•  अजय ब्रह्मात्मज
    •  31 May 2020
    •  809

    योगेश की याद में

    गीतकार योगेश (19 मार्च, 1943 – 29 मई, 2020) को श्रद्धांजलि, अजय ब्रह्मात्मज की क़लम से

    29 मई 2020 को गीतकार योगेश का निधन हो गया। निधन के दो-चार दिनों पहले तक उनकी दोस्तों से बातें हो रही थीं। उनका बेटा फिलहाल ऑस्ट्रेलिया में है और बहू अपने मायक। लॉकडाउन की परिस्थिति में वह वसई में रह रहे थे। शिष्यवत मित्र सत्येंद्र त्रिपाठी उनकी देखभाल कर रहे थे। योगेश के निधन से हिंदी फिल्मों में सहज और ललित हिंदी में लिखे गीतों की एक परंपरा ठहर गई।

    गिनती में योगेश ने बहुत कम फिल्मों में गाने लिखे। उन्हें आज की पहचान भी देर से मिली। उनके प्रशंसक मानते हैं कि योगेश को उनकी प्रतिभा और उनके गीतों की लोकप्रियता के अनुरूप स्थान नहीं मिला। फिर भी इस तथ्य से कोई कैसे इनकार कर सकता है कि उन्होंने चंद फिल्मों के दर्जन-दो दर्जन गीतों से ही लोकप्रियता और स्वीकृति का वह मुकाम हासिल किया, जो सैकड़ों फ़िल्में लिखने के बाद भी कई गीतकार नहीं पा सके। योगेश के गीतों की एक अलग श्रेणी है। वह हिंदी फिल्मों के विरले गीतकार हैं। सलिल चौधरी के संपर्क में आने के बाद उनकी प्रतिभा को खास पॉपुलर पहचान मिली। लोकप्रिय सितारों की मुख्यधारा ही फिल्मों से जुडी बाकी हस्तियों को पहचान और लोकप्रियता के मंच पर ले आती है। सलिल चौधरी के साथ तैयार किए उनके कुछ आरंभिक गीत श्रोताओं के बीच नहीं पहुँच सके, क्योंकि वे फिल्में नहीं बन सकीं।

    योगेश लखनऊ से मुंबई आए थे। लखनऊ में उनके पिता पीडब्ल्यूडी में इंजीनियर थे। कर्तव्यनिष्ठ और इमानदार पिता से योगेश ने सारे सद्गुण ग्रहण किये और उनमें विनम्रता एवं सरलता जोड़ दी। निश्छल व्यक्तित्व के योगेश के लिए हिंदी फिल्मों की गलियों में अपनी राह खोजना और मंजिल तक पहुंचना आसान काम नहीं रहा। पूरा वक्त लगा। योगेश में प्रतिभा और प्रतीक्षा दोनों थी। उन्होंने बेहतर और नामचीन मौकों का इंतजार किया। उन्हें शुरू में चलताऊ किस्म की एक्शन और एडवेंचर फिल्में मिलीं, लेकिन उन फिल्मों के गीतों में भी उनकी प्रतिभा की कौंध देखी जा सकती है। बहरहाल, लखनऊ में वे अपनी सामान्य जिंदगी से खुश और संतुष्ट थे। पिता की आकस्मिक मृत्यु ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। मददगार स्वाभाव के पिता की अर्थी पड़ी थी और नाते-रिश्तेदार यह पूछ रहे थे कि क्रिया-कर्म का खर्च कौन देगा? इस एक कड़वे सत्य ने उन्हें जिंदगी एक बड़ा सबक दिया। पिता की मृत्यु के बाद परिवार के गुजर-बसर के लिए पढ़ाई छोड़ कर उन्होंने नौकरी की तलाश में पिता के दोस्तों और परिचितों से मिलना शुरू किया तो उन्हें निराशा ही हाथ लगी। आखिर में योगेश ने तय किया कि वे कोठी का एक हिस्सा किराए पर चढ़ाकर नौकरी की तलाश में मुंबई जाएंगे।

