•  सुदीप सोहनी
    •  14 August 2020
    •  744

    कितनी अकेली ये रात है

    नैटफ़्लिक्स की चर्चित फिल्म ‘रात अकेली है’ की पटकथा पर एक नज़र   

    ‘रात अकेली है’ (2020)
    निर्देशक: हनी त्रेहान
    स्टोरी-स्क्रीनप्ले-डायलॉग: स्मिता सिंह


    पिछले कुछ सालों में ‘ओटीटी प्लेटफॉर्म’ (OTT Platform) के नाम से जो एक अलग ‘सेगमेंट’ बना और विकसित हुआ है, उसने न केवल मनोरंजन का एक नया बाज़ार खोला है बल्कि ‘कंटेन्ट’ को किसी भी बंधन से मुक्त होने या ‘अनसेंसर्ड’ होने की स्वतंत्रता दी है। कहानी या संवाद या दृश्यों के आपत्तिजनक होने या भावनाएँ भड़क जाने वाले क़िस्से अब केवल (अपवाद को छोड़कर) थिएटर में रिलीज़ होने वाली फिल्मों के लिए रह गए हैं। और ऐसे में एक बिलकुल अपनी तरह का, स्वच्छंद सिनेमाई अनुभव दर्शक तक पहुँच रहा है। यहाँ ख़ास यह भी है कि दर्शक इस तरह की कहानियों को निजी अनुभव की तरह महसूस कर पा रहे हैं और उनसे जुड़ पा रहे हैं और स्वयं-समीक्षा भी कर पा रहे हैं। यहाँ समीक्षा शब्द इसलिए ज़रूरी लग रहा है क्योंकि सोशल मीडिया के कारण अब बात केवल अच्छी या बुरी न हो कर बीच की भी है, अपने तर्क को अपनी ख़ुद की समझदारी के साथ कहने के भी। 

    बात का यह थोड़ा फैलाव इसलिए ज़रूरी था क्योंकि कुछ दिनों पहले रीलीज़ हुई ‘रात अकेली है’ में आश्चर्यजनक रूप से लगभग एक-सवा घंटे तक तो कोई भी ऐसा आपत्तिजनक शब्द नहीं है जिसको लेकर दर्शकों का एक तबका अब तक की वैब फिल्मों की भाषा पर सवाल खड़े करता रहा है। दूसरा, केवल कहानी के एक मुख्य मोड़ के अलावा दृश्यों में भी कोई सनसनी इस पूरी फ़िल्म में कहीं नज़र नहीं आती। यह बात ग़ैर-ज़रूरी हो कर भी इसलिए दर्ज करना ज़रूरी लग रही है क्योंकि अंततः दर्शकों की राय महत्त्वपूर्ण है, जो अधिकतर आ रही फ़िल्मों को ‘आइटम सॉन्ग’, हत्या, सैक्स, गालियाँ, अनैतिक संबंध या इसी तरह के ‘टर्न-ट्विस्ट’ में लपेटकर कहीं ‘फार्मूला वैब कंटेन्ट’ फ़िल्म कह रहे हैं। 

    इस बात को यहीं ख़त्म कर जब हम ‘रात अकेली है’ पर आते हैं तो इसकी तह में पिछले कुछ समयों में आई एक बेहतरीन थ्रिलर-संस्पेंस फ़िल्म और कहानी दिखाई पड़ती है। स्मिता सिंह की लिखी ये ताज़ा क्राइम थ्रिलर इस वक़्त नैटफ्लिक्स पर मौजूद तमाम तरह की फिल्मों में अलग और अनूठी है।

     

