•  अजय ब्रह्मात्मज
    •  25 September 2020
    •  488

    एसडबल्यूए अवार्ड्स 2020: परदे के पीछे 

    एसडबल्यूए अवार्ड्स की स्थापना पर एक नज़र (सहयोग: दिनकर शर्मा)

    साहिर लुधियानवी ने 1950-60 में ही कहा था कि लेखकों का अपना अवार्ड होना चाहिए। तब सिनेमा के लेखकों को पुरस्कार नहीं दिए जाते थें। साहिर  एसडबल्यूए (तब, ऍफ़डबल्यूए - फ़िल्म राइटर्स एसोसिएशन) के संस्थापकों में से एक थें। उनका देखा वो सपना अब पूरा होने जा रहा है। एसडबल्यूए अवार्ड्स 2020 की कल्पना सच होने जा रही है। लेखकों की बिरादरी के लिए ये अच्छी खबर तो है ही, साथ ही बेहतर कंटेंट को प्रोत्साहन भी है। 27 सितम्बर 2020, रविवार, को सभी इसे ऑनलाइन प्लेटफार्म पर देख सकते हैं।  

    आखिर इन अवार्ड्स की ज़रूरत क्यूँ पड़ी? दरसल, लंबे समय से लेखकों की यह तकलीफ थी कि विभिन्न पुरस्कार समारोहों में उन्हें उचित तरजीह नहीं दी जाती। ख़ासकर मीडिया घरानों द्वारा आयोजित पुरस्कार समारोहों में उन्हें उनके योगदान के अनुरूप महत्व नहीं मिलता। इन पुरस्कार समारोहों में लेखन को टेक्निकल अवार्ड की श्रेणी में रख दिया जाता है जबकि लेखन ही फिल्म या शो निर्माण की सबसे अबूझ और रचनात्मक विधा है। पिछले कुछ सालों से पुरस्कारों को टीवी इवेंट की तरह प्रस्तुत किये जाने से आयोजकों का पूरा ध्यान लोकप्रिय श्रेणी के पुरस्कारों और स्टार्स की परफॉर्मेंस पर ही रहता है। कई आयोजनों में लेखकों को मंच पर भी नहीं बुलाया जाता। उन्हें इवेंट की शाम के पहले या बाद में किसी छोटे आयोजन में बुलाकर पुरस्कार देने की औपचारिकता की जाती है। ऐसे पुरस्कारों से सम्मान का एहसास नहीं होता। अनेक लेखकों को यह अपने योगदान की अवमानना लगती है। दर्शक का भी स्क्रिप्ट और गीत के बोल की अहमियत की ओर ध्यान नहीं जाता।  

    इसी के मद्देनज़र एसडबल्यूए लगातार कोशिश करती है कि लेखकों का नाम सामने आये। एसोसिएशन ने एसडबल्यूए अवार्ड्स के कुछ बीज पहले ही बो दिए थें। साल 2013 में तीसरी राष्ट्रीय स्तर की स्क्रीनराइटर्स कॉन्फ्रेंस (आईएससी) जोकि एसडबल्यूए का सबसे बड़ा और लोकप्रिय इवेंट है, के समापन के मौके पर मशहूर हस्तियों जावेद अख़्तर (फिल्म लेखन के लिए), गुलज़ार (गीत लेखन के लिए), मनोहर श्याम जोशी (टीवी लेखन के लिए, मरणोपरांत) को सबसे पहले ये सम्मान दिये गए थें। इसके बाद साल 2015 में जब चौथी स्क्रीनराइटर्स कॉन्फ्रेंस हुई तो विजय आनंद (फिल्म लेखन के लिए, मरणोपरांत), साहिर लुधियानवी (गीत लेखन के लिए, मरणोपरांत) और शरद जोशी (टीवी लेखन के लिए, मरणोपरान्त) के पुरस्कार दिए गयें। इसी क्रम में 2018 में पांचवी आईएससी के दौरान केए अब्बास (फिल्म लेखन के लिए, मरणोपरांत), शैलेन्द्र (गीत लेखन के लिए, मरणोपरान्त) और डॉ राही मासूम रज़ा (टीवी लेखन के लिए, मरणोपरांत) को सम्मानित किया गया। ये सभी पुरस्कार लाइफ़टाइम अचीवमेंट के तौर पर दिए गए थें।  

