•  अनामिका झा
    •  04 September 2020
    •  393

    विचार और अभिव्यक्ति के बीच की रेखा

    मुंबई उच्च न्यायालय का प्रसिद्ध “सिंगारदान निर्णय”

    सभी कहानीकारों को नमस्कार । 
     

    इस लेख में हम, कॉपीराइट लॉ के तहत मशहूर "विचार बनाम अभिव्यक्ति" के विरोधाभास को परखेंगे| हम इसे  मुम्बई उच्च न्यायालयके "शोमिल अहमद खान बनाम फाल्गुनी शाह एंड अदर्स, 2019" (सिंगारदान जजमेंट के नाम से प्रख्यात) केस के सन्दर्भ से देखेंगे।

     

    आगे बढ़ने से पहले, मेरे आपसे कुछ रोचक सवाल हैं - 
     

    क्या आपने कभी सोचा है कि जब हम यह कहते है कि, किसी के पास उसकी लिखी किसी कहानी का कॉपीराइट है, तो इस बात के क्या मायने होते हैं? क्या उनका कॉपीराइट उनके कहानी के कथानक पर होता है, या कहानी की रुपरेखा पर, या फ़िर उनकी कहानी के पात्रों पर होता है? हमें ये अच्छी तरह से जान लेना चाहिए के कॉपीराइट क़ानून हमारी कहानी के विचार को नहीं बल्कि उसकी अभिव्यक्ति को सुरक्षा देता है। तो क्या कोई और आपकी कहानी के विचार का अनुकरण कर अपनी कहानी लिख सकता है? आपको यह कैसे पता लगेगा कि उन्होंने कहानी के सिर्फ़ मुख्य विचार का अनुकरण किया है और उसकी अभिव्यक्ति का नहीं? वास्तव में ये सभी जटिल सवाल हैं। इन सवालों के जवाब पाने के लिए हमें "विचार बनाम अभिव्यक्ति विरोधाभास" के मौलिक सिद्धांत को समझना होगा। 

     
    न्यायालयों ने इस विरोधाभास को कई निर्णयों द्वारा विस्तृत रूप से समझाया है। लेकिन, हाल ही में हुए मुम्बई उच्च न्यायालय के सिंगारदान केस के निर्णय ने काफ़ी लोगों का ध्यान आकर्षित किया है। इस केस में मुम्बई उच्च न्यायालय (आगे से सिर्फ 'न्यायालय' नाम से उल्लेख) ने इस विरोधाभास को फिर से परिभाषित किया है। न्यायालय ने यह बताया है कि वास्तविक तौर पर हम कैसे एक ही मापदंड से कहानी के संरक्षित और असंरक्षित तत्वों के बीच अंतर तय कर सकते हैं। कहानीकारों में इस निर्णय को लेकर काफ़ी सवाल उठे थें।  क्या इस निर्णय से कॉपीराइट क़ानून के तहत कहानी के सुरक्षा के दायरे बढ़ गए हैं? क्या यह नतीजा विषय/कथानक/कहानी की रुपरेखा को भी संरक्षित दायरे में लाया है? चलिए, मैं इस निर्णय को आपके लिए सरल भाषा में सुलझाती हूँ। मुझे उम्मीद है, इससे आपको कुछ सवालों के जवाब ज़रूर मिल जायेंगे।

     

    1. तथ्य

    अभियोगी ने "सिंगारदान" नाम की कहानी लिखी और प्रकाशित की। उनकी कहानी एक हिन्दू नायक की है। दंगो के दौरान, वो वेश्यालय से एक मुस्लिम वैश्या का पैतृक सिंगारदान चुराकर अपने घर ले आता है। इस सिंगारदान की मौजूदगी से उसकी पत्नी और बेटी पर विपरीत प्रभाव के साथ ही उनके व्यवहार में भी नकारात्मक बदलाव होने लगते है। इस कहानी की एक मुख्य विशेषता ये है कि, कैसे सिंगारदान जैसी एक निर्जीव चीज़ उसे इस्तेमाल करने वाले इंसानों की संवेदनाओ को अवशोषित कर अन्य लोगों के जीवन को प्रभावित करती है| 

     
    अभियोगी ने प्रतिवादी पर उसकी कहानी को उसी शीर्षक वाली एक वैबसीरीज़ में रूपांतरित कर उसके कॉपीराइट का उल्लंघन करने के लिए मुकदमा दायर कर दिया। अभियोगी के मुताबिक, प्रतिवादी ने उसकी वैबसीरीज़ में अभियोगी की कहानी के  पूरे कथानक, कथा वर्णन और किरदारों की नकल की है। प्रतिवादी ने अभियोगी का यह दावा ठुकराया है। प्रतिवादी ने तर्क दिया है कि उन्होंने अभियोगी के सिर्फ मुख्य कहानी से प्रेरणा ली और खुद की असल कहानी बनायी।      


