•  अजय ब्रह्मात्मज
    •  17 July 2020
    •  603

    "लेखन में हर पेशे की पढ़ाई करनी होती है।"

    अजय ब्रह्मात्मज के सवाल, लेखकों के जवाब: रितेश शाह

    - जन्मस्थान 
    अनंतनाग, जम्मू और कश्मीर।
       
    - जन्मतिथि 
    19 अप्रैल 1976

    - शिक्षा-दीक्षा 
    बीए (अंग्रेज़ी साहित्य), हिंदू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, एमए (मास कम्युनिकेशन फिल्म और रेडियो), जामिया मिलिया, दिल्ली।

    - लेखन प्रशिक्षण और अभ्यास?
    मास कॉम की पढ़ाई में सिखाते हैं। नाटक करने के दिनों में कुछ फिल्मों में काम करने वालों ने सिखाया। बाकी फिर इन्टरनेट का दौर आया तो वहां से सीखा। स्क्रिप्ट लेखन की मशहूर किताबें पढ़ीं।

    - मुंबई कब पहुंचे?
    1999 के अप्रैल में। मैं हर शहर अपने जन्मदिन के महीने में ही छोड़ता हूँ। 23 साल की उम्र में दिल्ली छोड़ी थी। 14 साल की उम्र में श्रीनगर छोड़ा था।

    - कहानी लिखने का विचार कैसे आया? पहली कहानी कब लिखी थी? वह कहीं छपी थी या कोई और उपयोग हुआ था?
    स्कूल-कॉलेज के दिनों में लिखा, जो वहां की मैगज़ीन में छपी। 19 साल की उम्र में मैंने अपना पहला नाटक लिख लिया था। किसी और का अधूरा नाटक पूरा किया था। मैंने सीधे नाटक, और फिर टीवी के लिए लिखा। अंत में फिल्मों में आ गया।

    - आरंभिक दिनों में किस लेखक ने प्रभावित लिया? कोई कहानी या रचना, जिसका ज़बरदस्त असर रहा? 
    दसवीं में प्रेमचंद की ‘नमक का दारोगा’ पढ़ी थी। उसका असर रहा। तब तक हिंदी साहित्य अधिक नहीं पढ़ा था। ‘ममता का विष’ एकांकी के प्रभाव में रहा। वह ऐसी माँ के बारे में है,जो अपने बच्चे को इसलिए बीमार रखती है कि वह बाहर न जाए।  

    - ज़िन्दगी के कैसे अनुभवों से आप के चरित्र बनते और प्रभावित होते हैं?
    श्रीनगर छोड़ने के बाद संजीदा हो गए थें हम। माँ-बाप, शिक्षक और थिएटर के गुरु एन के शर्मा के सिखाये मूल्यों का लम्बा प्रभाव रहा। उनकी बनायीं नींव से मार्गदर्शन मिला। चरित्र उनके नज़रिए और अपने अनुभव से मिलते हैं।

    - चरित्र गढ़ने की प्रक्रिया पर कुछ बतायें।
    अक्सर यही होता है कि एक कहानी आती है तो उसके साथ चरित्र भी आते हैं। हम उनकी कुंडली बनाने लगते हैं। पसंद-नापसंद, नैतिकता, आस्था और विश्वास राजनीतिक विचारधारा, किस वजह से कुछ करेगा कहानी में। कैरेक्टर स्कैच कभी लिख लेते हैं। कभी ऐन मौके पर सोचते हैं। चरित्र की छवि गढ़ लेते हैं। जैसे कि मूर्तिकार मूर्ति बनाता है या चित्रकार कोई मानव आकृति बनाता है। हम उसकी छवि उतार लेते हैं कभी कागज़ पर, कभी दिल में। वह बहुत हद तक कहानी के उतार-चढ़ाव को तय करता है।