    अब पहली बार, विभिन्न कैटेगरियों के लिए एक निर्धारित साल में आयी फिल्मों, गीतों, वैब शोज़, टीवी शोज़ के लिए ये पुरस्कार दिए जा रहे हैं। पिछले कुछ सालों से स्क्रीनराइटर्स एसोसिएशन की बैठकों में इस मुद्दे पर लेखकों के बीच विमर्श चलता रहा है। फिल्म पुरस्कार समारोहों में अपनी स्थिति से नाखुश लेखक खुद के योगदान के समुचित रेखांकन और पहचान के लिए पुरस्कारों की प्लानिंग कर रहे थें। बाकायदा एक कमेटी बनायी गयी थी। इस एसडबल्यूए अवार्ड्स कमेटी के चेयरपर्सन हैं श्रीधर रंगायन जबकि ऋचा सिंह गौतम कन्वीनर है। एसडबल्यूए अवार्ड्स की रूपरेखा का पहला खाका तैयार करने में अहम् भूमिका रही विनोद रंगनाथ की जो बाद में निजी व्यस्तताओं के चलते बहुत अधिक सक्रियता नहीं रख सके। इसके अलावा जागृति ठाकुर, राजेश दूबे, धनंजय कुमार, शैली, मनीषा कोरडे, बिकास मिश्रा, मीतेश शाह, सुहाना भाटिया, अंजुम रजबअली (एडवाइज़री काउंसिल), सुनील सालगिया (एक्स ऑफिशियो, मानद महासचिव - एसडबल्यूए) और रॉबिन भट्ट (एक्स ऑफिशियो, अध्यक्ष - एसडबल्यूए) भी कमेटी का हिस्सा रहें। कमेटी ने कोमल अग्रवाल और संचित डहाके के रूप में दो कोर्डिनेटर भी नियुक्त किये। 

    सफ़र के इस पड़ाव तक आने की अपनी कहानी है। स्क्रीनराइटर्स एसोसिएशन की कार्यकरिणी समिति (एक्ज़ेक्यूटिव कमेटी) के वरिष्ठ सदस्य विनोद रंगनाथ ने ऐसे अवार्ड के बारे में 2017-18 में कोशिशें शुरू कर दी थी। उस साल कुछ कारणों से यह आयोजन नहीं हो पाया। फिर 2019 में कार्यकारिणी समिति ने सहमति दी और प्रारूप की तैयारी चलने लगी। विनोद रंगनाथ बताते हैं, "किसी भी फिल्म की शुरुआत लेखक ही करता है। सादा कागज़ पर वह कुछ लिखता है। उसके लिखे बगैर किसी फिल्म की कल्पना नहीं की जा सकती। कहानी, पटकथा और संवाद ही किसी फिल्म, टीवी शो या वैब सीरीज की धुरी और नींव है। हमने देखा है कि स्क्रिप्ट अच्छी नहीं हो तो पॉपुलर स्टार भी फिल्म नहीं चला पाते। उनका आकर्षण आरंभिक दो-तीन दिनों तक दर्शकों को खींचता है। उसके बाद तो कंटेंट से ही फिल्म चलती है और इस ‘कंटेंट क्रिएटर’ को ही आदर-सम्मान नहीं मिलता।" 