    आपराधिक मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति की कहानी 

    ‘रात अकेली है’ की कहानी के केंद्र में मध्य भारत यानि उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश का ‘बैकग्राउंड’ है। इस परिवेश में अपराध की पृष्ठभूमि में बाल यौन शोषण, जिस्मफ़रोशी और खरीद-बेच, अमीर घरानों की पारिवारिक कुंठा और महत्त्वाकांक्षाएं, राजनीति और पुलिस तंत्र के साथ इस माहौल में रह रहे हर किरदार की मानसिक दशा का चित्रण है। दरअसल, अपराध एक ऐसी मूलभूत मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति है जो हर समय (चाहे घट न भी रहा हो, तब भी कहीं न कहीं), किसी न किसी रूप में हर आदमी के दिमाग में मौजूद रहती है। कहानी का नायक कानपुर थाने में पदस्थ अधेड़, ईमानदार, मेहनती और चतुर मध्यवर्गीय पुलिस इंस्पेक्टर जटिल यादव (नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी) है, जिसकी माँ चाहती है कि उसका बेटा एक सुखी गृहस्थ जीवन जिये। लेकिन अपने नाम के अनुरूप जटिल इस बात पर अपनी माँ से हर वक़्त उलझता रहता है। उसे एक रात सीनियर अफ़सर शुक्ला (तिगमांशु धूलिया) का फ़ोन आता है कि एक बड़ी हवेली और बेशुमार पुश्तैनी जायदाद के बूढ़े मालिक रघुवीर सिंह की इस उम्र में हुई शादी के कुछ घंटों बाद ही उनकी हत्या हो गई है। जटिल यादव इस केस को सुलझाने में जिन भी चरित्रों, घटनाओं और अनुभवों के ज़रिये इस क़त्ल की गुत्थी को जिस तरह सुलझाता है, और इस दौरान उसका सामना जिन परिस्थितियों से होता है, वही ‘रात अकेली है’ का कुल जमा अनुभव है। 

     

    किरदार और कहानी का फैलाव 
     

    ‘क्राइम-थ्रिलर’ कहानी के रूप में यह सरल और आसान या एक तरह से परंपरागत ‘प्लॉट’ है। लेकिन इस कहानी की विशेषता प्याज़ के छिलके की तरह इसका लिपटा होना है। एक-एक परत हटने के साथ इस ‘मर्डर-मिस्ट्री’ की गुत्थी सुलझती है। लेकिन तब तक दर्शक के हिस्से एक बेहतरीन कहानी सामने आती है। जटिल यादव अधेड़ उम्र की दहलीज़ पर खड़ा पुलिस कर्मचारी है जिसके एक हिस्से में विधवा माँ (ईला अरुण) और उसकी तमन्ना है तो दूसरे हिस्से में पुलिस की नौकरी और उसका फर्ज़। इसके बीच जटिल भीतर से तन्हा आदमी है जो फ़िल्म में बमुश्किल एकाध जगह दिखाई दिया है। उसके सामने रघुवीर सिंह की हत्या का केस आया है। यह केस भी उतना ही दिलचस्प और अपनी तरह का अनोखा है। बुढ़ापे के भी लगभग अंतिम पड़ाव पर पहुँच चुके रघुवीर सिंह की, उम्र में अपने से कहीं छोटी राधा (राधिका आप्टे), जिसे उसके बाप ने बेच दिया था और जो इस घर में रघुवीर की ‘रखैल’ है, के साथ हुई शादी के कुछ घंटों बाद ही ह्त्या हो जाती है। जटिल उसी रात हवेली पहुँचता है जहाँ उसे रघुवीर की पहली पत्नी का भाई रमेश (स्वानंद किरकिरे) मिलता है। रमेश के ज़रिये जटिल का परिचय हवेली के अन्य सदस्यों रघुवीर की बेटी करुणा (श्वेता त्रिपाठी) और भाई करण, भतीजे विक्रम, भाई की बीवी और विक्रम की माँ प्रमिला, विक्रम की बहन वसुधा (शिवानी रघुवंशी), नौकरानी चुन्नी, दामाद और करुणा के पति रवि और राधा से होता है। जटिल इस केस की तफ़्तीश शुरू करता है और वहीं उसे समझ आ जाता है कि रघुवीर की हत्या किसी घर के व्यक्ति ने ही की है। परिवार वालों का शक राधा पर जाता है लेकिन गुत्थी सुलझाना आसान नहीं। जहाँ रघुवीर की दौलत की वारिस अब राधा है, वहीं विक्रम और रवि के अपने हिसाब-किताब हैं। रवि इन सबमें ज़्यादा आक्रामक है जो राधा पर शक को पुख्ता करते हुए जटिल से उलझता है और फिर उससे झड़प के बाद इलाके के विधायक मुन्ना राजा (आदित्य श्रीवास्तव) के बहाने अपनी पहुँच और रौब जटिल पर आजमाने की कोशिश करता है। जटिल का दिमाग चलने लगता है कि रघुबीर की हत्या के तार इन्हीं किरदारों से कहीं जुड़े हैं। 

