•  अजय ब्रह्मात्मज
    •  08 October 2020
    •  674

    "कहानी का विस्तार ही पटकथा है।"

    अजय ब्रह्मात्मज के सवाल, लेखकों के जवाब: दिलीप शुक्ला (पहला भाग)

    जन्मस्थान 

    दिलपुर, जिला-रायबरेली (उत्तर प्रदेश)। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का गांव दौलतपुर मेरे गांव के पास ही है। 

     

    जन्मतिथि 

    13 जुलाई 1962
     

    शिक्षा-दीक्षा 

    मैं स्नातक नहीं कर सका। आठवीं तक गांव में पढ़ाई की। मेरे पिता रेलवे में नौकरी करते थे तो उनके पास लखनऊ में पढ़ने आया। इंटर करने के बाद कुछ ऐसा हुआ कि मैं मुंबई आ गया। 

     

    मुंबई कब पहुंचे?

    मई 1982 में मुंबई आया था और सिर्फ लिखने के लिए ही आया था। 

     

    लेखन प्रशिक्षण और अभ्यास?

    मैंने कोई प्रशिक्षण नहीं लिया। मुंबई आने के बाद शुरू में थिएटर ही किया, क्योंकि लखनऊ में थिएटर कर रहा था। दो-तीन नाटक लिखे और उनको डायरेक्ट भी किया। बाद में अनुभवी लोगों के साथ उठना-बैठना हुआ तो उनसे स्क्रीनप्ले लिखना सीखा। राज जी(राजकुमार संतोषी) के साथ मुझे फिल्म ‘घायल’ मिली। उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला। उनकी स्कूलिंग श्याम बेनेगल और गोविंद निहलानी के साथ हुई थी। उनका बहुत गहरा प्रभाव रहा। वह स्वयं एक अच्छे लेखक हैं। राज जी के साथ चार-पांच साल रहा और लगातार सीखता रहा। मैं किसी इंस्टिट्यूट मैं नहीं गया हूं फिल्म लेखन पढ़ने के लिए।

     

    कहानी लिखने का विचार कैसे आया? पहली कहानी कब लिखी थी? वह कहीं छपी थी या कोई और उपयोग हुआ था?

