•  अजय ब्रह्मात्मज
    •  13 October 2020
    •  686

    मेरे लिए लेखन अनुष्ठान और अनुशासन है। 

    अजय ब्रह्मात्मज के सवाल, लेखकों के जवाब: दिलीप शुक्ला (दूसरा भाग)

    (पहले भाग से आगे। लिंक : https://www.swaindia.org/article_dyn.php?q=TVRJMg== )

     

    कभी राइटर ब्लॉक से गुज़रना पड़ा? ऐसी हालत में क्या करते हैं?

    कई बार फिल्म लिखते हुए पता चल जाता है कि आप ठीक नहीं जा रहे हैं। कहानी में अगर यह पता है कि कहां जाना है और कैसे जाना है तो कहानी बनती जाती है। कई बार हम रास्ते गलत पकड़ लेते हैं। तब राइटर ब्लॉक होता है। कई बार ऐसा होता है कि लिखने बैठे हो और इंटरवल के बाद का सेकंड हाफ़  नहीं मिल पा रहा है। मैंने एक फिल्म लिखी थी ‘ज़िद्दी’। इस फिल्म में सनी देओल थे। ऊटी में शूटिंग चल रही थी। मैं भी गया हुआ था। एक दिन हम लोग कॉफ़ी शॉप में बैठे बातें कर रहे थे। किसी ने पॉइंट निकाला। वह पॉइंट इतना वाजिब था कि उसकी वजह से फिल्म का सेकंड हाफ़ ग़लत लग रहा था।  मुझे भी उनका पॉइंट सही लगा और मैंने स्वीकार किया। मैंने कहा कि इसे ठीक किया जा सकता है। सवाल था कि क्या आप सनी को फिर से मिलकर स्टोरी सुनाएंगे। वे तो पहले से ही कॉन्फिडेंट है तो अब कहानी बदलने की क्या जरूरत है? कहीं उनके दिमाग में यह ना आ जाए कि स्क्रिप्ट तैयार नहीं है।  मेरे दिमाग में था कि हमें गलती की जानकारी मिल गई है फिर भी अगर हम सुधार नहीं करते तो यह ठीक बात नहीं होगी। अपनी टीम के साथ में चार-पांच दिन बैठा। रीराइट किया। फिल्म बनी और हिट रही। कभी-कभी हम फंस जाते हैं। चार-पांच दिन उस पर विचार करते हैं। फिर भी कोई रास्ता नहीं निकलता तो हम ब्रेक ले लेते हैं। मेरी फिल्मों में यह नहीं हो सकता है कि आप किसी और की फिल्म देखकर उसका ट्रैक पकड़ ले। ना मैं कभी इस अभ्यास में गया हूं कि चलो कोई फिल्म देख लेते हैं, वहां से आइडिया ले लेते हैं। अगर मैं फंसता हूं तो उसका हल मुझे ही निकालना होता है।  

     

    लेखकों के बारे कौन सी धारणा बिल्कुल गलत है?
    लेखकों के बारे में यह धारणा गलत है कि लेखक ग़ैरज़िम्मेदार होते हैं। लेखक थोड़े से मूडी और फकीर टाइप के होते हैं। जो लोगों को ग़ैरज़िम्मेदारी लगती है। उसके बारे में मैं यही कहूंगा कि अगर वह छापता नहीं है और दिल से लिखता है, मौलिक बात करता है तो मूड से काम करता है। आप उससे ज़बरदस्ती नहीं कर सकते। ऐसा ना सोचें कि वह जानबूझकर ऐसा कर रहा है। अगर वह जानबूझकर ऐसा करेगा तो बाज़ार में उसे काम कौन देगा? अब मान लें कि मैंने किसी को कहा कि मैं सोमवार को दे दूंगा। हो सकता है मैं रविवार को फोन करके कहूं कि भाई मैं सोमवार को नहीं दे पाऊंगा। मैं बुधवार-गुरुवार को दूंगा। मैंने देखा है कि मौलिक लेखक कई बार अनुशासन में नहीं चल पाता है। 

     

    लेखक होने का सबसे बड़ा लाभ क्या है?
    लेखक होने का सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि लेखक कभी अकेला नहीं होता। हमारे साथ एक दुनिया चलती है। हम अपनी दुनिया बनाते हैं। उस पर मेरा पूरा अधिकार भी होता है। मुझे तो ऐसा लगता है कि मैं हमेशा मेले में रहता हूं। मेरे साथ मेरे बनाए किरदारों का हुजूम रहता है। उनके साथ में सुरक्षित महसूस करता हूं। इस पूरे संधान में कोई पैसा नहीं लगा होता है और ना कोई पूछ सकता है कि आप ऐसा क्यों कर रहे हैं? लेखक होने से आप समाज से जुड़े रहते हैं और वाकई समाज को कुछ देते भी हैं। जब लोग सराहते हैं तो बहुत खुशी होती है, क्योंकि किसी का फायदा होता है और फिर आपकी भी ग्रोथ होती है। जब भी आप की कहानी सफल होती है तो आपके व्यक्तित्व का विकास होता है। हर नई कहानी के साथ एक नई दुनिया बनती है और वह आप में कुछ जोड़ती जाती है। 