     

    कथानक, उप-कथानक और परंपरागत ‘थ्री-एक्ट स्ट्रक्चर’
     

    परंपरागत ‘थ्री-एक्ट स्ट्रक्चर’ यानि आरंभ, मध्य और अंत वाली कहानी का मूल ‘प्लॉट’ यही है। कहानी को जोड़ने वाले तीन छोटे उप-कथानक (सब-प्लॉट) हैं – राधा की बीती ज़िंदगी जिसमें एक बार वह जटिल से पहले भी मिल चुकी होती है और फिर उसका बाप उसे रघुवीर को बेच देता है। दूसरा, रघुवीर की पत्नी और ड्राइवर की हत्या कर उनकी लाशों को चमड़ा फैक्ट्री में दफना देना। कहानी में लगभग दूसरे अंक में यह खुलासा होता है कि चमड़ा फैक्ट्री मुन्ना राजा की है और उनके इशारे पर एक कसाई ने यह हत्याएँ की हैं। तीसरा, रघुवीर और उसके अनैतिक संबंध है जिसके कारण ये सब हत्याएँ हुई हैं। लगभग यही इस फ़िल्म का ‘क्लाइमैक्स’ भी है जिसकी वजह से इस पूरे घटनाक्रम से पर्दा हटता है। हालाँकि दो बहुत छोटे लेकिन महत्त्वपूर्ण घटनाक्रम इस कहानी में घटते हैं। 

    पहला, विक्रम और राधा के बीच संबंध। राधा, विक्रम से प्रेम करती है और उस से शादी करना चाहती है लेकिन चूँकि विक्रम और मुन्ना राजा की बेटी का संबंध तय है और यह एक तरह की ‘डील’ ही है जिस पर विक्रम का सुनहरा भविष्य निर्भर है। यह एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण कोण है जिसके कारण भी रघुवीर, उनकी पत्नी, ड्राइवर और बाद में चुन्नी और कसाई (इन सबकी हत्या करने वाला, चमड़े की फैक्ट्री में काम करने वाला मुन्ना राजा का सेवक) की हत्या तक का घटनाक्रम उजागर होता है। लेकिन दूसरा घटनाक्रम इस भागती-दौड़ती कहानी का एक नितांत मानवीय कोण है जहाँ कुछ पलों के लिए जटिल और राधा के बीच आकर्षण-प्रेम दिखता है। जटिल जो लगभग मशीनी ज़िंदगी जी रहा और उसके जीवन में जो तनहाई और अकेलापन है, उसके भीतर का आदमी राधा को चूमने की कोशिश करता है मगर राधा के इंकार के बाद रुक भी जाता है। वह दो बार कोशिश करता है - एक बार आकर्षण में और दूसरी बार एक तरह के अधिकार में लेकिन फिर रुक कर वह वापस इंसान से ‘ड्यूटी’ पर तैनात पुलिस वाला बन जाता है। जटिल के भीतर का यही इंसान माँ की बातों को सुनने, तैयार होते समय ‘फेयरनेस क्रीम’ लगाने, घर के नलके से नहाते वक़्त पानी ख़त्म हो जाने और माँ को आवाज़ लगाने पर भी पड़ोसी से बतियाने जैसी आम घटनाओं में भी दिखता है। 

