•  अजय ब्रह्मात्मज
    •  02 July 2020
    •  844

    "रंग दे बसंती का डीजे मैं ख़ुद था। उसकी कुंठा मेरी कुंठा थी।"

    अजय ब्रह्मात्मज के सवाल, लेखकों के जवाब: कमलेश पांडे

    इस नयी श्रृंखला में वरिष्ठ सिने पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज फिल्म और टीवी जगत के लेखकों से चुनिंदा सवाल करेंगे और उनके जवाब आप तक पहुचायेंगे। आप अगर इस स्तम्भ में किसी सिनेमा या टीवी लेखक के जवाब पढ़ना चाहें तो हमें contact@swaindia.org पर ईमेल भेजकर नाम सुझाएँ।

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    - जन्मस्थान

    हंस नगर,बलिया,उत्तर प्रदेश

     

    - जन्मतिथि

    21 सितम्बर 1947

     

    - शिक्षा-दीक्षा

    केवल 12वीं तक। इलाहाबाद और मुंबई।

     

    - मुंबई कब पहुंचे?

    1970 में जेजे में एडमिशन मिला था। आर्ट डायरेक्टर बनने के उद्देश्य से आया था, लेकिन वहां कुछ और पढ़ते थे। वहां से ड्राप आउट होकर एडवरटाइजिंग में चला गया।

     

    - कहानी लिखने का विचार कैसे आया? पहली कहानी कब लिखी थी? वह कहीं छपी थी या कोई और उपयोग हुआ था?

    स्कूल के दिनों से मेरी हिंदी अच्छी थी। मेरे टीचर मुझे निराला जी से मिलवाने ले गए थे। वहां मैंने उनकी कविता ‘राम की शक्ति पूजा’ की कुछ पंक्तियाँ सुनाई थीं। खुश होकर उन्होंने भी पाठ किया था मेरी क्लास के सभी सहपाठियों के लिए। उन दिनों कहानियां भी लिखी। तब ज्ञान रंजन वहां थे। मेरी कहानियां कहीं छप नहीं पायीं।

     

    - आरंभिक दिनों में किस लेखक ने प्रभावित लिया? कोई कहानी या रचना, जिसका ज़बरदस्त असर रहा?

    फणीश्वरनाथ रेणु,धर्मवीर भारती और मोहन राकेश। हिंदी में मोहन राकेश जैसी मेहनत और मशक्कत किसी और में नहीं दिखती। 

     

    - पहली फिल्म या नाटक या कोई शो,जिसकी कहानी ने सम्मोहित कर लिया?

    मुंबई में सत्यदेव दुबे के नाटकों ने। वे हिंदी थिएटर के महान ऋषि थे। उनका ‘आधे अधूरे’ का मंचन तो रोंगटे खड़े करने वाला था। उसमें अमोल पालेकर और भक्ति बर्वे थे।

     

    - आप का पहला लेखन जिस पर कोई फिल्म,टीवी शो या कोई और कार्यक्रम बना हो?

    अमोल पालेकर की ‘अनकही’(1985) मेरी पहली फिल्म है। 

     

    - ज़िन्दगी के कैसे अनुभवों से आप के चरित्र बनते और प्रभावित होते हैं?

    मैंने गाँव से ज़िन्दगी शुरू की। वहां के किरदार आज भी साथ हैं। फिर इलाहबाद आ गया था। कानपुर और जबलपुर में भी रहा हूँ। छोटे शहर के किरदारों को भी देखा है। और फिर मुंबई... मेरी पूँजी गाँव,छोटे शहर और महानगर के अनुभवों से तैयार हुई है। चरित्र और भाषा वहीं से निकालता हूँ।

     

    - चरित्र गढ़ने की प्रक्रिया पर कुछ बताएं?

    कहानी कैसी भी हो - ऐतिहासिक हो, सामाजिक हो, वास्तविक हो या मेलोड्रामा हो, मगर आप अपने आप को ही लिखते हैं हर बार। तभी चरित्रों से दर्शक जुडाव महसूस करते हैं। एक छोटा उदहारण दूं। ‘रंग दे बसंती’ का डीजे मैं ख़ुद था। उसकी कुंठा मेरी कुंठा थी। ‘कॉलेज में तो हम हीरो होते हैं, रोड पर आकर जीरो हो जाते हैं’, इस संवाद में मेरी कुंठा थी। मेरा अनुभव था। ‘तेजाब’ का मुन्ना मैं ही था। मैं फिल्मों में मुन्ना और बब्बन नाम के किरदार ले आया।

     

    - क्या आप अपने चरित्रों की जीवनी भी लिखते हैं?