     

    अपने लेखन करियर की अभी तक की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मानते हैं?
    उपलब्धि के हिसाब से अभी कोई बहुत मज़बूत काम नहीं कर पाया हूं। फिर भी संतोष है कि खराब काम नहीं किया है। मैं इसको उपलब्धि ही मानता हूं कि मैंने दबाव में कोई भी फिल्म नहीं लिखी। अभी वैब सीरीज़ के दौर में मेरे पास विकास दुबे पर लिखने के ऑफ़र आ रहे हैं। मैंने सोचा कि मैं इस पर क्या लिखूंगा? मैं फिर से वही लिखूंगा जो सबका देखा-सुना और जाना हुआ है। मैं ऐसे कैरेक्टर पर काम क्यों करूं, जिसने पुलिसवाले मारे है और बाद में वह मारा गया। मैं क्यों फिर से लिखकर बताऊं कि उसने ऐसा किया? जब भी मुझे कोई प्रस्ताव मिलता है तो मैं सोचता हूं कि मैं यह क्यों देखूं? अगर मुझे जवाब नहीं मिलता है तो मैं नहीं लिखता हूं। मुझे अपनी फिल्मों में ‘दामिनी’ और कॉमेडी में ‘अंदाज अपना अपना’ पसंद है। इसके अलावा बच्चों के लिए मैंने एक फिल्म लिखी है ‘गट्टू’, जिसे अभी बच्चों की 10 श्रेष्ठ फिल्मों में शामिल किया गया। 

     

    कई बार कलाकार दृश्य और संवादों में बदलाव करते हैं। क्या यह उचित है?
    कुछ फिल्में ऐसी होती हैं, जिसमें लगातार कुछ न कुछ जोड़ना पड़ता है। लोगों के साथ मिलकर उस में कुछ एड करते रहना पड़ता है। ऐसी फिल्मों में हम बहुत सख़्त नहीं होते हैं। ‘दबंग’ सीरीज़ की फिल्में लें तो उसमें मैं बहुत सख्त नहीं रहता हूं। अगर कोई स्टार हमारी फिल्म कर रहा है और उसका अपना करिश्मा है तो उसकी बात सुननी चाहिए। उसका एक बाज़ार है। कई बार हम स्टार के करिश्मे को भुनाने की कोशिश करते हैं। ‘दबंग’ फिल्म की ही बात करें तो सलमान ने इस फिल्म में पीछे कॉलर में चश्मा लगा लिया। अब वह स्क्रिप्ट का हिस्सा नहीं था। कमर्शियल फिल्मों में इसकी गुंजाइश बनी रहती है। अब जैसे कि शूटिंग चल रही है, उसी बीच में एक गाना आ गया। गाना फिल्म के हीरो को अच्छा लग गया। फिर बात आती है कि उसे फिल्म में डाल सकते हैं क्या? फिर से सिचुएशन खोजा जाता है। पता चलता है कि माँ तो मर चुकी हो। गाना अभी आया। फिर सजेशन आता है कि भाई पहले गाना सुना दो फिर मां को मारना। कमर्शियल सिनेमा में यह सब हो सकता है, लेकिन ‘दामिनी' जैसी फिल्म में तो संवादों के साथ चलना पड़ेगा। दृश्य भी उसके तय हैं। अब ‘दामिनी’ फिल्म में उसका हस्बैंड इंप्रोवाइज़ कर दे तो बात तो बिगड़ जाएगी। वहां एक लाइन भी बदलना मुश्किल पैदा करेगा। छोटी-मोटी तब्दीलियां चलती हैं, लेकिन मूल कहानी के अनुशासन का पालन करना चाहिए। अब यह निर्देशक की ज़िम्मेदारी है कि वह कैसे इन चीजों को संभाले। डायरेक्टर कमज़ोर हो तो आप देखेंगे कि फिल्म खड़ी होने के पहले उखड़ जाती है। 

     