    - अपने चरित्रों के साथ आप का इमोशनल रिश्ता कैसा होता है?
    मुझे अपने चरित्र शरीर से अलग दिखते हैं। लगाव तो हो ही जाता है। तभी तो वे मेरे साथ बढ़ते हैं। भावुक दृश्यों में लगाव दिखता है। किसी बाप ने बेटे को खो दिया हो तो हम भी रोते हैं। हाँ, लेकिन उस लगाव को गंभीरता से नहीं ले सकते। किरदारों के बुरे समय में हम साथ हो जाते हैं। लेखन में 'एम्पैथी' तो होनी ही चाहिए। इसी तरह कभी किरदार हँसता है तो हम भी हँसते हैं।

    - क्या कभी आप के चरित्र ख़ुद ही बोलने लगते हैं?
    हाँ, क्योंकि मैं लिखने के पहले सुनता हूँ। थिएटर में भी मेरी यही प्रक्रिया रही। दिल्ली की बसों में सफ़र करते समय उन्हें बातें करते हुए सुनता था सिचुएशन के हिसाब से। मैं उन्हें याद कर लेता था और फिर घर पहुँच कर लिख देता था। स्क्रीनप्ले भी ऐसे ही लिखता हूँ। मेरी आँखों के सामने 70 एमएम का एक पर्दा होता है। उस पर सीन उभरते हैं।

    - क्या किरदारों की भाषा अलग-अलग होनी चाहिए?
    बिलकुल होनी चाहिए। एक ही परिवेश और पृष्ठभूमि के किरदारों की भाषा सामान हो सकती है थोड़े मुहावरों और शब्दों के हेरफेर से। लेकिन अगर कोई धारावी का किरदार बनारस के पण्डे से मिलता है तो उनकी भाषा अलग होनी ही चाहिए। 'नैचुरल वेरिएशन' आना चाहिए। नकली भाषा ना हो।

    - संवाद लिखना कितना आसान या मुश्किल होता है? 
    कहानी और पटकथा लिखना अधिक मुश्किल है। अगर आप अपनी कहानी और दृश्य अच्छी तरह जानते हैं तो संवाद लिखना आसान हो जाता है। मैं उन चंद लेखकों में से हूँ जो अपने संवाद हिंदी में ही लिखते हैं। मेरी पृष्ठभूमि नाटकों की है तो संवाद लिखने का अभ्यास रहा है। निर्देशकों से मैंने 'विजुअलाइज़ेशन' सीखा है। 

    - दिन के किस समय लिखना सबसे ज्यादा पसंद है? कोई खास जगह घर में? फिल्म लिखने के लिए कभी शहर भी छोड़ा है?
    एक छोटी घटना सुनाऊँगा। मैं नाटक लिखने लगा था। एक दिन कुछ सीन लिख कर ले जाने थें। मैंने अपने गुरु एन के शर्मा से कहा कि कल रात हॉस्टल में बहुत हल्ला हो रहा था, इसलिए नहीं लिख पाया। इस वीकेंड पर तसल्ली से लिखूंगा। इस पर उन्होंने कहा कि तुम्हें कौन सा किसी उपन्यास से चुराना था। तुम उसी शोर पर लिख देते। मेरी ट्रेनिंग ऐसी है कि किसी भी हालत और स्थिति में लिख सकता हूँ। मैं डिस्टर्ब भी नहीं होता। मैं बातें करते हुए लिख सकता हूँ। बच्चों को कोई मनाही नहीं होती। मेरी समस्या इच्छा की है, जगह और समय की नहीं है। लोगों के कहने पर कभी 'रिवाइज़' करने बाहर चला जाता हूँ। वरना घर पर लिखता हूँ।

    - कभी राइटर ब्लाक से गुजरना पड़ा? ऐसी हालत में क्या करते हैं?
    मुझे शुरू में ही समझा दिया गया था कि यह लेखकों का फ़ितूर है। आप बुरा लिख सकते हो, लेकिन ऐसा नहीं होगा कि लिख ही नहीं सकते। 