    प्रतिवादी की वैबसीरीज़ में, मुख्य नायक एक हिन्दू पुरुष है। उसके एक मुस्लिम वैश्या के साथ विवाहेतर सम्बन्ध हैं। शहर में हुए दंगो में, उस वैश्या की मौत होती है। उसकी मौत से टूटकर, वो उसके पैतृक सिंगारदान को उसकी आखिरी निशानी समझ कर रख लेता है। उसे वो अपने घर ले आता है। उस दिन से वो अपनी पत्नी और बेटी के बर्ताव में अचानक बदलाव महसूस करने लगता है। वो दोनों घर में रखें उस सिंगारदान की मौजूदगी के प्रभाव से वैश्याओं की तरह पेश आने लगती हैं। 

     
    प्रतिवादी का अपने बचाव में तर्क ये है कि, कहानी की मुख्य कल्पना को छोड़कर -  जिसके तहत, "एक आदमी दंगो के दौरान, वेश्यालय से श्रृंगार-पटल उठाकर अपने घर ले आता है, जो उसके घर की औरतों के बर्ताव में बदलाव का कारण बनता है", दोनों कलाकृतियों में और कोई समानता नहीं है।  ये कहानी की केवल मुख्य कल्पना, अपने तौर पर ही कॉपीराइट की हक़दार नहीं है। 

     
    2. मुद्दा


    क्या अभियोगी की कृति से केवल कहानी की अरक्षित कल्पना की नक़ल की गई? या फिर प्रतिवादी ने, अभियोगी की कहानी की अभिव्यक्ति की नकल कर उसके कॉपीराइट का उल्लंघन किया है?

     

    3. न्यायालय का विश्लेषण


    कल्पना-अभिव्यक्ति का विरोधाभास सैद्धांतिक रूप से तो समझा जा सकता है। लेकिन, वास्तव में इस अंतर को लागू कर पाना मुश्किल होता है। क्यूँकि हर कल्पना को, शब्दों या किसी रूप में ढाल कर ही व्यक्त किया जाता है। इसीलिए किसी भी कल्पना को ऐसी अभिव्यक्ति के बग़ैर  समझ पाना मुमकिन नहीं है। फिर भी कॉपीराइट के तहत क्या संरक्षित है और क्या नहीं न्यायालयों को ये तय करने के लिए इन दोनों में अंतर करना ही पड़ता है। ठीक किस मुद्दे पर साहित्यिक चोर ने लेखक की कहानी की कल्पना की नकल की है और कहाँ उसकी अभिव्यक्ति की चोरी की है ये पता करने का सतर्कता भरा काम न्यायालयों को करना होता है। इन दोनों में अंतर तय करने के कई तरीके हैं। हालाँकि, "निष्कर्षण" ये तय करने का सबसे श्रेष्ठ तरीका है।  इस निर्णय में, न्यायालय ने निष्कर्षण की प्रक्रिया को निम्नलिखित तरीके से लागू किया:

     
    ( i ) कल्पना के मूल को एक विषय में विकसित किया जाता है और फिर कथानक में और फ़िर किरदारों के समायोजन से अंतिम कहानी में।  इन सभी तत्वों के मेल से अंतिम कृति का सार बनता है। निष्कर्षण प्रक्रिया में हमें अंतिम कृति को खोलकर उसमें से सभी संरक्षित तत्वों को निकालना होता है। इस अंतिम कृति से सभी संरक्षित तत्वों को निकालने की प्रक्रिया करते हुए, कोई भी उस पड़ाव तक पहुँच ही जायेगा, जहाँ सिर्फ कहानी की कल्पना या सारांशन (एब्सट्रैक्शन) रह जाएंगे जिन्हें कॉपीराइट का संरक्षण प्राप्त नहीं है। इसीलिये, न्यायालय के सामने इस प्रक्रिया में उन मुद्दों को ढूंढने का काम होता है, जिसके बाद सिर्फ असंरक्षित कहानी की कल्पना ही बाकी रह जाएगी।  

     
    ( ii ) एक न्यायालय को हर मामले के हिसाब से "सारांशन (एब्सट्रैक्शन)  की इस शृंखला" में कहाँ रुकना है  या उसकी सीमारेखा क्या होगी ये अपने विवेक से तय करना होता है।  इस मापदंड से ऊपर के सभी मुद्दे कहानी की अभिव्यक्ति से जुड़े हैं - तो ये सुरक्षा के पात्र हैं और इस मापदंड के नीचे जो भी है - वह असंरक्षित है। न्यायालय ने इस मामले में इसी प्रक्रिया को नीचे बताए गए तरीके से लागू किया।  