    एक और महत्त्वपूर्ण किरदार जटिल के साथी इंस्पेक्टर नंदू का है जिसके ज़रिये केस की छानबीन और घटनाक्रम आगे बढ़ता है। कहानी में अंत में इस पूरे घटनाक्रम का मक़सद उजागर होता है। जिसका संबंध किरदारों से होते हुए भी उनके भीतर की असुरक्षा, तुच्छ महत्त्वाकांक्षाओं और स्वार्थ जैसी मानवीय कमजोरियों के रूप में दर्शकों के सामने आता है। एक असाधारण कहानी इस तरह अपने अंजाम पर पहुँचती है। 

     

    कहानी की कमजोरियों को ढँकती पटकथा की बुनावट 
     

    घटनाओं की महीन और सघन बुनावाट वाली कहानी दूर से देखने पर कहीं कमज़ोर भी दिखाई पड़ती है। मसलन, अगर इस कहानी को लेकर सारे किरदारों का सपाट ‘बैकग्राउंड’ जो आगे चलकर महज एक या दो संवादों में दर्शाया गया है। जटिल की माँ का किरदार और जटिल की शादी को लेकर उसकी चिंताओं वाले दृश्य भी कहीं-कहीं पर बेमतलब लगते हैं। मुन्ना राजा के विधायक होते हुए भी उनके आसपास  छुटभैये नेताओं का न होना और उनका केवल ‘डायलॉगबाज़ी’ करते दिखाई देना भी वास्तविकता से दूर, ‘फ़िल्मी’ लगता है। और एक बड़े शहर की बड़ी हवेली में होने वाली हत्याओं के बावजूद शहर में या मोहल्ले में किसी भी तरह की सनसनी/हलचल का ना दिखाई देना भी कथानक के लिए ली गई ‘सुविधा’ ही लगती है। और सबसे बड़ी बात एक ‘रियलिस्टिक ट्रीटमेंट’ को लेकर लिखी गई कहानी में ‘मीडिया’ का न होना भी अचंभित करता है। 

    लेकिन कहानी से इतर लगभग ‘नॉन-लीनियर स्ट्रक्चर’ में बुनी इसकी पटकथा ‘रात अकेली है’ की लिखाई का सबसे उम्दा और बेहतरीन पक्ष है। पहले ही दृश्य में कसाई द्वारा रघुवीर की पत्नी और ड्राइवर की हत्या का दृश्य रोंगटे खड़े करता है। खुले ट्रक में शहर के बीच से लाशों को ले जाने का दृश्य यही दिखाता है कि हत्यारे को इन हत्याओं में पकड़ लिए जाने का कोई खौफ़ नहीं। और फिर चमड़ा फैक्ट्री में दफ़नाते हुए और तेज़ाब फेंकते हुए अपने हाथ पर गिर गया तेज़ाब कथानक का एक महत्त्वपूर्ण सुराग है जो आगे चलकर चुन्नी की ह्त्या के बाद ‘पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट’ से जुड़ता है। पटकथा लेखन (स्क्रीनप्ले राइटिंग) की भाषा में यह ‘सेट-अप एन्ड पे-ऑफ़’ है। 