    मुंबई में उनके फुफेरे बड़े भाई व्रजेंद्र गौड़ फिल्मों में लेखक थे। एक संभावित उम्मीद थी कि शायद भाई साहब की मदद से नौकरी मिल जाएगी। निर्णय की इस नाजुक घड़ी में बचपन के दोस्त सत्यप्रकाश तिवारी साथ आये। दोनों की गहरी दोस्ती थी। दोनों मुंबई आ गए। मुंबई आने पर दोनों दोस्त बड़ी उम्मीद से व्रजेंद्र गौड़ से मिलने गए। वह तब अंधेरी में रहते थे। मुंबई की पहली मुलाकात में ही अंदाजा हो गया था कि भाई साहब कुछ नहीं कर पाएंगे। फिर भी योगेश उनसे मिलने आते रहे। पारिवारिक रिश्ते का लिहाज बना हुआ था। योगेश को कोई काम नहीं मिल पा रहा था। एक दिन सत्यप्रकाश ने योगेश से कहा- ‘अभी तुमको एक ही काम करना है। फिल्म लाइन में ही कुछ बनकर दिखाना है।' योगेश ने अपनी लाचारी जाहिर की। 'मैं क्या करूं मुझे तो कुछ आता नहीं।' फिर भी दोस्त की प्रेरणा और प्रोत्साहन से योगेश ने लोगों से मिलना शुरू किया। सत्यप्रकाश ने कहा कि तुम खाने-पीने की चिंता मत करो। वह मेरी जिम्मेदारी रहेगी। सत्यप्रकाश तिवारी ने उन दिनों में हर तरह की नौकरी की। कहीं चपरासी रहे तो कभी साड़ियां बेची और कभी कोई और काम किया। उन्होंने योगेश को रोज़मर्रा की जरूरी चिंताओं से मुक्त रखा।

    काम की तलाश में भटकने के दिनों में मन के भाव उमड़े। सघन पीड़ा, दुख और अवसाद के एहसास शब्दों में व्यक्त होने लगे। योगेश ने कविताएं लिखनी शुरू कर दी। दोस्तों के बीच कविताएं सुनाते समय तारीफ मिलने पर भी वह बताने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे कि ये कविताएं मेरी हैं। ओशिवारा के जिस इलाके में उन दिनों योगेश रह रहे थे, वहीं गुलशन बावरा भी रहते थे। गुलशन बावरा भी गीत लिखते थे। जब पता चला कि कल्याण जी वीर जी शाह ने गुलशन बावरा के गाने रिकॉर्ड किए तो योगेश को स्फूर्ति और प्रेरणा मिली। फिर वह भी प्रोडक्शन के दफ्तरों और स्टूडियो के चक्कर लगाने लगे। कई असफल चक्करों और छिटपुट मेल-मुलाकातों के बाद संगीतकार रॉबिन बनर्जी से उनकी मुलाकात हुई। उन्होंने योगेश की कविताएं सुनीं और पसंद की। मुलाकातों का सिलसिला बढ़ा तो रॉबिन बनर्जी ने उन्हें बताया कि धुनों पर लिखना शुरू करो। उन्होंने इसका गुर भी सिखाया। लगभग एक साल के अभ्यास के बाद रॉबिन ने खबर दी कि ‘सखी रॉबिन’ फ़िल्म के लिए तुम्हारे गाने चुन लिए गए हैं। योगेश को प्रति गाने ₹25 मिले थे। इसका एक गीत- ‘तुम जो आओ तो प्यार आ जाए, जिंदगी में बहार आ जाए’ काफी लोकप्रिय हुआ था। हालांकि ‘सखी रॉबिन’ के बाद रॉबिन बनर्जी को नौ फिल्में मिलीं, लेकिन सब की सब उसी श्रेणी की थीं- ‘जंगली राजा’, ‘रॉकेट टार्जन’, ‘मार्वल मैन’, ‘फ्लाइंग सर्कस’ आदि उनके नाम थे।

    योगेश ने आगे का सफर जीएस कोहली के साथ तय किया। ‘एडवेंचर ऑफ रॉबिनहुड’ में मोहम्मद रफी का गाया गीत ‘माना मेरे हसीन सनम तू रश्क-ए-आफताब है’ काफी मशहूर हुआ। फिर उषा खन्ना के साथ ‘एक रात’ फिल्म मिली। इस फिल्म का गीत ‘सौ बार बनाकर मालिक ने सौ बार मिटाया होगा’ की तारीफ और चर्चा हुई। इस गीत को सुनकर मजरुह सुल्तानपुरी ने कहा था कि खूबसूरती को लेकर ऐसा भावपूर्ण गीत किसी ने नहीं लिखा है। योगेश ने बीच में गीतकार अनजान के साथ जोड़ी बनाई। तय हुआ कि दोनों साथ मिलकर गीत लिखेंगे। योगेश उन्हें अपने साथ रॉबिन बनर्जी और उषा खन्ना के पास ले गए। दोनों ने कई फिल्मों में साथ गीत लिखे। परेशानी तब हुई जब दो लड़कियों के लिए लिखे उनके गीत बहुत पॉपुलर हुए और फिर वैसे ही गीतों की फरमाइशें होने लगीं, जैसे कि ‘तुमको पिया दिल दिया, बड़े नाज से’ और ‘हंसता हुआ नूरानी चेहरा। स्थिति ऐसी हो गई कि योगेश की गीत लेखन में रुचि कम होने लगी। उन्होंने गीत लिखना बंद सा कर दिया।