    जब मैं गांव में था, छठी क्लास में। एक बार 26 जनवरी के मौके पर स्कूल के बच्चों को कुछ ना कुछ परफॉर्म करना था। वहां मैंने कहा कि मैं स्पीच दूंगा।  मैंने मास्टर जी से कहा कि लिख कर दें कि क्या बोलना है? उन्होंने मना कर दिया। उन्होंने कहा कि तुम ही लिख लो, तुम्हें बोलना है। उनके ऐसा कहने पर क्लास के बच्चे हंसने लगे तो मैंने चुनौती की तरह लिया। मैंने सोचा कि अगर मैं बोल सकता हूं तो मैं लिख भी सकता हूं। तो जोश में मैंने कुछ लिख दिया। मेरी हिंदी तो अच्छी थी। वह पहला भाषण था, जो मेरे लिखा हुआ था। मेरा परफॉर्मेंस बहुत अच्छा रहा तो मास्टर जी ने बहुत प्यार किया। तारीफ की। मैंने भी सोचा कि यह तो कमाल हो गया। घर पहुंचा। मेरी मां को लोगों ने पहले बता दिया था। मां ने कहा कि तुम स्पीच रिपीट करो। मैंने जब घर में किया तो वैसी बात नहीं हुई, जो स्कूल में हुई थी। मुझे लगा कि शायद स्कूल में मंच था और सामने बच्चे बैठे हुए थे। वह माहौल घर पर नहीं हो सका। मैंने कहा भी कि मुझसे नहीं हो पाएगा। तो मां को गुस्सा आ गया। उन्होंने मुझे एक चांटा जड़ दिया। मां का चांटा मुझे इतना बुरा लगा कि मैंने घर छोड़ दिया। मैंने तय किया कि मैं मामा के पास जाकर मां की शिकायत करूंगा। मैं पैदल ही निकल पड़ा। लगभग 30 किलोमीटर चला गया था। रास्ते में एक राहगीर से मैंने पूछा, ‘क्यों उन्नाव कितनी दूर है?’ उस राहगीर को कुछ शक हुआ। उसने पूछा, ‘कहां जा रहे हो? कैसे जा रहे हो?’ फिर मेरी बात सुनकर वह मुझे अपने साथ अपने घर ले गया। उसके घर में मेरी बहुत आवभगत हुई। सभी ने प्यार किया। उन्हें लगा कि कोई बच्चा घर से किसी बात पर नाराज़ होकर भाग आया है। मैं उन्हें पूरी बात नहीं बता रहा था। क्योंकि मुझे डर था कि वह मुझे वापस घर छोड़ आएंगे। रात में उनके ही घर रुका। सुबह उन लोगों ने फिर से मुझे समझाया-बुझाया और फिर छोड़ने घर आए। स्कूल में बोलना मेरे लिए प्रस्थान बन गया। अच्छा लगा कि मैं कुछ सोच सकता हूं, लिख सकता हूं और बोल सकता हूं। वहीं से कल्पना से कहानी लिखने की आदत बनी। मनगढ़ंत कहानियां बनाकर लोगों को सुना कर मज़े लेना आदत बन गयी। गांव से मेरा स्कूल 5 किलोमीटर दूर था तो हम सारे बच्चे पैदल ही जाते थे और रास्ते में मैं उन्हें कहानी सुनाया करता था। मुझे अच्छी तरह याद है कि स्कूल के रास्ते में एक सूखा पेड़ था - ठूंठ। दूर से वह किसी वृद्ध की आकृति लगता था। मैंने अपने साथियों को एक मनगढ़ंत कहानी सुनाकर डरा भी दिया कि 'देख।  उसके हाथ फैले हुए हैं और वह हमें बुला रहा है। मैं कल इधर से लौट रहा था तो वह ही ही ही कर रहा था।' फिर सारे बच्चे इतना डर गए कि हम लोग का निकलना वहां से मुश्किल हो गया। ख़ैर उसी समय एक बैलगाड़ी वहां आई, जिससे हम लोग वहां से निकल सके। थोड़ा बड़े होने पर लखनऊ आ गया। फिर लखनऊ में मैंने रामलीला की और उस छोटी उम्र में ही मैंने दशरथ की भूमिका निभाई थी। बाद में लक्ष्मण की भी भूमिका निभाई। इंटर करने तक सिनेमा प्रभावित करने लगा था। उन्हीं दिनों से मैं फिल्मों में राइटिंग पर गौर किया करता था। लेखकों के नाम पता करता था। मेरे लिए अमिताभ बच्चन की एक्टिंग ज़्यादा महत्वपूर्ण नहीं थी। मेरे लिए फिल्म के संवाद ज्यादा महत्वपूर्ण थे। धीरे-धीरे यह बात दिमाग में बैठ गई कि मुंबई जाना है और फिल्म में लिखना है। मैंने सोचा कि फिल्में लिखने से बात बहुत लोगों के पास पहुंचेगी। अभी जैसे मैं कानपुर में बैठकर मुंबई की फिल्में देखता हूं, वैसे सब लोग मेरी लिखी हुई फिल्म देखेंगे। लाखों-करोड़ों लोगों तक अपनी बात पहुंचा पाऊंगा। यही सब सोचकर मैं छोटी उम्र में ही मुंबई आ गया। 1989 तक में थिएटर और डबिंग आदि काम करता रहा।  

     

    आरंभिक दिनों में किस लेखक ने प्रभावित लिया? कोई कहानी या रचना, जिसका ज़बरदस्त असर रहा?