    - लेखकों के बारे में कौन सी धारणा बिल्कुल गलत है?
    बहुत सी गलत धारणायें हैं। ऐसा माना जाता है कि लेखक गुरु गंभीर होते हैं। साफ़-सफाई पर अधिक ध्यान नहीं देते। सच्चाई यह है कि वे भी खाने-पीने और सफाई के शौक़ीन होते हैं। लेखक बहुत मज़ेदार होते हैं। कुछ लेखक ख़राब आदमी होते हैं। शुरू में मुझे इस पर यकीन नहीं होता था, लेकिन ऐसे लेखक मिले हैं। एक ही धारणा सही है कि वे आलसी होते हैं।

    - लेखक होने का सबसे बड़ा लाभ क्या है?
    हम बच्चों की तरह हर फिल्म के साथ नया घरौंदा बनाते हैं। हम पहले दिमाग में फिल्म बना लेते हैं। हमारा बचपन गया ही नहीं है। हर तरह के इमोशन को हम फ़ील कर लेते हैं।

    - फिल्म के कितने ड्राफ्ट्स तैयार करते हैं?
    यह निर्भर करता है कि तीर निशाने पर कब लगा। कई बार 5-6 ड्राफ्ट ही लिखे गए औए वही शूट हुई है। कई बार 40 ड्राफ्ट के बाद भी बात नहीं बनती। औसतन 7-8 तो होते हैं। ज़िन्दगी के करीब की कहानी जल्दी फाइनल हो जाती है। उसमें कम ड्राफ्ट बनते हैं। थ्रिलर में ज्यादा ड्राफ्ट लगते हैं। अब बैंक डकैती पर फिल्म लिखनी है तो नया ट्विस्ट लाने के लिए ड्राफ्टिंग करनी पड़ती है।

    - अपनी ज़िन्दगी और परिवेश के बाहर की कहानियां भी लिख लेते हैं आप?
    जी। क्या होता है कि संवेदना और सहानुभूति के स्तर पर लेखक होने के नाते आप समझ सकते हैं। ठीक है कि वह आप के अनुभव में न हुआ हो, लेकिन अपने किसी अनुभव से जोड़ कर आप लिख लेते हैं। हमने कश्मीर से पलायन किया। बाद में मैंने ‘एयरलिफ़्ट’ लिखी। उसका मेरी ज़िन्दगी से कोई लेना-देना नहीं था, लेकिन अनुभव से था। जैसे कि ‘मदारी’ में इरफ़ान के बेटे की पुल दुर्घटना में मौत हो जाती है। वह क्या महसूस करता है, कल्पना ये अनुभव दे सकती है। हम लड़कियों के बारे में लिखते समय ऐसे ही लिखते हैं। ‘पिंक’ में जिस टच का ज़िक्र था, वह फ़ील कर सकता हूँ। एहसास और भावनाओं का फ़ील तो रहता ही है। जानकारी फिल्मों और किताबों से मिल जाती है।

    - अपने लेखन कैरियर की अभी तक की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मानते हैं?
    यह भी हमारी ट्रेनिंग का हिस्सा था कि न तो कोई पोस्टर रखो। न तो कोई पत्रिका या आर्टिकल रखा हो। इधर दो-तीन ट्रॉफ़ी आई हैं, जो घर पर हैं। उपलब्धि यही है कि अभी तक लिख रहा हूँ। मुझे अच्छी फ़िल्में लिखने के लिए मिल रही हैं। यही उपलब्धि है।

    - कई बार निर्देशक और कलाकार दृश्य और संवादों में बदलाव करते हैं। क्या यह उचित है?
    अगर वे अच्छे से योगदान कर रहे हैं तो बढ़िया है। अगर बेतुकी मनमानी कर रहे हैं तो ख़राब है। मैं लेखन की सहयोगी प्रक्रिया से आया हूँ। मुझे किसी बदलाव से कोई दिक्कत नहीं होती है। मुझे तानाशाही नहीं चाहिये। योगदान सोना-चांदी या किसी और निकृष्ट धातु की तरह हो सकता है।

    - कहा जाता है कि लेखन एकाकी काम है। अपने अनुभव बताएं। 
    हम लिखते अकेले ज़रूर हैं, लेकिन फिल्म लेखन सहयोगी प्रक्रिया है। सभी के सहयोग से लेखन निखरता है। निर्देशक और कलाकार के साथ बाकी सभी तकनीशियनों का सहयोग भी चाहिए होता है। हम साहित्य नहीं रच रहे हैं।

