•  डॉ. मनीष कुमार जैसल
    •  19 October 2020
    •  301

    "लेखक के लिए सबसे बड़ा उसका नाम ही होता है। लेखन से जुड़े हर काम में क्रेडिट होना ज़रूरी है।"

    सुपरहिट भोजपुरी रैप सॉन्ग 'बम्बई में का बाँ' के गीतकार डॉ. सागर से बातचीत

    बलिया उत्तर प्रदेश से ताल्लुक़ रखने वाले युवा गीतकार और लेखक डॉ सागर अब मुंबई में स्ट्रगलर नहीं रहे। उनकी क़लम से निकला भोजपुरी रैप सॉन्ग लाखों गीत संगीत प्रेमियों को भा गया है। बलिया से लेकर बंगाल, बिहार और देश के सभी हिस्सों में 'बम्बई में का बाँ' जुबां पर चढ़ गया है। रैप के अंदाज़ में ठेठ देसी बात कहने का ये तरीका काम कर गया है। इसमें पलायन का दर्द, पलायन करने वालो की भाषा में उकेरा गया है, जिसे सुनकर एक ऐसा तबका जो समाज के सबसे निचले स्तर पर है, अपनापन महसूस करता है। अनुभव सिन्हा के निर्देशन में रिलीज़ हुए इस वीडियो सॉन्ग में अभिनेता मनोज बाजपेयी ने अभिनय के साथ साथ अपनी आवाज़ भी दी है। 

    जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय नई दिल्ली से पीएचडी करने के बाद मुंबई आकर फ़िल्मों में गीत लिखना शुरू किया। इनके गीतों में अपनी मिट्टी की वो ख़ुशबू है जो एक संगीत प्रेमी ज़रूर महसूस करता है। बीबीसी में छपे डॉ सागर के एक साक्षात्कार में उनकी ज़िंदगी के कई क़िस्सों का ज़िक्र मिलता है। उनकी आर्थिक तंगी के संदर्भ में भी लिखा है कि "अरे पैसे हों तब तो चाय पीयें। हालत बहुत ख़राब है भाई लोग। वैसे मेरी चाय पर जो पैसे ख़र्च होने वाले हैं, वो अगर मुझे दे दिए जाएँ, तो शायद मेरे लिए वो ज़्यादा अच्छा होगा।" और आज साहिर, शैलेंद्र और फ़ैज़ को अपना आदर्श मानने वाले गीतकार सागर को बेशुमार लोगों का प्यार मिल रहा है साथ ही पैसे भी। सागर के गीतों को फ़िल्म ‘अनारकली ऑफ़ आरा', 'दास देव', 'रिबन', 'लव यू सोनियो’ और ‘मैं और चार्ल्स’ में भी सुना जा चुका है। 

    हमने गीतकार डॉ सागर से उनके अनुभवों और फ़िल्म इंडस्ट्री के संदर्भ में बात की।

     

     

    आपका लिखा भोजपुरी रैप सॉन्ग यूट्यूब पर काफी पसंद किया जा रहा हैं। क्या है गाना व किस पर आधारित है?

    जी, यह निर्देशक अनुभव सिन्हा जी का आइडिया था। इसे अभिनेता मनोज बाजपेयी ने अपनी आवाज दी है। आधुनिकीकरण और महानगरीय व्यवस्था के विकास की चपेट में जिस तरह देश के ग़रीब और दबे कुचले लोग आए हैं यह उनकी ही कहानी है। मूलभूल ज़रूरतों को पूरा करने के लिए गाँव से महानगरों में जाकर, वहाँ रोजी रोटी कमाने के लिए संघर्ष कर रहें ऐसे लोगों की दास्तां हैं, जो आँखों में सपने लिए मायानगरी में आते हैं। यह गाना भी इन्हीं किरदारों के इर्द गिर्द है।

     

    मुम्बई में आपको काम करते हुए 8-10 साल हो गए हैं। इतने समय में अपने भीतर भोजपुरी को ज़िंदा कैसे रखा, भोजपुरी को नए अंदाज के साथ प्रस्तुत करने में आपकी क्या भूमिका रही?

    यह पहली बार हुआ कि मैंने अपना लिखा किसी को भी नहीं भेजा था। मैं देखना चाहता था कि मेरे क्षेत्र बलिया के लोग गाना सुनने के बाद सामने से मुझसे बोले व पसन्द करें। और अब रिश्तेदार, परिचित,गाँव से गाने को पसन्द करने वालों के लगातार कॉल आ रहे हैं। गाने की सफलता पर खुशी जताते हैं क्योंकि वास्तव में यह उनकी ही कहानी है। अपने शहर गाँव में काबिल लोगों को उचित स्थान नहीं मिलने के कारण वे संघर्ष करते हुए भटकते रहते हैं । और बड़े शहरों में आकर मजदूरी करते हैं। यदि इन लोगों को कानपुर, लखनऊ, बनारस, गोरखपुर आदि शहरों में काम मिल जाता तो यह बड़े शहरों में काम की तलाश में क्यूं आते? इसी लिए गाने के बोल हैं 'ना तो बम्बई में का बा' क्यूंकि घर परिवार व गाँव को छोड़कर बम्बई में क्यूँ आऊँ, वहाँ क्या है?

     

    'बागी' बलिया से आए हुए गीतकार डॉ. सागर अभी स्ट्रगलर हैं या नहीं?

    10 साल हो गए इंडस्ट्रीज़ में काम करते हुए। स्ट्रगल तो खत्म हो गया है, अब बेहतर स्थिति है।

     

    आपने लिखना कैसे शुरू किया?

