•  डॉ. मनीष कुमार जैसल
    •  06 June 2020
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    नाम गुम जाएगा? 

    डिजिटल शोज़ में स्क्रीनराइटर का 'नाम' ढूंढने की विशेष पड़ताल (सहयोग: दिनकर शर्मा)

    सिनेमाई भाषा में लेखक की अहम भूमिका होती है। फ़िल्म की कहानी लिखना हो या फिर उसकी पटकथा या फिर संवाद एक लेखक ही सिनेमा के परदे या टीवी और मोबाइल की स्क्रीन में दिखने वाले कंटेंट का शिल्पकार होता है।  वो जैसा समाज देखता, पढ़ता और महसूस करता है वैसा ही लेखनी में उतारने की कोशिश करता है। एक लेखक अपनी किसी रचना से  पाठक के दिलों दिमाग़ पर पैठ बनाता है। स्वप्न से लेकर स्वर्ग की सीढ़ियों और नरक भुगतने वाले पात्रों को लेखक ही जीवंत रूप देता है। भिन्न माध्यमों के लिए लिखने वाले लेखक को यूँ तो काफ़ी सम्मान मिलता है लेकिन सिनेमा और टीवी के लेखक को अक्सर अपने नाम की स्वीकार्यता के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है। तब भी, जब उसी की लिखी फिल्म परदे पर चल रही हो। यही चलन अब कुछ हद तक डिजिटल माध्यमों में देखने को मिल रहा है। प्रस्तुत है, इसकी एक पड़ताल।   

    हम सुन रहे हैं कि डिजिटल माध्यम ने वाकई 'राइटर इज़ द किंग' की कहावत को सच कर दिया है। कुछ वैब शोज़ के लिए लेखक को 'शोरनर' 'क्रियेटर' इत्यादि के नाम से भी सम्मान मिलने लगा है। लेकिन एक आम दर्शक की हैसियत से देशी विदेशी दोनों ही वैबसीरीज़ के साथ डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर दिखाई जा रही फ़िल्मों का विश्लेषण करते हुए पता चला कि यहाँ इनके लेखक के नाम को वरीयता नहीं दी जा रही है। सभी जगह निर्माता और अभिनेता का नाम प्रधान है और कई जगह 'क्रियेटर' या 'क्रिएटिड बाय' का। इस 'क्रियेटर' या 'क्रिएटिड बाय' के शीर्षक का क्या मतलब होता है इसकी भी हमने जानकारी जुटायी। राइटर्स गिल्ड ऑफ़ अमेरिका वैस्ट WGA की वैबसाइट (लिंक: wga.org/contracts/know-your-rights/determining-separated-rights ) कहती है कि 'क्रियेटर' या 'क्रिएटिड बाय' के लिए या तो राइटर ने शो का फॉर्मेट लिखा हो या उसे पायलट एपिसोड में कहानी या 'रिटिन बाय' का क्रेडिट मिला हो। यह भी जानकारी मिली है कि भारत में कुछ निर्माताओं और निर्देशकों को भी 'क्रियेटर' का क्रेडिट दिया जा रहा है, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। इन दिनों वैब शोज़ के लिए 'राइटर्स रूम' का प्रचलन है जिसमें कई लेखक बैठकर हर एपिसोड की कहानी और स्क्रीनप्ले पर काम करते है। ये भी आम जानकारी है कि एक लेखक पूरी सीरीज़ नहीं लिखता है। शो के मूल क्रियेटर को भी कई कई घंटे का कंटेंट लिखने के लिए सहयोग लगता है। इस तरह हमारी पड़ताल के निष्कर्ष में बात आयी कि 'क्रियेटर' या 'क्रिएटिड बाय' के क्रेडिट से यह पूरे तौर पर तय नहीं होता है कि क्या क्रियेटर शो का अकेला लेखक भी है, कौन सा ऐपीसोड किसने लिखा है, संवाद किसने लिखे हैं, क्या शो की मूल कहानी किसी बाहरी लेखक की किताब पर आधारित है, इत्यादि। ऐसे में 'राइटर्स रूम' के सभी लेखकों के नामों को तरजीह क्यों नहीं दी जा सकती, ये प्रश्न स्वतः ही उठता है। 

