा माध्यम बनेंगे। नए पीढ़ी के फ़िल्मकारों को इस पर भरोसा करना चाहिए।

     

    क्या हिंदी फिल्म उद्योग के निर्माता निर्देशक अरुणांचल में फ़िल्म शूट कर रहे हैं?

    यहाँ जो भी बड़े फ़िल्मकार यहाँ फिल्म के लिए आते हैं मैंने हमेशा उनका स्वागत किया है। कॉस्ट्यूम, मेकअप, टेक्निकल जानकारी के अलावा कैटरिंग, टैक्सी आदि के काम में भी लोगो को रोजगार मिल जाता है। यहाँ होने वाली शूटिंग से हमारे लोग काफी सीख रहे हैं और धीरे धीरे ही सही, बाहर से लोग हमारे यहाँ के लोगो को रखना भी शुरू कर रहे हैं।

     

    पूर्वोत्तर राज्यों के फ़िल्म से जुड़े लोग मुम्बई और हैदराबाद जैसे शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। क्या कारण हैं?

    एक एक्टर या निर्देशक हमेशा बड़ा सपना देखता है। इसीलिए वो छोटी जगह में नहीं रहना चाहेगा। निर्देशक, राइटर, कैमरा मैन, टेकनीशियन, साउंड एडिटिंग आदि में अरुणांचल के लोग जा रहे हैं। क्योंकि वहाँ पैसा ज़्यादा है, नाम और शोहरत ज्यादा है, जॉब की गारंटी भी ज्यादा मिलती है।  तो जहां उम्मीद हैं लोग वहीं रहना पसंद करते हैं। मैं इसे ठीक भी मानता हूँ। जहां ज़्यादा हरा होगा, घोड़ा वहीं दौड़ेगा।

     

    असम का सिनेमा आगे बढ़ रहा है। क्या इसीलिए अरुणांचल में सिनेमा का विस्तार रुका है?

    असम की इंडस्ट्री बहुत पुरानी है। या कहे जब अरुणांचल में सरकारी सौजन्य से पहली फिल्म मेरा धरम मेरी माँ बनी थी तो उसे असमिया फिल्मों के बादशाह निर्देशक डॉ. भूपेन हजारिका ने बनाया था। यह ऐसे समय में बनी थी जब अरुणांचल के लोग सिनेमा देखने असम जाया करते थे। ऐसे में असम ने तो हमारे लिए योगदान ही किया है। हमें सिनेमा देखने का मंच दिया और कहीं न कहीं फिल्म बनाने की प्रेरणा भी।  वहाँ का सिनेमा इसलिए भी लोकप्रिय हो रहा क्योंकि वहाँ सरकार की मदद है, सिनेमा हॉल हैं, एक ही भाषा का दर्शक है। और सबसे बड़ी बात - एक लंबा अनुभव है उनके पास।

     

    अरुणांचल की फिल्मों के विषय, निर्माण और निर्देशन में महिलाओं की क्या स्थिति है?

    महिलाओं की स्थिति अभी ठीक नहीं है। अरुणांचल में कोई महिला फ़िल्मकार नहीं दिखती है। दूरदर्शन में कुछ निर्दशन वगैराह किया हो तो अलग बात है। नई पीढ़ी के जो लोग बना रहे होंगे उनकी जानकारी भी अभी नहीं है। एक्टिंग और गीत संगीत में महिलाएं हैं। महिला मुद्दों पर कहानियाँ लिखी गई हैं और उन पर फिल्में भी हैं।

     

    अरुणांचल प्रदेश के सिनेमा का भविष्य कैसा होगा?

    वैब सीरीज के आने से अरुणांचल के सिनेमा का भविष्य उज्ज्वल होगा। निर्माता और पैसा लगाएगा क्योंकि उसके पास दर्शक की उम्मीद है। भारत के अंदर जितनी कहानियाँ हैं उतनी इस अकेले प्रदेश में आपको मिलेंगी। क्योंकि आबादी कम है लेकिन आबादी में विविधता बहुत है। सभी को वैब सीरीज में डाल दिया जाए तो एक अलग ही दुनिया दर्शको को दिखेगी। नई पीढ़ी के निर्माता निर्देशकों के साथ हम जैसे लोग भी फिल्मों की बारीकी सीखने के बाद एक साथ आयेंतो हमारा सिनेमा भी एक नई दिशा में जाता दिखेगा।

    डॉ. मनीष कुमार जैसल मंदसौर यूनिवर्सिटी, मध्य प्रदेश, में जनसंचार एवं पत्रकारिता के सहायक प्रोफेसर हैं । नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी नई दिल्ली के बुक फ़ेलो और सहपीडिया यूनेस्को के रिसर्च फ़ेलो भी रह चुके हैं। फ़िल्मकार मुजफ्फर अली पर किताब 'फिल्मों का अंजुमन: मुजफ्फर अली' प्रकाशित। सेंसरशिप और सिनेमा पर पीएचडी। नियमित आलेख और संगोष्ठियों में वाचन। संपर्क: mjaisal2@gmail.com