    शुरू में मुझे सबसे ज़्यादा प्रेमचंद ने प्रभावित किया। स्कूल के दिनों से ही उनकी राइटिंग मुझे छू जाती थी। मैंने उनकी ‘मंत्र’ कहानी का नाट्य रूपांतरण किया था। उस नाटक में मैंने वृद्ध की भूमिका भी निभाई, जो मंत्र का जानकार होता है। उसके बाद मैंने ‘बड़े भाई’ लिखी। मेरे दोनों ही नाटक बहुत चर्चित हुए। उनके बारे में अखबारों में भी लिखा गया। प्रभाव की बात करें तो मैं ‘मंत्र’ का ही नाम लूंगा। बहुत ही रोचक कहानी है। इसमें ढ़ेर सारे ट्विस्ट और टर्न हैं।  ‘बड़े भाई’ में भाइयों के संबंध की मधुरता है। इनका रूपांतरण करते हुए मुझे बहुत रस आया। नाटक के अलावा मुझे आल्हा बहुत प्रभावित करता था। लल्लू बाजपेई का आल्हा सुनने के लिए मैं दूर दूर चला जाया करता था। नौटंकी देखने का भी शौक था मुझे और मैं दूर दूर चला जाता था नौटंकी देखने। ‘अमर सिंह राठौड’, ‘सत्यवादी हरिश्चंद्र’ जैसे नाटक देखे। हम लोगों के समय में मनोरंजन के यही माध्यम थे। 

     

    आप का पहला लेखन जिस पर कोई फिल्म, टीवी शो या कोई और कार्यक्रम बना हो?

    1989 में मुझे राज साहब की ‘घायल’ मिली। मेरा सात सालों का लंबा संघर्ष रहा। ऐसा संघर्ष, जिसमें दूसरे हिम्मत हार जाते हैं और लौट जाते हैं। मैंने तय कर लिया था कि जो भी होगा, यहीं रहेंगे। वापस नहीं जाएंगे। मैं ख़ुद से सवाल कर ख़ुद को ही जवाब देता था। मैं ख़ुद को ही प्रोत्साहित किया करता था और फिर मैं ज़ोर से लग जाता था। ख़ुद को ही शाबाशी देता था। ख़ुद को ही किसी काम से मना करता था। मेरा मानना है कि मन का विश्वास आपको गति में रखता है और परिणाम तक ले जाता है। मैंने महसूस किया है कि मेरे साथ काम करने वाले जवान बच्चे भी थक जाते हैं। 

     

    ज़िन्दगी के कैसे अनुभवों से आप के चरित्र बनते और प्रभावित होते हैं?

    मैं छोटी उम्र में ही मुंबई आ गया था। शुरू के सालों में जहां-जहां रहा, जिस-जिस घर में पीजी रहा, जिन इलाकों में अलग-अलग जाकर रहा। बस्तियों और झुग्गियों में भी रहा कुछ दिनों तक धारावी में भी रहा फिर थोड़े अलग ढंग के लोगों के साथ संगत हुई तो दूसरी दुनिया भी देखी। इन अनुभवों से मेरे ज़िंदगी से आए सारे चरित्र ही फिल्मों में आते हैं। मैं कहीं से भी ग्रहण कर लेता हूं। ट्रेन में जा रहा हूं तो किसी से बातें कर लूंगा। रिक्शे पर बैठा हूं तो रिक्शेवाले से बातें कर लूंगा। लखनऊ में ऐसा कई बार कर चुका हूं कि रिक्शा लिया तो दिन भर उसके साथ घूमता रहा और उससे बातें करता रहा। उसे अलग से पैसे भी दिए। 
    रिक्शेवाले की बातें सुनकर मुझे बहुत सारी जानकारी मिल जाती है, जो किरदारों के स्वभाव बनाने में काम आती हैं। लेखक होने की वजह से कल्पनाशील हूं तो अपने चरित्र गढ़ लेता हूं। अब ‘दबंग’ के पांडेजी की बात करूं तो स्कूल के दिनों में हमारे थाने में एक दरोगा आए थे। उनके किस्से हम लोग सुना करते थे कि फलां फलां गुंडे को बुलाया उन्होंने और थाने में उल्टा लटका दिया। दरोगा थोड़े दबंग टाइप के थे और उनके नाम से लोग डरते थे। उनके आने की ख़बर लगते ही पूरे गांव में हलचल हो जाती थी कि आज दरोगा जी आएंगे। मुझे यही लगता है कि ‘दबंग’ लिखते समय वही दरोगा मेरे दिमाग में थे। विदेशों की फिल्में मैंने बहुत कम देखी हैं तो मेरे सारे किरदार भारतीय ही होते हैं। 

     

    चरित्र गढ़ने की प्रक्रिया पर कुछ बताएं? क्या आप अपने चरित्रों की जीवनी भी लिखते हैं?

