•  डॉ. मनीष कुमार जैसल
    •  22 August 2020
    •  471

    "अरुणांचल की प्राकृतिक सुंदरता को अगर सही से एक्सपोजर मिले तो हमें शायद ही दूसरे देशों में शूटिंग के लिए जाना पड़े।"

    'अरुणांचल के अमिताभ' कहे जाने वाले लेखक-निर्देशक-अभिनेता हेगे डी अप्पा से ख़ास बातचीत। 

    हम सभी हिंदी सिनेमा से ख़ासे परिचित हैं लेकिन पूर्वोत्तर (नॉर्थ-ईस्ट) के सिनेमा से गैर-पूर्वोत्तर राज्यों के आम दर्शक अनजान ही रहते हैं। वो पूर्वोत्तर जो अपनी खूबसूरती, संस्कृति और सभ्यता के लिए जाना जाता है। स्क्रीनराइटर्स ऐसोसिएशन की इस ख़ास सीरीज़ में, डॉक्टर मनीष कुमार जैसल समाज का अक्स दिखाने वाले मीडियम सिनेमा के जरिये आपको पूर्वोत्तर राज्यों की यात्रा कराएंगे। जानु बरुआ, मंजु बोरा, रीमा दास, जतिन बोरा, ज़ुबिन जैसे नाम आपने देश की चर्चित मीडिया में ज़रूर सुने होंगे। इनकी फिल्मों को भी आपने किसी फिल्म फेस्टिवल में देखा होगा। लेकिन भारत के पूर्वोत्तर में बसे आठ राज्यों के फ़िल्मकारों, पटकथा लेखकों, निर्माताओं, और खासकर यहाँ के सिनेमा के भूत, भविष्य और वर्तमान को लेकर जानकारी जुटाना मुश्किल रहता है। कैसा है इन राज्यों का सिनेमा, किस तरह की चुनौतियों का सामना करता है? इसी को ध्यान में रखते हुए हम यह सीरीज अपने पाठकों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं जिसमें पूर्वोत्तर राज्यों से जुड़े फिल्म विधा के सशक्त हस्ताक्षरों से आपको रूबरू कराया जायेगा।

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    भाग 2: हेगे डी अप्पा 

    2007 में प्रेसिडेंट अवार्ड के लिए चुनी गई एहसान मुजीद निर्देशित मोनपा बोली में बनी फिल्म 'सोनम' में की गई अदाकारी से मशहूर हुए ईटानगर निवासी हेगे डी अप्पा अरुणांचल प्रदेश के मुख्य फिल्म कलाकार, निर्देशक, गायक, लेखक के साथ सोशल वर्कर के रूप में जाने पहचाने जाते हैं। इन्हें अरुणांचल का अमिताभ बच्चन भी कहा जाता है। हेगे डी अप्पा अरुणांचल प्रदेश की अपतानी बोली के पहले अभिनेता रहे हेगे डी टैगा के पुत्र हैं। अरुणांचल प्रदेश के पहले फ़िल्मकार टारो चटूंग की हिन्दी फिल्म 'फ्रंटियर स्टूडेन्ट्स' में भी हेगे ने अभिनय किया था। साथ ही 2009 में अंशुमान जी बरुआ की हिन्दी फिल्म ‘शिवम’ में भी हेगे अभिनेता थें जिसे 2011 में पूरे भारत में रिलीज़ मिली। इस तरह अरुणांचल प्रदेश में बनी लगभग 34 से अधिक फिल्मों में अभिनय तथा 16 से अधिक फिल्मों को निर्देशित और लिख चुके हेगे डी अप्पा का फिल्मी कैरियर पुराना और बेहद सकारात्मक रहा है। 

    हेगे अप्पा अरुणांचल आर्टिस्ट सोसाइटी 1998 और अरुणांचल फिल्म फेडरेशन 2013 के फाउंडर मेम्बर, अपतानी कैरियर गाइडेंस फोरम के फाइनेंस सेकेट्री, तथा अपतानी सोशियो कल्चरल एंड लिट्रेचर सोसाइटी के कल्चरल सेकेट्री के पद पर भी अपनी स्पष्ट भूमिका निभा चुके हैं। एक लंबे अनुभव को साथ लेकर हेगे अप्पा ने अरुणांचल प्रदेश के सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर बेहतरीन कार्य किए हैं। 

    पूर्वोत्तर के सिनेमा संस्कृति के विकास के क्रम को समझने के लिए हमने उनसे बात की। पेश हैं उनसे बातचीत के कुछ अंश:
     