    मैंने तीसरी चौथी कक्षा से ही कविता लिखना शुरू कर दिया था। धीरे- धीरे लोग मेरा लिखा हुआ पढ़ने लगे। और ऐसे ही मैं गाने और कविता लिखने लगा। गरीब परिवार से होने के कारण नौकरी की इच्छा थी, इसलिए पढ़ाई में पीएचडी की। लेकिन फिर मुम्बई आने के बाद काम मिलना शुरू हो गया। और फिर यही रोज़ी रोटी का ठिकाना बन गया।

     

    कुछ ऐसे अनुभव या ऐसे पल बताएँ, जो आपको सदैव स्मरणीय रहेंगे।

    जी, जब अनुभव सिन्हा जी को मैंने यह कविता सुनाई तो उन्होंने कहा था कि "तुम पहले ऐसे लेखक हो जो मेरी परीक्षा में पहली बार में पास हो रहे हो", यह बात मुझे हमेशा याद रहेगी।

     

    मुम्बई में आने वाले दिनों में नया क्या करने वाले हैं?

    मैं साउथ के म्यूजिक डायरेक्टर ई राजा के साथ काम कर रहा हूँ । कुछ नई फिल्में आने वाली हैं, उनके कुछ गानों पर भी काम कर रहा हूँ।

     

    हाल ही में स्वानंद किरकिरे, वरुण ग्रोवर जैसे कई शीर्ष गीतकारों ने ये मुद्दा उठाया है कि म्यूज़िक एप्स और यूट्यूब पर लिरिसिस्ट का नाम नहीं दिया जाता है। आपका क्या ख़याल है?

    लेखक के लिए सबसे बड़ा उसका नाम ही होता है। लेखन से जुड़े हर काम में नाम का होना ज़रूरी है। क्रेडिट मिलना ही चाहिए। सलीम-जावेद ने नामों को लेकर लड़ाइयाँ लड़ी हैं। और इतनी आसानी से लेखक का नाम हटाना या नहीं दिखाना उचित नहीं है। क्योंकि सिर्फ पैसा देने भर से लेख़क का अस्तित्व नही बचा रह पाएगा।

     

    भोजपुरी गाने अश्लीलता को लेकर बदनाम है। क्या डॉ. सागर के गाने इसमें परिवर्तन ला सकेंगे?

    रिलीज़ हुए गाने को लेकर युवाओं ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। सही टिप्पणियाँ की हैं। कई युवा जो लिखना चाह रहे थे वो इस गाने को सुनकर लिखना भी प्रारंभ कर चुके है। जल्द ही परिवर्तन आएगा और अब आने वाले युवा और भी बढ़िया लिखेंगे।

     

    पहली बार भोजपुरी में रैप सॉन्ग इतना हिट हुआ है। क्या आगे भी इस तरह के गानों का प्रचलन होगा?

    लोगों ने इसे काफी पसन्द किया है। यदि इंडस्ट्री में बड़े अभिनेता- निर्देशक इस तरह का रैप बनायें तो इनके लोकप्रिय होने में समय नहीं लगेगा, बल्कि एक दौर भी शुरू हो जाएगा।

     

    बलिया पर आने वाले समय में कुछ लिखेंगे?

    (मुस्कुराते हुए) जी बिल्कुल, बलिया तो जन्मभूमि हैं, बलिया से तो मोहब्बत है। बलिया के लोग रसीले होते हैं, बलिया के नाम पर जोशीले होते हैं। यदि जब भी ऐसा कोई मौका आएगा तो बिल्कुल लिखूंगा।

     

    लेखक बनने के लिए में 'फॉर्मल ट्रेनिंग' की कितनी ज़रूरत महसूस करते हैं आप?

    देखिए, मैंने ख़ुद जेएनयू से पीएचडी की है। सहायक प्रोफ़ेसर के लिए कुछ इंटर्व्यूज़ दिए लेकिन सफल नहीं हूँ। मुंबई आया तो अकादमिक जीवन भूल सा गया। लेकिन ऐसा लगता है और होना भी चाहिए कि सिनेमा और फिल्म लेखन को एक विषय के तौर पर विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाये, जिससे नई पीढ़ी जो मुंबई आए वो और परिपक्व हो।

     

    छोटे शहर से गीतकार बनने का सपना देखकर मुंबई आने वाले युवाओं को क्या संदेश देना चाहते हैं?

    मेरा युवाओं से बस यहीं कहना है कि पूरी तैयारी के बाद यहाँ आएँ। खुद पर विश्वास होना भी बहुत ज़रूरी है, और साथ में ज्ञान भी। बिना तैयारी के किसी भी लक्ष्य तक नहीं पहुंचा सकता, इसलिए अध्ययन करने के साथ तैयारी करके आयें। यदि आपमें हुनर व ज़ज़्बा हैं तो यकीनन आपको आपका स्थान ज़रूर मिलेगा।

    डॉ. मनीष कुमार जैसल मंदसौर यूनिवर्सिटी, मध्य प्रदेश, में जनसंचार एवं पत्रकारिता के सहायक प्रोफेसर हैं । नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी नई दिल्ली के बुक फ़ेलो और सहपीडिया यूनेस्को के रिसर्च फ़ेलो भी रह चुके हैं। फ़िल्मकार मुजफ्फर अली पर किताब 'फिल्मों का अंजुमन: मुजफ्फर अली' प्रकाशित। सेंसरशिप और सिनेमा पर पीएचडी। नियमित आलेख और संगोष्ठियों में वाचन। संपर्क: mjaisal2@gmail.com