    चरित्र गढ़ते समय हम बहुत सोच-समझ कर उसका नामकरण करते हैं। नामकरण के समय हम सोचते हैं कि यह नाम उसे कैसे मिला? क्या किसी ने दिया या मां बाप ने रख दिया? फिर उसके बाद विचार, आचार-व्यवहार तय करते हैं। उसकी जीवनशैली और बाकी चीज़ों पर भी विचार कते हैं। बहुत सारी ऐसी बातें भी सोच लेते हैं, जिसका स्क्रिप्ट में कोई ज़िक्र नहीं होता है। उसके बचपन के बारे में सोचते हैं बचपन कि कोई घटना हो सकती है। अभी मैं जिस फिल्म पर काम कर रहा हूं, उसमें मेरा किरदार मेरे बचपन के एक अनुभव से लिया गया है। मैंने कभी एक किस्सा सुना था कि दो भाई थे। दोनों एक-दूसरे को बहुत प्यार करते थे। बड़े भाई ने छोटे भाई को एक चिड़िया पकड़ कर दी। छोटे भाई ने उस चिड़िया को पिंजड़े में रख दिया। उससे खेलता रहा। ठंड का मौसम था। अगले दिन सुबह धूप निकली तो छोटे भाई को ख्याल आया कि थोड़ी देरी इसे धूप में रखते हैं। कुछ सोचते हुए उसने पिंजड़ा खोल दिया कि अच्छा लगेगा चिड़िया को। चिड़िया तो पिंजड़ा खुलते ही उड़ गई। फिल्म के अंदर लड़का बड़ा हो गया है। एक लड़की से प्रेम करता है। कुछ दिनों तक दोनों का साथ रहता है। लड़की आज उसे छोड़कर जाने वाली है। वह उससे दूर रहने के लिए शहर भी छोड़ देना चाहती है। वहां मैंने उस का संवाद रखा कि 'चिड़िया अब दोबारा नहीं उड़ पाएगी!' किरदार की जीवनी हमारे दिमाग में ज़रूर रहती है। उसे लिख भी लेते हैं।

     

    अपने चरित्रों के साथ आप का इमोशनल रिश्ता कैसा होता है?

    हां, अपने चरित्रों से इमोशनल रिश्ता बन जाता है। उसका एक कारण है कि मैं अपनी फिल्मों में घिनौना करैक्टर कम बनाता हूं, इसलिए आप गौर करेंगे कि मेरी फिल्मों का बुरा किरदार भी थोड़ा इंटरेस्टिंग होता है। उनसे दर्शक जुड़ाव महसूस करते हैं। फिल्म की कहानी में जब उसे मारने की बात आती है तो मुझे अखरता है। मैं अभी एक फिल्म लिख रहा हूं ‘फूलपुर की गुड्डन’। वह 40 साल का लड़का है। पूरे कस्बे में मशहूर है। सभी उसे प्यार करते हैं। वह दिल का भी बहुत अच्छा है। आपको ऐसा लगेगा कि बहुत ही भले स्वभाव का सूफ़ी किस्म का लड़का है। अभी तक कुंवारा है। कस्बे के लोग उस पर शक भी करते हैं। नजर रखते हैं कि कहीं लड़कियों की पर उसकी बुरी निगाह तो नहीं है। कहानी में वह बाद में एक शादीशुदा औरत का आशिक हो जाता है। कहानी में आगे बढ़ने पर क्लाइमैक्स तक पहुंचने पर मैंने सोचा कि अगर इस चरित्र को मज़बूत बनाना है, ऐसा कि दर्शक इसे देखकर अपने दिल में बिठा कर घर ले जाएं तो इसे मारना पड़ेगा। मेरे सारे सहायकों के चेहरे उतर गए। वे कहने लगे कि इतना अच्छा करैक्टर है। क्यों मार रहे हो? मेरा कहना था कि अच्छा है तो भी तो मरना है। नियति जिसे उठाना चाहेगी, उसे उठा ही लेती है। मरने के बाद वह चरित्र बहुत बड़ा हो गया। अब मुझे देखना है कि उसे कैसे मारना है? दिल पर पत्थर रखकर उसे मारना होता है। मुझे तो अपने चरित्रों से प्यार हो जाता है। मेरा उनसे आत्मीय रिश्ता बनता है। मेरी सारी फिल्में मौलिक होती हैं तो सारे किरदार भी मेरे गढ़े होते हैं। उनके साथ मेरा निजि रिश्ता रहता है। फिर उसकी ख़ुशी और तकलीफ़ सब कुछ मेरी हो जाती है। 