    आपकी अब तक की सिनेमाई यात्रा कैसी रही? किन चुनौतियों का सामना किया है आपने?
    1996 में बनी फिल्म 'फ्रंटियर स्टूडेन्ट्स' से एक कलाकार के रूप में मैंने फिल्मी सफर शुरू किया जो एक वीडियो फिल्म थी। उन दिनों कोई सिनेमा हॉल नहीं हुआ करता था। सिनेमा हॉल की स्थिति वैसे तो आज भी वैसी ही है। लेकिन फिल्म निर्माण के बाद स्क्रीनिंग की चुनौती सबसे प्रमुख रही है। टीवी पर फिल्म दिखाई जाती थी। यही एक माध्यम था फिल्म को दिखने का। 16 से अधिक फिल्में निर्देशित की। कई फ़िल्में लिखी भी। वहीं 34 के करीब फिल्मों में अभिनय किया। इन सभी को करते हुए दर्शक की चिंता सताती रही। साथ ही भाषा का संकट हमेशा रहा। नई पीढ़ी के निर्माता निर्देशको के सामने भी फाइनेंस और दर्शकों का संकट सबसे पहले आता है। ऊपर से अरुणांचल प्रदेश में 26 से अधिक मुख्य आदिवासी समुदाय और उसमें भी सब-ट्राइब 100 से अधिक हैं और उनकी बोलियाँ भी अलग हैं। एक बोली दूसरे राज्य के समुदाय को समझ नहीं आती। अपतानी, मिशिंग, मोनपा जैसी तमाम बोलियाँ हैं जिनको लोग समझते हैं लेकिन अगर किसी एक भाषा में फिल्म बनाई जाए तो दूसरे बोली वाले को यह समझने में मुश्किल होती है।
     
    इसीलिए यहाँ एक नया फिल्म कल्चर आया है कि फिल्म हिन्दी में बननी शुरू हुई है। लेकिन उस फिल्म को भी सिनेमा हॉल के अंदर दिखाने के प्रयास न करते हुए उसे मोबाइल थियेटर के जरिये दिखाने का प्रयास ही किया जाता है। यही सब बड़ी चुनौतियाँ हैं यहाँ फिल्म निर्माण में।
     
    फ़िल्मों के लेखन में क्या चुनौतियाँ रही हैं ?
    फ़िल्म लेखन में दिक्कतें ज़्यादा तो नहीं हैं। लेकिन उन्हें परदे के लिए बनाने के माध्यम में बहुत चुनौतियाँ हैं। मैं कई टेली फ़िल्म लिख चुका हूँ, उन्हें बना भी चुका हूँ। लेकिन फ़ीचर फ़िल्मों के लिए कई बार सोचना पड़ता है। यहाँ बहुत कुछ है लिखने को लेकिन कितना लिखा जा रहा है इससे ज़रूरी है यह जानना कि कितना लिखा हुआ फ़िल्माया जा रहा है।
      
    असम और अरुणांचल के सिनेमा उद्योग में क्या अंतर नज़र आता है?
    असम और अरुणांचल दोनों में जमीन आसमान का अंतर है। 1935 में असमिया सिनेमा की शुरुआत हुई वहीं हमने 1976 में फिल्में बनाने की शुरुआत की थी। फिल्म 'मेरा धर्म मेरी माँ' नाम की फिल्म को अरुणांचल सरकार ने फाइनेंस किया था और उसकी भाषा भी हिन्दी रखी गई थी। भूपेन हजारिका के निर्देशन में बनी ये फिल्म हम लोगों ने बचपन में देखी थी। भाषा का बहुत बड़ा अंतर हैं। असम में पूरे राज्य का 70 फीसदी नागरिक असमिया भाषा समझता है तो ऐसे में फिल्मों के दर्शक कम से कम 70 फीसदी तो हैं ही। यहाँ 26 मेजर ट्राइब के अंदर 100 के करीब सब-ट्राइब होने से भाषाई विविधता इतनी है कि फिल्म बनाने की सोचना भी अपने आप में बड़ी बात है। यहाँ बॉलीवुड और हॉलीवुड फिल्में दर्शक देख रहा हैं ऐसे में अरुणांचल की अपनी कहानी को हिन्दी में भी देखने पर दर्शक हिन्दी के सिनेमा से तुलना करने लगता है। और हिन्दी फिल्मों के आगे तो हम कुछ भी नहीं। वहीं बात असम की करे तो वहाँ भी हालत ज्यादा सही नहीं हैं। व्यावसायिक रूप से वो भी नुक़सान में ही हैं। एक दो फिल्मों को छोड़ कर उनकी फिल्में भी दर्शको से दूर ही हैं।
     
