•  अजय ब्रह्मात्मज
    •  07 September 2020
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    ज़िन्दगी में मिले किरदार फिल्म राइटिंग में काम आये।

    अजय ब्रह्मात्मज के सवाल, लेखकों के जवाब: रॉबिन भट्ट

    रॉबिन भट्ट ने ‘आशिकी’ से फिल्म लेखन की शुरुआत की। महेश भट्ट की अनेक फ़िल्में लिखने के बाद उन्होंने ‘बाज़ीगर’ से एक अलग मुक़ाम हासिल किया। अनेक कामयाब फिल्मों के लेखक रॉबिन भट्ट फिलहाल लेखकों के हित में स्क्रीनराइटर्स एसोसिएशन (एसडबल्यूए) के अध्यक्ष के रूप में बेहद सक्रिय ज़िम्मेदारी निभा रहे हैं। 

     

    जन्मस्थान: मुंबई

    जन्मतिथि: 10 मार्च 1946

    शिक्षा-दीक्षा: स्नातक 

    लेखन प्रशिक्षण और अभ्यास? 
    कोई प्रशिक्षण नहीं लिया। फ़िल्में देखने का जो अनुभव था, उसी के आधार पर लिखा और बाद में कुछ किताबें खरीदीं स्क्रिप्ट राइटिंग की।
     
    कहानी लिखने का विचार कैसे आया? पहली कहानी कब लिखी थी? वह कहीं छपी थी या कोई और उपयोग हुआ था?
    कॉलेज में खूब कहानियां बनाया और सुनाया करता था। दोस्तों का ध्यान पाने के लिए। मैं उन अंग्रेजी फिल्मों की कहानियाँ अपनी जबान में थोड़ा बदलकर भारतीय किरदारों के साथ सुनाया करता था, जो उन्होंने नहीं देखी होती थी।
      
    आप का फ़िल्मी परिवार था। क्या बड़े होने के साथ फिल्मों में आने का विचार आया था?
    मैं अपने परिवार का पहला स्नातक था। इरादा था कि और थोड़ा पढ़ के कोई नौकरी कर लूं। फिल्मों में आने का कोई विचार नहीं था। फिल्म लाइन की अनिश्चितता का डर था। बीच में डेढ़ साल तक सेल्स मैनेजर की नौकरी भी की। 

    आरंभिक दिनों में किस लेखक ने प्रभावित लिया? कोई कहानी या रचना, जिसका ज़बरदस्त असर रहा?
    मैं गार्डनर, हर्रोल्ड रॉब्बिंस आदि के अंग्रेजी नावेल पढ़ा करता था। कोई विशेष रूचि नहीं थी। 

    पहली फिल्म या नाटक या कोई शो, जिसकी कहानी ने सम्मोहित कर लिया?
    मुझे अपने पिता नानाभाई भट्ट की फिल्म ‘सिंदबाद - द सेलर्स’ ने बहुत प्रभावित किया था। मैं अपने 7-8 दोस्तों के साथ ट्रायल शो देखने गया था। सिंदबाद समंदर में तूफ़ान से घिर जाता है। राक्षसों से लड़ता है। थोडा बड़ा हुआ तो पिताजी से मिलने कादरी साहब और पाठक साहब जैसे लेखक आते थे। वे कहानियां सुनते थे तो मैं घंटों सुना करता था। मुझे लगता है लेखन का कीड़ा वहीं से आया होगा। 

    आपका पहला लेखन जिस पर कोई फिल्म, टीवी शो या कोई और कार्यक्रम बना हो?
    मैंने पहला लेखन फिल्म के लिए ही किया। नहीं लिखता तो ‘आशिकी’ नहीं बनती। गुलशन कुमार ने महेश भट्ट को गानों की एक कैसेट दी और कहा कि एक रोमांटिक फिल्म बना कर दो। गाने लो। महेश ने मना कर दिया पहले। उसने कहा कि मैं तो इंटेंस डायरेक्टर हूँ। मुझ से रोमांटिक फिल्म नहीं होगी। मैंने टेबल के नीचे से पैर मारा कि हाँ कर दे। फिर उसने हाँ कर दी। गुलशन कुमार के ऑफिस से निकलते ही महेश ने वह कैसेट मुझे दे दी और कहा कि गाने सुनकर बताओ। कुछ लिखो। कहानी लिखकर ले आओ। ऐसे मैं राइटर बन गया।  

