•  अजय ब्रह्मात्मज
    •  31 August 2020
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    "लेखक का 'सेंस ऑफ़ ह्यूमर' अच्छा होना चाहिए अन्यथा वह निराश हो जायेगा।"

    अजय ब्रह्मात्मज के सवाल, लेखकों के जवाब: संजय चौहान

    भोपाल में पले-पढ़े संजय चौहान ने अध्यापन और पत्रकारिता के बाद टीवी के लिए लेखन आरम्भ किया और फिर फिल्मों में व्यस्त हो गए। 'हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी' के संवाद लिखने से शुरुआत हुई। बीच में ‘आई एम कलाम’ और ‘मैंने गाँधी को नहीं मारा’ लिखने के बाद उन्होंने ‘पान सिंह तोमर’ लिखी। इन दिनों वे कुछ वैब सीरीज़ लिखने में व्यस्त हैं।

    - जन्मस्थान
    भोपाल, मध्य प्रदेश।

    - जन्मतिथि 
    20 अप्रैल 1960

    - शिक्षा-दीक्षा
    स्नातक तक की पढाई भोपाल से, फिर एमए और एमफिल, जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली। 

    लेखन प्रशिक्षण और अभ्यास? 
    प्रशिक्षण तो कोई नहीं लिया। अभ्यास अभी तक जारी है।

    मुंबई कब पहुंचे? 
    सन 2000 में। दिल्ली में पत्रकारिता से टीवी सीरियल लेखन में आ गया था। दिल्ली में संभावनाएं कम थीं। मैंने मुंबई आना बेहतर समझा। 

    कहानी लिखने का विचार कैसे आया? पहली कहानी कब लिखी थी? वह कहीं छपी थी या कोई और उपयोग हुआ था?
    मेरी मां हिंदी और संस्कृत पढ़ाती थीं। उनका आरंभिक प्रभाव रहा। स्कूल में कविता-कहानी पाठ में हिस्सा लेता था। फिर मैं पिताजी के साथ पांडुरना चला गया था। मराठी मीडियम से पढ़ाई होती थी। वहां से ‘नवभारत’ अखबार के बच्चों के पन्ने के लिए लिख कर भेजा करता था। अनेक कोशिशों के बाद एक बार छप गया तो मैं कस्बे में मशहूर हो गया। वहां से उत्साह बढ़ा। लिखने से पहले लेखक की छवि दिमाग में बसी। मेरे पापा (मशहूर लेखक शानी को मैं पापा बोलता था) को देखा करता था। उनका कमरा बंद रहता था। गाढ़े रंग की खिड़कियों के कमरे में वे लैंप जला कर लिखते थे। वह विजुअल मेरे दिमाग में बस गया। शाम में उनके दोस्त दुष्यंत कुमार, धनंजय कुमार, सत्येन और शरद जोशी आ जाया करते थे। इनका जमावड़ा अच्छा लगता था।

    आरंभिक दिनों में किस लेखक ने प्रभावित लिया? कोई कहानी या रचना, जिसका ज़बरदस्त असर रहा?
    मुझे चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी ‘उसने कहा था’ बहुत अच्छी लगती थी। उसमें मस्ती, इश्क और बाकी चीजें भी थी। पापा की कहानियों और उपन्यासों का प्रभाव रहा।

    पहली फिल्म या नाटक या कोई शो, जिसकी कहानी ने सम्मोहित कर लिया?
    फ़िल्में बहुत देखता था। ‘साहब बीवी गुलाम’ मैं हज़ार बार देख चुका होऊंगा। त्योहारों में वह फिल्म देखने को मिलती थी। मनोज कुमार की ‘उपकार’ बार-बार देखी। मुझे था कि मुंबई जाकर मीना कुमारी से मिलूंगा। उनके साथ एक फिल्म करूंगा, जिसमें उनका बेटा बनूंगा। आज भी उनका इंट्रो सीन मैं भक्ति भाव से देखता हूँ।

    आप का पहला लेखन जिस पर कोई फिल्म, टीवी शो या कोई और कार्यक्रम बना हो?
    अशोक चक्रधर, उदय प्रकाश और सफ़दर हाश्मी के साथ कुछ छिटपुट लेखन करने के बाद टीमवर्क के संजय रॉय को ‘न्यूज़लाइन’ का आईडिया दिया था। इसमें पत्रकारिता की दुनिया थी। वह एल टीवी पर आया था।

    ज़िन्दगी के कैसे अनुभवों से आपके चरित्र बनते और प्रभावित होते हैं?
    थोड़ा कठिन सवाल है। बुरे और अच्छे दोनों वक़्त के अनुभव काम आते हैं। डीवीडी दौर में मैंने भी कॉपी की है। वह करने के बाद एक दिन लगा कि मुझे यह काम नहीं करना है। फिर कोई काम नहीं रहा। उन दिनों दोस्तों से उधार लेकर काम चलाया।