    क्या सरकारी मदद मिल रही है?
    दूरदर्शन के लिए बनने वाली टेली फिल्म के लिए तो फाइनेंस हो रहा है लेकिन क्षेत्रीय भाषा की फीचर फिल्मों के लिए कोई मदद नहीं मिल रही है। सरकार को भी यह संकट पता है, हो सकता है शायद इसीलिए इस ओर ध्यान न दे रही हो। मैंने खुद मुख्यमंत्री से मुलाक़ात की थी इस संदर्भ में तो उन्होंने मेरा सजेशन सुना भी और इसे सराहा भी। मैंने उन्हें बताया कि यहाँ के फ़िल्ममेकर की फिल्में अगर कहीं अवार्ड जीत कर लाती है तो राज्य सरकार उसे सम्मानित करे। यह इस मार्च के बजट में शामिल होना था लेकिन कोरोना संकट काल की वजह से टल गया। 

    पूर्वोत्तर राज्यों से जुड़े फ़िल्मकार मुंबई और हैदराबाद जैसे शहरों में पलायन करते हैं। क्या कारण हैं?
    एक प्रोफेशनल फिल्ममेकर के तौर पर यहाँ का निर्देशक और कलाकार टेकनीशियन काम करेगा तो भूखा मर जाएगा। ऐसे में उसे मुंबई और हैदराबाद जैसी बड़ी फिल्म इंडस्ट्री की ओर जाना ही पड़ेगा। भोजपुरी और अन्य क्षेत्रीय सिनेमा में आप लोकल फ़िल्म फ़िल्म बना कर जी सकते हैं लेकिन यहाँ यह मुमकिन नहीं। साल में एक दो फिल्म  में अभिनय करने में मिले 50 हजार या एक लाख से पूरे साल कैसे गुजारा होगा यह संकट उन्हें पता है। इसीलिए जा रहे हैं।
     
    हिन्दी, तमिल, तेलुगु से जुड़े फ़िल्मकार अरुणांचल या कहे पूर्वोत्तर राज्यों की खूबसूरती तथा कलाकारों को अपनी फिल्मों में दिखा रहे हैं। इसे कैसे देखते हैं आप ?
    हमारे अरुणांचल की प्राकृतिक सुंदरता को अगर सही से एक्सपोजर मिले तो हमें शायद ही दूसरे देशों में शूटिंग के लिए जाना पड़े। यहाँ के फ़िल्मकार फिल्म से जुड़े जरूरी समान असम से लाकर ही शूट करते हैं। यह एक मुश्किलों भरा सफर होता हैं। मुंबई की फिल्मों का बजट ज्यादा होता है। वो विदेशों में शूट करते हैं। इससे अच्छा देश में और यहाँ मुफ्त में उपलब्ध लोकेशन का प्रयोग क्यो नहीं करना चाहेंगे? विशाल भारद्वाज ने रंगून बनाई। राकेश रोशन ने कोयला के 40 फीसदी सीन यहीं शूट किए। लेकिन दोनों में अरुणांचल कहाँ है यह सभी दर्शक देख सकते हैं। यहाँ के सिनेमाई विकास में इसका कोई योगदान मुझे नहीं नज़र आता। दोनों ही फिल्मों में अरुणांचल के किसी भी कलाकार को काम नहीं मिला। सारे क्रू मेम्बर तक मुंबई से ही लाये गए। ऐसे में मेन या दूसरे तीसरे नंबर के किरदार भी लेना पसंद नहीं करते। दो चार किरदार फिल्म में दे देने से उन्हें लगता हैं कि पर्याप्त है लेकिन यहाँ के लोगों का इसका कभी विरोध नहीं किया। ना ही किसी तरह का खलल उनके फिल्म निर्माण में डाला बल्कि मदद ही की। मेहमान का दर्जा दिया। मैंने खुद रंगून के लिए काफी कोशिश की लेकिन रोल नहीं मिला । फिर भी कभी इसका विरोध नहीं किया। यहाँ किसी तरह का एक्टिव फिल्म ऐसोसिएशन न होने से भी यह समस्या उठती है।