     

    क्या कभी आप के चरित्र ख़ुद ही बोलने लगते हैं?

    हां, किरदार बोलते हैं। गुड्डन को मारने लगा तो गुड्डन ने मुझसे पूछा कि 'मैं तो अभी 40 साल का आदमी हूं। अभी मैंने ज़िंदगी नहीं देखी है। अभी क्यों मारना चाहते हो?' कभी किसी फिल्म में मां का किरदार होता है और फिर मैं उसे अहमियत नहीं दे पाता हूं। पॉपुलर स्टार की फिल्म में कई बार ऐसा होता है कि सही ट्रैक ही नहीं बन पाता है। क्योंकि गाने रहते हैं। एक्शन रहता है। मां के जो सीन सोचे गए थे, उनके लिए भी जगह नहीं मिल पाती है। फिर मां मुझसे सवाल करती हैं कि 'अगर मेरी ज़रूरत कहानी में नहीं थी तो मुझे क्यों जोड़ा?' फिर मैं अपनी गलती मानता हूं। लिखते समय यह सब झेलना पड़ता है।

     

    कहानी, पटकथा और संवाद में किस चरण में आसानी रहती है और किसमें मुश्किल बढ़ जाती है?

    कहानी तो आसान चीज़ है। बढ़िया विचार आ गया तो आपकी कहानी बन गई। विषय तो छोटा ही होता है। कहानी का जब विस्तार करने जाते हैं। स्क्रीनप्ले लिखते हैं तो वह भारी काम होता है। उसमें काफ़ी मेहनत लगती है। आपको दो घंटों में ही वह कहानी कहनी होती है। कहानी के हिसाब से करैक्टर बनाने होते हैं। दृश्य बनाने होते हैं। उसमें इंटरवल भी लाना है। क्लाइमैक्स भी लाना है। भाषा देखनी है। पृष्ठभूमि देखनी है। कहानी का विस्तार ही पटकथा है। अगर दिल से आप काम करते हैं तो यह कठिन काम है। पटकथा तैयार हो जाए, चरित्र ढंग से सैट हो, नैरेटिव सही हो तो फिर संवादों में दिक्कत नहीं होती है। दृश्य लिखते समय हम थोड़े बहुत संवाद तो लिख ही लेते हैं। दृश्य का द्वंद सही है तो संवाद आ ही जाएंगे। दृश्य कमजोर है तो फिर संवादों में दिक्कत होती है। कई बार मेरे पास सिर्फ संवाद के लिए स्क्रिप्ट आती है। उनकी पटकथा पढ़ने के बाद कोफ़्त होती है कि संवाद कैसे लिखे जाएंगे?

     

    दिन के किस समय लिखना सबसे ज्यादा पसंद है? कोई ख़ास जगह घर में? फिल्म लिखने के लिए कभी शहर भी छोड़ा है? 