    चरित्र गढ़ने की प्रक्रिया पर कुछ बताएं?
    चरित्र की पृष्ठभूमि देखनी पड़ती है। उसका आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक पृष्ठभूमि के साथ शहर और उम्र भी देखनी पड़ती है।

    क्या आप अपने चरित्रों की जीवनी भी लिखते हैं?
    शुरू में यह अभ्यास किया था। वह मुझे ज़्यादा काम की नहीं लगी। फिर भी उसे एक्स्प्लोर ज़रूर करता हूँ। वह नास्तिक है या कुछ और है जैसी बातें।

    अपने चरित्रों के साथ आप का इमोशनल रिश्ता कैसा होता है?
    बहुत मुश्किल रिश्ता रहता है। अच्छे, बुरे और कमीने चरित्र रचने के बाद हमें उनके साथ रहना पड़ता है। सब बनना पड़ता है। इस तरह एक रिश्ता तो बन ही जाता है।

    क्या कभी आप के चरित्र ख़ुद ही बोलने लगते हैं?
    शुरू में नहीं बोलते थे। तब मैं सीधे स्क्रीनप्ले और संवाद लिखने बैठ जाता था। बाद में गड़बड़ी समझ में आई कि साथ-साथ संवाद लिख देने से उनकी भाषा एक जैसी हो जाती है। एकरसता आ जाती है। अभी लम्बी स्टोरी, फिर ट्रीटमेंट और फिर विस्तार से पटकथा लिखता हूँ। संवाद आखिरी में लिखता हूँ। अब उनकी सुन लेता हूँ।

    क्या किरदारों की भाषा अलग-अलग होनी चाहिए?
    बिल्कुल होनी चाहिए। रियल ज़िन्दगी में यही होता है। भाइयों और दोस्तों को देखिये। एक ही माहौल से होने के बावजूद उनकी भाषा अलग होती है। अगर दो चरित्र एक जैसा सोचते और बोलते हैं तो किसी एक की ज़रुरत नहीं है। 

    संवाद लिखना कितना आसान या मुश्किल होता है?
    संवाद लिखने के बारे में सलीम साहब को याद करूंगा। वे कहते हैं यह ‘गरीब के तार’ जैसा होना चाहिए। कम से कम शब्दों में ज़्यादा से ज़्यादा बात। वह आसान नहीं होता। यह मुश्किल काम है।

    दिन के किस समय लिखना सबसे ज़्यादा पसंद है? कोई ख़ास जगह घर में? फिल्म लिखने के लिए कभी शहर भी छोड़ा है?
    मैं शहर के बाहर जाकर लिखना पसंद करता हूँ। पहले रात में ही लिखता था। अभी ऐसा कोई वक़्त नहीं रहता। कई बार रात सोचने में गुज़र जाती है और सुबह में लिख पाते हैं।

    कभी राइटर ब्लॉक से गुज़रना पड़ा? ऐसी हालत में क्या करते हैं?
    यह किसी ऐय्याश लेखक की कल्पना है। कई बार अटकते हैं। भटकते हैं, लेकिन रहते तो वहीं हैं। उन्हीं किरदारों के साथ। ऐसा कुछ होने पर वॉक ले लीजिये। कुकिंग कर लीजिये। अब कोई पायलट या ड्राईवर तो ऐसा नहीं कह सकता की उसे ‘पायलट ब्लॉक’ या ‘ड्राईवर ब्लॉक' हो गया है। 

    लेखकों के बारे कौन सी धारणा बिल्कुल गलत है?
    लेखन भी एक काम है। लेकिन सिर्फ लिखना आने से लेखक नहीं हो जाते। इसीलिए लेखन को सबसे आसान काम समझना गलत धारणा है।  फिल्मों का लेखन आसान काम नहीं है। 

    लेखक होने का सबसे बड़ा लाभ क्या है?
    सारी निराशा लेखन में निकल जाती है। सभी दुश्मनों को विलैन का नाम दे सकते हैं। अपनी भड़ास निकाल सकते हैं। आप कोई बड़ी और आदर्श बात भी लोगों तक पहुंचा सकते हैं।

    फिल्म के कितने ड्राफ्ट्स तैयार करते हैं?
    निर्भर करता है फिल्म पर। ‘पान सिंह तोमर’ एक साल में लिखी गयी। ‘आई एम् कलाम’ 15 दिनों में लिख दी थी। हर स्क्रिप्ट की अपनी एनर्जी होती है।

    अपने लेखन कैरियर की अभी तक की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मानते हैं?
    अभी तक कोई उपलब्धि नहीं है। पुरस्कार वगैरह तो सभी को मिल जाते है। इस सवाल का जवाब देने में वक़्त लगेगा।