    बिलकुल लिखता हूँ।  मैं पटकथा लेखन की अपनी कक्षाओं में पहला पाठ यही देता हूँ कि हर चरित्र की आत्मकथा लिखो पहले। फिल्म की कहानी में दाखिल होने तक की जानकारी लेखक को होनी चाहिए। यहाँ तक कि उसकी जेब में कितने छुट्टे पैसे है।

     

    - अपने चरित्रों के साथ आप का इमोशनल रिश्ता कैसा होता है? क्या कभी आप के चरित्र ख़ुद ही बोलने लगते हैं?

    रिश्ता तब बनता है,जब किरदार आप से बड़े हो जाते हैं। फिर वे आप को बताने लगते हैं कि ऐसे नहीं, वैसे लिखो। वे आपसे बातें करने लगते हैं। हमें उनकी बातें सुननी पड़ती हैं। चरित्र हमारी अर्द्धचेतना से आते आते हैं। वे चौंकाते हैं।

     

    - क्या किरदारों की भाषा अलग-अलग होनी चाहिए?

    होनी ही चाहिए। ज़िंदगी में हर आदमी की अलग स्पीच और शब्दावली होती है। हर किरदार की अपनी भाषा और अपना अंदाज होना चाहिए। लेखक की भारी भूल होती है, जब हर चरित्र में अपनी भाषा डाल देता है।

     

    - संवाद लिखना कितना आसान या मुश्किल होता है?

    एक तरह से आसान है। जीवन के अनुभवों से आप समृद्ध हैं तो आसान है। संवाद खुद सुन कर देख लें। संगत लग रहा है कि नहीं?

     

    - दिन के किस समय लिखना सबसे ज़्यादा पसंद है? कोई ख़ास जगह है घर में? फिल्म लिखने के लिए कभी शहर भी छोड़ा है?

    मेरा कोई ख़ास समय नहीं होता। कभी-कभी रात के एक-दो बजे भी मेरा सुर लग जाता है। असली बात है कि मैं बहुत आलसी हूँ। सर पर तलवार लटकती है तो लिखता हूँ। दोपहर में नहीं लिखता हूँ। मेरा एक लेखन-अध्ययन कक्ष है। उसकी खिड़की के बाहर हरियाली है। मैं होटल में रूम बुक कर लिखने में यकीन नहीं करता। किसी और शहर नहीं जाता।

     

    - कभी 'राइटर ब्लॉक' से गुज़रना पड़ा? ऐसी हालत में क्या करते हैं?

    'राइटर ब्लॉक' तो सच्चाई है। उसकी प्रमुख वजह होती हैं कि आप की तैयारी पूरी नहीं है। मैं छोड़ देता हूँ। कोई किताब पढ़ने लगता हूँ। कोई अनपढ़ी किताब उठा लेता हूँ। फिल्म देखता हूँ। मनपसंद खाना खाता हूँ। लेखक को ख़ुद को रिवॉर्ड देते रहना चाहिए। मैं गोलगप्पे खाता हूँ।

     

    - लेखकों के बारे कौन सी धारणा बिल्कुल गलत है?

    गलत धारणा है कि लेखक अहंकारी और ऐय्याश होते हैं। कुछ गैरपेशेवर हो सकते हैं।.वह धारणा आंशिक रूप से सत्य है।

     

    - लेखक होने का सबसे बड़ा लाभ क्या है?

    लेखक होना ही एक आशीर्वाद है। यह सभी की नहीं मिलता। अपने हुनर को लेकर विनम्रता और ज़िम्मेदारी होनी चाहिए। उसका सदुपयोग हो। हमारी बात लाखों-करोड़ों लोग देखते-सुनते हैं। 

     

    - फिल्म के कितने ड्राफ़्ट्स तैयार करते हैं?

    ‘सौदागर’ के 10-12 ड्राफ्ट हुए होंगे, उसकी वजह मैं ख़ुद था। मैं राज कुमार और दिलीप कुमार दोनों का फ़ैन था। उनके किरदारों को लिखते समय पन्ने पर पन्ने भर देता था। 8 से 10 पेज के दृश्य लिख देता था। सुभाष घई दृश्य छोटे और आधे पेज में करवाते थे। संक्षेपीकरण सीख गया मैं। औसतन हर फिल्म के 3-4 ड्राफ्ट तो हो ही जाते हैं।

     

    - अपने लेखन करियर की अभी तक की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मानते हैं?