    एपिसोड या फिल्म के अंत में आने वाले 'रोलिंग क्रेडिट्स' में सभी के नाम दिए जाते हैं। कुछ शोज़ के 'ओपनिंग क्रेडिट' में भी लेखक का नाम रहता है, जबकि कुछ में नहीं। लेकिन हमने पाया कि इसके अलावा कहीं और - ख़ासकर शोज़ की प्रोफ़ाइल या गैलेरी में, एपिसोड की लिस्ट में - लेखक के नाम को रेखांकित करने से मानो बचा जाता है या भुला दिया जाता है। ये भी ग़ौरतलब है कि 'बिंज वॉच' के सिद्धांत के कारण 'ओपनिंग' और 'रोलिंग क्रेडिट' दोनों ही हमेशा ‘ऑटो-स्किप’ मोड़ पर ही रहते है। यानी लेखक का नाम आप ख़ुद खोदकर निकालना चाहें तो ठीक, वरना आपकी आँखों को लेखक का नाम देखने की तकलीफ़ नहीं दी जायेगी। यहां तक कि पोस्टर पर पहले ही जिन अभिनेताओं का चेहरा दिखाई पड़ रहा है उनके नामों को तो शो के डिस्क्रिप्शन, यानी विवरण, में तवज्जो है, लेकिन जिस लेखक को अमूमन कहानी का असली ‘स्टार’ माना जाता है, उसे प्रचारित नहीं किया रहा है। शो या फिल्म के डिस्क्रिप्शन में लेखक का नाम आपको कहीं नहीं मिलेगा। बस, निर्माता का मिलेगा। अभिनेताओं और सह-अभिनेताओं का भी। फिल्म हुई तो निर्देशक का भी। लेकिन लेखक का नाम ख़ुद से कहीं प्रकट नहीं होगा। लेखकों के क्रेडिट को लेकर सभी ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म एक जैसा ही सोचते हैं इसीलिए नेटफ़्लिक्स, अमेज़ॉन प्राइम वीडियो, एमएक्सप्लेयर, वूट, जी5 और हॉटस्टार जैसे सभी प्लेटफ़ोर्म में आलम यही है कि शो के प्रोफ़ाइल पेज पर लेखक नाम आपको नदारद मिलेगा। 

    यहां मामला क्रेडिट की चोरी का नहीं है। लेखक का हक़ मारा जा रहा है, हम ये भी नहीं कह रहे। बात ये है कि क्या लेखक की रचनाधर्मिता को वो स्थान और आदर दिया जा रहा जिसकी उसे दरक़ार है? क्या उसे ' *ing ' वाला दर्जा मिल रहा है? क्या दर्शक को जागरूक किया जा रहा है कि उसे पसंद आने वाले शो से जुड़े सबसे अहम नाम किसके हैं? क्या लेखक के लिए वो ज़मीन तैयार की जा रही है जिस पर वो अगला शो अपनी मर्ज़ी और अपनी शर्तों पर खड़ा कर सके, बिना नामी अभिनेताओं के। अग़र इसका जवाब 'ना' है तो मुझे डर है ये अच्छे कंटेंट के अनुकूल बात नहीं है। चाहे अनजाने में ही सही, इसमें कहीं ना कहीं नैतिक ज़िम्मेदारी से दूर हटने की ओर इशारा है।  

    कुछ उदाहरण लेते हैं। अमेज़न प्राइम की चर्चित सीरीज़ 'मिर्ज़ापुर' को दर्शकों ने ख़ूब देखा था। उसके संवादों से अभी तक निकल भी नही पाएँ हैं। वहीं इसके दूसरे सीज़न का भी इंतज़ार होने लगा है। लेकिन इसके लेखक कौन हैं, एक दर्शक के तौर पर यह जानने के लिए दूसरे माध्यमों का इस्तेमाल करना पड़ेगा क्योंकि यहाँ एक जगह पर तो इसका कोई लेखा जोखा मौजूदा नहीं है। मुझे विकिपीडिया और आईएमडीबी पर जाकर देखना पड़ा कि इसके सभी एपिसोड को पुनीत कृष्णा, विनीत कृष्णा और करण अंशुमान ने मिलकर लिखा है। लेकिन इस शो के डिस्प्ले पेज पर इसका कोई ज़िक्र नही है। स्क्रीनशॉट देखें।

     