    ज़िन्दगी के कैसे अनुभवों से आप के चरित्र बनते और प्रभावित होते हैं?
    ज़िन्दगी में मिले किरदार फिल्म राइटिंग में काम आये। स्कूल, कॉलेज, घर-परिवार, अडोस-पड़ोस में किरदार मिलते रहे हैं। उनके हाव-भाव, बोलने का अंदाज और ख़ाससियत ही मेरे किरदारों में आये। डॉक्टर, दूधवाला, वॉचमैन आदि सभी मेरे दिमाग में हैं। 

    क्या आप अपने चरित्रों की जीवनी भी लिखते हैं?
    लिखता हूँ। उसकी पृष्ठ्भूमि, उसका अतीत। एक खांका तो तैयार करता हूँ। सामाजिक, आर्थिक, शारीरिक स्तर कैसा है? यह सब अपने लिए होता है। अगर कभी निर्माता या कलाकार चाहे तो उसको भी लिखकर दे देता हूँ।
     
    अपने चरित्रों के साथ आप का इमोशनल रिश्ता कैसा होता है?
    मेरा कोई रिश्ता नहीं बनता। 

    क्या कभी आप के चरित्र खुद ही बोलने लगते हैं?
    चरित्र अपने आप बोलने लगते हैं। आपने चरित्र अच्छे से गढ़ लिए हैं तो किसी दृश्य में अगर चार चरित्र आ रहे हैं तो चारों अपने आप बोलने लगते हैं। चरित्रों पर लिखने से पहले मेहनत होनी चाहिए। 

    क्या किरदारों की भाषा अलग-अलग होनी चाहिए?
    बिलकुल, बहुत ज़रूरी है। हर किरदार की भाषा थोड़ी अलग होती है। चार पढ़े-लिखे दोस्त भी बात करें तो उनकी भाषा में उनके अनुभव और लहजे आ जाते हैं।  

    संवाद लिखना कितना आसान या मुश्किल होता है? 
    मेरे लिए इतना आसान नहीं है। मैं मुंबई में ही पला-बढ़ा। यहीं की भाषा जानता हूँ। मुंबई के बाहर की भाषा मुझे नहीं आती। मैं ज़्यादा रहा भी नहीं हिंदी राज्यों में। शूटिंग में या कभी घूमने चला गया, लेकिन उससे अनुभव नहीं बढ़ता। दो-चार साल वहां रहें तो सब समझ में आता है। 

    स्क्रिप्ट लेखन का आप का लम्बा अनुभव है। पहले और आज की स्क्रिप्ट राइटिंग में क्या फ़र्क आया है?
    आज की राइटिंग में डीटेलिंग ज़्यादा है। कई बार लिखकर उसे परफैक्ट कर लिया जाता है। पहले स्क्रिप्ट कहाँ लिखी जाती थी? कहानी का एक ढांचा रहता था। उस पर काम शुरू हो जाता था। स्क्रीनप्ले बन जाता था। फिर शूटिंग शिड्यूल के हिसाब से सीन और उसके अनुसार डीटेल में लिखा जाता था। आजकल तो पहले दृश्य से अंतिम दृश्य तक लिख लिया जाता है। 