    कई बार कलाकार दृश्य और संवादों में बदलाव करते हैं। क्या यह उचित है?
    मैं नहीं मानता कि कलाकार और निर्देशक अनपढ़ और बेवकूफ होते हैं। हो सकता है उन्हें लिखना नहीं आता हो, लेकिन उनका स्क्रिप्ट-सेंस ज़बरदस्त होता है। अगर वे कोई बदलाव चाहते हैं तो करना चाहिए। लेखन में कमजोरी हो तभी ऐसा होता है। और फिर निर्देशक की बात आखिरी होनी चाहिए।

    कहा जाता है कि लेखन एकाकी काम है। अपने अनुभव बताएं।
    यह दर्दनाक और अकेले का काम है। इसमें किसी और की गुंजाईश नहीं होती। लेखक का 'सेंस ऑफ़ ह्यूमर' अच्छा होना चाहिए अन्यथा वह निराश हो जायेगा। लिखते समय हम किरदारों के साथ रहने लगते हैं।

    फिल्मों में आप के आदर्श लेखक कौन हैं?
    मेरे आदर्श ढ़ेर सारे है। इन्दर राज आनंद, वजाहत मिर्ज़ा,अबरार अल्वी जैसे कई हैं। विशाल भारद्वाज का लेखन बहुत पसंद है। सलीम-जावेद हैं। गुलज़ार साहब हैं।

    लेखकों की स्थिति में किस बदलाव की तत्काल ज़रुरत है?
    उनें अपने लेखन का उचित पारिश्रमिक मिले। नए लेखक के लिए न्यूनतम राशि तय करने की बात चल रही है। अनुबंध लेखकों के पक्ष में भी हो।

    साहित्य और सिनेमा के रिश्तों पर क्या कहेंगे?
    हमारे यहाँ साहित्य और सिनेमा का रिश्ता बन ही नहीं पाया है। हिंदी लेखन ज्यादातर विजुअल नहीं है। उसे सिनेमा में लाने में दिक्कत है। हिंदी लेखक चाहते तो हैं उनकी रचनाओं पर फ़िल्में बनें लेकिन वे इस लेखन को दोयम दर्जे का मानते हैं। इस मामले डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी भाग्यशाली हैं कि उन्हें अमृता प्रीतम और काशीनाथ सिंह जैसे लेखक मिलें।

    इन दिनों क्या लिख रहे हैं?
    अभी एक वैब सीरीज़ लिख रहा हूँ, जो बायोपिक है। उसके अलावा एक मिनी सीरीज के लिए रिसर्च का काम कर रहा हूँ।

    अपनी स्क्रिप्ट में गाने के सिचुएशन आप डालते हैं कि किसी और की सलाह होती है?
    मेरी कोशिश तो रहती है कि मैं ही डालूँ। गानों की गुंजाईश लिख देता हूँ। उसका मूड भी बता देता हूँ।

    इंटरवल पॉइंट कौन तय करता है?
    मेरी कोशिश रहती है कि मैं ही करूँ। एक चलन है कि इंटरवल के बाद का सीन फ़िलर की तरह हो ताकि कोई देर से घुसे भी तो कहानी मिस न हो। मुझे लगता है कि ऐसा नहीं होना चाहिए।
        
    स्क्रिप्ट किस सॉफ्टवेयर में लिखते हैं और उसकी भाषा क्या होती है?
    मैं  फ़ाइनल ड्राफ्ट का इस्तेमाल करता हूँ। उसमें अंग्रेज़ी में ही करना होता है। बाद में हिंदी कर देता हूँ। कुछ कलाकार हिंदी में मांगते हैं।

    फिल्म लेखन में आने की इच्छुक प्रतिभाओं को क्या सुझाव देंगे?
    थोड़ी तैयारी के साथ आयें। फ़िल्में देखें। स्क्रिप्ट पढ़ें। स्क्रिप्ट लेखन की किताबें पढ़ लें। आने के पहले ख़ुद कुछ कहानियां लिख कर परख लें।

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    आप अगर इस स्तम्भ में किसी सिनेमा, टीवी या वैब सीरीज़ लेखक या गीतकार के जवाब पढ़ना चाहें तो हमें contact@swaindia.org पर ईमेल भेजकर नाम सुझाएँ।

     

    अजय ब्रह्मात्मज जाने-माने फिल्म पत्रकार हैं। पिछले 20 सालों से फिल्‍मों पर नियमित लेखन। 1999 से दैनिक जागरण और दैनिक भास्‍कर जैसे प्रमुख अखबारों के साथ फ़िल्म और मनोरंजन पर पत्रकारिता। चवन्‍नी चैप (chavannichap.blogspot.com) नाम से ब्‍लॉग का संचालन। हिंदी सिनेमा की जातीय और सांस्‍कृतिक चेतना पर फिल्‍म फेस्टिवल, सेमिनार, गोष्‍ठी और बहसों में निरंतर सक्रियता। फिलहाल सिनेमाहौल यूट्यूब चैनल (youtube.com/c/CineMahaul) और लोकमत समाचार, संडे नवजीवन और न्यूज़ लांड्री हिंदी में लेखन।