    इसी तरह अमेज़न प्राइम पर ही चर्चित ईरानी फ़िल्म 'अ सेपरेशन' देखते हुए असग़र फरहदी के निर्देशन का ज़िक्र मिला, लेकिन फ़िल्म के लेखक के तौर पर उन्हें जानने के लिए दर्शक को किसी और माध्यम का सहारा लेना पड़ेगा। यही हाल प्राइम द्वारा ख़ुद बनाये गए शोज़ और इस ऐप पर उपलब्ध बाकी हिंदी और अंग्रेज़ी फिल्मों का है। स्क्रीनशॉट देखें।

    अमेज़न प्राइम पर ही हाल ही में एक और वैब सीरीज़ ‘पाताल लोक’ की स्ट्रीमिंग हुई। देखते ही देखते इस क्राइम थ्रिलर सिरीज़ के चाहने वालों की संख्या में इज़ाफ़ा भी होने लगा। हाथीराम से लेकर हथौड़ा त्यागी और तोप सिंह चाकू दर्शकों के दिलों दिमाग़ में राज करने लगे। एक दर्शक के तौर पर मैंने यह जानने की कोशिश की कि यह सीरीज़ किसके दिमाग़ की उपज है। सवाल का जवाब ढूँढने के लिए मुझे फिर से मशक़्क़त करनी पड़ी। ध्यान दें, कि इस ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर एक एक सीन की ख़ासियत या उससे जुड़े किस्से 'XRAY TRIVIA' में बताए जाते हैं। आप स्क्रीनशॉट में देख सकते हैं कि वैबसीरीज़ के एक दृश्य को लेकर अमेज़न प्राइम पर बक़ायदा यह बताया गया है कि इस सीन का एक्शन अभिनेता द्वारा ही किया गया है बजाय किसी स्टंटमैन के। यह जानकारी रोचक तो है लेकिन इस सीन को लिखा किसने है, ये इस पन्ने पर पता नहीं चलता। 


     
    अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए मैंने पूरी सीरीज़ देखी। हरेक एपिसोड के अंत में अगले एपिसोड पर ले जानी वाली खिड़की को तुरंत प्रभाव से रोकने के लिए 'Hide' पर क्लिक करना पड़ा जिसके लिए सिर्फ दो-तीन सैकिंड ही दिए जाते हैं। कई बार प्रयास करने पड़े क्योंकि क्लिक होने से पहले ही अगला एपिसोड शुरू हो जाता था। काफ़ी जद्दोजहद के बाद जब रोलिंग क्रेडिट चले, तब जाकर पता चला कि इस वैब सीरीज़ के क्रियेटर सुदीप शर्मा हैं जिनके साथ सागर हवेली, हार्दिक मेहता और गुंजित चोपड़ा ने इसे लिखा है। ध्यान देने वाली बात है कि इस शो में ओपनिंग क्रेडिट भी नहीं है। ना ही पोस्टर पर नाम दिए गए हैं।
       
    बात नैटफ़्लिक्स की करें तो पता चलता है कि इस ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर भी वही हाल है। यहाँ 'जमतारा-सबका नम्बर आएगा' जैसी नई वैबसीरीज़ के साथ पूर्व में दिखाई जा चुकी 'सेक्रेड गेम्स' जैसी सीरीज़ में लेखक का नाम शो के विवरण में शामिल नहीं है। 'जमतारा-सबका नम्बर आएगा' के लेखक त्रिशांत श्रीवास्तव हैं जबकि विक्रम चंद्रा के उपन्यास पर आधारित 'सेक्रेड गेम्स' (सीज़न 1 और 2) के लेखक वरुण ग्रोवर, स्मिता सिंह, वसंतनाथ, ध्रुव नारंग, पूजा तोलानी, निहित भावे हैं। 

    आप चाहे कहें कि मैं ज़रूरत से ज़्यादा जज़्बाती हो रहा हूँ या 'ओवर रिएक्ट' कर रहा हूँ। लेकिन मेरा सवाल है कि मुझे लेखक का क्रेडिट ढूंढना क्यों पड़े? मुझे बार बार याद क्यों न दिलाया जाए? लेखक को एक स्टार के तौर पर प्रोजेक्ट क्यों नहीं किया जाए, ताकि मनोरंजन जगत 'ऑन-स्क्रीन' कलाकारों की लोकप्रियता पर निर्भर रहने से आज़ाद हो सके। एक दर्शक को सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में एक लेखक का नाम खोजने के लिए क़वायद करनी पड़ेगी तो कैसे कहा जाए कि नये लोगों को सिनेमाई लेखन की ओर आकर्षित होना चाहिये। सभी दर्शक लेखक को जानने के लिए एक शोधार्थी बन जायेंगे, यह भी मुमक़िन होने से रहा। 