    दिन के किस समय लिखना सबसे ज़्यादा पसंद है? कोई खास जगह घर में फिल्म लिखने के लिए? कभी शहर भी छोड़ा है?
    सुबह लिखता हूँ। मैं देर तक सोने वाला आदमी नहीं हूँ। क्रिकेट खेला करता था, इसलिए सुबह सात बजे प्रैक्टिस के लिए जाता था। आदत बन गयी सुबह उठने की। पहले खार के एक होटल में मेरा कमरा था। वहां जाकर 9 से 11 बजे तक लिखा करता था। अभी तो 1995 से मेरा ऑफिस है। फिल्म इंडस्ट्री 11-12 के बाद जागती है। दो-ढाई घंटे लिख लेता हूँ। बाहर जाने पर पूरा ध्यान लिखने पर रहता है। ‘ओमकारा’ के लिए विशाल भारद्वाज के साथ मसूरी गया था। वहां जाकर सात दिनों में लिखा था। इसी प्रकार ‘कोई... मिल गया’ लिखने के लिए कहानी का ढांचा लेकर खंडाला गए थे राकेश रोशन के साथ और चार दिनों में लिख लिया था। ‘बाज़ीगर’ को भी चार-पांच दिनों में लिखा था मैंने खंडाला-लोनावाला जाकर। बाहर जाने पर सुबह से शाम तक केवल लिखना ही होता है। फिर काम जल्दी हो जाता है। 

    कभी राइटर ब्लॉक से गुज़रना पड़ा? ऐसी हालत में क्या करते हैं?
    स्विमिंग के लिए या कुछ खेलने चला जाता हूँ। राइटर ब्लॉक कहने की चीज़ है। पेन-पेपर लेकर कुर्सी पर बैठो या लैपटॉप खोल लो तो कुछ न कुछ लिख ही लेते हो। 
     
    लेखकों के बारे कौन सी धारणा बिल्कुल ग़लत है?
    यह धारणा गलत है कि लेखक बहुत पढ़ाकू होते हैं। उन्हें बहुत ज्ञान होता है। हमारा पढ़ने का कोई रूटीन नहीं होता है। हाँ, काम आने पर पढ़ते भी हैं लेखक।
       
    लेखक होने का सबसे बड़ा लाभ क्या है?
    एसी कमरे में बैठ कर काम करते हैं। फिल्म यूनिट के सभी लोग धूप, बारिश और मिट्टी में काम करते हैं। हम कमरे में बैठ कर लिखते हैं। 

    फिल्म के कितने ड्राफ्ट्स तैयार करते हैं?
    चार-पांच में मेरा काम हो जाता है। 

    अपने लेखन कैरियर की अभी तक की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मानते हैं?
    ‘बाज़ीगर’, 'साथी’, ’सड़क’ ,'ओमकारा’ और ‘कोई... मिल गया’। इनमें चुनौतियां थीं। 

    आप की फिल्मों के रीमेक और स्वीकल आये, जैसे कि ‘आशिकी’ और ‘सड़क’। इनमें आपका कोई योगदान रहा?
    ‘सड़क’ और ‘आशिकी’ में मेरा योगदान नहीं था। ‘आशिकी’ देखकर मैंने बोला था कि यह पहली से बड़ी हिट होगी। ‘सड़क’ अभी नहीं देखी है। 

    कई बार कलाकार दृश्य और संवादों में बदलाव करते हैं। क्या यह उचित है?
    मैंने जिन निर्देशकों के साथ काम किया है, वे सभी राइटर से बगैर पूछे कोई बदलाव नहीं करते। अब्बास-मस्तान, रमेश सिप्पी और राकेश रोशन के साथ मेरे अच्छे अनुभव हैं। किसी एक्टर ने कभी कुछ बदलने के लिए कहा तो वे मुझे फोन कर लेते हैं या बुला लेते हैं। जो निर्देशक एक्टर के दबाव में लेखक से पूछे बगैर बदलाव कर देते हैं, वे बाद में पछताते हैं। हमें बाद में संभालना पड़ता है। रिपेयर का काम दर्शक भांप लेता है। 

    कहा जाता है कि लेखन एकाकी काम है। अपने अनुभव बताएं। 
    मैंने तो हमेशा पार्टनरशिप में लेखन किया है। जावेद सिद्दीकी साहब, आकाश खुराना और दूसरे कई। मेरे साथ ज़्यादातर को-राइटर रहते हैं। उनसे फायदा ही होता है। लेखन मेरे लिए एकाकी काम नहीं रहा। कभी अकेला लिखना पड़ा तो निर्देशक को बुला लेता हूँ। 