    कुछ इसी तरह का एक सुराग रघुवीर की हत्या के बाद उनके बिस्तर के नीचे मिला बटन भी है जो जटिल को राधा के बैग में मिले दुपट्टे से टूटकर गिरा था। कहानी के उलट दृश्यों में सोचकर इस तरह की ‘डीटेलिंग’ को लिखना वास्तव में आसान काम नहीं है। ‘फ़िल्म’ के पहले ही दृश्य में हुई हत्याओं और फिर कहानी के शुरुआती ‘सेट-अप’ और रघुवीर की हत्या के बाद छानबीन तक के दृश्यों में किरदारों का परिचय है जिसके साथ कहानी आगे बढ़ती है। साथ ही कहानी का ‘मूड’ भी जो इस परिस्थिति में दिख रहा जहाँ जटिल के लिए हर क़दम पर चुनौती है। राधा और जटिल की हवेली में मुलाक़ात के क्रम में उनकी पूर्व मुलाक़ात का दृश्य आता है और यहाँ से जटिल का दिमाग कम से कम यह मान चुका कि रघुवीर की हत्या राधा ने तो नहीं ही की है। दर्शक भी इन दृश्यों में यह तो भाँप ही लेते हैं कि राधा को फँसाने की कोशिश हो रही। शक यहाँ से विक्रम पर बढ़ता है। लेकिन इस घर में मुन्ना राजा की उपस्थिति जटिल को एक दूसरे तल पर ले जाने पर मजबूर कर देती है। 

    नौकरानी चुन्नी और करुणा के बयान चाची प्रमिला पर भी संदेह बढ़ाते हैं। लेकिन फिर यहीं एक कुशल लेखक का दिमाग भी काम करता है जब करुणा के संवाद के ज़रिये यह बताया जाता है कि विक्रम, रघुवीर के सबसे ज़्यादा करीब रहता आया है। उसके बयानों वाले दृश्य और फिर राधा के साथ संबंध भी विक्रम को शक के घेरे में रखे रहते हैं। लेकिन ‘थ्रिलर-सस्पेंस’ का दर्शक यहाँ भी भाँप सकता है कि इतनी आसानी से विक्रम तो अंत में अपराधी साबित होगा नहीं। चुन्नी, इस पूरी कहानी का एक महत्त्वपूर्ण किरदार है। उसके ड्राइवर पिता की मृत्यु के केस वाले बयान, एसएसपी शुक्ला को जटिल द्वारा दी गई रिपोर्ट, रघुवीर की पत्नी और ड्राइवर की ‘एक्सीडेंट’ में हुई मृत्यु, मुन्ना राजा की चमड़ा फैक्ट्री और कसाई तक यह सारी कड़ियाँ और दृश्य जटिल को इस केस की तह तक पहुंचाते हैं और इस तरह पटकथा का दूसरा-अंक अपने अंजाम पर पहुँचता है। 

    ‘क्लाइमैक्स’ की तरफ बढ़ना जटिल के लिए आसान है पर कुछ मुश्किलें है। उस पर हुआ हमला उसे राधा के साथ रघुवीर के एक बंगले पर ले जाता है, जहाँ से सारा घटनाक्रम खुल जाता है। 

    लगभग ढाई घंटे के फैलाव में ‘रात अकेली है’ का लेखन बिलकुल आखरी मिनटों तक रघुवीर के क़ातिल को छुपाए रहता है। और यही इसके लेखन की सबसे बड़ी सफलता है। एक और युक्ति यह भी है कि आरंभ, मध्य और अंत के लगभग हर दृश्य के बाद दर्शक क़ातिल को पहचानने की कोशिश तो करता है लेकिन पक्के तौर पर कह नहीं सकता। बेहद कम किरदारों और कुछ ‘लोकेशन’ वाली एक ‘थ्रिलर-सस्पेंस’ की कहानी को बिलकुल आखिर तक इस तरह ‘होल्ड’ करना ही इसे एक बेहतरीन और चुस्त ‘स्क्रिप्ट’ बनाता है।  
     

    फ़िल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, पुणे, से पटकथा-लेखन में स्नातक। लेखक, निर्देशक, कॉलमिस्ट, कवि, गायक, प्रशिक्षक, संपादक के रूप में सुदीप का कार्यक्षेत्र सिनेमा, नाटक, पत्रकारिता, कविता एवं आयोजनधर्मी के रूप में फैला है। भोपाल से प्रकाशित दैनिक ‘सुबह सवेरे’ में विश्व-सिनेमा पर साप्ताहिक कॉलम ‘सिनेमा के बहाने’ और इन्स्टाग्राम पर विशिष्ट गद्य लेखन के कारण भी पहचान।