    आज भी सड़क पर युवा मिलते हैं तो कहते हैं "थैंक यू फॉर ‘रंग दे बसंती।"  यह मेरे लिए किसी अवार्ड से बड़ा है। मैंने फिल्म लिखते समय राकेश मेहरा से बोला था कि ऐसा होगा। यह बहुत बड़ी उपलब्धि है।

     

    - कई बार कलाकार दृश्य और संवादों में बदलाव करते हैं। क्या यह उचित है?

    हाँ, कई बार कुछ कलाकार और निर्देशक यह हिमाकत करते हैं। मैं बदलाव से साफ़ मना कर देता हूँ। यहाँ तक कह देता हूँ कि यहीं फाड़ कर चला जाऊँगा।

     

    -  क्या लेखन वाकई एकाकी काम है?

    मेरे लिए तो है। वैसे फिल्म के लेखन में फ़ीडबैक लेते रहना पड़ता है। फिर भी लेखन एकाकी प्रक्रिया है.

     

    - आपके आदर्श लेखक कौन हैं?

    वजाहत मिर्ज़ा, अर्जुन देव ‘रश्क’ और अली रज़ा।  स्क्रीनप्ले में नवेंदु घोष। नवेंदु जी मेरे द्रोणाचार्य हैं। मैंने उनसे ही सीखा है। कभी उनसे मिला नहीं। अकेले उन्होंने स्क्रीनप्ले को साहित्य का स्तर दिया और दिलवाया। बिमल राय के वह प्रिय लेखक थे।

     

    - लेखकों की स्थिति में किस बदलाव की तत्काल ज़रुरत है?

    रॉयल्टी का अधिकार तो 2012 में मिल गया है। अभी यह तय करवाना है कि लेखक को उसके काम की मिनिमम राशि क्या हो? वह प्रारूप बन चुका है। कुछ निर्मता तैयार हो गए हैं।

     

    - साहित्य और सिनेमा के रिश्तों पर क्या कहेंगे?

    अफ़सोस की बात है कि यह मजबूत नहीं है। कोई पुल नहीं है। मैंने ऑफर किया था कि पटकथा लिखना सीखना चाहिए। कई लेखकों ने वादा तो किया है। अभी केवल गौरव सोलंकी सामने आया है। लेखकों के बुरे अनुभव की किंवदंतियाँ चलती हैं। अनेक हिंदी साहित्यकारों को फिल्म लेखन घटिया और निम्नस्तरीय काम लगता है। बुरे उदहारण भी हैं। उदय प्रकाश की कहानी ‘मोहनदास’ पर इतनी बुरी फिल्म बनी। बेहद अफ़सोस हुआ। बंगाल में यह संबंध मजबूत है।

     

    - इन दिनों क्या लिख रहे हैं?

    राकेश मेहरा के लिए एक पुरानी स्क्रिप्ट पर काम कर रहा हूँ। बीच में वे दूसरी फिल्मों में व्यस्त थे। एक फिल्म रेसूल पुकुट्टी के पास है। पूजा बेदी के पास एक स्क्रिप्ट है।

     

    - फिल्म लेखन में आने के इच्छुक प्रतिभाओं को क्या सुझाव देंगे?

    फिल्म लेखन का व्याकरण सीखो। फिल्मों में सारी कलाओं का समावेश है। स्ट्रक्चर समझना ज़रूरी है। फिल्मों की कमज़ोर कड़ी आज भी लेखन ही है।

     

    अजय ब्रह्मात्मज जाने-माने फिल्म पत्रकार हैं। पिछले 20 सालों से फिल्‍मों पर नियमित लेखन। 1999 से दैनिक जागरण और दैनिक भास्‍कर जैसे प्रमुख अखबारों के साथ फ़िल्म और मनोरंजन पर पत्रकारिता। चवन्‍नी चैप (chavannichap.blogspot.com) नाम से ब्‍लॉग का संचालन। हिंदी सिनेमा की जातीय और सांस्‍कृतिक चेतना पर फिल्‍म फेस्टिवल, सेमिनार, गोष्‍ठी और बहसों में निरंतर सक्रियता। फिलहाल सिनेमाहौल यूट्यूब चैनल (youtube.com/c/CineMahaul) और लोकमत समाचार, संडे नवजीवन और न्यूज़ लांड्री हिंदी में लेखन।