    फिल्मों में आप के आदर्श लेखक कौन हैं?
    कई लोग हैं। सलीम-जावेद, सचिन भौमिक और गुलज़ार साहब का नाम ले सकता हूँ। इधर जिनके साथ काम किया वे दोस्त हैं। 

    लेखकों की स्थिति में किस बदलाव की तत्काल ज़रुरत है?
    राइटर अपने क्रेडिट के लिए आज भी लड़ रहा है। उसका नाम देने से पता नहीं क्यों प्रोडक्शन हाउस या ओटीटी प्लेटफार्म कतराते हैं।  गीतकारो की लड़ाई अभी चल रही है। उनका नाम नहीं मेंशन किया जा रहा है।  पैसा तो मिलने लगा है। नाम और इज्ज़त भी मिले। इसीलिए हम लोग (एसडब्लूए) अपना अवार्ड देने जा रहे हैं। 

    साहित्य और सिनेमा के रिश्तों पर क्या कहेंगे?
    होना चाहिए। 'ओमकारा’ लिखते समय मेरी आँखें खुल गयीं कि बन्दे ने 400 साल पहले जो लिख दिया, वह आज भी ताज़ा और प्रासंगिक है।  अभी शेक्सपियर की एक कॉमेडी का रूपांतर कर रहा हूँ विशाल भारद्वाज के साथ। साहित्य पर ज्यादा सिनेमा बनना चाहिए। 

    इन दिनों क्या लिख रहे हैं?
    विशाल भारद्वाज के लिए लिख रहा हूँ। अजय देवगन के प्रॉडक्शन हाउस के लिए एक स्क्रिप्ट लिखी है। कुछ ओटीटी के लिए भी लिखा है। 

    अपने फिल्मों में गानों के सिचुएशन आप बताते हैं कि डायरेक्टर तय करता है?
    चाहता हूँ कि मैं तय करूं।  लेखक तय करे तो वह दृश्य का हिस्सा बन जाता है। निर्देशक या निर्माता करता है तो वह आइटम बन जाता है।  वो सुसाइडल है। 

    इंटरवल पॉइंट कौन तय करता है?
    मैं करता हूँ। 

    कौन सा सॉफ्टवेयर इस्तेमाल करते हैं?
    मैं फाइनल ड्राफ्ट इस्तेमाल करता हूँ। 

    फिल्म लेखन में आने के इच्छुक प्रतिभाओं को क्या सुझाव देंगे?
    ज्ञान बढ़ा कर आयें। ज्यादा पढ़ के और देख कर आयें। रोज सिनेमा के चार पैग पीकर आयें। एक घंटा पढ़ो, एक घंटा समाचार देखो, एक कोई भारतीय फिल्म देखो।  इसके अलावा बाहर की फ़िल्में और वैब सीरीज देखो। पूरा अपडेट रहो। फिर आप फिल्मों में आएंगे तो अपना मापदंड साथ में रहेगा। खेल में चैंपियनशिप में जाने के लिए क्वालिफाई तो करना पड़ेगा। बिलकुल आना चाहिए फिल्मों में। 

    अजय ब्रह्मात्मज जाने-माने फिल्म पत्रकार हैं। पिछले 20 सालों से फिल्‍मों पर नियमित लेखन। 1999 से दैनिक जागरण और दैनिक भास्‍कर जैसे प्रमुख अखबारों के साथ फ़िल्म और मनोरंजन पर पत्रकारिता। चवन्‍नी चैप (chavannichap.blogspot.com) नाम से ब्‍लॉग का संचालन। हिंदी सिनेमा की जातीय और सांस्‍कृतिक चेतना पर फिल्‍म फेस्टिवल, सेमिनार, गोष्‍ठी और बहसों में निरंतर सक्रियता। फिलहाल सिनेमाहौल यूट्यूब चैनल (youtube.com/c/CineMahaul) और लोकमत समाचार, संडे नवजीवन और न्यूज़ लांड्री हिंदी में लेखन।