    ऋचा सिंह गौतम के अनुसार, "एसडबल्यूए अवार्ड्स की मूल अवधारणा यही है कि लेखक ही लेखक को सम्मान दें। उन्हें पहचान और प्रोत्साहन दें। हम सभी ने देखा है कि पुरस्कार समारोहों में लेखकों को पुरस्कार देने की खानापूर्ति भर की जाती है। महज औपचारिकता निभा ली जाती है। किसी भी क्रिएटिव व्यक्ति को यह रवैया स्वीकार नहीं होगा।"

    तीस सालों के लेखन के अपने अनुभव में विनोद रंगनाथ ने महसूस किया है कि लेखकों को लाइमलाइट से दूर रखा जाना बदस्तूर जारी है। वे मानते हैं कि "फिल्म, टीवी शो और वैब सीरीज राइटर की बनाई नींव पर ही तामीर होते हैं, लेकिन कई पुरस्कारों में उनका जिक्र तक नहीं होता। कई टीवी पुरस्कारों में तो लेखकों के लिए अवार्ड ही नहीं है। अवार्ड समारोह के टेलीकास्ट का चलन बढ़ने से चैनलों के दबाव में लेखकों को दरकिनार कर दिया जाता है। उन्हें शो के प्रसारण के लिए गैरज़रूरी माना जाता है। लेखकों को अलग से किसी कमरे में अवार्ड दे दिए जाते हैं।" विनोद रंगनाथ की मूल ख्वाहिश इतनी ही थी कि एक ऐसा अवार्ड हो, जिसके केंद्र में लेखक हो। उनकी इस सोच से एसोसिएशन के लेखकों की आम सहमति थी, क्योंकि सभी ने कभी ना कभी यह महसूस किया था कि उन्हें महत्त्व नहीं दिया जाता। एसडबल्यूए के भूतपूर्व अध्यक्षों, महासचिवों और कार्यकारिणी समिति के कई सदस्यों ने भी ऐसे पुरस्कारों के आयोजन लिए कदम बढ़ाने की इच्छा जताई थी। एसडब्ल्यूए अवार्ड्स 2020 लेखकों की इसी सामूहिक आकांक्षा का प्रतिफल है। 

    वर्तमान अवार्ड का प्रारूप तैयार करने के पहले विनोद रंगनाथ ने हॉलीवुड के लेखक संगठन डबल्यूजीए वैस्ट की गतिविधियों का अध्ययन किया। उन्होंने वहां से भारत के लिए अनुकूल कुछ बाते लीं। फिर इसका प्रस्ताव और प्रारूप तैयार हुआ। यह अवार्ड लेखकों की क्रिएटिविटी पर केन्द्रित रहेगा। समारोह में मनोरंजन होगा भी तो वह लेखक के इर्द-गिर्द ही रहेगा। लेखक बिरादरी ही लेखकों के काम को निहारेगी, परखेगी और पुरस्कृत करेगी। ज्यूरी के सदस्य केवल लेखन के बारे में ही सोचेंगे और निर्णय लेंगे। इस अवार्ड में फिल्मों की लोकप्रियता और कमाई या टीवी शो की टीआरपी को तरजीह नहीं दी जाएगी और ना ही उनसे परहेज किया जाएगा। लेखन बेहतरीन है तो वह अवार्ड का हकदार होगा। यह एक सार्थक पहल है।   

    एसडब्ल्यूए अवॉर्ड्स में फिल्म, टीवी शो, वैब सीरीज और गीत के चुनाव की त्रुटिहीन प्रक्रिया अपनाई गई है। पिछले साल 2019 में रिलीज हुई सभी फिल्मों को स्वाभाविक प्रविष्टि मिली है। बाकी माध्यमों के लिए प्रविष्टियां मंगाई गई थीं। शॉर्टलिस्टिंग और पुरस्कार के लिए तय की गई ज्यूरी के साथ एक ऑडिटर भी रखा गया ताकि किसी प्रकार का पक्षपात ना हो। पूरी प्रक्रिया पारदर्शी रखने के साथ रिकॉर्ड भी की गई है। किसी भी प्रकार का विवाद होने पर पुनरीक्षण किया जा सकता है। 