    फिल्मों में आपके आदर्श लेखक कौन हैं?
    गुलज़ार साहब के काम से मैं बहुत प्रभावित हूं। उनकी फिल्मों का मीठा इमोशन लाजवाब है। उनकी दुनिया मुझे बहुत अच्छी लगती है। उसके बाद सलीम-जावेद हैं। ‘दीवार’ की स्क्रिप्ट देख लीजिए। फिल्म लेखन का करिश्मा उनकी फिल्मों में है। उनकी फिल्मों ने मुझे बहुत प्रेरित किया है। 

     

    इन दिनों क्या लिख रहे हैं?
    मैं आजकल ‘फूलपुर की गुड्डन’ लिख रहा हूं। फिल्मों के अलावा भी कुछ लिख रहा हूं। भगवान राम पर एक टॉक शो करने का इरादा है। ‘वाह वाह रामजी’ नाम रखा है। दूसरा एक वैब सीरीज़ लिख रहा हूं ‘तर्पण’। धर्म-कर्म कराने वाले हमारे पुरोहित पंडा घर-परिवार के सारे अनुष्ठान और आयोजनों में पंडे-पुरोहित की भूमिका रहती है। एक फिल्म मेडिकल और डॉक्टर की दुनिया पर लिखना चाहता हूं। मेडिकल इंडस्ट्री आज किस रूप में आ गई है? इसकी चर्चा होगी। शायद उसका नाम ‘हैलो डॉक्टर’ होगा। मैं हत्या, रोमांच, अपहरण, हिंसा जैसी वैब सीरीज़ नहीं लिखना चाहता। अवैध रिश्तो की कहानी लिखने का कोई मन नहीं है। 24 साल की एक लड़की कहानी उत्तरा की कहानी लिखने का इरादा है। वह नायिका बनती है। उसके पिता का नाम नारायण पाठक है। उसका नाम मैंने रखा है ‘मैं उत्तरा नारायण पाठक’। वह कैसे स्थानीय गुंडे के साथ उलझ जाती है फिर कैसे वहां से निकलती है, गुंडे को नकेल डालती है। एक और कहानी कर रहा हूं, जिसमें 24 साल का एक लड़का क्राइम की दुनिया में आ गया है। इस छोटी उम्र में उसने 26 हत्या कर दी है पिछले चार सालों में। वह कहता है कि अगले साल तक में 30 पूरा कर दूंगा। उस लड़के का कद कम है। वह इतना नाटा है कि लोग उसे छोटू बोलना शुरू कर देते हैं। कद ही उसका कॉन्प्लेक्स है। अगर वह कद में ढाई इंच बड़ा होता तो वह समाज का सामान्य नागरिक होता। उसी अपमान की खुन्नस में वह अपराध की दुनिया में घुसता है और फिर हत्याएं करता है। आखिर में पुलिस उसे भारती है। इसे मैंने आगरा मैं रखा है। अपराध की दुनिया में ज़्यादातर अपराधी के बच्चे या राजनीतिज्ञ के बच्चे जाते हैं। मैंने इसे बिजनेस परिवार से रखा है। कुछ फिल्मों में हमने देखा है कि बहन-माँ के साथ या परिवार के साथ कुछ हो गया तो नायक से हत्या हो गई और फिर वहां अपराधी बन गया। वह बेरोज़गार भी नहीं है। उसे कामकाज की दिक्कत नहीं है। पैसों की दिक्कत नहीं है। मैंने दिखाया कि एक व्यापारी का लड़का कैसे अपराधी बनता है। जिस परिवार के संस्कार में व्यापार हैं, उस घर के लड़के को मैंने अपराध में जाते दिखाया है।  वह पेठे का धंधा करते हैं। केवड़ा-गुलाब इत्र में जो लड़का बड़ा हुआ है। चासनी के बीच पला वह लड़का कैसे अपराध में चला गया? यही कहानी है और इस फिल्म का टाइटल मैंने रखा है ‘नाइन आवर्स इन लोहा मंडी’। आगरा के लोहा मंडी में एनकाउंटर होता है। नौ  घंटे की फायरिंग के बाद सुबह में पुलिस उसे मारती है। संदेश यही है कि अपराध की दुनिया से बाहर रहो नहीं तो इस लड़के का जो हश्र हुआ, वही हश्र होगा। अपराध जीवन छीन लेती है, इसलिए सतर्क रहना चाहिए।  

     

    आपकी फिल्मों में गानों के सिचुएशन आप तय करते हैं या कोई और?
    गाने के सिचुएशन तो इसको लिखने के साथ होने लगते हैं। लगता है कि दृश्य ज़्यादा हो गए तो देखा जाता है कि कहां गाना आ सकता है। कमर्शियल सिनेमा में यह दिक्कत रहती है कि कुछ गाने पहले से तैयार रहते हैं। हीरो अपने गाने लेकर आता है। कभी-कभी ऐसा होता है कि इंटरवल के पहले कुछ गाने हैं। इंटरवल के बाद के सीन भारी हो जाते हैं तो सुझाव आता है कि गाना डाल दो। 