    नए ऑनलाइन स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म के आने से दर्शकों और फ़िल्मकारों में किस तरह के बदलाव दिख रहे हैं?
    मैंने इन प्लेटफॉर्म का प्रयोग तो अभी  तक नहीं किया। लेकिन मेरे नई पीढ़ी के साथी कर रहे हैं। छोटे छोटे वीडियो तो बनाकर वो डाल रहे हैं लेकिन वो इससे कितना कमा रहे हैं यह कह पाना मुश्किल है। वहीं दर्शक अरुणांचल का दर्शक इन माध्यमों से भी अभी जुड़ नहीं सका है। क्षेत्रीय भाषा से दर्शकों की दूरी अभी भी बरकरार है। हिन्दी इंगलिश फिल्मों ने अरुणांचल के दर्शको को जकड़ रखा है।
     
    आने वाले समय में किन विषयों पर अरुणांचल की क्षेत्रीय बोली भाषा में फिल्म बनाई जानी सबसे ज्यादा जरूरी लगती है?
    1962 के इंडो चाइना युद्ध पर एक मुकम्मल फिल्म न हिन्दी में है न क्षेत्रीय भाषा में। यह एक जरूरी विषय हो सकता है। हम इंडियन तो बन गए लेकिन किस तरह की दिक़्क़तों का सामना आज भी इसी युद्ध के असर के साथ कर रहे हैं यह फिल्म में दिखाया जाना चाहिए। चाइनीज के खिलाफ जो हमने लड़ाई लड़ी उसमें अरुणांचल के लोगो का किस तरह का योगदान और क्या चुनौतियाँ रही है यह दिखाया जाना चाहिए। यहाँ के नेचर को लेकर जो फिल्म बनानी चाहिए वो अब तक नहीं बन पाई। हिन्दी फिल्म के बजट पर नेचर को लेकर एक अच्छी फिल्म बने तो यह अच्छा योगदान होगा। अरुणांचल प्रदेश को लेकर ही कई कहानिया लिखकर उन पर फिल्में बनाई जा सकती हैं। यहाँ के स्थानीय लोगो की कहानियों पर फ़िल्में बनाई जानी चाहिए। यहाँ के तमाम आदिवासी समुदाय में कोई भी कॉमन कहानी नहीं हैं। सबमें कोई न कोई अंतर के साथ लगभग मिलती जुलती लोक कथायें  प्रचिलित है। यहाँ अपतानी में एक कहानी करी तुमी दुरी यामा चार-पाँच ट्राइब में एक कॉमन लोक कथा है। लेकिन इसमें भी कुछ न कुछ अंतर आपको अलग अलग बोलियों में देखने को मिलेगा। 

    अरुणांचल प्रदेश के सिनेमा का भविष्य कैसा होगा ?
    यहाँ का भविष्य अन्धकारमय तो नहीं है लेकिन ऐसा भी नहीं कह सकते कि हमारा फ्यूचर बहुत ब्राइट है। जैसा चल रहा है वैसा चलता रहेगा यही कह सकता हूँ। 20 लाख 30 लाख की सरकारी मदद मिलने पर ही निर्माता क्षेत्रीय भाषा में फिल्म निर्माण में दिलचस्पी लेगा। और यह राज्य के सिने इतिहास को बचाने के लिए जरूरी पहल होनी चाहिए। वन टाइम फाइनेंसर यहाँ बहुत हैं।

     

    हेगे डी अप्पा के कुछ गीत और टेली फ़िल्मस -

    https://www.youtube.com/watch?v=3BuZ-g-_i94&feature=youtu.be

    https://www.youtube.com/watch?v=tPXWcAU4Has

    https://www.youtube.com/watch?v=kuSTCGElM0c&feature=youtu.be

    https://www.youtube.com/watch?v=uWd9cY--hb8&feature=youtu.be

    https://www.youtube.com/watch?v=hstB9Uxj_Lg&feature=youtu.be

    डॉ. मनीष कुमार जैसल मंदसौर यूनिवर्सिटी, मध्य प्रदेश, में जनसंचार एवं पत्रकारिता के सहायक प्रोफेसर हैं । नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी नई दिल्ली के बुक फ़ेलो और सहपीडिया यूनेस्को के रिसर्च फ़ेलो भी रह चुके हैं। फ़िल्मकार मुजफ्फर अली पर किताब 'फिल्मों का अंजुमन: मुजफ्फर अली' प्रकाशित। सेंसरशिप और सिनेमा पर पीएचडी। नियमित आलेख और संगोष्ठियों में वाचन। संपर्क: mjaisal2@gmail.com