    एसडबल्यूए अवार्ड्स समिति के चेयरमैन श्रीधर रंगायन के मुताबिक, "इस साल केवल हिंदी फिल्मों, टीवी शो, वैब सीरीज और गीत के अवार्ड दिए जाएंगे।  अगले साल से देश की दूसरी भाषाएं भी शामिल की जाएंगी।" विनोद रंगनाथ की निजी घरेलू व्यस्तता की वजह से ही श्रीधर रंगायन ने समारोह के चेयरपर्सन होने की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी उठायी है। उन्हें ऐसे समारोहों के आयोजन का पुराना अनुभव है। वे कशिश फिल्म फेस्टिवल का आयोजन करते रहे हैं। उनके अनुसार, "पहले हमने ग्राउंड इवेंट के बारे में सोचा था। कोविड-19 की वजह से अब इसे ऑनलाइन करना पड़ रहा है। इसमें कुछ हिस्से लाइव और कुछ प्री-रिकार्डेड रहेंगे। बेरोक प्रेजेंटेशन के लिए तकनीकी टीम तैयार की गई है। कोशिश यही है कि पूरा समारोह अबाधित और सुचारू रहे।"
     
    श्रीधर रंगायन और ऋचा सिंह गौतम एक स्वर से बार-बार जोर देते हैं कि हमारी प्रक्रिया बेहद सख्त और पारदर्शी रही है। जूरी के सदस्यों का हमें पूरा सहयोग मिला है। आरंभ में योजना थी कि कुल 25-26 अवार्ड दिए जाएं। फिर लगा कि संबोधन के लिए सभी पुरस्कृत लेखकों को पर्याप्त समय दिया जाए तो यह लंबी अवधि का इवेंट हो जाएगा, इसलिए इस बार 16 अवार्ड ही रखे गए हैं। 
     
    अवार्ड्स की कैटेगरियों में फिल्मों के लिए बेस्ट डेब्यू, बेस्ट स्टोरी, बेस्ट स्क्रीनप्ले, बेस्ट डायलॉग और जेंडर सेंसिटिव श्रेणियां हैं। टीवी के लिए निश्चित श्रेणियों में ड्रामा और कॉमेडी खंडों के लिए स्टोरी, स्क्रीनप्ले और डायलॉग के 3-3 अवार्ड हैं। वैब सीरीज में राइटर रूम की अवधारणा को ध्यान में रखते हुए लेखकों के समूह को पुरस्कृत करने की योजना है। इसमें बेस्ट ओरिजिनल ड्रामा, बेस्ट ओरिजिनल कॉमेडी और बेस्ट ओरिजिनल एडाप्टेशन श्रेणियां रखी गयी हैं। गीतों के लिए बेस्ट फिल्म और बेस्ट टीवी/वैब सीरीज दो श्रेणियां हैं।  

    कहना होगा कि ये आगाज़ अच्छा है।

    अजय ब्रह्मात्मज जाने-माने फिल्म पत्रकार हैं। पिछले 20 सालों से फिल्‍मों पर नियमित लेखन। 1999 से दैनिक जागरण और दैनिक भास्‍कर जैसे प्रमुख अखबारों के साथ फ़िल्म और मनोरंजन पर पत्रकारिता। चवन्‍नी चैप (chavannichap.blogspot.com) नाम से ब्‍लॉग का संचालन। हिंदी सिनेमा की जातीय और सांस्‍कृतिक चेतना पर फिल्‍म फेस्टिवल, सेमिनार, गोष्‍ठी और बहसों में निरंतर सक्रियता। फिलहाल सिनेमाहौल यूट्यूब चैनल (youtube.com/c/CineMahaul) और लोकमत समाचार, संडे नवजीवन और न्यूज़ लांड्री हिंदी में लेखन।