     
    ( क ) सबसे पहले, हम कहानी को उसके अलंकरण, भावों के वर्णन, किरदारों की समस्याएं और प्रत्यक्ष क्रियाओं से अलग करते है। फिर हमें उसका विषय, कथानक और रुपरेखा मिल जाती है। दोनों कहानियों के विषय, कथानक और रूपरेखा एक जैसे हैं। दोनों कहानियों में दंगे की पृष्ठभूमि में एक हिन्दू पुरुष, मुस्लिम वैश्या का पैतृक सिंगारदान वेश्यालय से अपने घर ले आता है। दोनों कहानियों में, उस व्यक्ति के घर पर सिंगारदान के होने से उसकी पत्नी और उसकी बेटी/बेटियों के बर्ताव में बदलाव आता है। वे वैश्याओं की तरह व्यवहार करना शुरू कर देती हैं। इसीलिए, न्यायालय ने ये समीक्षा की:

     

    "....विषय, कथानक और कहानी की रुपरेखा - ये कृति की आत्मा है। अगर कोई विषय, कथानक और कहानी की रुपरेखा को चुराए तो क्या ये अभियोगी की अभिव्यक्ति की साहित्यिक चोरी नहीं है? क्या ये ऊपर बताए गए विषय, कथानक और कहानी की रुपरेखा को सहजता से अभियोगी की असंरक्षित कल्पना कहकर ख़ारिज किया जायेगा? लगता तो नहीं। हम अब तक निष्कर्षण के उस मक़ाम तक नहीं पहुंचे हैं जहाँ हमने कृति को उसकी असंरक्षित कल्पना तक उघाड़ दिया हो।"

     

    ( ख ) फिर हमने कृति को आगे थोड़ा और उघाड़ा और हम सारांशन के अगले चरण तक जा पहुंचे। "हम अगर किरदारों से उनकी धार्मिक और व्यवसायिक पहचान, दंगे की पृष्ठभूमि, सिंगारदान को ले जाने की घटना, या फिर सिंगारदान से नायक की पत्नी और बेटी के प्रभावित होने को कहानी से अलग कर दें तब जाकर हम शायद कहानी के कॉपीराइट से असंरक्षित निष्कर्षण तक पहुंचेंगे। फिर हम शायद, उदाहरण के तौर पर, इस विचार तक पहुँच सकते हैं कि कोई वस्तु या कलाकृति उसका इस्तेमाल करने वाले में, उस वस्तु के पुराने या मूल अधिकारी के स्वभाव या ऊपरी भेष की दिशा में परिवर्तन पैदा कर सकती है। इसे निश्चित ही एक असंरक्षित कल्पना के तौर पर सामने रखा जा सकता है। यदि कोई और इस कहानी को लिखता या किसी और समायोजन या अलग किरदारों के साथ इसका नाट्य रूपांतरण करता जिसमें विषय, कथानक या कहानी की रुपरेखा भी अलग होती, तो उनपर साहित्यिक चोरी का कोई करवाई योग्य मुक़दमा नहीं हो सकता था।"

     

    4. निष्कर्ष

    न्यायालय ने माना कि अभियोगी की कहानी के विषय, कथानक या कहानी की रुपरेखा को केवल एक कहानी की कल्पना के तौर पर नहीं देखा जा सकता है। यह एक कहानी के विचार की अभिव्यक्ति के रूप में काफी विस्तृत है। इस नतीजे में यह माना गया है कि एक विस्तृत विषय/कहानी की रुपरेखा/कथानक जो कहानी के सार को शामिल करता है वह संरक्षित है। इस मामले में, प्रतिवादी ने अभियोगी की कलाकृति में से अनोखे भाग की ही नकल की है। उन्होंने अपनी वैबसीरीज़ के प्रस्तुतीकरण में बदलाव किये हैं। हालाँकि, दोनों कहानियों की आत्मा और सार एक ही है। इसीलिए न्यायालय ने निष्कर्षण की प्रक्रिया लागू करते हुए ये माना कि प्रतिवादी ने अभियोगी की कलाकृति के कॉपीराइट का उल्लंघन किया है। 

     

    हालांकि, हमें इस बात को समझना होगा कि इस निर्णय को किसी भी सामान्य विषय-वस्तु की सुरक्षा की मिसाल के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। यह जानना ज़रूरी है कि बिना किसी अनोखे भाग के कोई भी सामान्य विषय-वस्तु/कथानक को संरक्षित नहीं माना जा सकता।  

    ***

    (अनुवाद: निखिल पटेल)

     

    कानूनी अधिकारी, SWA | अनामिका झा इंटलैक्चुअल प्रॉपर्टी क़ानून की विशेषज्ञ हैं, जिसमें कॉपीराइट क़ानून और मीडिया एवं मनोरंजन क़ानून शामिल हैं। उनका जुनून रचनाकारों की सेवा है। उनके पास मुकदमों और कॉर्पोरेट जगत, दोनों का अनुभव है। उनके सभी मूल अंग्रेज़ी आर्टिकल उनके इस ब्लॉग पर उपलब्ध हैं: https://www.attorneyforcreators.com/