    जब किसी भी फ़िल्म या वैब सीरीज़ में लेखक केंद्रीय है तो ऐसे में उसे वरीयता क्यों नहीं दी जा रही है, यह समझ से परे है। लेखक की पहचान को प्रचारित नहीं किया जाना भविष्य के फ़िल्म लेखन की परम्परा के लिए नुक़सानदेह है। आने वाले समय में ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म अपनी उपस्थिति को और मज़बूत करेंगे। लेकिन आने वाले समय के लेखक का मनोबल कैसे बढ़ेगा? ख़ुशकिस्मती हुई तो 'ओपनिंग क्रेडिट' में या फिर 'रोलिंग क्रेडिट में चुपके से आने वाला लेखक का नाम, मानो उसे हाशिये में धकेलता है, दिमाग़ में पूरी दुनिया बसाने के कौशल को गुम हो जाने के लिए कहता है। क्रेडिट के दिखने की अनिश्चितता दर्शक को लेखक का नाम जानने की आदत नहीं होने देती। ऐसा फॉर्मेट तय क्यूँ नहीं है कि लेखक का नाम निर्देशक के नाम के तुरंत बाद या ठीक नीचे, अनिवार्य रूप से आएगा? चाहे पोस्टर हो या वैब बैनर - सभी जगह। शो के विवरण में हमेशा दिखाई पड़ेगा। 

    हिंदी और भारतीय सिनेमा में लेखकों के साथ अन्याय हुए हैं। उन्हें उचित मंचों पर प्रोत्साहन नही मिला। ऐसे में नई सदी के नए मंच पर भी ऐसा होता रहे तो इससे सचेत होना चाहिए। इसीलिए ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर चल रहे नए कंटेंट में लेखकों का नाम 'हाईलाइट' ना होना मुझे खटकता है। मैंने हमेशा सिनेमाघर के बाहर लगे फ़िल्म के पोस्टरों पर लेखक का नाम ढूँढा है। लेकिन तकनीकी सहूलियत के इस दौर में अतिआधुनिक प्लेटफ़ॉर्म पर किसी भी फ़िल्म और वैब सीरीज़ के लेखक को जानने के लिए मुझे इतनी मशक़्क़त क्यों करनी पड़े? वो भी ऐसे में जब मैं पैसे देकर उस कंटेंट को देख रहा हूँ।

    एक बार के लिए मान लेते हैं कि इस सब से किसी भी शो के लेखकों को कोई समस्या ना हो। उनके क्रेडिट किसी और को तो दिए नहीं गए हैं, बस पलक झपकते ही फ़ुर्र हो जाने वाले स्क्रीन क्रेडिट्स में सरकाये गए हैं। हो सकता है कई अंतर्मुखी कलाकारों की तरह उन्हें 'लाईमलाइट' की चाह नहीं हो। लोग किरदारों का नाम ले रहे हैं, उनके कहे संवाद बोल रहे हैं - लेखकों के लिए यही बहुत हो। नाम का चर्चा उन्हें चाहिए ही न हो। तब भी, मैं इसे मुद्दा मानूंगा क्योंकि इससे कहीं ना कहीं अच्छे लेखन की तौहीन होती है। बनाने वाले अग़र चाहें तो दर्शक को बार बार यह अहसास दिला सकते हैं कि अच्छा लेखन ही उनकी बनायी फिल्म या शो के लिए रीढ़ की हड्डी है। दर्शक जानेंगे तो ही लेखकों के स्टार होने का मौका आएगा और उनका अपना दर्शक वर्ग बनेगा। इसी राह से गुज़रकर हम बेहतर और विश्वस्तरीय फिल्में और शोज़ बना सकेंगे।

    जनसंचार एवं पत्रकारिता के सहायक प्रोफेसर। नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी नई दिल्ली के बुक फ़ेलो और सहपीडिया यूनेस्को के रिसर्च फ़ेलो भी रह चुके हैं। फ़िल्मकार मुजफ्फर अली पर किताब 'फिल्मों का अंजुमन: मुजफ्फर अली' प्रकाशित। सेंसरशिप और सिनेमा पर पीएचडी। नियमित आलेख और संगोष्ठियों में वाचन। संपर्क: mjaisal2@gmail.com