     

    लिखने के लिए कौन सा सॉफ्टवेयर इस्तेमाल करते हैं? 
    मैं कोई सॉफ्टवेयर से इस्तेमाल नहीं करता। मैं और मेरे साथ के बच्चे हाथ से लिखते हैं और बाद में कंप्यूटर पर टाइप करते हैं। मुझे लगता है कि लैपटॉप का कम से कम इस्तेमाल हो तो बेहतर। किसी भी स्क्रिप्ट के बहुत सारे ड्राफ्ट न लिखे जायें तो ज्यादा अच्छा। थोड़ा-थोड़ा चेंज करके अनेक ड्राफ्ट बन जाते हैं तो आजकल उसकी वजह से कन्फ्यूजन बढ़ता चलता है। हम लोग हाथ से नोट्स बनाते रहते हैं। इस काम में कई बार दो-चार महीने भी लग जाते हैं।  पहला ड्राफ्ट हम इस तरह से तैयार करते हैं कि वह करीब-करीब ठीक ही लगे। 

     

    फिल्म लेखन में आने के इच्छुक प्रतिभाओं को क्या सुझाव देंगे?
    फिल्म लेखन में आने वाले लड़के सबसे पहले पढ़ाई करें। खूब अच्छी तरह से। अभी जो समय है, उसमें ज़रूरी नहीं है कि मुंबई आकर के ही लिखें।  आजकल तो इतने माध्यम है और तरीके हैं। आप चाहे तो शॉर्ट फिल्म लिख सकते हैं। आपको मेल आईडी मिल जाते हैं। आप लिख करके उन लोगों को भेज दीजिए। आप किताबें लिख सकते हैं। परिवार चाहता है कि आप कोई और काम करके परिवार का खर्च चलाएं तो वह काम करते हुए आप किताबें लिख सकते हैं। फिर किसी निर्माता को कहानी पसंद आ गई तो आपकी किताब के अधिकार खरीद लेगा। अब ज़रूरी नहीं है कि धक्के खाने आप मुंबई आयें। मैंने पहले बताया था कि मैं ज़्यादा पढ़ नहीं पाया था। आज पछताता हूं कि मैं पढ़कर आया होता तो शायद और बेहतर कर पाता। हां, बहुत कुछ पढ़ें-देखें-सीखें, लेकिन जब भी कोई कहानी लिखें तो वह आपकी ओरिजिनल कहानी हो। मौलिक हो। उसमें आपका कोई विचार जरूर होना चाहिए। विचार रखें और विश्वास भी रखें। सारा मोहल्ला जैसी पतंग उड़ा रहा है वैसी पतंग आप भी उड़ाने लगे तो क्या मज़ा है? 

     

    लेखकों की स्थिति में किस बदलाव की तत्काल ज़रुरत है?
    पिछले एक दशक में लेखकों के अधिकार वगैरह की बातें होने लगी हैं। आपको एक नहीं सैकड़ों किस्से मिलेंगे। क्रेडिट का चक्कर भी है। छिछोरे दिमाग के कुछ लोग क्रेडिट ना देने की गलीज हरकतें करते हैं। इस तरह वे अपना छोटापन दिखाते हैं। लेखक सीधे डायरेक्टर से शेयर करता है। फिल्म के स्क्रीन पर जब लेखक का नाम आता है तो अपने आप आधा क्रेडिट उसे मिल जाता है। इन दिनों हर निर्देशक की कोशिश होती है कि लेखन से जुड़ जाए। निर्देशक जब से लेखक बने हैं, तब से इस तरह की प्रवृत्ति बढ़ी है। 

    अजय ब्रह्मात्मज जाने-माने फिल्म पत्रकार हैं। पिछले 20 सालों से फिल्‍मों पर नियमित लेखन। 1999 से दैनिक जागरण और दैनिक भास्‍कर जैसे प्रमुख अखबारों के साथ फ़िल्म और मनोरंजन पर पत्रकारिता। चवन्‍नी चैप (chavannichap.blogspot.com) नाम से ब्‍लॉग का संचालन। हिंदी सिनेमा की जातीय और सांस्‍कृतिक चेतना पर फिल्‍म फेस्टिवल, सेमिनार, गोष्‍ठी और बहसों में निरंतर सक्रियता। फिलहाल सिनेमाहौल यूट्यूब चैनल (youtube.com/c/CineMahaul) और लोकमत समाचार, संडे नवजीवन और न्यूज़ लांड्री हिंदी में लेखन।