•  दिनकर शर्मा
    •  25 April 2020
    •  769

    “लोगों को हमारा शो देखकर ‘मालगुडी डेज़’ की याद आयी!”

    वैब शो ‘पंचायत’ के युवा लेखक चंदन कुमार से बातचीत


    वैब सीरीज़ का माध्यम युवा लेखकों को मौक़ा देने का नया ज़रिया बनता जा रहा है। अलग-अलग विषयों पर लगातार शोज़ बन रहे हैं, जो प्रस्तुतीकरण में भी नयापन लिए हैं। ऐसा ही एक शो ‘पंचायत’ समीक्षकों की तारीफ़ें बटोर रहा है। गाँव के वातावरण में घटती सीधी-सच्ची कहानी वाले इस शो में ग्रामीण परिवेश और पंचायती राज-व्यवस्था का दिलचस्प ब्यौरा है। गोलीबारी और गाली-गलौच वाले कंटेंट के दौर में ऐसी वैब सीरीज़ एक सुखद अहसास है। इसके युवा लेखक चंदन कुमार ने एसडबल्यूए से बातचीत की। प्रस्तुत है, मुख्य अंश: 

     

     

    लेखन की ओर झुकाव कैसे हुआ? स्क्रीनराइटिंग की बारीकियाँ कैसे सीखी? अभी तक की यात्रा कैसी रही?

     

    मैं मूलतः पटना का रहने वाला हूँ। ICFAI देहरादून से कंप्यूटर साइंस में इंजिनीयरिंग की है। उसके बाद मैंने दो साल IT सैक्टर में नौकरी की। लेखन की ओर मेरा पहला झुकाव उसी दौर में हुआ। 2013 में मैं अपनी नौकरी छोड़कर एक व्यंग्य ख़बरों की वैबसाइट फ़ेकिंग न्यूज़ में काम करने लगा। वहाँ लगभग दो साल तक व्यंग्य ख़बरें लिखने के बाद 2015 में मैं TVF से जुड़ गया और तब से यहीं हूँ। फ़िल्ममेकिंग और स्क्रीनराइटिंग की बारीकियाँ मैंने यहीं सीखीं। शुरूआती दिनों में मैं स्कैच लिखता था। धीरे-धीरे वैब सीरीज़ की ओर क़दम बढ़ाया। सो अभी तक के सफ़र की बात करें तो सब कुछ अच्छा ही रहा है।

     

     

    आप ‘पंचायत’ वैब शो से कैसे जुड़ें? क्या ये आपका ही आइडिया था? प्रक्रिया क्या रही?

     

    2017 में किसी दूसरे वैब शो के आइडिया पर रिसर्च कर रहा था और उसी दौरान मैंने पंचायत दफ़्तर का सैट-अप ढूँढा जो मुझे काफ़ी इंटरैस्टिंग लगा। आइडिया को लेकर शुरुआत में थोड़ा संशय था लेकिन जब TVF के बाक़ी लोगों ने इसमें विश्वास जताया तो मेरा संशय चला गया। आख़िरकार 2018 के मध्य में मैंने ‘पंचायत’ लिखना शुरू किया। हर एपिसोड लिखने के बाद मैं निर्देशक दीपक मिश्रा के साथ TVF टीम के कुछ सदस्यों को बिठाकर नरेशन दिया करता था। नरेशन के सैशन में मिले फ़ीडबैक से स्क्रिप्ट को बेहतर करने में काफ़ी मदद मिली। पंचायत मैंने अकेले ही लिखा है पर निर्देशक दीपक मिश्रा बातचीत और जैमिंग के लिए हमेशा तैयार रहते थें। शूटिंग के दौरान कलाकारों ने भी लिखे हुए दृश्यों में बहुत अच्छा इम्प्रोवाइज़ेशन किया। 2019 में इसकी शूटिंग पूरी हुई।

     

     

    आपके हिसाब से ‘पंचायत’ की ख़ास बात क्या है? आपके लिए इसकी वन-लाइन पिच क्या थी?

     

    ‘पंचायत’ की सबसे ख़ास बात है इसकी छोटी-छोटी कहानियों की फ़्रेशनैस और प्यारे-से किरदार। मेरे लिए पंचायत की ‘वन-लाइन’ पिच है - “एक शहरी लड़का जिसे गाँव बिलकुल भी पसंद नहीं, उसे नौकरी की मजबूरी में एक गाँव में आना पड़ता है।”

     

     

    इसे लिखने के पीछे आपके प्रेरणास्रोत क्या रहें?

     

    देखिये, इस शो को लिखने के पीछे कभी कोई रेफ़रेंस नहीं रहा। हमारे पास बस एक दिलचस्प वन-लाइन थी जिसके साथ हमने खेलना शुरू किया। कहानियाँ बनाते वक़्त मैं निजी अनुभवों और रिसर्च में मिली चीज़ों को पिरोता गया और धीरे-धीरे काग़ज़ पर एक दुनिया बसती गयी। हाँ, शो देखने के बाद कई लोगों ने कहा कि इसे देखकर उन्हें ‘मालगुडी डेज़’ जैसी कहानियों की याद आयी जो कि हमारे लिए बहुत बड़ी तारीफ़ है।
     

     

    क्या आइडिया आने के बाद शो के लिए रिसर्च की या आपको पहले से ही इस परिवेश की अच्छी जानकारी थी?