    संयोग से उन्हीं दिनों सलिल चौधरी की पत्नी सविता चौधरी से योगेश की मुलाकात हुई और फिर सलिलदा से मिलने का शुभ अवसर आया। पहली मुलाकात में सलिलदा योगेश को नीरस लगे। फिर कुछ ऐसा हुआ कि उन्हें नए गीतकार की जरूरत महसूस हुई। दरअसल, शैलेंद्र का निधन हो गया था और गुलजार काफी व्यस्त थे। योगेश को बुलाया गया दादा ने एक धुन सुनाई और गीत लिखने का बोल कर बाहर चले गए। गीत के बारे में सोचने के चक्कर में योगेश धुन भूल गए। उन्होंने सलिल दा के सहायक से पूछा तो उन्होंने नहीं बताया, बल्कि मजाक उड़ाया कि सी ग्रेड फिल्मों के गीतकार हो तुम... यहां शैलेंद्र और गुलजार गीत लिखा करते हैं। झेप में योगेश घर लौटने के लिए बाहर चले आए। बस स्टॉप पर पहुंचे तो उन के मन में द्वंद चलने लगा। उन्होंने सोचा कि लौटकर जाता हूं तो फिर कभी नहीं आ पाऊँगा। दादा आएंगे तो पूछ लूंगा। फिर सोचा कि दादा कहेंगे कि तुम्हें धुन याद नहीं रहती तो गीत कैसे लिखोगे? इस बीच सामने से बस आती दिखी, लेकिन तभी दिमाग की घंटी बजी और धुन याद आ गई। धुन याद आने के साथ दो-चार बोल फूटे और धुनों में गुंथ गए। दादा के आने जब योगेश ने गीत सुनाया तो वे बहुत खुश हुए। वह गाना रिकॉर्ड हुआ लेकिन फिल्म नहीं बन पाई।

    सलिल दा की मुश्किल धुनों पर योगेश सरल गीत लिखते रहें। इन गीतों में गहन भाव रहते थे। दोनों का रियाज चलता रहा। उन दिनों बासु भट्टाचार्य ने सलिल दा से आगामी फिल्म के लिए गीत तैयार करने को कहा। उन्होंने तो गुलजार की सिफारिश की थी, लेकिन सलिलदा ने योगेश को मौका दिया। गीत रिकॉर्ड हुए लेकिन यह फिल्म भी रुक गई। सलिलदा ने फिर उन गीतों को हृषिकेश मुखर्जी और एल बी लक्ष्मण को सुनाया। लक्ष्मण ने आगामी फिल्म ‘अन्नदाता’ के लिए गीत ले लिए, लेकिन हृषिदा को दो गाने 'आनंद' के लिए पसंद आये। लक्ष्मण ने उन्हें कहा कि केवल एक ही गीत मैं दूंगा, चाहे जो चुन लो। हृषिदा ने ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’ गीत चुना। बाद में योगेश ने आंनद के लिए दूसरा गीत 'ज़िंदगी कैसी है पहेली' लिखा। इन दोनों गीतों ने योगेश की पहचान ही बदल दी। वहां से योगेश की गिनती श्रेष्ठ गीतकारों में होने लगी। अपने गीतों की स्वीकृति और लोकप्रियता के बारे में योगेश ने खुद बताया था कि जब गीत के भाव अपनी कहानी से मिल जाते हैं तो कॉमन अपील होती है। फिर दिल की बात गीतों में चली आती है। योगेश ने एक उदाहरण दिया कि ‘कहीं तो ये दिल कभी मिल नहीं पाते, कहीं से निकल आए जन्मों के नाते’.. ये पंक्तिया साथी सत्यप्रकाश तिवारी के ख्याल से आई थीं।

     

    योगेश के कुछ लोकप्रिय गीत

    कहीं दूर जब दिन ढल जाए

    जिंदगी कैसी है पहेली आए

    आये तुम याद मुझे

    न जाने क्यों होता है जिंदगी के साथ

    रिमझिम गिरे सावन

    रजनीगंधा फूल तुम्हारे

    जानेमन जानेमन तेरे दो नयन

    कई बार यूं ही देखा है

    ना बोले तुम ना मैंने कुछ कहा

    मैंने कहा फूलों से

    अजय ब्रह्मात्मज जाने-माने फिल्म पत्रकार हैं। पिछले 20 सालों से फिल्‍मों पर नियमित लेखन। 1999 से दैनिक जागरण और दैनिक भास्‍कर जैसे प्रमुख अखबारों के साथ फ़िल्म और मनोरंजन पर पत्रकारिता। चवन्‍नी चैप (chavannichap.blogspot.com) नाम से ब्‍लॉग का संचालन। हिंदी सिनेमा की जातीय और सांस्‍कृतिक चेतना पर फिल्‍म फेस्टिवल, सेमिनार, गोष्‍ठी और बहसों में निरंतर सक्रियता। फिलहाल सिनेमाहौल यूट्यूब चैनल (youtube.com/c/CineMahaul) और लोकमत समाचार, संडे नवजीवन और न्यूज़ लांड्री हिंदी में लेखन।