    25-28 सालों से मैं होटल में ही बैठ कर लिखता हूं। यह मेरे ऑफिस की तरह ही है। जब भी कोई स्क्रिप्ट करनी होती है तो मैं महीने-दो महीने के लिए कमरा लेकर के चला जाता हूँ। फिल्म लिखते समय मुझे दो-चार आदमी चाहिए, जो मेरे साथ बैठकर लिखें। अभी लॉकडाउन में मैं घर से काम कर रहा था, लेकिन तब भी मेरी टीम मुझसे जुड़ी हुई थी। मेरे लिखने का यही तरीका है कि मेरे प्यारे लोग मेरे साथ बैठे हुए हों। उनके साथ कहानी पर चर्चा हो। थोड़ा हंसी-मजाक भी हो। ऐसे ही बातचीत करते-करते फिल्म का प्लॉट बने। कई बार हम लोग ग्रुप में नासिक चले जाते हैं। मैं कभी-कभी बनारस चला जाता हूं।मैं कभी गोवा नहीं जाता हूं। मुझे ऐसी जगहों पर जाना बिलकुल पसंद नहीं है। एक बार की बात है। एक राइटर के साथ फिल्म लिखने के लिए गोवा गया था। वे पीने के बहुत शौकीन थे। उन दिनों मैं कभी-कभी बीयर पी लेता था। मेरे दिमाग में था कि अगर गोवा आया हूं, काम करने आया हूं तो क्यों ड्रिंक पर ध्यान दूं? फिर दिमाग में यह भी था कि प्रोड्यूसर ने होटल दिया है तो काम तो होना चाहिए। उनके साथ जाने पर मैंने पाया कि होटल में चैक-इन करते ही उन्होंने ड्रिंक शुरू कर दी। सुबह नाश्ते के बाद पीते थे। सिर्फ आधे घंटे इधर-उधर की बातें होती थी। इंडस्ट्री के गॉसिप होते थे। उसके बाद स्विमिंग करते थे। फिर लंच। उसके बाद दो घंटे का आराम। फिर दारू। फिर डिनर और फिर दारू। चार-पांच दिन ऐसे ही निकल गया और कोई काम नहीं हुआ। जब प्रॉड्यूसर ने आकर पूछा कि 'कुछ हुआ क्या?' तो क्या बताते? पांच दिनों में कुछ भी काम नहीं हुआ था। मेरा मानना है कि लेखन एक अनुष्ठान की तरह लेन चाहिए। जब लिखना शुरू करें तो उसे गंभीरता से पूरा करें। लिखने के लिए किसी ऐसी जगह पर नहीं जाना चाहिए जो बहुत सुरम्य हो। जहाँ मस्तियां करने जाते हैं, वहां गंभीर काम नहीं हो सकता। मैं तो धार्मिक स्थलों पर चला जाता हूं। बनारस जाता हूं तो सुबह-सुबह घाट पर पहुंच जाता हूं। खाने-पीने में भी उत्तर भारत के व्यंजन मुझे ज्यादा अच्छे लगते हैं। मेरे साथ टीम रहती है और टीम बहुत इंजॉय करती है। मैंने कभी तीन-चार फ़िल्में एक साथ नहीं ली हैं। मेरे लिए लेखन एक अनुशासन है और फिर मनोरंजन भी है कि उसमें आनंद आए। मैं कभी चार-पांच घंटे एक साथ बैठकर नहीं लिख सकता। मैं तो बातें करता हूं, डिस्कशन करता हूं, फिर उसके बाद किसी से कहता हूं कि लैपटॉप खोलो और टाइप करो। 

    (यहां से आगे दूसरे भाग में।)

    अजय ब्रह्मात्मज जाने-माने फिल्म पत्रकार हैं। पिछले 20 सालों से फिल्‍मों पर नियमित लेखन। 1999 से दैनिक जागरण और दैनिक भास्‍कर जैसे प्रमुख अखबारों के साथ फ़िल्म और मनोरंजन पर पत्रकारिता। चवन्‍नी चैप (chavannichap.blogspot.com) नाम से ब्‍लॉग का संचालन। हिंदी सिनेमा की जातीय और सांस्‍कृतिक चेतना पर फिल्‍म फेस्टिवल, सेमिनार, गोष्‍ठी और बहसों में निरंतर सक्रियता। फिलहाल सिनेमाहौल यूट्यूब चैनल (youtube.com/c/CineMahaul) और लोकमत समाचार, संडे नवजीवन और न्यूज़ लांड्री हिंदी में लेखन।