     

    हालाँकि, मैं गाँव में रहा बहुत कम हूँ लेकिन वहाँ के परिवेश की ठीक-ठाक जानकारी मुझे पहले से थी। रही बात पंचायती राज व्यवस्था की तो उसके बारे में ज़्यादा जानकारी रिसर्च से आयी। आइडिया आने के बाद हमें शो की रिसर्च के लिए हमने कुछ गाँवों के प्रधानों और सचिवों से बात की थी।

     

     

    एपिसोड 4 ‘हमारा नेता कैसा हो’ में स्लोगन से जुड़ा जो टकराव पैदा होता है वो दिलचस्प और वास्तविक लगता है। ये विचार क्या रिसर्च से आया? 

     

    स्लोगन वाले एपिसोड का विचार मुझे लोकेशन रेकी के समय आया था जब हम लोग भोपाल के पास एक गाँव में घूम रहे थें। फिर मैंने पता करने की कोशिश की कि क्या कभी ऐसा हुआ है कि किसी गाँव में स्लोगन की वजह से झगड़ा हुआ हो। आख़िरकार, मुझे कुछ न्यूज़ आर्टिकल भी मिलें जिसमें इस तरह की घटनाओं का वर्णन था।

     

     

    शो के नायक ग्राम-सचिव अभिषेक त्रिपाठी का किरदार कैसे गढ़ा?

     

    ये हम लोगों को शुरू से ही स्पष्ट था कि अभिषेक त्रिपाठी एक एवरेज लड़का होगा। उसकी कहानी हर उस एवरेज इंसान की कहानी होगी जो ढंग से पढ़ाई लिखाई ना करने के कारण ऐसी नौकरियों में फँसे होते हैं जिन्हें वो कभी करना ही नहीं चाहते थें। हालाँकि उसके सपने भी बड़े हैं लेकिन क्या वो उनके लायक भी है? यही अभिषेक त्रिपाठी की कहानी है। जैसे, ज़्यादातर एवरेज विद्यार्थी एक बार में CAT पास नहीं कर पातें, ये सच्चाई है। लोग कई प्रयासों के बाद भी IIM नहीं पहुँच पाते हैं।

     

    नए कलाकार चंदन रॉय की बहुत तारीफ़ हुई है। उनके किरदार ग्राम सहायक विकास को आपने कैसे लिखा? पूरे शो की कास्टिंग में आपका कितना दख़ल रहा?

     

    विकास का किरदार गाँव के हर उस सीधे-सादे लड़के का प्रतिनिधित्व करता है जो कि अपनी ज़िंदगी में बहुत ख़ुश हैं और यही उसके जीवन जीने का तरीक़ा भी है। ये किरदार अभिषेक त्रिपाठी के किरदार से एकदम उलट है और शायद इसी वजह से इन दोनों की जोड़ी स्क्रीन पर जमती है। चंदन रॉय ने इसे बख़ूबी निभाया है। मैं शो की कास्टिंग में भी पूरी तरह से जुड़ा हुआ था।
     

     

    आपके लिए शो का सबसे पसंदीदा एपिसोड या सीन कौन सा है?

     

    मेरा सबसे पसंदीदा एपिसोड है एपिसोड 5 - कंप्यूटर नहीं मॉनिटर। इसी एपिसोड में जब प्रधान जी खाना बैठते हैं; वहाँ से लेकर एपिसोड के अंत तक, मुझे सारे सीन बहुत पसंद हैं।

     

     

    यूँ तो लॉकडाउन के चलते चीज़ें थमी हुयी हैं, लेकिन क्या आपने दूसरे सीज़न पर काम शुरू कर दिया है? और किस तरह के शो या फ़िल्म पर काम कर रहे हैं? 

     

    अभी अगले सीज़न पर काम शुरू नहीं हुआ है। लेकिन कुछ विचार हैं और ये पता है कि कहानी आगे किस दिशा में ले जानी है। पंचायत के अलावा मैं एक दो और आइडिया पर काम कर रहा हूँ। जब इन्हें अच्छे से परख लूँगा तब पता चलेगा कि इन पर शो बन सकता है या फ़िल्म।

    दिनकर शर्मा फ़्रीलांस लेखक-निर्देशक हैं। उन्होंने एफ़टीआइआइ (पुणे) से पटकथा लेखन की पढ़ाई की और बाद में, विस्लिंगवुड्स इंटरनैशनल में स्क्रीनराइटिंग फ़ैकल्टी के बतौर कार्य किया। वे एफ़टीआइआइ और डबल्यूडबल्यूआइ पर गैस्ट स्क्रिप्ट-मेंटर तथा एफ़टीआइआइ के शॉर्ट-टर्म स्क्रीनराइटिंग कोर्स में गैस्ट-फ़ैकल्टी भी हैं।