    - फिल्मों में आप के आदर्श लेखक कौन हैं?
    हमारे बड़े होने के समय के सलीम-जावेद हम सभी के फ़ेवरिट हैं। और उसके अलावा के के शुक्ला का काम मुझे बहुत अच्छा लगता है एक हद तक। जावेद सिद्दीक़ी,आकाश खुराना आदि ने साथ में अच्छा काम किया। मेरी फेवरिट फ़िल्में अनेक हैं। लेखक का नाम छठी-सातवीं के समय से ही जोड़ने और याद रखने लगा था। बचपन में एक फिल्म से मैं निकल गया था, क्योंकि कहानी अच्छी नहीं थी। शुरू से ही कहानी मुझे अपील करती रही है।

    - लेखकों की स्थिति में किस बदलाव की तत्काल ज़रुरत है?
    पार्लियामेंट ने  क़ानून पास कर दिया है, लेकिन निर्माता अभी भी दबाने और बदलने की कोशिश करते हैं। क़रार में जो शर्तें लिखी जाती हैं, उन्हें कानून भी नहीं मानेगा। फिर भी लेखक पूरी जानकारी नहीं होने से डरा और सहमा रहता है। कुछ निर्माताओं ने अच्छी तरह पालन किया है। लेखकों पर निर्भरता बढ़ी है। 

    - साहित्य और सिनेमा के रिश्तों पर क्या कहेंगे?
    जब तक था, तब तक अच्छा था।  टॉकीज आने के बाद से साहित्य पर निर्देशक निर्भर रहे। उन्होंने अच्छी फ़िल्में बनायीं। इधर यह रिश्ता कमज़ोर हुआ है। सिनेमा से अधिक लेखक की ग्रोथ के लिए साहित्य ज़रूरी है। बगैर साहित्य पढ़े आप अच्छे लेखक नहीं हो सकते। साहित्य हमारे लिए आधार और मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है। ओटीटी के आने के बाद साहित्य की ज़रुरत बढ़ी है।

    - इन दिनों क्या लिख रहे हैं?
    ‘धाकड़’ लिख रहा हूँ। बाकी फिल्मों के बारे में घोषणा होने के बाद ही बता सकता हूँ।

    - लॉकडाउन में कुछ लिख पाए क्या?
    लॉकडाउन में सतही और ख़राब नहीं लिख पाया। आत्मविश्लेषण हो जाता है। घर का काम-काज बढ़ने से 'स्लोडाउन' हो गया है। खिड़की से देख कर क्या लिख पाएंगे?

    - फिल्म लेखन में आने के इच्छुक प्रतिभाओं को क्या सुझाव देंगे?
    किताबें पढनी हैं। लेखन के नियम मालूम होने चाहिए। फ़ॉर्म सीखना होगा। लेखन का खाद लाने के लिए साहित्य का सप्लाई लाइन दुरूस्त रखें। 'क्रॉस-राइटिंग' पढ़नी होगी। पढ़ने में मन नहीं लगने से लेखक नहीं बन सकते। यहाँ तो हर पेशे की पढ़ाई करनी होती है।

     

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    पिछले 20 सालों से फिल्‍मों पर नियमित लेखन। 1999 से दैनिक जागरण और दैनिक भास्‍कर जैसे प्रमुख अखबारों के साथ फ़िल्म और मनोरंजन पर पत्रकारिता। चवन्‍नी चैप (chavannichap.blogspot.com) नाम से ब्‍लॉग का संचालन। हिंदी सिनेमा की जातीय और सांस्‍कृतिक चेतना पर फिल्‍म फेस्टिवल, सेमिनार, गोष्‍ठी और बहसों में निरंतर सक्रियता। फिलहाल सिनेमाहौल यूट्यूब चैनल (youtube.com/c/CineMahaul) और लोकमत समाचार, संडे नवजीवन और न्यूज़ लांड्री हिंदी में लेखन।